महात्मा गांधी के जीवन से जुड़ी रोचक कहानी

महात्मा गांधी की कहानी,

महात्मा गांधी के जीवन  से जुड़ी रोचक कहानी

ऐसे थे बापू 

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी के योगदान और उनके जीवन-दर्शन को भला कौन भुला सकता है। उनका पटोक कार्य निज स्वार्थ से परे, सादगी और सत्य से अतिप्रात काता अहिंसात्मक आंदोलन का सहारा लेकर देश को फिरंगियों से आजाद करा लेना उनके जैसे कर्मठ मानव के ही बस का था। अपनी दैनिक दिनचर्या में उनके क्रियाकलाप और रहने के तौर तरीकों से भी हमें काफी-कुछ सीखने को मिलता है। उनसे जुड़े कुछ ऐसे ही प्रसंग…। 

 

महात्मा गांधी की कहानी,

कस्तूरबा के लिए प्रेरणा बने 

गांधीजी के जीवन के बारे में एक सच यह भी है कि जो वह कहते थे उसे स्वयं भी किया करते थे।  गांधी जी के पत्नी कस्तूरबा कुछ दिनों से बीमार चल रही थी। यह देखकर गांधी जी ने अपनी पत्नी को एक सलाह दी उन्होंने कहा कि आप नमक खाना छोड़ दे तो आप तुरंत स्वस्थ हो जाओगी।

कस्तूरबा ने गांधी की तरफ देखा और फिर बोला बिना नमक के भोजन कैसे किया जा सकता है।

तभी गांधी जी ने बोले नमक छोड़ कर तो देखो तुम्हें खुद पता चल जाएगा।

कस्तूरबा ने गांधी जी की बात सुनकर बोली पहले आप नमक छोड़कर दिखाइए तब मैं सोचूंगी।

गांधी जी ने यह बात सुनकर उन्होंने उसी समय संकल्प लिया कि मैं अभी से ही नमक का त्याग कर दे रहा हूं।

सचमुच उसी दिन से गांधी जी ने नमक बिलकुल छोड़ दिया वह अपने जीवन में अपने ही बात के स्वयं प्रेरक बन गए

सेवा का भाव 

महात्मा गांधी की कहानी,

एक बार एक व्यक्ति, जिसे अपने लेखक होने का बहुत घमंड था, गांधीजी से मिलने गया। वह गांधीजी से कछ सीखने नहीं उनकी नजर में खुद को खास साबित करने गया था। 

पूरी बातचीत के दौरान वह आत्मप्रशंसा करता रहा और बापू भी मुस्कराते हुए धैर्यपूर्वक उसकी बात सुनते रहे। वह तरह-तरह के दावे करता रहा। यह भी बताता रहा कि किस व्यक्ति ने उसके लेखन की कितनी तारीफ की है। 

वह अपनी भावी योजनाओं के बारे में भी बहुत सी बातें करता रहा, लेकिन उसने गांधीजी से कुछ नहीं पूछा, न ही कोई जिज्ञासा प्रकट की और न ही कोई नई बात जानने के प्रति रुचि दिखाई। बातचीत समाप्त कर जब वह जाने लगा तो उसने कहा, ‘महात्मा जी, मेरे योग्य कोई सेवा हो तो बताइए।’ 

उसने सोचा था कि शायद गांधीजी उसे ‘हरिजन’ में कोई लेख लिखने का आग्रह करेंगे। असल में उसके आने का एक मकसद यह भी था। पर उसकी इच्छा पूरी नहीं हुई। बापू नम्रतापूर्वक बोले, 

‘आप सचमुच सेवा भाव रखते हैं तो कुछ काम बताऊं?’ उस दीजिए।’ तब गांधीजी ने कहा, ‘आश्रम में गेहूं पीसने को रखा है, कृपया उसे पीसने में मदद करें।’ 

सजा भुगत कर खुश हुए

बापू नियमों के बड़े पाबंद थे। वह कोई भी नियम काफी सोच-विचार के बाद ही बनाते थे और उसका खुद भी सख्ती से पालन करते थे। उनके आश्रम में भोजन के समय भोजनशाला में मौजूद होने के लिए दो बार घंटी बजती थी। जो व्यक्ति दूसरी घंटी तक भोजनशाला नहीं पहुंच पाता था, उसे दूसरी पंगत लगने तक बाहर बरामदे में ही खड़े रहना व इंतजार करना पड़ता था। बापू इसे ‘लेटलतीफी की मीठी सजा’ कहते थे। 

नियमानुसार दूसरी घंटी बजते ही रसोई घर के दरवाजे तुरंत बंद कर दिये जाते थे, जिससे देर से आने वाले अंदर नहीं जा सकें। हरेक के लिए इस नियम की पाबंदी रहती थी और सख्ती से इसका पालन एक दिन बापू स्वयं लेट हो गए। लेकिन दरवाजा बंद करने वाले आश्रमवासी ने उन्हें आते देख लिया। वह बड़े धर्म संकट में पड़ा। तभी महादेव भाई ने उससे कहा, बापू से सजा पानी है क्या? नियम तो नियम है। उसकी पाबंदी जरूरी है, दरवाजा बंद कर लो। 

बापू किसी से बात करते हुए दरवाजे के निकट आ गए थे, पर उस व्यक्ति ने दरवाजा बंद कर लिया। दरवाजा बंद देखकर बापू अनुशासित आश्रमवासी की तरह खड़े हो गए। वे प्रसन्न थे कि भोजनशाला के नियमों का पालन हो रहा है। तभी वहां हरिभाऊ उपाध्याय भी पहुंचे। उन्होंने वहां बापू को खड़े देखकर कहा, ‘आज तो आप स्वयं लेट लतीफी वाले कटघरे में खड़े हो गए।

मीठी सजा आज आपको भी भुगतनी पड़ रही है।’ ठहरिये, मैं आपके बैठने के लिए कुर्सी ले आता हूं। कहकर वे जाने लगे। तब बापू ने उन्हें हाथ पकड़ कर रोकते हुए कहा, ‘हरिभाऊ! गलती हो तो उसे सुधारने के लिए सजा पूरी भुगतनी चाहिए। जीवन में सच्चे आनंद को पाने के लिए यह जरूरी है।

More from my site

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *