शिक्षा ज्ञान वाली कहानियां-कर भला हो भला, एक परी थी ,लाल कपड़े की थैली, शिक्षा ही जीवन है 

शिक्षा ज्ञान वाली कहानियां-कर भला, हो भला 

शिक्षा ज्ञान वाली कहानियां-कर भला, हो भला 

चीनू कछुआ किसी को मुश्किल में देखकर बहुत खुश होता था। उसकी इस आदत को देखकर एक दिन बगुले ने कहा, “चीनू, दूसरों को दुखी देखकर तुम्हें क्या मिलता है?” बगुले की बात सुनकर चीनू ठहाका लगाकर बोला, “ये मेरे कोई नाते-रिश्तेदार तो हैं नहीं, जिनके दुख को देखकर मैं भी रोऊं!” 

इस पर बगुले ने उसे समझाया, “दोस्त, याद रखना कि किसी के दुख पर जो खुश होता है, उसकी तकलीफ पर भी लोग खुश होते हैं।” बगुले की बात सुनकर चीनू चिढ़कर बोला, “यह उपदेश कहीं और जाकर सुनाओ, मेरे पास समय नहीं है, तुम्हारी फालतू की बकवास सुनने का।” 

अभी वो दोनों बातें ही कर रहे थे कि अचानक चिन्नी गिलहरी चीखी, “बचाओ, मेरी मदद करो, उस चील से।” चिन्नी की आवाज सुनते ही बगुला उसकी मदद के लिए दौड़ा और उसे अपने पंखों में छुपाकर बोला, “तुम मेरे पंखों के नीचे छिपी रहना, चील अब तुम्हें नहीं देख पाएगी।” चिन्नी गिलहरी ने वैसा ही किया। कुछ देर बाद चील दूसरी दिशा में उड़ गई। 

कुछ दिन बीते, एक दिन चीनू टहलते-टहलते नदी के किनारे पहुंचा और वहां गीली रेत पर आराम से सो गया। तभी एक शिकारी उधर से गुजरा। उसकी नजर कछुए पर पड़ी। वह खुशी से उछल पड़ा। उसे तो ऐसे ही कछुए की तलाश थी। उसने चीनू को जाल में डाला और कंधे पर उठाकर घर की तरफ चल दिया। चीनू लगा चिल्लाने, “बचाओ-बचाओ। कोई है, जो मेरी मदद करे।” मगर वहां उसे कोई बचाने नहीं पहुंचा। तभी बगुले की नजर उस पर पड़ी। बगुले ने उसे याद दिलाया, “किसी के दुख पर जो खुश होता है, लोग दुख में उसकी सहायता नहीं करते, वो भी खुश होते हैं।” 

पर चीनू के दिल का पछतावा उसके चेहरे पर और आंखों में साफ-साफ झलक रहा था। 

बगुले ने तरकीब लगा कर उसे बचा लिया। इसके बाद चीनू किसी की भी मदद करते समय सबसे आगे रहता। ऐसा करते समय उसे अपने सुख की भी परवाह नहीं रहती थी। 

शिक्षाप्रद कहानी-एक परी थी 

निकी नाम की एक परी थी। निकी जब भी धरती पर आती, तो बच्चों को नई-नई कहानियां सुनाती। बच्चे उससे बहुत प्यार करने लगे। मगर उन्हें यह नहीं मालूम था कि जिसे वो दीदी कहते हैं, वह एक परी है। 

शिक्षाप्रद कहानी-एक परी थी 

एक दिन निकी बगीचे में बच्चों को कहानी सुनाने आ रही थी कि अचानक उसके कानों में आवाज आई-“निकी, अब बस, कहानी सुनाने का तुम्हारा सिलसिला खत्म हुआ।” निकी ने चौंक कर आसमान की तरफ देखा, तो परियों का राजा उससे कह रहा था, “निकी, अब तुम्हें परियों के देश में ही कहानी सुनानी होगी, तुम लौट आओ।” निकी ने पूछा, “क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मैं धरती पर भी बच्चों को कहानियां सुनाऊं और परियों के देश में भी।” परियों के राजा ने कहा, “अभी तो परिस्तान चलो।”

 निकी कुछ देर सोचती रही और फिर अचानक वापिस परिस्तान की तरफ लौट गई। लेकिन रात में उसे रह-रह कर धरती पर बसे बच्चों की याद आने लगी। वह सोचने लगी, ‘वह सब मेरा इंतजार करेंगे, क्या करूं?’ तभी उसे अपनी चमकदार छड़ी में से आवाज सुनाई दी, ‘जब तुम सफर का इरादा कर लो तो फिर यह न देखो कि यह मार्ग दुर्गम है या सुगम, बस सफर जारी रखो।’ 

इतना सुनते ही परी राजा के पास जाकर बोली, “महाराज ! मैं धरती पर जाना नहीं छोड़ेगी। मेरे साथी धरती और परिस्तान दोनों में ही हैं।” 

राजा ने कहा, “तो ठीक है। अब तुम्हें दोनों में से एक को चुनना है। धरती पर जाना चाहती हो, तो परिस्तान छोड़ना होगा।” 

परी ने कहा, “महाराज! परिस्तान को भी मैं बहुत प्यार करती हूं। लेकिन आपने जो शर्त रखी है उसने मुझे धर्मसंकट में डाल दिया है।” 

“यहां तुम्हारे पास सब कुछ है, सारी सुख-सुविधाएं हैं, धरती पर तुम्हें क्या मिलेगा?” 

