Life Success Tips in Hindi – स्मरण शक्ति ही व्यक्ति की सबसे बड़ी योग्यता है

Life Success Tips in Hindi

Life Success Tips in Hindi-स्मरण शक्ति ही व्यक्ति की सबसे बड़ी योग्यता है (Memory is The Biggest Power of an Individual) 

1.अद्भुत स्मरण शक्ति के कारण ही व्यक्ति को अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ माना जाता है. अन्य प्राणियों में भी थोड़ी बहुत स्मरण शक्ति हो सकती है, किन्तु मानव के पास अपार स्मरण शक्ति होती है. निरन्तर अभ्यास एवम् विशेष तकनीकी प्रयोगों से व्यक्ति अपनी स्मरण शक्ति को बढ़ा सकता है, योग साधना के माध्यम से तो व्यक्ति अपनी स्मरण शक्ति को अनन्त तक बढ़ा सकता है और अपने पूर्व जन्मों को भी स्पष्ट देख सकता है. “स्मरण शक्ति’ के बिना व्यक्ति जीवन में कुछ भी नहीं कर सकता. शिक्षण, प्रशिक्षण, तकनीकी शिक्षण, व्यवसाय, सेवा कार्य सभी कुछ स्मरण शक्ति पर ही निर्भर है, आज तक जितनी भी प्रगति हुई है, स्मरण शक्ति के कारण ही हुई है, दुर्भाग्यवश सबकी स्मरण शक्ति एक सी नहीं होती. यदि आपकी स्मरण शक्ति कमजोर है, तो आप किसी भी कार्य को ठीक से सम्पादित नहीं कर सकते. व्यक्ति के हर कार्य की सफलता सुदृढ़ स्मरण शक्ति पर ही निर्भर करती है.

3. यदि कोई व्यक्ति स्मृति शून्य हो जाय तो वह सब कुछ भूल जायेगा. अपने आप को भूल जायेगा, अपने संसार को भूल जायेगा. तब उसे यह भी पता नहीं रहेगा कि वह कहाँ है ? क्यों है ? तब वह दिन-दिनांक, खाना-पीना, घर-परिवार सब कुछ भूल जायेगा. वस्तुतः स्मरण शक्ति ईश्वर द्वारा प्रदत्त सबसे बड़ी भेंट है और इस भेंट के कारण ही व्यक्ति ‘व्यक्ति’ है.

4. जिस व्यक्ति की स्मरण शक्ति जितनी प्रखर होगी, उतनी ही वह प्रगति करता चला जायेगा. स्मरण शक्ति के आधार पर ही कोई सफलता दर सफलता प्राप्त कर सकता है. नयी-नयी जानकारियों को याद रखने के लिए तनाव मुक्त एवम् थकान मुक्त होना जरूरी है. रटने से नहीं, समझकर स्मृति पटल पर बिठाने से जानकारियाँ स्थायी रूप से याद हो जाती हैं. स्मृति पटल वस्तुतः दुनिया की सबसे बड़ी ‘स्लेट’ है.

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5. लिख-लिख कर याद करने से कोई भी जानकारी जल्दी याद हो जाती है. याद की गई सामग्री को बीच-बीच में दोहराते रहने से स्मरण शक्ति बढ़ती है. स्मरण शक्ति एक कम्प्यूटर की तरह है. जिस प्रकार का प्रोग्राम होगा, उसी प्रकार की सूचनायें उपलब्ध होंगी. सूचनाओं को ठीक ढंग से फीड करते रहें, आपका मस्तिष्क कम्प्यूटर से भी तेज गति से स्मृतिपटल पर सूचनाओं को पुनः प्रस्तुत कर देगा. याद रखें, मस्तिष्क से कम्प्यूटर बनता है, कम्प्यूटर से मस्तिष्क नहीं बनता.

6. किसी भी जानकारी को याद रखने के लिए उसे किसी घटना, वस्तु, अनुक्रम अथवा परिस्थिति विशेष से जोड़कर देखिए, फिर आप उसे कभी भूल नहीं पायेंगे. जब कोई जानकारी आप पढ़कर या सुनकर या देखकर प्राप्त करते हैं, तब आपके स्मृति पटल पर उस जानकारी सम्बन्धी एक बिम्ब (Image) भी तैयार होता है, जिसके आधार पर उसे याद रखना आसान हो जाता है, किसी भी जानकारी को लम्बे समय तक याद रखने के लिए उसका कोई स्थायी बिम्ब या मानचित्र बनाकर दो चार बार दोहरा कर देख लें. जब भी उस जानकारी की आवश्यकता पड़ेगी, स्मृति पटल पर बना हुआ बिम्ब, मानचित्र अथवा वस्तु घटना आदि का प्रतिबिम्ब उभरेगा और उससे सम्बन्धित जानकारी सजीव हो उठेगी..

