लेजर का आविष्कार किसने किया |Laser Ka avishkar kisne kiya

लेजर का आविष्कार किसने किया

लेजर का आविष्कार किसने किया

लेजर किरणों के आविष्कारक चार्ल्स का मानना था कि अणु-परमाणु विकिरण को प्रकाश के रूप में, रेडियो तरंगों के रूप में या फिर ताप के रूप में सोखा जा सकता है। ऊर्जा के नन्हें-नन्हें पैकेटों के रूप में यही सोखा जाता है, जिसके कारण परमाणु एक ऊर्जा स्तर से और ऊंचे स्तर पर चले जाते हैं। इस तरह से उत्तेजित परमाणु स्वतः निचले स्तर पर गिर सकता है। वह जब ऐसा करता है, उसकी ऊर्जा निकल जाती है। यह विद्युत चुम्बकीय विकिरण हमें प्रकाश के रूप में दिखाई पड़ती है। सूरज में प्रतिदिन यही होता है उच्च ऊर्जा-स्तर के परमाणु अपनी ऊर्जा खोकर निचले स्तर पर गिरते हैं और इस तरह ऊर्जा और प्रकाश उत्पन्न करते हैं।

चार्ल्स टाउन्स ने इस पर दूसरे ढंग से सोचा था। सन् 1917 ई. में आइंस्टाइन ने विकिरण के उद्दीप्ति उत्सर्जन की चर्चा की थी। चार्ल्स ने उसे ही अमलीजामा पहनाने का निर्णय लिया। चार्ल्स अन्ततः इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यदि किसी को निर्वात-नलियों की अपेक्षा और छोटी तरंगें चाहिए, तो उसे ‘रेडीमेड’ नन्हें उपकरण अणु और परमाणु का उपयोग करना होगा।

चार्ल्स ने सोचा-‘यदि किसी निर्धारित माप-जोख के कक्ष में विकिरण को उद्दीप्त करने का काम किया जाए, तो अधिक शक्तिशाली किरणें प्राप्त की जा सकती हैं। 

थोड़े समय पश्चात् चार्ल्स ने अपने इस सिद्धान्त की चर्चा कोलम्बिया विश्वविद्यालय में अपने छात्रों से की और इन किरणों के लिए कोई नाम सुझाने का निवेदन किया। बस फिर क्या था? छात्रों ने इतने नाम बताए कि एक नवीन प्रौद्योगिकी-शब्दावली ही बन गई। उन्हीं में एक छात्र ने नाम सुझाया था-मेजर। यह ‘माइक्रोवेव एम्प्लीफिकेशन बाय स्टीमुलेटेड एमीशन ऑव रेडिएशन’ का संक्षिप्त रूप है। ‘इंफ्रारेड एम्प्लीफिकेशन’ के आधार पर ‘इरेजर’ नाम भी फैलाया गया। 

एक्सरे एम्प्लीफिकेशन के लिए ‘एक्साजर’ नामक भी प्रस्तावित था। अन्ततः लाइट एम्प्लीफिकेशन के आधार पर सर्व-सम्मति से ‘लेजर’ नाम चुना गया। ‘मेजर’ और ‘लेजर’ आज भी लोकप्रियता की बुलन्दियों को छू रहे हैं। 

जब नाम का चुनाव हो गया, तब कार्य शुरू हुआ। ‘सूक्ष्म तरंग प्रवर्द्धन’ ‘माइक्रोवेव एम्प्लीफिकेशन’ के लिए एक यंत्र विकसित किया गया। इसके माध्यम के लिए अमोनिया गैस को चुना गया। अमोनिया गैस को इसलिए चुना गया कि वह सूक्ष्म तरंगों के साथ शीघ्र पारस्परिक क्रिया करती है।

 हरबर्ट जीगर जैसे युवा भौतिकशास्त्री के साथ एक विद्यार्थी जेम्स गोर्डन को यह परियोजना शोध-प्रबन्ध के लिए सौंपी गई। तीन सालों तक जेम्स ने मिले हुए विषय पर पूरी निष्ठा, लगन व परिश्रम से कार्य किया और अन्ततः जेम्स की मेहनत रंग लाई। जेम्स अणुओं के कम्पन्न से उत्पन्न होने वाली विशुद्ध आवृत्ति प्रदर्शित करने में सफल रहे। 

