गांधी जी के जीवन से जुड़े कुछ प्रेरक प्रसंग

गांधी जी के जीवन से जुड़े कुछ प्रेरक प्रसंग

गांधी जी के जीवन से जुड़े कुछ प्रेरक प्रसंग

बुरा मत देखो, मत सुनो, मत कहो 

एक बार एक चीनी यात्री गांधीजी से मिलने आया। वह उन्हें एक चीनी मिट्टी का खिलौना दे गया। उसमें तीन बंदर बैठे थे। एक आंखें बंद किए था, दूसरा अपने कान और तीसरा मुंह। इन बंदरों को गांधीजी सदैव अपने पास रखते थे और उन्हें अपना गुरु मानते थे। इनकी ओर वे संकेत करके कहा करते थे, ‘किसी की बुराई मत देखो, न देखने योग्य वस्तु मत देखो, जो देखो पवित्र भावना से देखो, हर वस्तु को देखने का आग्रह भी न करो।’ यह बात आंख बंद करने वाला बंदर सिखाता है। 

‘किसी की निंदा न सुनो, सदा अच्छी बातें सुनो, हर बात सुनने का अनुग्रह मत रखो।’ यह बात कान बंद रखने वाला बंदर सिखाता है। तीसरा बंदर शिक्षा देता है, ‘जो बोलो सत्य, मधुर और प्रिय बोलो, बाकी मौन रहो, बोलते रहने का आग्रह मत करो।’ 

जो भी व्यक्ति, वस्तु, पुस्तक, दृश्य आदि गांधीजी के सामने आते, गांधीजी उनमें उनकी खूबियों खोजते और यदि कोई खूबी मिल जाती तो वह उसे अपने जीवन में अवश्य उतारते। ‘हर अच्छाई को अपनाना तथा हर बुराई से बचना’ यह गांधीजी की जीवन पद्धति थी। इसे अपनाकर ही गांधीजी सफलता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचे। 

श्रमदान महादान 

वर्धा में सेवाग्राम आश्रम बन रहा था। यह वर्धा से पांच मील दूरी पर था। कई लोग सेवाग्राम आश्रम बनाने में सहयोग कर रहे थे। गांधीजी सेवाग्राम स्थल पर ही झोंपड़ी बना कर रह रहे थे। बाकी लोग शाम को वापिस वर्धा लौट जाते। वर्धा से आश्रम स्थल आने-जाने का रास्ता बेहद खराब था। कहीं ऊबड़ खाबड़ तो कहीं ऊंचा-नीचा। 

 एक दिन की बात है। किसी ने कहा, श्रमदान “बापू। यदि आप प्रशासन को एक पत्र लिख दें, तो ये रास्ता ठीक बन सकता है।’ अन्य लोगों ने भी इस सुझाव का समर्थन किया। गांधीजी ने मुस्कराते हुए कहा, ‘प्रशासन को लिखे बगैर भी ये रास्ता ठीक हो सकता है। कोई समझ नहीं पाया। गांधीजी बोले, ‘यदि हर कोई वर्धा से आते-जाते समय इधर-उधर पड़े पत्थरों को रास्ते में बिछाता जाए तो रास्ता ठीक हो सकता है।’ 

अगले दिन से यह काम शुरू हो गया। आते-जाते समय लोग पत्थरों को रास्ते के लिए डालते और गांधीजी उसे समतल करते जाते। गांधीजी के एक प्रशंसक थे बृजकृष्ण चांदीवाल। वे भी आश्रम देखने आए। उनका शरीर काफी भारी था। पांच मील का खराब रास्ता तय करते हुए हांफते हुए चांदीवाल किसी तरह आश्रम पहुंचे। गांधीजी आदत के अनुसार उन्हें आदर से बैठाने लगे। बृजकृष्ण चांदीवाल अपना पसीना पोंछते – हुए गांधीजी से बोले, ‘क्या दो-दो पत्थरों को इधर-उधर करने से ये रास्ता बन जाएगा? यदि आप रास्ते का काम प्रशासन से नहीं करवा सकते तो बताइए, महादान इस रास्ते के लिए कितने धन की । आवश्यकता है? मैं दूंगा।’ 

गांधीजी मुस्कराते हुए बोले, ‘आपके दान से हमें लाभ होगा। लेकिन धनदान नहीं, हमें आपका श्रमदान चाहिए। बूंद-बूंद से घड़ा भरता है। यदि आप हमारे साथ जुड़ेंगे तो इसके तीन फायदे होंगे। हमारा आश्रम ठीक होगा। आपका धन बचेगा। साथ ही आपका मोटापा भी कम होगा। आप निरोगी होंगे।’ यह सुनकर चांदीवाल ठहाका मारकर हंस पड़े। सब लोग जान चुके थे कि गांधीजी आश्रम का निर्माण सहयोग, सेवा और समर्पण से ही पूर्ण करवाना चाहते हैं।