7. याददाश्त बढ़ाने के लिए ध्यान केन्द्रित करना, स्मृति पटल पर काल्पनिक चित्र गढ़ना, लिख कर या बोलकर याद करना जरूरी है. वस्तुओं, भावनाओं एवम् शब्दों के चित्र कल्पना द्वारा मस्तिष्क तक पहुँचते हैं, जिन्हें हम ध्यान द्वारा स्मृति पटल पर अंकित कर सकते हैं. याद रखने की विधियाँ विभिन्न हो सकती हैं, किन्तु आप उन्हीं विधियों का उपयोग करें, जो आपके लिए उपयुक्त हों.

8. ध्यान के माध्यम से बुद्धि में अभिवृद्धि, मानसिक शान्ति एवम् स्मरण शक्ति में क्रान्ति घट सकती है. योग, नियमित व्यायाम, भरपूर नींद, कठोर परिश्रम एवम् पर्याप्त विश्राम से हर समृद्धि संभव है. आपकी स्मरण-शक्ति जितनी तेज होगी, उतना ही आपका समय बचेगा. लोगों का विश्वास आप पर जमेगा. आपका सब जगह सम्मान होगा. आज तक जितने महापुरूष हुये हैं, वे सब अपनी विशेष स्मरण शक्ति के कारण ही हुये हैं.

9. साधारण स्मरण-शक्ति के सहारे आप जिन्दगी में बहुत कुछ नहीं कर सकते. असाधारण बनने के लिए असाधारण स्मरण-शक्ति चाहिए. स्मरण-शक्ति के बलबूते ही आप अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो सकते हैं. किसी कागज का सहारा लिये बिना आप धारावाहिक रूप से प्रवचन कर सकते हैं. अपनी दुकान के सामान एवम् कीमतें जबानी याद रख सकते हैं. अधिकांश हिसाब-किताब जबानी बता सकते हैं, बशर्ते कि आप एक अच्छी स्मरण शक्ति के धनी हों, अर्थात् जीवन की हर सफलता के लिए स्मरण शक्ति को तेज रखना अनिवार्य है.

निजी अनुभव 

एक इन्टरव्यू में मुझसे पूछा गया-‘आपका जन्म कब हुआ था ?’ मैंने जवाब दिया-‘सन् 1942 में, इस पर पूछा गया-‘1942 में और क्या-क्या हुआ था ?’ मेरा जवाब था-‘सर, द्वितीय विश्वयुद्ध अपनी चरम सीमा पर था. हमारा देश गुलाम था, ‘भारत छोड़ो आन्दोलन चल रहा था. उस वर्ष बंगाल में भीषण अकाल पड़ा था …….. .’ बीच में ही इन्टरव्यू बोर्ड के एक सदस्य ने पूछ लिया-‘सबसे बड़ी घटना कौनसी थी ?’ मैंने जरा हंसकर जवाब दिया-‘सर, मैं पैदा हुआ था, मेरे लिए तो यही सबसे बड़ी घटना थी.’ इस पर सब हँस पड़े. सौभाग्य से मेरा चयन हो गया. अर्थात् जब किसी जानकारी को किसी न किसी घटना/बिम्ब से जोड़कर याद किया जाता है, तब वह स्मृति पटल पर स्थायी हो जाती है. इससे याद रखना आसान होता है.

खिड़कियाँ सदैव खुली रखें, ताकि ताजा हवा में अन्दर आ सके (Keep Your Mind Open, So that Some Fresh Ideas May Come in) 

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1.सदैव नवाचारों एवम् नये विचारों के लिए तैयार रहें. विचार, व्यवहार एवम् जीवन शैली में नये-नये प्रयोगों के लिए तैयार रहें, ताकि पुराने होने से बच सकें और समय के साथ चल सकें. सफलता के लिए महत्वपूर्ण बिन्दु यही है कि समय और लोगों के साथ चला जाय. समय और लोगों को साथ लेकर चला जाय. नये-नये रास्ते खोजे जायें, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी उन पर चल सकें.

