साहित्य समाज का दर्पण है निबंध |Literature is the mirror of society Essay

साहित्य समाज का दर्पण है निबंध

साहित्य समाज का दर्पण है निबंध |Literature is the mirror of society Essay

साहित्य और समाज में गहनतम संबंध है। साहित्यकार एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज से अलग नहीं हो सकता, क्योंकि उसकी अनुभूतियों का संपूर्ण विषय समाज, उसकी समस्याएं, मानव जीवन और जीवन मूल्य हैं, जिनमें वह सांस लेता है। साहित्यकार सामाजिक प्रभाव और दबाव की उपेक्षा करके एक कदम भी आगे नहीं चल सकता। अत: जिस ग्रंथ में समष्टिगत हित चिंतन प्राप्त होता है, वही साहित्य है। इसीलिए विद्वानों ने ज्ञान-राशि के संचित कोष का नाम ‘साहित्य’ रखा है। प्रत्येक युग का श्रेष्ठ साहित्य अपने युग के प्रगतिशील विचारों द्वारा किसी न किसी रूप में अवश्य प्रभावित होता है। 

साहित्य हमारी ज्ञान पिपासा को तृप्त करता है तथा मस्तिष्क की क्षुधापूर्ति करके उसे सबल और चिंतन योग्य बनाता है। साहित्य जीवन की अभिव्यक्ति है। संस्कृत के आचार्यों ने साहित्य की परिभाषा देते हुए कहा है, “जिसमें साथ रहने का भाव विद्यमान हो, उसे ‘साहित्य’ कहते हैं।” इस प्रकार साहित्य के द्वारा हम अपने राष्ट्रीय इतिहास, देश की गरिमा और गौरव, संस्कृति, सभ्यता, पूर्वजों के अनुभूत विचारों एवं अनुसंधानों, प्राचीन रीति-रिवाजों, रहन-सहन तथा परंपराओं से परिचय प्राप्त करते हैं। 

आज से सैंकड़ों वर्ष पूर्व देश के किस भाग में कौन सी भाषा बोली जाती थी, उस समय की वेशभूषा क्या थी, उनके सामाजिक एवं धार्मिक विचार कैसे थे और धार्मिक दशा किस प्रकार की थी आदि बातों की जानकारी भी हमको तत्कालीन साहित्य के अध्ययन से प्राप्त हो जाती है। सहस्रों वर्ष पूर्व भारतवर्ष शिक्षा तथा आध्यात्मिक क्षेत्र में उन्नति की चरम सीमा पर था—यह बात भी हमें साहित्य से ही ज्ञात होती है। अत: जिस देश और जाति के पास जितना उन्नत एवं समृद्धशाली साहित्य उपलब्ध होगा, वह देश और जाति उतनी ही अधिक उन्नत तथा समृद्ध समझी जाएगी। 

साहित्य और समाज में अविच्छिन्न संबंध है। ये परस्पर अन्योन्याश्रित है। यदि समाज शरीर है, तो साहित्य उसकी आत्मा। साहित्य मानव मस्तिष्क की देन है तथा मानव सामाजिक प्राणी है। उसका संचालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा सब कुछ समाज में ही होता है। इस प्रकार साहित्य पर समाज का पूरा प्रभाव पड़ता है। अतः समाज की जैसी भावनाएं और विचार होंगे, तत्कालीन साहित्य भी वैसा ही होगा। यदि समाज में धार्मिक भावना अधिक होगी, तो साहित्य भी उससे अछूता नहीं रह सकता। यदि समाज में विलासिता का साम्राज्य है, तो साहित्य भी शृंगारिक होगा। साहित्यकार प्रतिभा संपन्न होने के कारण अपने साहित्य की छाप समाज पर छोड़े बिना नहीं रह सकता। साहित्य में वह शक्ति होती है, जो तोप और तलवारों में भी नहीं होती। अलग-अलग देशों में जो भी क्रांतियां हुईं, वे सब वहां के प्रतिभाशाली साहित्यकारों की देन हैं। 

साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। जिस प्रकार दर्पण में सामने रखी वस्तु का स्पष्ट स्वरूप अंकित हो जाता है, उसी प्रकार किसी भी देश के साहित्य में उस देश के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक जीवन की झांकी स्पष्टतः दिखाई देती है। साहित्य अपने में समाज के उत्थान-पतन और उत्कर्ष-अपकर्ष की कहानी संजोए रहता है। सामाजिक जटिलताओं, कमियों, दोषों, अंधविश्वासों और मान्यताओं का यथार्थ चित्रण करना साहित्य का उद्देश्य होता है। साहित्य समाज की प्रतिध्वनि, प्रतिच्छाया और प्रतिबिंब है। 

हिंदी साहित्य के इतिहास पर सिंहावलोकन करने से यह स्पष्ट हो जाएगा कि समय और समाज के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य में भी परिवर्तन होता है। जिस काल में जिस जाति की जैसी सामाजिक परिस्थिति होगी, उसका वैसा ही चित्रण साहित्य में अंकित होगा। आदिकाल, जिसे हम ‘वीर गाथा काल’ भी कहते हैं, एक प्रकार से युद्धकाल था। उस युग का साहित्य युद्ध एवं सम्राटों की प्रशंसा से अनुप्राणित हुआ है। इस काल के साहित्य में वीर एवं श्रृंगार रस की प्रमुखता रही है। उस काल में कवियों का प्राधान्य बना रहा। फिर मध्यकाल का भक्ति भाव प्रकट हुआ। उस काल में कवियों ने भक्ति-काव्य की रचना की। इस युग ने कबीर, सूर, तुलसी, जायसी आदि कवियों को जन्म दिया। 

मध्यकाल का सामंतीय समाज रीतिकालीन कवियों को लेकर सामने आया, जिसमें राधा और कृष्ण का पवित्र स्वरूप भी विकृत हो उठा। शृंगारिक रचनाएं होने लगीं। युग बदल गया और देश अंग्रेजों की परतंत्रता में जकड़ गया। विदेशियों की दमन नीति बढ़ने लगी। पराधीन देशवासियों में निराशा फैल गई। ऐसे समय में साहित्य मौन न रह सका। भारतेंदु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद एवं मैथिलीशरण गुप्त आदि प्रबुद्ध साहित्यकारों ने अपनी विभिन्न रचनाओं के माध्यम से निराश भारतीयों के मन में एक नया विश्वास और चेतना जागृत करते हुए समय की पुकार सुनी। कविवर माखनलाल चतुर्वेदी ने नवयुवकों को अपनी मातृभूमि के लिए शीश चढ़ाने की प्रेरणा दी 

मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक, 

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जाएं वीर अनेक।

किसी भी देश या जाति की सांस्कृतिक चेतना का स्पष्ट चित्र उस देश अथवा जाति में बोली जाने वाली भाषा के साहित्य में परिलक्षित होता है। समाज और साहित्य अभिन्न हैं। ‘रामायण’, ‘महाभारत’, ‘साकेत’, ‘गोदान’, ‘पद्मावत’ आदि ग्रंथ इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।

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