“धरती पर कुछ नहीं है, तभी तो उन्हें मेरी जरूरत है। मेरी कहानियां उन्हें जीने की प्रेरणा देती हैं। इन्हें सुनकर वे अपने दुख भूल जाते हैं।” । 

“तो तुम्हारा क्या निर्णय है?” राजा ने पूछा। “मैं धरती पर रहूंगी।” परी ने अपना निर्णय राजा को बता दिया। 

कई युग बीत गए, लेकिन वह परी आज भी धरती के लोगों को मीठी-मीठी कहानियां सुना रही है। वह खुश है। जो खुशियां बांटता है, उसे भला कौन दुखी कर सकता है। 

शिक्षाप्रद कहानी-लाल कपड़े की थैली 

कबीर नाम का मल्लाह नदी किनारे अपनी नाव ठीक कर रहा था। अचानक एक बच्चा उसके पास रोता हुआ आया और उससे बोला, “क्या तुम मेरी मदद कर सकते हो?” कबीर ने पूछा, “क्या हुआ है?” बच्चा बोला, “मेरी मां बहुत बीमार है, उस पार तक उसे ले जाना है।” कबीर को उस बच्चे पर रहम आया और उसने उन दोनों को नदी पार पहुंचा दिया। बच्चे ने उसे धन्यवाद दिया। कबीर घर लौट आया। 

शिक्षाप्रद कहानी-लाल कपड़े की थैली 

शाम ढले जैसे ही वह खाना-खाने बैठा कि बाहर दरवाजे पर उसे आवाज आई, “भूखा हूं, कुछ खाने को दे दो।” कबीर ने अपनी पत्नी से कहा, “जाओ, उस भूखे को खाने को दे दो।” लेकिन वह गुस्से से बोली, “मेरी समझ में नहीं आता कि तुम लोगों के साथ जरूरत से ज्यादा हमदर्दी क्यों करते हो? अब बेटी की शादी आने वाली है, देखती हूं कौन मदद करता है तुम्हारी।”

कबीर मुस्कराते हुए बोला, “भाग्यवान ! मैं सोचता हूं कि मैं उनकी जगह होता, तो उनसे क्या उम्मीद करता।”

 बात आई-गई हो गई। बेटी की शादी सिर पर आ गई। चार दिन रह गए थे। मन थोड़ा परेशान था। रोज की तरह सुबह कबीर नदी किनारे पहुंचा। जैसे ही वह नाव लेकर पानी की तरफ बढ़ा कि उसकी नजर नाव में पड़ी एक लाल कपड़े की थैली पर गई। उसने थैली खोली, तो हैरान रह गया उसमें सोने के सिक्के थे। वह सोच में पड़ गया, आख़िर इसे यहां कौन रख गया? तभी उसे आवाज आई, “कुछ दिन पहले जिस बच्चे की तुमने मदद की थी, उसी ने तुम्हें ईनाम भेजा है। वह बच्चा कोई आम इंसान नहीं था। बच्चे के रूप में एक अदृश्य शक्ति थी वह । वह जानना चाहती थी कि कितने रहमदिल हो तुम। प्रत्येक की परीक्षा होती है एक दिन ऐसी ही।” 

सच ही कहा है किसी ने, जिसका दिल रहम से भरा है, भगवान हमेशा उसके साथ रहते हैं। उसकी सारी जरूरतें पूरी होती जाती हैं। 

शिक्षाप्रद कहानी- शिक्षा ही जीवन है 

शिक्षाप्रद कहानी

शाहिद नाम का एक लड़का था। वह पढ़ने से हमेशा जी चुराता। जब देखो कोई न कोई बहाना करके स्कूल की छुट्टी कर लेता। आज भी उसने यही किया। उसकी मां ने कहा, “शाहिद तुम्हारी परीक्षा सर पर है और तुमने फिर आज छुट्टी कर ली।” शाहिद बोला, “अम्मा, आज मेरे सिर में बहुत दर्द है।” यह बहाना बनाकर वह लेट गया। कुछ देर बाद उसकी मां पड़ोस में चली गई। शाहिद ने जैसे ही मां को जाते देखा तुरंत खेलने निकल गया। 

शाम ढले जब वह घर लौटा तो उसकी मां बोली, “अब तो पढ़ने बैठ जाओ।” मां की बात सुनते ही शाहिद ने फिर एक नया बहाना ढूंढ लिया और जाकर फिर से लेट गया। तभी उसके कानों में शहद की मक्खी की भन-भनाहट सुनाई दी, उसने चादर मुंह से हटाई तो मक्खी बोली, “दोस्त, तुम चार किताबें पढ़कर थक जाते हो, खेलने-कूदने में नहीं थकते। मुझे देखो, मैं रात-दिन फूलों से शहद इकट्ठा करती हूं, पूरे जीवन में कुछ चम्मच, फिर भी नहीं कहती कि मैं थक गई हूं। मैं जानती हूं कि ईश्वर ने मुझे इसी काम के लिए पैदा किया है।” शाहिद ने पूछा, “लेकिन हमें क्यों भेजा है?” मधुमक्खी बोली, “इंसानों को अपना जीवन संवारने के लिए भेजा है। और यह काम शिक्षा से ही हो सकता है। यह हमेशा याद रखना कि शिक्षा ही जीवन है। जो शिक्षा से दूर भागता है, खुशी उसके पास नहीं आती।” 

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