2. दुनिया के सभी धर्मों का निर्माण आदमी ने ही किया है. किसी भी धर्म ने आज तक किसी आदमी का निर्माण नहीं किया. यह भी सही है कि जब आदमी किसी धर्म का निर्माण करता है, बन्द कमरे में ही करता है. खिड़कियाँ खुली रखकर नहीं करता. इसीलिए दुनिया में आज हजारों धर्म हैं. नये-नये धर्म भी पनप रहे हैं, किन्तु जब तक किसी धर्म में स्वतन्त्र, उदारवादी एवम् प्रगतिवादी विचारधारा नहीं होगी, तब तक कोई धर्म व्यापक, सुलभ एवम् हितकर नहीं बन सकता.

3. हर व्यक्ति को कुछ न कुछ तो करना ही पड़ता है, जहाँ काम है, वहाँ तनाव भी है, यदि आप नाक, कान, आँख, दिल और दिमाग खुले रखेंगे तो अपने आप को समझने और समय के साथ आगे बढ़ने में सुविधा रहेगी. अन्यथा एकरसता, नीरसता, ऊब और निराशा के शिकार हो जायेंगे. इसलिए प्रगतिशील बनों और दूसरों को भी प्रगतिशील बनने में मदद करो.

4. जिन्दगी उतनी आसान नहीं है, जितनी कि हम समझते हैं. जिन्दगी उतनी मुश्किल भी नहीं है, जितनी कि हम समझते हैं. यदि हम खुले दिमाग से समय के साथ चलेंगे तो आसान, वरना मुश्किल है. यदि हमारा नजरिया सकारात्मक है तो जिन्दगी आसान, वरना मुश्किल है. दिल और दिमाग की खिड़कियाँ सदैव खुली रखें, ताकि हर घटना के साक्षी बन सकें, हर घटना से कुछ न कुछ सीख सकें. तब जिन्दगी भार-स्वरूप नहीं लगेगी.

5. हर व्यक्ति, हर व्यक्ति से कुछ न कुछ सीख सकता है, बशर्ते कि वह खुले दिल से सीखने के लिए तैयार हो. हर व्यक्ति दूसरों को कुछ न कुछ सिखा सकता है, बशर्ते कि वह खुले मन से सिखाने के लिए तैयार हो. सीखने और सिखाने वाले को अपनी अहम् रूपी खिड़कियाँ खुली रखनी होंगी. याद रखें, संसार के तमाम उपद्रवों का मुख्य कारण ‘अहम्’ ही है..

6. आपके वर्तमान व्यवसाय में बहुत कुछ नयापन लाया जा सकता है. कम्प्यूटर, इन्टरनेट, ऑटोमेशन, इलेक्ट्रोनिक मशीनों, नये आविष्कारों, नयी तकनीक आदि का समावेश किया जा सकता है. आधुनिक एवम् उपयोगी विचारों, उत्पादों एवम् संसाधनों का बिना किसी पूर्वाग्रह अथवा दुराग्रह के पूरा-पूरा उपयोग किया जाना चाहिए, ताकि आपका व्यवसाय मुख्य धारा में रह सकें. 

7.यदि आपके वर्तमान व्यवसाय में बहुत अधिक समस्यायें हों अथवा व्यवसाय तिथि-बाह्य (Out Dated) हो चुका हो तो उसे बदला जा सकता है. नये व्यवसाय का चयन काफी सोच-विचार कर खुले दिमाग से किया जाना चाहिए. अपने व्यवसाय में नयी-नयी तकनीक एवम् भावी विस्तार की तमाम संभावनाओं के लिए अभी से प्रावधान कर लें, ताकि आगे चलकर पछताना न पड़े.

8. नये आविष्कारों, नये चमत्कारों, नयी कल्पनाओं एवम् नयी संभावनाओं के लिए अपने आपको सदैव तैयार रखें. नयी आशाओं, संभावित निराशाओं, अनायास सफलताओं एवम् तमाम विफलताओं के लिए अपने आपको मानसिक रूप से तैयार रखें. हर स्थिति पर नियन्त्रण रखें, ताकि कोई भी परिस्थिति आपको गुलाम न बना सकें. आजकल सभी व्यवसायों में नयी तकनीक और नये-नये फार्मूलों की आवश्यकता पड़ती है, इसलिए अपने दिमाग को खुला रखें और सभी बंदिशों से अपने आपको मुक्त रखें.

