महापुरुषों की प्रेरक कहानियां-गांधीजी की आस्था 

महापुरुषों की प्रेरक कहानियां

महापुरुषों की प्रेरक कहानियां-गांधीजी की आस्था 

महात्मा गांधी सुबह-सुबह उठकर कभी-कभी कुरान का पाठ किया करते थे। सूरा-ए-फातेहा उन्हें जुबानी याद था। इसको याद रखने के कारण एक बार उनकी जान बच गई थी। हुआ यूं कि जब बंगाल में सांप्रदायिक दंगों की भड़कती आग को शांत करने के लिए वह सड़कों पर लोगों से शांति बनाए रखने का आग्रह कर रहे थे, तो एक कट्टर मुसलमान ने गांधीजी को काफिर पुकार कर उन पर हमला कर दिया।

गांधीजी तो वैसे ही दुबले-पतले थे और आए दिन व्रत-उपवास भी रखते रहे, अत: जमीन पर गिर पड़े। गिरते समय उन्होंने मुंह से सूरा-ए-फातेहा को शुद्ध उच्चारण के साथ पढ़ा जिसमें सभी के लिए शांति और सलामती का संदेश है। 

एक हिंदू को कुरान की आयत पढ़ते देख वह मुसलमान तुरंत उनके पैरों में पड़ गया। उसने अपने कृत्य के लिए बार-बार क्षमा मांगी। तब से वह मुसलमान गांधीजी का शिष्य बन गया। मौलाना आजाद के एक लेख में, जो दैनिक वकील में प्रकाशित हुआ था,

एक वाकया मिलता है कि नौआखाली में ही दंगे पर उतारू मुसलमानों के एक गुट से गांधीजी ने कहा था, “तुम कैसे मुसलमान हो? क्या तुमने हजरत मोहम्मद से कोई शिक्षा ग्रहण नहीं की। आज अगर मोहम्मद साहब यहां होते तो तुममें से बहुत-से मुसलमानों को वह अपनाने से इनकार कर देते। तुमसे अच्छा तो मुसलमान मैं हूं कि मारकाट नहीं कर रहा। वे अवश्य मुझे अपनाएंगे, क्योंकि मैं उनके बताए हुए रास्ते पर चल रहा हूं।” 

जिस प्रकार से मौलाना आजाद की धर्म में अटूट आस्था थी, उसी प्रकार गांधीजी की भी थी। गांधीजी ने अपने पत्रों में मौलाना साहब को लिखा था कि अपने छात्र जीवन से ही उन्हें गीता का पाठ करने से आलिक व मानसिक शांति प्राप्त होती थी।

हजरत मोहम्मद का चरित्र उन्हें बहुत पसंद था। अपने जीवन में भी वे उनका अनुसरण करते थे। गांधीजी हजरत मोहम्मद के चरित्र से कितने प्रभावित थे, यह उनके लेखन से जाहिर है। गांधीजी ने अपने लेखन में हजरत मोहम्मद के विचारों को प्रमुखता से व्यक्त किया था।

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