मानव शरीर की बनावट की जानकारी

मानव शरीर की रचना

मानव शरीर की रचना

शरीर की इस कहानी में सबसे पहला प्रश्न यह आता है कि हमारा शरीर किस वस्तु से और कैसे बना है। शरीर के तत्व – 

क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा। पंच तत्त्व रचित यह मनुज सरीरा।। 

– तुलसीकृत रामायण

भारतीय दर्शन के अनुसार हमारे शरीर की रचना पंच-महाभूतों से हुई है, ये हैं – पृथ्वी, जल, तेज (अग्नि) वायु और आकाश। वास्तव में सिर्फ मनुष्य का शरीर ही नहीं, बल्कि पूरी सृष्टि को इन्हीं पांच तत्त्वों से बनी माना गया है। अब यह देखना है कि पांच तत्त्वों ने शरीर को किस तरह बनाया है – 

मानव शरीर की रचना-Human anatomy

मानव शरीर की रचना

पृथ्वी 

इसके अनेक नाम हैं, इसको जमीन भी कहा जाता है। नाम भले ही कुछ भी दिया जाए, परंतु अभिप्राय मिट्टी से है। लोक-व्यवहार में अकसर कहा जाता है कि “मिट्टी का तन अन्त में मिट्टी में मिल जाता है।” 

मिट्टी को मुंह पर रखकर देखा जाए, तो उसका स्वाद नमकीन होता है अर्थात् मिट्टी में नमक के कण होते हैं। घर में जो नमक हम प्रतिदिन दाल और सब्जियों में डालकर खाते हैं, यह भी एक नमक है और इसका मायनिक नाम ‘सोडियम क्लोराइड’ है। इस नमक के अलावा और भी परेक प्रकार के नमक होते हैं; जैसे पोटेशियम, कैल्शियम, मैंगनीज, तांबा, लोहा आदि धातुओं के नमक। 

हमारा शरीर बहुत छोटे-छोटे कोषों से बना है। कोषों के रासायनिक लेषण से अल्पांशों से ऊपर लिखे नमक मिलते हैं, किन्तु अधिक मात्रा में मोडियम क्लोराइड ही होता है। दूसरे नम्बर पर कैल्शियम (चूने) के लवण आते हैं। हमारे शरीर की हड्डियों का निर्माण अधिकांश में कैल्शियम से ही हुआ है। इस प्रकार नमकों के रूप में पृथ्वी-तत्त्व हमारे शरीर में स्पष्ट रूप से मौजूद हैं। 

जल

 तुम्हें यह जानकर आश्चर्य होगा कि हमारे शरीर की पेशियां और हड्डियां, जो स्पष्ट रूप से ठोस दिखाई देती हैं, इनमें अधिकांश रूप से पानी होता है। वास्तव में हमारे शरीर में 3/4 भाग पानी है। ऊपर लिखे नमक इस पानी में ही घुले होते हैं। सोडियम क्लोराइड नमक का अनुपात शरीर के पानी में एक प्रतिशत होता है, जो दूसरे नमकों की अपेक्षा सबसे अधिक है। 

तेज (अग्नि) 

हमारे शरीर में अग्नि तत्त्व भी है। इसके लिए किसी खास प्रमाण की जरूरत नहीं है। सभी लोग जानते हैं कि शरीर एक विशेष तापक्रम (98.4 डिग्री फारेनहाइट) तक गरम रहता है; शरीर इसी ताप से जीवित रहता है। मृत शरीर में ताप नहीं रह जाता। 

वायु 

हमारी श्वास-प्रश्वास क्रिया शरीर में वायु तत्त्व होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है। सामान्य रूप से हमारे फेफड़ों में 180 घन इंच वायु रहती है, लेकिन इस वायु का आवागमन जारी रहता है। वास्तव में वायु हमारे जीवन का अनिवार्य तत्त्व है। जल और भोजन के अभाव में हम कई दिनों तक जी रह सकते हैं, लेकिन यदि एक क्षण के लिए वायु ना मिले तो जीवन ही समाप्त हो जाता है। 