9. जब माचिस या लाइटर का आविष्कार नहीं हुआ था, तब किसी ने यह कल्पना नहीं की थी कि आग को जेब में भी रखा जा सकता है. लेकिन जेबें तो तब भी रखी जाती थीं. हमारे समय में ही इतना कुछ बदल जायेगा, हमने इसकी कल्पना भी नहीं की थी. हमारे समय में ही अभी बहुत कुछ बदलने वाला है. पिछले सौ-सवा सौ वर्षों में जितनी प्रगति हुई है, उतनी लाखों वर्षों में भी नहीं हो सकी थी. प्रगति की गति को देखते हुए हमें हर स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए. समस्या रहित, सुविधापूर्ण एवम् सुरक्षित जीवन जीने से तो हमारा विकास ही रूक जायेगा. दृष्टान्त 

(क) पारसी धर्म का तत्व ज्ञान तीन शब्दों में छिपा है 1. ‘हुमदा’ अर्थात् अच्छे विचार. 2. ‘हुखता’ अर्थात् सही बोलाना. 3. ‘हुवस्ता’ अर्थात् नेक कार्य. इसी तरह बौद्ध धर्म का सार भी तीन वाक्यांशों में समाहित है 1. ‘बुद्धम शरणम् गच्छामि.’ अर्थात् विवेक का सहारा लो. 2. ‘धर्मम् शरणम् गच्छामि.’ अर्थात् अपने आचरण में धर्म का समावेश करो. 3. ‘संघम् शरणम् गच्छामि.’ अर्थात् मिलजुल कर रहो. यानी दुनिया का हर धर्म उपयोगी है, बशर्ते कि हम अपनी खिड़कियाँ खुली रख सकें. (ख) हम जितने खुले रहेंगे, सकारात्मक रहेंगे, हल्के रहेंगे, हँसते रहेंगे, प्रकृति के सानिध्य में रहेंगे, उतने ही अधिक हारमोन्स का निर्माण हमारे शरीर में होगा. हारमोन्स से ही हमारे विचारों का जन्म होता है, विचारों से तरंगें निकलती हैं, जो ब्रह्माण्डीय ऊर्जा (Cosmic Energy) से मिल जाती हैं. इस ऊर्जा की तरंगें दूर-दूर तक फैल जाती हैं, तब ही हम अपने विचारों को कार्य रूप में रूपान्तरित कर पाते हैं. हमारी सफलता वस्तुतः इन ऊर्जाओं पर ही निर्भर करती है. इसलिए खिड़कियाँ तो खुली रखनी ही होंगी.

Success Tips In Hindi- सामने वाले की लकीर को छोटी करनी हो तो अपनी लकीर बढ़ाते चलो (You Can’t Cut Down The Size of Others, Only You Can Make Yourself Larger) 

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1.यदि आप किसी को गिराने की सोचेंगे तो खुद को ही गिरा हुआ पायेंगे. यदि आप अपनी चाल तेज कर देंगे तो बिना किसी को गिराये ही आगे निकल जायेंगे. सामने वाले को तो अपनी गति से बढ़ने दीजिए. आप तो अपनी गति बढ़ाइए और चुपके से आगे निकल जाइए. यदि आपने सामने वाले को चुनौती दे डाली तो सामने वाला शायद ही आपको आगे निकलने दे.

2. यदि सामने वाले की लकीर आपकी लकीर से काफी लम्बी हो तो फिलहाल उससे मुकाबला करने का कोई औचित्य नहीं है. मुकाबला तो मुमकिन के साथ ही करें. यदि आप केवल अपनी लकीर की चिन्ता करते हुए निरन्तर आगे बढ़ते रहेंगे तो एक दिन आप असंभव से भी आगे निकल जायेंगे. असंभव को संभव बनाते चलना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए.

3. जरा सोचिए, क्या दुनिया का हर व्यक्ति, हर अन्य व्यक्ति से आगे निकल सकता है ? हर व्यक्ति आगे होगा तो पीछे कौन होगा ? व्यक्ति की क्षमताओं का कोई न कोई स्थान नियत हो जाता है. व्यक्ति अपने स्थान पर ही रह सकता है. इस तरह न कोई आगे है, न कोई पीछे है. भौतिक संसाधनों की तुलना करना ही व्यक्ति के कष्टों का सबसे बड़ा कारण है. याद रखें, भौतिक संसाधनों का समान वितरण न कभी हुआ है, न कभी होगा. मानवीय प्रवृत्तियों के कारण यह संभव भी नहीं है, इसलिए किसी से छीनने की बजाय अपने संसाधनों में वृद्धि करते चलें.