अच्छाई को अपनाना 

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन से हमें हमेशा से ही कुछ न कुछ सीखने को मिलता रहा है। चाहे उनका बचपन हो या युवा दिन, फिर वे दिन जो उन्होंने देश की आजादी के अहिंसात्मक आंदोलन में लगाए और देश की आजादी के प्रेरक बने। हर समय उनकी एक-एक गतिविधि हमें प्रेरणा देती है। उनके जीवन से जुड़े कुछ प्रसंग। 

गांधीजी बचपन में कोई खास होशियार लड़के नहीं थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है, ‘मैं बुद्धिमान तो था नहीं, आज भी मुझे बुद्धि का कोई घमंड नहीं है। स्कूल के मास्टर बस यही कहते थे कि मोहनदास होशियार तो नहीं है, पर ठीक है। जैसे-तैसे पास हो जाता है। लेकिन मैं मैट्रिक में पास भी नहीं हो सका। 

दरअसल मैं एक मूर्ख बालक था। वे कुसंग में पड़कर सिगरेट व मांस का सेवन करने लगे थे। तुम लड़कों में से बहुत से बच्चे ऐसे होंगे जो बुद्धि और चरित्र दोनों में गांधीजी से अच्छे होंगे, गांधीजी से आगे होंगे। 

अब सवाल यह उठता है कि जो आदमी बचपन में, छात्र जीवन में कोई खास योग्यता नहीं रखता था, पूर्ण सदाचारी भी नहीं था, उसने इतनी उन्नति कैसे कर ली कि वह देश को स्वतंत्र कराने में सफल हो गया? फिर 

वे हमारे राष्ट्रपिता महात्मा कहलाए। महात्मा ही नहीं, विश्व के महान व्यक्तियों में शुमार किए गए। गांधीजी में बचपन से ही गुण था कि जो काम या चीज उन्हें गलत लगे उसे तत्काल छोड़ देना, औ जो काम या चीज सही लगे, उसे तत्काल अपना लेना। इसी गुण के कारण वे इतने ऊंचे उठे। 

पढ़ने-सुनने-देखने में यदि कोई बात उन्हें उचित लगती तो वे उसे अपना कर ही रहते। चाहे उसके लिए कितनी ही मेहनत-मशक्कत करनी पड़े। और कोई बात या चीज गलत लगती तो वे उसे छोड़ने की उसी समय दृढ़ प्रतिज्ञा कर लेते थे। 

एक दिन उन्होंने ‘बालबोध’ पुस्तक में पढ़ा, ‘बच्चों को कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिए, जो उन्हें अपने माता-पिता से छिपाना पड़े। जो बच्चे उन्नति करना चाहते हैं, समाज का भला करना चाहते हैं, उन्हें व्यसनों, गलत व अनुपयोगी कामों तथा 

आरामतलबी से बचना चाहिए।’ ये बातें गांधीजी के हृदय में समा गईं। उन्होंने तत्काल उनके पालन का निश्चय कर लिया। सबसे पहले उन्होंने अपनी गलतियों को पिताजी के सामने रखना चाहा। पर पिताजी के सामने जबान खुलनी कठिन थी। 

इसलिए उन्होंने पिताजी को पत्र लिखा। पत्र में सब दोष स्वीकार किए और दंड मांगा। प्रतिज्ञा की कि भविष्य में ऐसा अपराध नहीं करूंगा। पिताजी ने पत्र पढ़ा। आंखों से आंसुओं की बूदें टपक पड़ीं। पत्र भीग गया। तनिक देर के लिए उन्होंने आंख मूंदी और पत्र फाड़ डाला। ऐसी शांतिमय क्षमा उनके स्वभाव के प्रतिकूल थी। गांधीजी ने सोचा था कि पिताजी गुस्सा होंगे, फटकारेंगे। किन्तु उन्होंने तो असीम शान्ति का परिचय दिया। यह सच्चे मन से अपनी गलती स्वीकारने का परिणाम था। 

जो आदमी अपनी गलती स्वेच्छापूर्वक स्वीकार कर लेता है और फिर कभी गलती न करने की प्रतिज्ञा करता है, वही सच्चा प्रायश्चित करता है। _ 

‘बालबोध’ के अलावा जिस दूसरी पुस्तक ने गांधीजी के जीवन में तत्काल महत्त्वपूर्ण रचनात्मक परिर्वतन कर डाला, वह पुस्तक है- रस्किन की पुस्तक। इस पुस्तक का गांधीजी ने सर्वोदय के नाम से गुजराती में अनुवाद किया है। अच्छी पुस्तक के बारे में गांधीजी ने लिखा है, ‘जिस पुस्तक में हमारी सोयी भावनाओं को जागृत करने का सामर्थ्य । हो, वही पुस्तक । अच्छी है। यह गुण रस्किन की पुस्तक में है। इस पुस्तक से मैंने सीखा है- ‘सबके भले में अपना भला है। वकील और नाई दोनों के काम की कीमत बराबर होनी चाहिए, क्योंकि आजीविका का हक दोनों का समान है। मजदूर और किसान का, अर्थात मेहनत का जीवन ही सच्चा जीवन है।’

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