आकाश 

“शब्द गुणकमाकाशम्” आकाश का गुण शब्द (आवाज) माना गया है अर्थात जहां शब्द होता है, वहां आकाश तत्त्व है। हम बोलते हैं, तो शब्द पैदा होता है। हमारे शरीर में दिल के धड़कनें की आवाज़ सुनाई देती है, श्वास लेने-छोड़ने की आवाज़ भी आती है। इस प्रकार आकाश तत्त्व हमारे शरीर में है। 

मानव शरीर की जानकारी

विज्ञान के प्रकाश में 

माइक्रोस्कोप

 विज्ञान से जो शरीर-निर्माण के रहस्यों का पता चला है, वह सब जानकारी बड़ी चमत्कारपूर्ण और दिलचस्प है। माइक्रोस्कोप (सूक्ष यन्त्र) यही वह चमत्कारपूर्ण यन्त्र है, जिसकी सहायता से वैज्ञानिकों ने प्रकृति के अनेक रहस्यों का पता पाया है। शरीर की रचना और उसके भेदों को जानने-समझने में भी यह यन्त्र सबसे अधिक सहायक हुआ है। आंखों माइक्रोस्कोप से न दिखाई देने वाली वस्तु को जब माइक्रोस्कोप हजारों गुना बड़ा करके पेश करता है, तो वह हाथ की रेखाओं के समान साफ दिखाई देने लगती है। 

इस प्रक्रिया को समझने के लिए कल्पना करो कि ‘चन्द्रमा’ पर भी लोग रहते हैं. और वहां से वे हमारी पृथ्वी को एक बड़े गोले के रूप में देखते हैं, जिसमें उन्हें बादलों के रूप में छाया नजर आती है। 

एक दिन कोई चन्द्रमा-निवासी व्यक्ति पृथ्वी की ओर यात्रा के लिए चल पडता है। कुछ दूरी तय करने पर वह देखता है कि चन्द्रमा से अस्पष्ट दिखाई देने वाले धब्बों की जगह पृथ्वी पर समुद्र है और वहां द्वीप और महाद्वीपों का रंग हरा है। और आगे बढ़ने पर उसे पहाड़, जंगल, नदियां तथा मैदान साफ दिखाई देने लगते हैं। फिर जब वह यात्री पृथ्वी से सिर्फ एक मील जाता है तो उसे शहर, पुल और रेल की लाइनें तक स्पष्ट दिखाई देने लगती हैं।

डीएनए

आगे जब उसकी दूरी लगभग 200 सौ गज रह जाती है, तो उसे पथ्वी के लोग जानवर, मोटरगाड़ियां, बिजली के तार, मकान और खिडकियों की तक दिखाई देने लगते हैं। और समीप आने पर वह देखता है कि मकान ईंटों से बने हैं और इसी प्रकार वैज्ञानिकों ने जब माइक्रोस्कोप के माध्यम से खद अपने (मनुष्य के शरीर को देखा, तो पाया कि मानव देह भी एक प्रकार की ईंटों से बनी है – जिसे कोष (सेल) कहा जाता है। 

जीवन की ईंट – “कोष’ 

कोष' 

‘कोष’ सिर्फ मनुष्य शरीर को बनाने वाली ईंटें नहीं हैं, अपितु प्रत्येक जीवित वस्तु, पौधे, कीड़े-मकोड़े, जल चर, थल चर, पक्षी आदि सभी के शरीर का निर्माण कोषों से हुआ है। कोष स्वयं एक जीवित इकाई है। वास्तव में पृथ्वी पर जीवन ‘कोष’ के रूप में ही प्रस्फुटित हुआ। 

कोष एक जर्रे के समान रचना है, जिसके चारों ओर एक बहुत पतली-सी झिल्ली होती है। और उसमें गाढ़ा-सा द्रव भरा होता है। वैज्ञानिकों के हिसाब से कोष 