विशुद्ध आवृत्ति का उपयोग एक सूक्ष्मतम माप वाली घड़ी के रूप में होना माना गया। इसका उदाहरण दिया गया कि यदि पता हो कि स्रोत से निकलने वाली किरण की आवृत्ति साठ साइकिल प्रति सैकेण्ड है, तो इसका मतलब यह हुआ कि एक साइकिल पूरी होने में सैकेण्ड का साठवां हिस्सा लगेगा। एक सैकेण्ड में साठ साइकिल होंगी और एक मिनट में तीन हजार छः सौ साइकिलें पूरी होंगी। इस तरह एकदम ठीक समय बताने वाली घड़ी बनाने के लिए साइकिलें गिनना आवश्यक है। 

लेजर का आविष्कार किसने किया

सन् 1950 ई में इस तरह की अमोनिया मेजर घड़ी बनी थी, जिसकी सहायता से अरबवें भाग तक का सही समय ज्ञात किया जा सकता था। आधुनिक परमाणु घड़ियों में हाइड्रोजन मेजर का उपयोग होता है और वे सौ खरबवें भाग तक का सही समय की गणना देती हैं। यदि ये घड़ियां चलती रहें, तो लाखों वर्ष में केवल एक मिनट का फर्क देंगी।

चार्ल्स हार्ड टाउन्स ने लेजर किरण का सन् 1951 ई. में एक पार्क की बेंच पर आविष्कार किया था। इस चमत्कारी किरण का जन्म जिस पार्क में हुआ था, वह संयुक्त राज्य अमेरिका के शहर वाशिंगटन में स्थित डी.सी. का फ्रेंकलिन स्क्वायर पार्क था। 

हुआ यू था कि उन दिनों चार्ल्स रेडियो-तरंगों को पैदा करने की नई तकनीक खोज रहे थे। वह फ्रेंकलिन स्क्वायर पार्क की एक बेंच पर बैठे प्रकृति की सुन्दरता को निहार रहे थे। एकाएक, उनके मस्तिष्क में विचार आया कि विद्युत चुम्बकीय तरंगों को अणुओं से किस प्रकार प्राप्त किया जाए? 

चार्ल्स की यह एक ऐसी सोच थी, जिसने बीसवीं सदी का स्वरूप ही बदल दिया। चार्ल्स ऐसी उच्च आवृत्ति की रेडियो तरंगें खोजना चाहते थे, जो तत्कालीन निर्वात-नलियों से उत्पन्न नहीं हो सकती थीं। चार्ल्स को यकीन था कि ये उच्च आवृत्ति की लघु तरंगें (शार्ट वेव) एक दिन अवश्य सूक्ष्म मापों और विश्लेषण में सहायक सिद्ध होंगी और भौतिक व रसायन शास्त्र के क्षेत्र में एक महान् क्रान्ति ला देंगी।

अन्त में चार्ल्स हार्ड टाउन्स की परिकल्पना साकार हुई। आज हालात यह हैं कि चार्ल्स ने जितना सोचा था, उससे कहीं अधिक उपयोग लेजर किरणों का उपयोग किया जा रहा है। चिकित्सा के क्षेत्र में भी इन किरणों का भरपूर उपयोग किया जा रहा है। शल्य-चिकित्सक, आंख के कोर्निया को चिपकाने में लेजर-किरणों का उपयोग कर रहे हैं। खून के थक्के भी इनकी सहायता से गलाए जा रहे हैं। धातुओं में बारीक-से-बारीक छेद करने के लिए लेजर किरणें काम में लायी जा रही हैं। 

संचार क्रान्ति को आगे बढ़ाने का श्रेय भी इन लेजर किरणों को जाता है। संचार प्रौद्योगिकी से सम्बन्धित न जाने कितने इंजीनियर फाइबर ऑप्टिक्स की मदद से ढेर सारी सूचनाएं हजारों किलोमीटर दूर तक प्रतिदिन भेजते हैं। विकसित देशों के सुपर बाजारों में चीजों की कीमत पढ़ने के लिए लेजर किरणों का उपयोग हो रहा है। अन्तरिक्ष विज्ञान की संस्कृति की कई नवीन चुनौतियों को लेजर किरणों द्वारा ही हल किया गया है।

दरअसल लेजर किरणें ऊर्जा की वे अदृश्य किरणें हैं, जो तीन गैसों के सम्मिश्रण से उद्दीप्त होती हैं। वे तीन गैसें हैं हीलियम, नाइट्रोजन और कार्बन-डाइ-ऑक्साइड। कार्बन-डाइ-आक्साइड लेजर कही जाती है। लेजर सूक्ष्म किरणों को उत्पन्न करता है और ये किरणें हीरे तक को भेदने की क्षमता रखती हैं। 

