मैला ढोने की प्रथा क्या है | भारत में मैला ढोने की कुप्रथा पर निबंध (Manual Scavenging in India) 

मैला ढोने की कुप्रथा पर निबंध

मैला ढोने की प्रथा क्या है | भारत में मैला ढोने की कुप्रथा पर निबंध (Manual Scavenging in India) 

 भारत में मैला ढोने की कुप्रथा की जड़ें बहुत गहरी हैं। यह सामंती युग में शुरू हुई और अनेक कालों से होकर गुजरती हुई आज भी जारी है, जबकि हमें स्वतंत्र हुए सात दशक से भी ज्यादा समय हो चुका है। कहीं न कहीं यह कुप्रथा सामाजिक असमानता और भेदभाव से जुड़ी है। मैला ढोने से अभिप्राय फ्लश-प्रणाली रहित एवं पानी रहित शुष्क शौचालयों से मानव मल-मूत्र को साफ कर, उसे बाल्टियों या टोकरों में भरकर अपने सिर पर लाद कर ले जाने और उसका निपटान करने से है। खुली नालियों एवं सेप्टिक टैंकों की सफाई, रेलवे ट्रैकों पर पड़े मल-मूत्र की सफाई एवं सीवर आदि की सफाई के कामों को भी इस समस्या से जोड़कर देखा जा सकता है। जिस तरह से हर व्यक्ति को साफ-सुथरे पर्यावरण में रहने का अधिकार है, उसी तरह उन लोगों को भी है, जो मैला ढोकर अमानवीयता का संत्रास रोज झेलते हैं। ऐसा करते हुए उन्हें अस्वस्थ कर देने वाली स्थितियों से तो गुजरना ही पड़ता है, उनके मान-सम्मान पर भी ठेस पहुंचती है। दुख इस बात का है कि सामाजिक समानता के तमाम प्रयासों के बावजूद आजाद भारत में यह कुप्रथा आज भी विद्यमान है। 

“हमें स्वतंत्र हुए छह दशक से भी ज्यादा समय हो चुका है। कहीं न कहीं यह कुप्रथा सामाजिक असमानता और भेदभाव से जुड़ी है। मैला ढोने से अभिप्राय फ्लश-प्रणाली रहित एवं पानी रहित शुष्क शौचालयों से मानव मल-मूत्र को साफ कर, उसे बाल्टियों या टोकरों में भरकर अपने सिर पर लाद कर ले जाने और उसका निपटान करने से है।” 

इस समस्या की जड़ें हमारे देश में व्याप्त सामाजिक-आर्थिक असमानता में छिपी है। इस तरफ डॉ. भीमराव अंबेडकर ने ध्यान भी आकर्षित किया था। उनका मानना था कि मनुष्यों में केवल राजनीतिक समानता और कानून के समक्ष समानता स्थापित करके समानता के सिद्धांत को पूरी तरह सार्थक नहीं किया जा सकता। जब तक उनमें सामाजिक-आर्थिक समानता स्थापित नहीं की जाती तब तक उनकी समानता अधूरी रहेगी। डॉ. अम्बेडकर ने भारतीय संविधान का प्रारूप प्रस्तुत करते समय संविधान सभा में कहा था- “इस संविधान को अपनाकर हम विरोधाभासों से भरे जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। इससे राजनीतिक जीवन में तो हमें समानता प्राप्त हो जाएगी, परंतु सामाजिक और आर्थिक जीवन में विषमता बनी रहेगी।” भारत में मैला ढोने की कुप्रथा के रूप में यह विषमता ही जिम्मेदार है, जिसे हम आजादी मिलने के इतने वर्षों बाद भी दूर नहीं कर पाए हैं। मैला ढोने वालों के ‘उत्पीडित समूह’ गांवों, कस्बों, शहरों में आज भी देखे जा सकते हैं, भले ही सरकारी आंकड़ों में उन्हें नगण्य दर्शाया जा रहा हो। जाहिर है, हम अपनी समाज व्यवस्था को बदल नहीं पाए हैं, निःसंदेह मैला ढोने जैसी कुप्रथा के पीछे बहुत कुछ उन अत्याचारपूर्ण तत्त्वों का योगदान है, जो हमारे समाज में गहरे से पैठ बनाए हुए हैं। 

हमारे देश में पारम्परिक रूप से तो सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा तो जारी ही है, बड़े शहरों व कस्बों आदि में यह एक अन्य रूप में देखने को मिलती है। आबादी बढ़ने के साथ-साथ शहरीकरण बढ़ा है। शहर न सिर्फ बेतरतीबी से बढ़ रहे हैं, बल्कि उसी के साथ नाले-नालियों की संख्या भी बढ़ रही हैं। गंदगी भी बढ़ी है। सेप्टिक टैंक और नाले-नाली चोक हो जाते हैं, जिनकी सफाई समय-समय _ पर शहरी निकायों द्वारा करवाई जाती है। यह सफाई का काम फावड़े-कुदालों आदि से सफाई कर्मियों द्वारा किया जाता है और इस प्रकार जो गंदगी और मल बाहर आता है, उसकी सफाई भी मनष्यों द्वारा ही की जाती है। यह भी एक अमानवीय कृत्य है, जिससे होकर सफाई कर्मियों को गुजरना पड़ता है। 