जीवन का प्रादुर्भाव समुद्र में हुआ; इसीलिए कोष में तरल पदार्थ अधिक होता है। कोष को ढकने वाली यह झिल्ली ही एक प्रकार से कोष के जीवन का संचालन करती है। पोषण (भोजन) इसी झिल्ली से छनकर कोष के भीतर पहुंचता है और हजम होने के बाद बचा हुआ मल-भाग इसी झिल्ली के जरिये छनकर बाहर निकल जाता है। कोष में भरे द्रव के मध्य एक और झिल्ली से लिपटी गाढ़े द्रव की एक बूंद-सी होती है, ठीक वैसे ही जैसे किसी बीज या गिरी में गूदा भरा रहता है। इसी गूदे को मींगी या केन्द्रक (न्यूक्लियस) कहा जाता है। 

वस्तुतः ये केन्द्रक ही कोष के प्राण होते हैं, शेष भाग शरीर है। यदि केन्द्रक नष्ट हो जाता है, तो कोष मर जाता है। वैज्ञानिक परिभाषा के अनुसार, यह केन्द्रक प्रोटोप्लाज़्म होता है, जो जीवन का मूल तत्त्व माना गया है। इसे जीवनीय द्रव भी कहा जाता है। 

एक-कोषीय आदि जीव – “एमीबा’ 

एमीबा' 

विज्ञान की मान्यता है कि अरबों वर्ष पहले जीवन का प्रादुर्भाव एक-कोषीय जीव ‘एमीबा’ के रूप में समुद्र में हुआ और सृष्टि का यह आदि प्राणी आज भी पानी-भरे गड्ढ़ों और तालाबों में पाया जाता है। एक कोषीय होने के कारण ‘एमीबा’ बहुत सूक्ष्म प्राणी है। इसका दर्शन माइक्रोस्कोप के नीचे ही हो पाता है। इसकी जीवन-लीला भी काफी दिलचस्प है। इसके पांव नहीं होते हैं और न कीड़ों की तरह रेंगने के अंग होते हैं, फिर भी यह चलता है। प्राय: 

भोजन प्राप्त करने के लिए इसे चलना पड़ता है। तब यह अपनी झिल्ली को दाईं ओर बाईं ओर से उंगलियों की तरह लम्बाई में बढ़ाता है और तुरन्त ही उनमें प्रोटोप्लाज्म भर जाता है। ये उंगलियां मिथ्यापाद (स्यूडोपोडिया) कहलाती हैं। 

इन्हीं मिथ्यापादों में एमीबा अपने भोज्य पदार्थ को घेरकर झिल्ली के जरिए आत्मसात कर लेता है। जैसा चित्र में दिखाया गया है मल-त्याग के लिए वह शरीर के किसी भी हिस्से पर दबाव डालता है और भोजन के अवशेष को झिल्ली के जरिए ही बाहर धकेल देता है। जनन अंग न होते हुए भी एमीबा उत्पादन करता है। ऊंचे दर्जे के प्राणियों में, जबकि उत्पादन-क्रिया काफी पेचीदा होती है, किन्तु एमीबा में यह बड़ी ही सरलता से सम्पादित हो जाती है।

जब केन्द्रक परिपक्व हो जाता है, अर्थात् उसमें काफी मात्रा में पोषक द्रव्य इकट्ठा हो जाता है, तो केन्द्रक लम्बाई में फैलता है और बीच में सिकुड़ता है, साथ ही उसका शरीर भी इसी अनुपात से सिकुड़ता और लम्बा होता है; फिर बीच से टूटकर एक के दो एमीबा बन जाते हैं, जैसा कि चित्र में दिखाया गया है और दोनों अपने में पूर्ण होते हैं। और यह सारी क्रिया कुछ मिनटों में सम्पादित हो जाती है।  इस प्रकार इस कोष के आदि जीवन के सभी लक्षण पाए जाते हैं। 

केन्द्रक

एक और तथ्य

 जीवन की इस मूल इकाई कोष के अनेक आकार-प्रकार होते हैं। लेकिन बुनियादी रूप से उनकी बनावट एक ही होती है अर्थात् हरेक कोष में बाहरी झिल्ली होती है और बीच में केन्द्रक और प्रोटोप्लाज्म होता है।

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