लेजर अधिक मात्रा में तत्काल प्रकाश उत्पन्न करता है। दूसरे, लेजर ‘सर्जरी न्यूमीडिनियम’ भाग कहलाती है, किन्तु ‘न्यूरोसर्जरी’ में कार्बन-डाइ-ऑक्साइड लेजर मुख्यतः प्रयोग में लायी जाती है।

गैस के एक सिलेण्डर में लेजर भरी जाती है, फिर उसे ट्यूब द्वारा ‘इंफ्राटैब रेंज’ में लाया जाता है। इससे ऊर्जा उद्दीप्त होती है, जो अणु को ‘ब्रेक डाउन’ अवस्था में ले आती है। लेजर द्वारा उत्पन्न प्रकाश एक ही दिशा में प्रवाहित होता है, जो एक पतली किरण के रूप में चलता है। लेजर का जो यंत्र होता है, उसमें मुख्यतः दो भाग होते हैं- 

(1) शक्ति का स्रोत, (2) प्रकाश को विस्तृत करने वाला पदार्थ। 

शक्ति स्रोत से उत्तेजित अणु के साथ जब ऊर्जा पैदा होती है, तब ही उद्दीप्त विकिरण होता है। 

सन् 1957 ई. में चॉर्ल्स हार्ड टाउन्स ने अपना ध्यान प्रकाश किरणों की ओर केन्द्रित किया। प्रकाश किरणें सूक्ष्म तरंगों की अपेक्षा दस हजार गुना ऊंची आवृत्ति की होती हैं। उस समय चार्ल्स के समक्ष यह प्रश्न उठा कि किस प्रकार आवश्यक अनुनादी कक्ष अर्थात् ‘रिजोनेटिंग चेम्बर’ बनाया जाए? 

उस स्थिति में चार्ल्स ने ‘बेल लेबोरेटरीज’ में कार्यरत अपने एक परिचित ऑर्थर एल. शॉलो से सहायता मांगी। ऑर्थर ने यथा सम्भव सहायता की। दोनों ने मिलकर एक लम्बोटर कक्ष तैयार किया, जिसके दोनों सिरों पर दर्पण लगे थे। सन् 1958 ई. में दोनों ने मिलकर इस विषय का शोध-पत्र प्रकाशित किया। शोध प्रकाशित होते ही जैसे विश्व भर में तहलका-सा मच गया।

सन् 1960 ई. में ‘ह्यूज एयर कैफ्टर कम्पनी’ के थियोडोर एच मैमन ने पहला कारगर लेजर उपकरण बना डाला। 

इधर बेल-प्रयोगशाला के अली जरान, विलियम आर. बेनेट जूनियर और डोनाल्ड आर. हेरियट ने दूसरी तरह का लेजर उपकरण प्रदर्शित कर दिया। मैमन ने अपने उपकरण में गैस के स्थान पर संश्लेषित रूबी का नन्हा-सा बेलन प्रयोग किया। इस तरह शीघ्र ही कई प्रकार की चीजों का उपयोग कर लेजर उपकरण बना दिए 

लेजर किरणें अत्यधिक शक्तिशाली होती हैं। इसका कारण है-उद्दीप्त प्रावर्द्धन से ऊर्जा ‘संसक्त’ होती है, अर्थात् मूल किरण की ही दिशा में वे जमा होती हैं। लेजर के इस गुण के आश्चर्यजनक परिणाम सामने आए। लेजर से निकलने वाली एक वॉट की रोशनी जीरो वॉट के बल्ब के बराबर होती है। जब चांद की ओर एक वॉट की लेजर किरण फेंकी गई, तब वहां रखे टेलीविजन पर वह दिखाई दी, जबकि वहां बड़े-बड़े शहरों की झिलमिलाती रोशनी का कोई अता-पता नहीं था।

संयुक्त राज्य अमेरिका के लोग विज्ञान के सभी क्षेत्र भौतिकी, रसायन, चिकित्सा, प्रतिरक्षा आदि में किसी-न-किसी तरह की लेजर किरणों का प्रयोग कर रहे हैं। वहां लेजर किरणें लम्बी दूरी की टेलीफोन-कॉल प्रेषित करने में सहायता करती हैं। ये कम्प्यूटर की अधिकांश हार्ड कॉपी प्रिंट करती हैं, स्टीरियो सिस्टम पर कॉम्पेक्ट डिस्क का डिजिटल कोड पढ़ती हैं। मात्र साठ वर्ष पूर्व न्यूजर्सी की बेल टेलीफोन लेबोरेटरीज में आर्थर स्कालो तथा चार्ल्स टाउन्स द्वारा अविष्कृत यह लेजर आज एक ऐसे औजार के रूप में विकसित हो चुकी है, जिसके बिना उच्च प्रौद्योगिकी की जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। 