इस कुप्रथा को लेकर सरकारें कितनी संजीदा हैं, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके पास इस बात के पर्याप्त आंकड़े तक नहीं हैं कि वर्तमान में कितने लोग इस कुप्रथा को ढो रहे हैं। राज्य सरकारें सीधे-सीधे यह कहकर पल्ला झाड़ लेती हैं कि उनके राज्यों में यह कुप्रथा समाप्त हो गई है और कोई भी व्यक्ति उनके यहां सिर पर मैला नहीं ढोता है। जबकि इस तस्वीर का दूसरा रुख यह है कि यह कुप्रथा समूचे देश के विभिन्न हिस्सों में विद्यमान है। गैर-सरकारी आंकड़ों के अनुसार आज भी देश में लगभग 10 लाख लोग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मैला ढोने के काम में लगे हैं। उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में स्थिति कुछ ज्यादा ही चिंताजनक है। राजस्थान, उत्तराखंड, नगालैण्ड, महाराष्ट्र, बिहार, झारखण्ड, हरियाणा एवं कर्नाटक देश के वे राज्य हैं, जहां आज भी इस कुप्रथा का अस्तित्व कायम है।

मैला ढोने की इस कुप्रथा के अनेक दुष्परिणाम उन लोगों को झेलने पड़ते हैं, जो इस काम में लगे हैं। ये लोग ससम्मान एवं स्वस्थ रूप से जीवन यापन नहीं कर पाते हैं। इस अमानवीय कुप्रथा को ढोने वाले अनेक प्रकार की बीमारियों के शिकार होकर असमय ही चल बसते हैं। उनका पूरा कुनबा अभिशप्त हो जाता है। सेप्टिक टैंकों की सफाई करने वाले भी अक्सर यह जोखिम भरा काम करते हुए मौत ा ग्रास बन जाते हैं। एक विडंबना यह भी है कि जिन लोगों को इस काम से मुक्ति मिल भी जाती है, तो उनका अभिशप्त अतीत उनका पीछा नहीं छोड़ता है। फलतः उन्हें जीवकोपार्जन के लिए कोई सम्मानजनक काम नहीं मिल पाता है। इस स्थिति में उन्हें विवश होकर पुराने काम को दोबारा शुरू करना पड़ता है। 

“हमारी पंचवर्षीय योजनाओं में भी इस दिशा में प्रयास किए गए। हमारी 10वीं पंचवर्षीय योजना में इस दिशा में पहली बार ध्यान दिया गया और यह तय किया गया कि मैला ढोने की प्रथा का उन्मूलन किया जाएगा।” 

हमारे देश में मैला ढोने वालों की अमानवीय स्थिति की तरफ बराबर सरकार का ध्यान आकर्षित किया जाता रहा और इसके उन्मूलन के लिए दबाव भी बनाया गया। सरकार जागी और उसकी तरफ स पहली पहल वर्ष 1993 में हुई। सरकार ने ‘मैला ढोने वाला का रोजगार और शुष्क शौचालय निर्माण (निषेध) कानून’ बनाकर इस कुप्रथा का उन्मूलन करना चाहा, किंतु सफलता नहीं मिली। कारण, न तो इस कानून का दायरा व्यापक था और न ही यह बहुत सुचिंतित एवं समग्र ही था। इस कानून की आलोचना भी हुई। इस कानून की कमियों को दूर करने एवं मैला ढोने की कुप्रथा के उन्मूलन के उद्देश्य से ‘मैला ढोने के नियोजन का प्रतिषेध एवं पुनर्वास अधिनियम, 2013’ को लागू किया गया। यह एक असरदार एवं व्यापक कानून माना जा रहा है। इस अधिनियम के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी जहां स्थानीय प्राधिकरणों, जिला मजिस्ट्रेटों, सार्कता एवं निगरानी समितियों को सांपी गई है. वहीं मैला ढुलाने को संज्ञेय गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में रखा गया है। कानून के उल्लंघन पर एक से पांच वर्ष के कारावास एवं पांच लाख रुपये जुर्माना का प्रावधान है। इसमें मैला ढुलाई से मुक्ति पाने वालों के पनर्वास का भी प्रावधान है। इसके अलावा भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस कुप्रथा को रोकने की पहले सरकार की तरफ से होती रहीं जिनमें से प्रमख हैं-राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयाग अधिनियम 1993, मैला ढुलाई के सम्पूर्ण उन्मूलन हेतु राष्ट्रीय योजना, 2007, मैला ढुलाईकर्ताओं के पुनर्वास हेतु स्वनियोजन योजना, सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान, मैला ढुलाईकर्ताओं की आजादी एवं पुनर्वास की राष्ट्रीय योजना, एकीकृत अल्प लागत स्वच्छता योजना, भुगतान कर शौचालय प्रयोग की योजना एवं राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी वित्त एवं विकास निगम आदि। हाल में शुरू किए गए ‘स्वच्छ भारत अभियान’ से भी आशा जागी है।