4. यहाँ हर व्यक्ति को कुछ न कुछ कर गुजरने के अवसर मिलते रहते हैं. दूसरों से आगे निकलने के भी अवसर मिलते रहते हैं. इसलिए यदि आप इन अवसरों का सदुपयोग करते चलेंगे तो साथ वालों से आगे निकलते चले जायेंगे. विशुद्ध प्रतिस्पर्धा की भावनाओं के साथ आगे बढ़ते चलें, बिना किसी को गिराये, बिना किसी को धक्का दिये, तब आपको पीछे मुड़कर देखने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.

5. जिन्दगी अपने आप में एक दौड़ है. हर दौड़ में होड़ है. होड़ के मापदण्ड हर क्षण बदलते रहते हैं. दौड़ के परिणाम भी अक्सर बदलते रहते हैं. महत्वपूर्ण तो यही है कि आप दौड़ में बने रहें. हर क्षण किसी न किसी से आगे निकलने के प्रयास करते रहें. किन्तु इतना ध्यान रखें कि पीछे वालों को कभी हीन भावना से न देखें और आगे वालों से जलन न रखें. याद रखें, आगे निकलने में महज आपकी योग्यता ही नहीं, सुस्त चलने वालों की अयोग्यता भी मददगार होती है. किन्तु दूसरों की अयोग्यता को ही अपनी योग्यता मत समझ लीजिए,

6. वक्त सदा एक सा नहीं रह पाता है. जो आज काफी आगे है, वो कल पिछड़ सकता है. जो आज काफी पीछे है, वो कल आगे निकल सकता है. इसलिए अपनी तथाकथित सफलता पर कभी घमण्ड मत करिए. कभी अति-आत्मविश्वासी भी मत बनिए. किसी का बुरा सोचने से कभी आपका भला नहीं हो सकता. किन्तु दूसरों का भला सोचने पर कम से कम आपका बुरा तो नहीं हो सकता.

7. न किसी को गिरायें, न किसी को कोसें. जो बढ़ रहा है, उसे बढ़ने दें. उससे जलन न रखें, बल्कि उसकी प्रशंसा करें. उससे कुछ न कुछ सीखने की कोशिश करें. जो पीछे है, उसकी भी प्रशंसा करें, उसे भी प्रोत्साहित करें, उससे भी कुछ न कुछ सीखें. हर व्यक्ति में कुछ न कुछ विशेषतायें होती हैं, इसलिए हर व्यक्ति से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है.

8. मोटे रूप से दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं-प्रथम वे जो हर असंभव को संभव बना लेते हैं और निरन्तर आगे बढ़ते रहते हैं. दूसरे वे जो केवल दूसरों को आगे बढ़ते हुए देखते रहते हैं और मन ही मन जलते रहते हैं. तीसरे वे जिन्हें यह ही पता नहीं होता कि उन्हें क्या करना चाहिए ? अब आप ही तय करें कि आप अपने आपको किस वर्ग में रखना पसंद करेंगे. जीवन को सार्थक करना है तो अपने आपको प्रथम वर्ग में रखिए.

9. वैसे सुखी रहने का सबसे आसान तरीका है, अपने आगे नहीं, पीछे देखना. पीछे वाले भी आपसे आगे निकलने की कोशिश करते रहते हैं. यदि आप केवल पीछे वालों को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ते रहेंगे तो बहुत संभव है, बहुत से आगे वाले भी आपसे पीछे छूट जायेंगे.

