प्रजातंत्र में मीडिया की जिम्मेदारी अथवा सु-शासन में मीडिया की भूमिका 

सु-शासन में मीडिया की भूमिका 

प्रजातंत्र में मीडिया की जिम्मेदारी अथवा सु-शासन में मीडिया की भूमिका (आईएएस मुख्य परीक्षा, 2008) 

मीडिया को प्रजातंत्र के प्रहरी के रूप में अभिहित किया जाता है। ऐसे में मीडिया का यह दायित्व बनता है कि वह लोकतंत्र में प्रहरा की अपनी भूमिका पर किसी भी तरह से आंच न आने दे। चूंकि भारत में मीडिया जनास्था का केन्द्र है, अतएव उसे और अधिक जिम्मेदारी से काम करना चाहिए। मीडिया के समाज में बढ़ते हुए प्रभाव को देखते हए यह आवश्यक है कि मीडिया पूरी गंभीरता से अपनी जिम्मेदारी को समझे तथा प्रजातंत्र की जड़ें मजबूत करने में योगदान दे। 

“प्रजातंत्र में मीडिया को नागरिकों के अधिकारों का प्रहरी बताया जाता है।” 

वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रजातंत्र की आधारशिला है। इस अधिकार के बिना प्रजातंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती है। भारतीय नागरिकों को संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत जो मौलिक अधिकार दिए गए हैं उनमें वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मौलिक अधिकार है। अनुच्छेद के खण्ड(2) में इस अधिकार पर प्रतिबंध भी लगाया गया है जिसमें कहा गया है कि देश की एकता, अखण्डता, राज्य की सुरक्षा, राज्यों के मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, लोक शिष्टाचार के हित में अथवा न्यायालय की अवमानना, मानहानि अपराध उद्दीपन के सम्बंध में इस अधिकार पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाया जा सकता है। इस अनुच्छेद में प्रेस की स्वतंत्रता का अलग से उल्लेख न किए जाने की कड़ी आलोचना की जाती है। संविधान निर्माण के समय संविधान सभा में भी इस पर आवाज उठाई गई थी। प्रेस की स्वतंत्रता का संविधान में न उल्लेख करने के पक्ष में संविधान निर्माताओं ने दो तर्क दिए थे—प्रथम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में प्रेस की स्वतंत्रता अंतर्निहित है। वस्तुतः अभिव्यक्ति पद में संचार के सभी साधनों यथा रेडियो, टीवी, मुद्रित सामग्री का समावेश है। द्वितीय-संविधान का यह भाग नागरिकों को दिए जाने वाले मूल अधिकारों की व्याख्या करता है और प्रेस नागरिक की परिभाषा के अंतर्गत नहीं आता। फिर भी संविधान सभा में डॉ. अम्बेडकर ने कहा था, ‘प्रेस पर वे सभी निबंधन लागू होंगे जो एक नागरिक पर लागू होते हैं।’ 

प्रजातंत्र में मीडिया को नागरिकों के अधिकारों का प्रहरी बताया जाता है। किन्तु सच्चाई इससे कोसों दूर है। विभिन्न सरकारी. अर्धसरकारी संस्थाओं द्वारा नागरिकों के अधिकारों का प्रायः हनन किया जाता है। किन्तु मीडिया जगत् प्रायः ऐसे अवसरों पर मूक बना रहता है। इमरजेंसी के दौरान समाचार पत्रों की भूमिका से कौन भारतीय परिचित न होगा। मीडिया की आज उस भूमिका में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। सत्ताधारियों के समक्ष घुटने टेकना और चाटुकारिता करना आज मीडिया का स्वभाव बन चुका है। यहां यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि मीडिया के सभी अंगों-उपांगों का यह स्वभाव नहीं है। मीडिया से संबंधित कुछ गिनी-चुनी संस्थाएं ऐसी भी हैं जो निष्पक्ष और स्वच्छ पत्रकारिता हेतु कटिबद्ध हैं। बोफोर्स कांड, ताबूत घोटाला, सैन्य अस्त्रों की खरीद से संबंधित घोटाला, रिश्वत प्रकरण इत्यादि अनेक ऐसे मामले हैं जिसमें मीडिया ने सारी सच्चाई जनता के सामने रख कर केन्द्र सरकार को उचित कार्यवाही हेतु विवश किया। लगभग एक दशक पूर्व फेयर फैक्स प्रकरण, यूरिया खाद घोटाला, पाठक रिश्वत प्रकरण, झामुमो रिश्वत प्रकरण, हर्षद मेहता प्रकरण को उजागर कर मीडिया ने अच्छी जिम्मेदारी निभाई है। 

स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए आवश्यक है। किसी लोकतंत्र के मूल्यांकन के लिए उसमें होने वाले चुनावों तथा क्रियाशील मीडिया तंत्र की परख पर्याप्त है। किसी देश के राजनीतिक समाज में विधायी संस्थाएं जितनी निष्पक्षता और स्वतंत्रता से चुनी जाती हैं और मीडिया तंत्र जितनी निर्भीकता और ईमानदारी से अपने दायित्वों का निर्वहन करता है उस राजनीतिक समाज को चारित्रिक दृष्टि से उतना ही उत्कृष्ट और संपूर्ण माना जाता है। इसीलिए लोकतांत्रिक देशों में मीडिया की स्वतंत्रता व निष्पक्षता को बनाए रखने की आवश्यकता महसूस की जाती है। हालांकि चनावों की निष्पक्षता सुनिश्चित करना चुनाव आयोग तथा सरकार का औपचारिक दायित्व है लेकिन व्यावहारिक रूप से इसका दायित्व मीडिया पर भी कम नहीं है। बल्कि यदि कहा जाय कि चुनावों की निष्पक्षता को बनाए रखने में मीडिया ही सर्वाधिक उत्तरदायी है तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी। 