हमारी पंचवर्षीय योजनाओं में भी इस दिशा में प्रयास किए गए। हमारी 10वीं पंचवर्षीय योजना में इस दिशा में पहली बार ध्यान दिया गया और यह तय किया गया कि मैला ढोने की प्रथा का उन्मूलन किया जाएगा। मैला ढोने की प्रथा से मुक्ति दिलवाने, इसमें लगे लोगों को रोजगार दिलवाने तथा आधुनिक शौचालयों आदि के लिए 460 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट भी आवंटित किया गया, किन्तु इस योजना का कड़वा सच यह है कि योजना के दौरान पूरा आवाटेत धन ही नहीं खर्च किया जा सका। मात्र 146 करोड़ ही खर्च हुए। जाहिर है, प्रशासनिक स्तर पर शिथिलता बरती गई और इस प्रथा का सफाया नहीं किया जा सका, जबकि पांच वर्ष का समय ऐसे काम के लिए कम नहीं होता है। दसवीं पंचवर्षीय योजना के बाद 11वीं पंचवर्षीय योजना में पुनः यह प्रावधान किया गया कि 

वर्ष 2012 तक इस कप्रथा को पर्णतः समाप्त कर दिया जाएगा और । इसके लिए बाकायदा एक कार्ययोजना भी तैयार की गई। यह तय हुआ कि मैला ढोने वालों व उनके परिजनों का पुनर्वास किया जाएगा। इस बार भी करोड़ों फूंके गये, किंतु स्थिति में कोई विशेष बदलाव नहीं आया और 11वीं पंचवर्षीय योजना भी समाप्त हो गई। प्रश्न यह है कि यदि दो-दो पंचवर्षीय योजनाओं में दस वर्षों की अवधि में यह कुप्रथा समाप्त नहीं हो पाई, तो इसके लिए जवाबदेह कौन है? किसी की जवाबदेही तो तय होनी ही चाहिए। 

गैस-सरकारी प्रयासों के तहत इस कुप्रथा के नियंत्रण हेतु __‘सुलभ इंटरनेशनल’ के रूप में एक अच्छी पहल हमारे देश में हुई। सुलभ इंटरनेशनल संगठन की स्थापना हमारे देश में वर्ष 1970 में – की गई तथा इस संगठन द्वारा देशभर में सुलभ शौचालयों की स्थापना की गई। इससे जहां हाथ से मैला ढोने की कुप्रथा में कमी आई, वहीं स्वच्छता भी बढ़ी। इस कुप्रथा पर अंकुश के लिए आज ऐसे और प्रयासों की आवश्यकता महसूस की जा रही है। 

समस्या कोई भी हो, समाधान सबका होता है। मैला ढोने  जैसी प्रथा का भी उन्मूलन हो सकता है, बशर्ते इसके लिए समाज और सरकारें, दोनों न सिर्फ संवेदनशील हों, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति का भी परिचय दें। योजनाओं की जवाबदेही तय की जाए और उनके क्रियान्वयन में पारदर्शिता बरती जाए। इससे जुड़े आंकड़े जुटाए जाए तथा बनने वाली कार्ययोजनाओं की निगरानी इस तरह से सुनिश्चित की जाए कि उनमें भ्रष्टाचार की गुंजाइश ही न रहे और वे प्रभावहीन न साबित हों। कुप्रथा के सफाये के लिए यह भी आवश्यक है कि सफाई जैसे कार्यों में हम अपने संसाधनों को बढ़ाएं तथा सफाई की आधुनिक तकनीकों को इस्तेमाल में लाकर बेहतर साफ-सफाई तो सुनिश्चित ही करें, सफाईकर्मियों को भी राहत दें व उनके सम्मानजनक रोजगार और पुनर्वास की व्यवस्था करें। 

इस कुप्रथा के उन्मूलन हेतु सामाजिक स्तर पर भी प्रभावी पहल आवश्यक है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इलाहाबाद में आयोजित कुंभ 2019 के आयोजन में सफाई कर्मचारियों के पांव धोकर एक सामाजिक संदेश दिया। इस तरह के सामाजिक संदेशों की देश को जरूरत है। कुप्रथा के उन्मूलन के लिए हमें सामाजिक न्याय एवं सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना करनी होगी। देश के हर नागरिक को इस दिशा में सोचना चाहिए कि यह कितना अमानवीय कृत्य है, जो सिर्फ जीविका चलाने के लिए किया जाता है। इस सोच के साथ आगे आकर इसके उन्मूलन में देश का हर नागरिक तो सहयोग दे ही, हमारे धर्माचार्य, दार्शनिक व विद्वत्जन आदि भी आगे आकर ऐसा माहौल निर्मित करें कि देश से इस शर्मनाक कुप्रथा का उन्मूलन हो सके। जब हम बदलेंगे, तो सब कुछ बदलेगा। मैला ढोने वालों के जीवन में भी नया सवेरा होगा। 

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