महँगाई पर निबंध-Mehangai Par Nibandh

महँगाई पर निबंध

महँगाई पर निबंध-Mehangai Par Nibandh

महँगाई! सुरसा की तरह मुँह फैलाती महँगाई। रक्तप की तरह रक्त चूसती महँगाई । जिधर जाइए, जहाँ जाइए, आम आदमी की जिह्वा पर मँहगाईरूपी काल-सर्पिणी की चर्चा आपको सुनाई पड़ेगी। महँगाई की मार से बचे लोगों की संख्या बहुत कम है। बड़े-बड़े धन्नासेठों, मुनाफाखोर व्यापारियों, ठेकेदारों, घूसखोर अफसरों, तुंदिल तस्करों और भ्रष्ट राजनेताओं को छोड़कर भारतवर्ष का शेष संपूर्ण जनजीवन महँगाई की चक्की में पिस रहा है। उत्तम भोजन, उत्तम वसन और उत्तम निकेतन तो दूर की कौड़ियाँ हैं, महँगाई के कारण सामान्य जनों को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं। तन ढकने के लिए कपड़े और सर छिपाने के लिए छत का सहारा भी महँगाई ने दूभर कर रखा है।

करोड़ों लोग पशुवत् जीवन बिता रहे हैं, आदमी होकर भी आदमी से बदतर जिंदगी पाल रहे हैं। कहा जाता है कि रामराज्य में बिना मूल्य वस्तुएँ बाजार में उपलब्ध हो जाती थीं। मुगलों और अँगरेजों के शासनकाल में भी एक रुपए में बीस-पचीस सेर अनाज तथा पाँच-छह आने में एक गज कपड़ा मिल जाता था, लेकिन आज की स्थिति ऐसी हो गई है कि आदमी कीमतों के सामने बौना हो गया है। आजादी के पूर्व चीन में मुद्रास्फीति का एक ऐसा दौर आया था कि लोग एक बोरा नोट ले जाते थे और एक जोड़ा जूता खरीद लाते थे। हमारे यहाँ भी यही हालत न हो जाए, 

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इसीलिए एक कवि ने लिखा 

कौन खाई है,

कि जिसको पाटती हैं कीमतें

उम्र को तेजाब बनाकर चाटती हैं कीमतें। 

आदमी को

पेट का चूहा बनाकर रात-दिन

नोंचती हैं, कोंचती हैं 

काटती हैं कीमतें। 

स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता के बाद की मूल्यवृद्धि पर विचार करें, तो अद्भुत बदलाव नजर आता है। 1939 ई० के द्वितीय महायुद्ध से आरंभ हुई मूल्यवृद्धि ने कीमतों का जो विस्तार आरंभ किया, वह फैलाव लगातार बढ़ता जा रहा है। विश्वयुद्ध के कारण खाद्यान्न जैसी मूलभूत वस्तुओं का अभाव हो गया। उत्पादन का बहुलांश युद्धसाधनों की पूर्ति में व्यय होने लगा। यद्यपि सरकार ने राशन द्वारा मूल्य-नियंत्रण करना चाहा, लेकिन कीमतों की विकरालता बढ़ती ही चली गई। 1946-47 में सामान्य मूल्य-स्तर का सूचकांक 1938-39 के मुकाबले लगभग ढाई गुना हो गया।

यदि भारत की आबादी के बाद के चालीस वर्षों की मूल्यवृद्धि पर दृष्टिपात किया जाए, तो मन काँप उठता है। 1947 ई० की तुलना में 1987 ई० के मूल्य अविश्वसनीय हद तक चौंकाते हैं। 1947 ई० में यदि साधारण चावल अड़तालीस पैसे सेर मिलता था, तो आज सात रुपये पचास पैसे किलो मिल रहा है। 1947 ई० में गेहूँ पैंतालीस पैसे सेर मिलता था तो आज सात रुपये किलो मिल रहा है। 1947 ई० में चने की दाल चालीस पैसे सेर मिलती थी तो आज उसकी कीमत बारह रुपये किलो हो गई है। 

उन दिनों आलू बीस पैसे सेर मिलता था, तो आज चार-पाँच रुपये किलो से कम नहीं मिलेगा। प्याज आज चार रुपये किलो मिल रहा है, 1947 ई० में बीस पैसे सेर मिल जाता था। उन दिनों दो-तीन रुपयों में एक टोकरी नारंगियाँ मिलती थीं, तो आज रुपये में एक भी नारंगी मिल जाए तो आप बड़भागी हों। सरसों तेल की कीमत तबसे बारहगुनी अधिक हो गई है। उन दिनों पाँच रुपये में तीन-चार सेर शुद्ध घी मिलता था, तो आज संदिग्ध घी भी पचहत्तर-अस्सी रुपये किलो मिल रहा है।