मीडिया तंत्र मतदाता के मन को, उसके विवेक को प्रभावित करता है। अतः मीडिया का यह दायित्व बनता है कि जनमानस के समक्ष वस्तुस्थिति की तस्वीर निष्पक्षतापूर्वक रखे। ताकि उसके आलोक में मतदाता अपनी परिस्थितियों का विश्लेषण कर अपने लिए उपयुक्त तथा उपयोगी पक्ष सुनिश्चित कर सके। यहां मीडिया की भूमिका एक शुभेच्छ और मार्गदर्शक की होनी चाहिए न कि किसी पार्टी प्रचारक की। किन्तु वास्तव में स्थिति ऐसी नहीं है। मीडिया अब पार्टी प्रचारक की भूमिका में आने लगा है। वह तथ्यों की समीक्षा तोड़-मरोड़ कर कुछ इस तरह से मतदाता के समक्ष रखता है कि मतदाता भ्रमित हो जाता है। प्रायः मीडिया का प्रस्तुतिकरण ऐसा होता है कि अपने आप ही यह स्पष्ट हो जाता है कि मीडिया का कौन सा उपांग किसी राजनीतिक पार्टी में निष्ठा रखता है।

यह स्थिति अशोभनीय और खतरनाक भी है। लोकतंत्र में मीडिया की इस भूमिका की सराहना किसी भी स्थिति में नहीं की जा सकती है। यह एक स्थापित मान्यता है कि चुनावों के समय मतदाताओं को प्रभावित करना अनुचित है। आचार संहिता लागू होने के बाद लोक हितकारी योजनाओं की घोषणाओं पर चुनाव आयोग इसी दृष्टि स रोक लगाता है। किन्त कठिनाई यह है कि मीडिया पर इस तरह का रोक लगाया जाना कठिन है। कभी विवाद उठता भी है तो या आभव्यक्ति की आजादी के नाम पर अपना बचाव कर लेता ह। हालांकि मीडिया से जडे कछ निष्पक्ष और निष्ठावान लोग पनप रही इस दुष्प्रवृत्ति पर लगाम लगाने के पक्षधर हैं और वे  चारित्रिक उत्कृष्टता और निष्पक्षता को बनाए रखने की सलाह भी एक सपूर्ण मीडिया तंत्र राजनीतिक दलों के दबाव तथा अपने मीडिया में पनप रही इस दुष्प्रवृत्ति पर निजी स्वार्थों के वशीभूत हो अपनी नैतिक जिम्मेदारी से विलग हो जाते हैं। 

“किसी लोकतंत्र के मूल्यांकन के लिए उसमें होने वाले चुनावों तथा क्रियाशील मीडिया तंत्र की परख पर्याप्त है।” 

विश्व के लगभग सभी देशों में प्रेस की स्वतंत्रता को महत्त्व दिया गया है। अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, डेनमार्क, आयरलैण्ड, जर्मनी आदि तमाम देशों में प्रेस की स्वतंत्रता को स्वीकारा गया है। भारत में प्रेस की स्वतंत्रता की अवधारणा अमेरिकी अवधारणा से ली गयी है जो कतिपय युक्तिसंगत निर्बंधों से सीमित है। संदेह नहीं कि हमारे देश के मीडिया ने कई स्थानों पर उत्तरदायी भूमिका निभाई है। लोकतंत्र की सुरक्षा तथा जनमत के निर्माण में इसकी अहम भूमिका रही है। देश में लोकतंत्र की जड़ों को गहरा करने में और लोकतंत्र रूपी वृक्ष को पल्लवित करने में मीडिया का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है किन्तु यह भी सत्य है कि कई स्थानों पर मीडिया ने ही नैतिक नियमों एवं प्रतिमानों को तोड़ा है। यही कारण है कि आज मीडिया को आचार संहिता द्वारा बांधने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

वर्तमान में भारत में मीडिया पर अंकुश रखने के लिए केवल टीवी रेगुलेशन एक्ट, 1994, इंडिसेंट रिप्रेजेंटेशन ऑफ वीमेन एक्ट 1986, भारतीय दण्ड संहिता के अतिरिक्त ब्राडकास्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया, भारतीय फिल्म सेंसर एवं प्रमाणन बोर्ड, भारतीय प्रेस परिषद् आदि संस्थाएं हैं किन्तु सरकारी इच्छाशक्ति के अभाव में मीडिया पर अपेक्षित प्रतिबंधों का आरोपण नहीं हो पा रहा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 में दिए गए युक्तियुक्त प्रतिबंध मीडिया पर अंकुश लगाने के लिए एक उपयुक्त तथा सशक्त आधार साबित हो सकता है किन्तु इसके लिए सरकारी इच्छा शक्ति की आवश्यकता है। बेहतर तो यही होगा कि भारतीय मीडिया अपनी उज्ज्वल छवि को लेकर स्वयं फिक्रमंद हो तथा उच्छृखलता, अगंभीरता एवं छिछलेपन से बचे। भारतीय मीडिया के उच्च प्रतिमान रहे हैं। ऐसे में उसका यह दायित्व बनता है कि वह इन उच्च प्रतिमानों को और संदर रूप दे और इन्हें क्षरण से बचाए। जनतंत्र की मजबूती एवं मीडिया की साख दोनों को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है। 

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