दृष्टान्त- दीनदयाल एक छोटा दुकानदार था, उसके सामने एक बड़ा दुकानदार था, जिसकी दुकान पर ग्राहकों का जमघट लगा रहता था. दीनदयाल काफी परेशान रहता था. काफी सोचने विचारने के बाद उसने व्यवसाय का नया तरीका अपनाया. ‘बढ़िया से बढ़िया माल और कम से कम मुनाफा इस एक सुत्री कार्यक्रम को परिश्रम, व्यवहार एवम् सेवा भावना के साथ लागू कर दिया. अधिकांश माल तो निर्माताओं से सीधे ही लाया जाने लगा. शेष बड़े थोक विक्रेताओं से मंगवाया जाने लगा. जहाँ भी उसे सस्ता माल मिल सकता था, वहीं से खरीदना शुरू कर दिया. नाम मात्र के लाभ पर ग्राहकों को उपभोक्ता सामान उपलब्ध करवाया जाने लगा. धीरे-धीरे दुकान की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी. खूब ग्राहक आने लगे. ग्राहकों की संतुष्टि एवम् गुणवत्ता को सर्वोच्च प्राथमिकतायें दी जाने लगी. फलतः खूब बिक्री होने लगी. साल के अन्त में जब हिसाब लगाया तो दीनदयाल का शुद्ध लाभ सामने वाले से अधिक ही था. दीनदयाल की तर्ज पर ही आज कल जगह-जगह सुपर मार्केट, मॉल, आदि विकसित हो रहे हैं. 

दूसरों की बजाय अपनी गलतियाँ ढूँढ़िए (Find Out Your Faults, Instead of Those of Others) 

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साधारणतः कोई भी व्यक्ति कभी भी अपनी गलती स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता, बल्कि अपनी तमाम असफलताओं का दोष दूसरों पर डालने में ही अपनी सफलता समझता है. और दूसरे भी ऐसा ही करते हैं. जब गलती मानने के लिए कोई तैयार ही नहीं है, तब जरा सोचिए, आखिर गलती कौन करता है ? यहाँ मानवीय गलतियों की कोई सीमा ही नहीं है. यहाँ जो कुछ भी गलत होता है, मानवीय गलती के कारण ही होता है. इसलिए गलती मानकर उसमें सुधार करना ही समझदारी है.

2. यह भी सही है कि आदमी जितना अपनी गलतियों से सीख सकता है, उतना दूसरों की गलतियों से नहीं सीख सकता. आदमी अक्सर अपनी ही गलतियों के कारण नाकामयाब होता है, इसलिए दूसरों पर दोष मढ़ना छोड़िए, अपनी गलतियों में सुधार करते हुए आगे बढ़िए. गलती किससे नहीं होती? गलती कभी इकतरफा भी नहीं होती. आपके साथ जो भी गलत होता है, उसमें कहीं न कहीं आपकी गलती अवश्य होती है.

3. अपनी गलती मानकर तो देखें, लोग आपको सिर-आँखों पर बिठा लेंगे. अपनी कमियाँ ढूँढ़ कर तो देखें, अपने आपको अपनी नजरों में ऊँचा उठा लेगें. गलतियों में सुधार करके तो देखें, अपनी हर गलती को कामयाबी में बदल लेंगे, हर त्रुटि आपकी कसौटी है और सफलता के लिए हर कसौटी पर खरा उतरना है.

4. दूसरों की गलतियों की समीक्षा न करें. दूसरों की विफलताओं की प्रतीक्षा न करें. यह बहुत महंगी पड़ सकती है. चाहने से किसी की प्रगति नहीं रूक सकती. दूसरों की विफलता से अपनी सफलता मत आंकिए. साथ ही अपनी सफलता से किसी की विफलता भी मत आंकिए. अपनी विफलताओं को अपनी ही गलतियों से आंकिए. अपनी ही गलतियों में से सफलता को ढूँढ निकालिए. सफलता का मूल मंत्र यही है.

5. हम दूसरों को जितना बुरा समझते हैं, उतने बुरे वे होते नहीं हैं. और दूसरें हमें जितना अच्छा समझते है, उतने अच्छे भी हम होते नहीं हैं. यदि हम अपनी गलतियों और दूसरों की अच्छाईयों को स्वीकार करना सीख लें तो हमें दूसरों को बुरा और खुद को भला समझने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी. इस आत्मदर्शन के बाद अपने अतिरिक्त कोई भी गलत प्रतीत नहीं होगा. अपने से बाहर गलतियाँ ढूँढ़ने वाले का न तो आगत होता है, न अतीत होता है. व्यक्ति वस्तुतः अपनी प्रकृति की सभी स्थितियों का सर्वशक्तिमान स्वामी होता है, पर अफसोस कि उसे इसका आभास नहीं हो पाता है. 