1947 ई० में एक जोड़ी धोती या साड़ी पाँच-छह रुपये में मिलती थी। तो आज वैसी धोती या साड़ी खरीदने के लिए कम-से-कम सौ रुपये देने होंगे। इस देश की आजादी के प्रारंभिक दिनों में मध्यवित्तीय परिवार के लोग काजू और किशमिश पूँजे की तरह फाँकते थे, जबकि आज किसी अनुष्ठान या पूजा के अवसर पर एक-दो छटाँक सूखे मेवे खरीदकर लोग गौरव का अनुभव करते हैं। पूँजीपतियों की लालची धनबटोर प्रवृत्ति के कारण यंत्रोत्पादनों की कीमतें भी आकाश छू रही हैं। 1946 ई० में पाँच-छह हजार रुपये में एक मोटर आ जाती थी, जबकि आज लाख रुपये देने पर भी मोटर प्राप्त करने में कठिनाई होती है। कीमतों ने तमाम मानवीय मूल्यों को जमीन पर खड़ा किया है। यह एक नग्न सत्य है। एक कवि ने बदलते हुए मूल्यों के संदर्भ में लिखा 

भारत में जनम बिना, यदि रहा न जाए, 

आनेवाला दुष्टजन, इतनी दया दिखाए, 

कि गल्ला लेकर जनमे। 

राशन की दुकान में सीता खाली जाए, 

महँगाई की शूर्पणखा, मन-ही-मन मुस्काए, 

कि राम की नाक कट गई। 

महँगाई के लिए जनता में मचे हाहाकार के संदर्भ में सरकार बार-बार यही कहती कि महँगाई केवल भारतवर्ष में ही नहीं, सारे संसार में बढ़ी है। यह सही भी है, लेकिन संसार के अधिकांश देशों में प्रतिव्यक्ति आय भारत से बहुत अधिक बढ़ी है। संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रतिव्यक्ति आय 4673 डॉलर, कनाडा में 3769 डॉलर, डेनमार्क में 3192 डॉलर, आस्ट्रेलिया में 2919 डॉलर, फ्रांस में 2851 डॉलर, बेल्जियम में 2721 डॉलर, ब्रिटेन में 2218 डॉलर, जापान में 1900 डॉलर और फिलिपींस में 246 डॉलर है, तो भारत में कुल 88 डॉलर मात्र है। प्रतिव्यक्ति आय से 

उस देश के जीवन-स्तर की जानकारी होती है। इसी कारण यदि अमेरिका में महंगाई हो, तो भी भारत की प्रतिव्यक्ति आय से 52 गुनी अधिक आय वहाँ के नागरिकों की है। वहाँ का व्यक्ति दीन भी है, तो वह है वामन-विराट और हम दीन है, तो हे निपट वामन। अमेरिका ही नहीं, तीसरी दुनिया के बहुत-सारे छोटे-छोटे देश भी अपनी अमीरी के लिए विख्यात हैं। भारत महँगाई का मारा गरीब देश है और उसमें भी सबसे दरिद्र राज्य बिहार ही है। जिस देश का सामान्य व्यक्ति महँगाई के बोझ से कराहता रहा है, उसका जनजीवन निराशाओं के खौलते तैलकुंड के सिवा और क्या होगा?

यहाँ के औसत व्यक्ति का जीवन चूसकर फेंके गए गन्ने जैसा है। महँगाई ने हमारी यही नियति बना दी है कि हम जन्म लें, जैसे-तैसे जीवन बिताएँ और अंत में गुमनामी के अंधकार में विलीन हो जाएँ। यदि हम महँगाई पर नियंत्रण नहीं कर पाते, तो किसी दिन रक्त-क्रांति समूचे देश के जनजीवन को लहूलुहान कर देगी, इसमें संदेह नहीं। 

महँगाई की मार से मुकाबला तभी हो सकता है, जब देश के नागरिकों की गरीबा दर हो। यह गरीबी तभी दूर हो सकती, जब देश की गरीबी दूर हो। देश का गराबा दर करने और बढती महँगाई से त्राण पाने का एक ही रास्ता है-राष्ट्रीय आयम वाद्ध तथा जनसंख्या-वद्धि पर रोक। जनसंख्या-वद्धि पर रोक तो नागारका के सर्किय सहयोग के बिना संभव नहीं।

सरकार और नागरिक दोनों मिलकर ईमानदार कोशिश कर, बाधा-विपदाओं पर विजय पाएँ तो आधनिकतम पद्धति पर देशव्यापी कृषि, 3ात आर मानवश्रम का कशलतम उपयोग कर पानेवाले उद्योगों की बदौलत हम राष्ट्रीय आय बढ़ाकर प्रति व्यक्ति आय का स्तर ऊँचा कर सकते हैं। महँगाई की सुरसा विशाल होते मुँह से स्वयं को बचाने का एक ही रास्ता हमारे सामने है। 

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