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि लेजर का पहला प्रभाव वैज्ञानिक निरीक्षण के क्षेत्र पर पड़ा। इसने अनुसंधानकर्ताओं को ऐसा प्रकाश-पुंज प्रदान किया, जो न केवल अणुओं और परमाणुओं को पहचान कर सकता था रासायनिक प्रक्रिया आरम्भ कर सकता था, साथ ही ‘पदार्थ’ की आधारभूत विशेषताओं को पहचानने, मापने और परिवर्तित करने का काम भी बखूबी कर सकता था। जल्द ही लेजर का औद्योगिकी प्रयोग वस्तुओं को काटने और उसे ताप पहुंचाने में होने लगा। अब भले ही किसी लोहे के कवच को शक्तिशाली कार्बन-डाइ-ऑक्साइड लेजर से काटने की बात हो या किसी महंगे संश्लिष्ट कपड़े को हाथ में पकड़े हुए छोटे से लेजर से काटने-छांटने की कटाई का कार्य हो, ये सभी काम अत्यन्त खूबसूरती से होते थे। 

यही नहीं, संगीत व मनोरंजन की दुनिया में भी इसका प्रयोग किया जा रहा है। घरों में चलाया जाने वाला होम स्टीरियो सिस्टम की कॉम्पेक्ट डिस्क में भव्य संगीत की वृहत् यात्रा लेजर रीडर की सहायता से प्रस्फुटित और प्रसारित होती है। कम्प्यूटरों के अंदर की डिस्क पर संगृहीत विज्ञान की जानकारी भी इसी प्रकार यह लेजर तेजी के साथ बिना कोई गलती किए कागज पर स्थानान्तरित कर देता है। बहुत-सी रिपोर्ट, मेमो, पत्र-पत्रिकाएं अब लेजर प्रिण्टरों के प्रयोग से कम्प्यूटरों पर छपती हैं। 

लेजर के सबसे चमत्कारी प्रयोग चिकित्सा के क्षेत्र में हैं। आज लेजर द्वारा आंखों 

की होने वाली सर्जरी से कोई भी अपरिचित नहीं है। भारत में करीब नब्बे लाख लोग नेत्रहीनता का शिकार हैं और करीब साढ़े चार करोड़ जनता आंशिक रूप से अंधी है। इस अवस्था ने अन्धता-निवारण के काम को अत्यन्त चुनौतीपूर्ण बना दिया है। नेत्र-विकार के मामलों में करीब पैंतालीस प्रतिशत केस ‘मोतियाबिन्द’ के होते हैं। इस बीमारी का उपचार शल्य-क्रिया द्वारा ही किया जाता रहा है, मगर ‘ग्लूकोमा’ जैसी बीमारी से उत्पन्न होने वाले अन्धेपन का उपचार अभी नहीं खोजा जा सका है। 

विज्ञान की आधुनिक प्रणाली ‘लेजर चिकित्सा’ से काला मोतिया जैसे भयानक रोग में भी अब अंधता-निवारण सम्भव हो गया है। काला मोतिया एक भयानक रोग है, जिसमें आंखों के भीतर पानी जमा हो जाता है और आंख पर दबाव बनने लगता है, नतीजतन आंखों के विभिन्न पर्दो पर इस दबाव का प्रभाव पड़ता है। इस बीमारी के इलाज में ‘लेजर किरणों द्वारा एक सुराख करके आंख के भीतर जमा पानी को बाहर निकाल दिया जाता है। पानी निकाल देने से रोगी को आराम मिल जाता है।

काला मोतिया के रोग में रोगी को पता भी नहीं चलता और धीरे-धीरे रोगी की नेत्र-ज्योति चली जाती है, परन्तु लेजर-पद्धति ने इस रोग के उपचार को अब बहुत सरल बना दिया है।

 मधुमेह रोग के कारण मधुमेह रोगी, आंखों में रक्त की सूक्ष्म नलियों के बंद हो जाने और उन पर दबाव पड़ने से संवेदनशील रेटीना पर रक्त जम जाने से अंधेपन का शिकार हो जाता था। 