6.हर व्यक्ति के भीतर असंख्य सद्गुण, सद्विचार एवम् सद्संकल्प विद्यमान होते हैं, जो उद्घाटित होने के लिए सदैव आतुर रहते हैं. किन्तु दुर्भाग्यवश हम अपनी विफलताओं के कारणों को बाहर खोजने में ही अपनी समूची ऊर्जा लगा देते हैं और अपने भीतर झांकने की हिम्मत नहीं जुटा पाते है. जब भीतर झांकने की आदत बना लेंगे, तब हमारे संकल्प अपने आप बाहर आने लगेंगे. 7. हम सब संसार रूपी सागर के जीव हैं. हमने कोई बंटवारा नहीं कर रखा है. समुद्र के पानी में बंटवारा संभव भी नहीं है. यदि हम एक दूसरे की गलतियाँ ही ढूँढ़ते रहेंगे तो इस महासागर में कुछ भी प्राप्त नहीं कर पायेंगे. गलतियाँ करना तो मानवीय स्वभाव है. लेकिन हम अपनी गलतियों को न मानकर अपने आपको धोखा देते रहते हैं और अन्ततः इसे ही अपनी उपलब्धि समझने लगते हैं. यही हमारी सबसे बड़ी त्रासदी है.

8. दूसरों की बजाय अपनी कमजोर कड़ी को पहचानिए. याद रखिए, माला जब भी टूटती है, कमजोर कड़ी से ही टूटती है. माला तो एक स्थान से ही टूटती है, किन्तु सभी मोती एक ही झटके में बिखर जाते है. इसलिए मोतियों को नहीं, माला को सुरक्षित रखिए. कमजोर कड़ी को वक्त पर ठीक करते रहें. अपनी गलतियों में सुधार करके ही कमजोर कड़ियों को मजबूत बना सकते हैं. न तो आपके कहने से कोई अपनी गलती मान सकता है, न आप दूसरों की गलतियां सुधार सकते हैं, इसलिए अपनी गलतियाँ सुधारिए. तब निश्चित रूप से दूसरे भी अपनी गलतियाँ सुधारते नजर आयेंगे.

9. आप अपनी नाकामयाबियों को दूसरों के सिर कब तक मंढ़ते रहेंगे ? भाग्य, प्रारब्ध, परिवार, सहकर्मियों एवम् प्रतिद्वन्द्वियों पर सारा दोष डालते हुए कब तक बचते रहेंगे? इसलिए अपनी गलतियाँ तत्काल स्वीकार करें, उनमें अपेक्षित सुधार करें, तब जो भी सफलता मिलेगी, वह आपकी अपनी होगी.

10. हम अकसर ईश्वरीय व्यवस्था में, प्राकृतिक प्रबन्धन में, अपने प्रारब्ध में, पूर्व जन्म के कर्म-फलों में, पारिवारिक परिवेश में, सामाजिक विषमताओं में, सरकारी नीतियों में, कामयाब लोगों की चालाकियों में ही गलतियाँ ढूँढ़ते रहते हैं और अपना अमूल्य समय खर्च करते रहते हैं. जिस दिन हम इन बाहरी व्यवस्थाओं में गलतियाँ ढूँढ़ना बन्द कर देंगे और अपने भीतर उतरकर अपनी कमियों को पकड़ना आरंभ कर देंगे, उसी दिन एक बहुत बड़ा ‘रूपान्तरण’ घटित हो जायेगा, तब हम अपने अलावा किसी को भी गलत नहीं मान पायेंगे. और यह रूपान्तरण अभी और इसी वक्त घटित हो सकता है. केवल आँखें बन्द करके भीतर उतरने भर की देर है.

दृष्टान्त- पति-पत्नी के बीच किसी बात पर झगड़ा हो गया. पत्नी ने गुस्से में पति पर बेलन फेंका, किन्तु पति के जरा टेढ़ा हो जाने के कारण बेलन सीधा खिड़की पर लगा और शीशा टूट गया. आवाज सुनकर पड़ौसी आया और पूछने लगा-‘शीशा कैसे टूटा ?’ पति ने पत्नी की तरफ इशारा करते हुए बताया कि-‘इनकी गलती से टूटा है. गुस्से में बेलन फेंका और शीशा टूट गया.’ इस पर पत्नी तपाक से बोली-‘भाई साहब, ये झूठ बोल रहे हैं. मैनें तो बेलन इन्हीं पर फेंका था. अगर ये अपने स्थान से नहीं हटते तो शीशा नहीं टूटता. अब आप ही बताइए, गलती मेरी है या इनकी ?’ अर्थात् सारा झगड़ा ही अपनी गलती न मानने के कारण है. 

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