पर, इस रोग के उपचार में भी लेजर किरणों द्वारा रोगी की रक्त-शिराओं को बंद कर दिया जाता है, जिससे रक्त में पौष्टिक तत्वों का बहाव न हो पाए। इसके अलावा पर्दे की सतह को ज्यादा पोषक तत्व पहुंचाकर इसे जीवित करने के लिए लेजर किरणों का प्रयोग किया जाता है। 

वहीं रक्त शिराओं के रोगों में लेजर-किरणों का प्रयोग वेल्डिंग की भांति किया जाता है, जो बीमारी के कारण फट जाती हैं, या फटने वाली होती हैं। फटी हुई रक्त-शिराओं को लेजर किरणों द्वारा वेल्डिंग कर जोड़ दिया जाता है। साथ ही आंखों की रोशनी कम होने के रोग में भी लेजर किरणों का प्रयोग किया जाता है। यह बीमारी प्रायः बढ़ती आयु के कारण होती है। इन सभी रोगों में उपयोग किए जाने वाले लेजर के ‘ऑर्गन’ और ‘क्रिप्टॉन’ लेजर कहलाते हैं। 

लेजर का आविष्कार किसने किया

लेजर किरणे आंखों से देखी जा सकती हैं। इंद्रधनुष के सात रंगों में से इनमें नीला, लाल और हरा होता है।

आधुनिक वैज्ञानिक युग में अब एक विशेष प्रकार के लेजर ‘एन.डी. याग’ का उपयोग आंखों की पुतली के पीछे की झिल्ली को काटने के लिए किया जाने लगा है। ये झिल्लियां प्रायः मोतियाबिन्द के ऑपरेशन के बाद उभर आती हैं। 

इन झिल्लियों को लेजर की सहायता से बिना शल्य क्रिया किए काटा जा सकता है। पहले इन झिल्लियों को आंख के अंदर औजार डालकर निकालना पड़ता था, मगर लेजर के कारण यह कार्य सरल हो गया है। यही कारण है कि कुछ मिनटों में झिल्ली काटकर आंख की लुप्त रोशनी वापस आ जाती है। 

वास्तव में लेजर किरण कई प्रकार के नेत्र-रोगियों के लिए प्रकाश की किरण लाई है। आंख की अनेक बीमारियों में लेजर किरणों के उपयोग से लाभ मिलने लगा है।

काला मोतिया, मधुमेह जिसे हम डायबिटिज कहते हैं, के कारण पर्दे पर धब्बे का बन जाना, आंख के पर्दे पर खून की नली की बीमारियां, खून की नली के रुकने से संवदेनशील पर्दे पर पौष्टिक तत्त्वों का अभाव होना और पुतली के पीछे झिल्ली का बन जाना आदि शामिल है। काला मोतिया के इलाज में लेजर किरणों का उपयोग विज्ञान की एक ऊंची छलांग ही माना जाएगा। इस पद्धति से नेत्र-विकार के उपचार में जटिलताएं भी कम हुई।

पहले भू-गर्भ की गहरी खुदाई, टांका लगाना और बहुत ही बारीक कार्य भारी-भरकम यंत्रों से किए जाते थे; तब बहुत कठिनाई होती थी। मगर जब से ‘लेजर किरण’ की खोज कर ली गई है, सभी कार्य सरल हो गए हैं। 

विश्व का सबसे कठोर पदार्थ हीरा है, मगर ‘लेजर किरणों’ द्वारा उसे किसी नरम वस्तु की भांति तराश दिया जाता है। सुरंगों की खुदाई में इसकी किरणें बहुत उपयोगी सिद्ध हुई हैं। 

लेजर किरणें इतनी बारीक अर्थात् सूक्ष्म और सधी हुई होती हैं कि बाल में भी छेद कर दें। 

इसके अतिरिक्त संचार, नौकायन, खोज-खबर आदि कार्यों में भी लेजर किरणें सहायक होती हैं। अन्तरिक्ष यात्रा से लेकर नपे-तुले बहुत खतरनाक शल्य-क्रियाओं को अत्यन्त सावधानीपूर्वक इन किरणों के द्वारा किया जाता है।

लेजर का आविष्कार किसने किया

आज के वैज्ञानिक इन किरणों की सहायता से अंधों के लिए कुछ करना चाहते हैं। ये किरणें अंधों के लिए आंख देने के काम में सहायक सिद्ध हो रही हैं। लेजर किरणों से प्रभावित एक घड़ी तैयार की गई है, जिनकी सहायता से अंधे लोग चल सकते हैं। इन घड़ियों के जादू से अंधे लोगों को आस-पास के वातावरण की पूरी जानकारी हो जाएगी। इससे नेत्रहीन लोगों को बहुत सहायता मिल रही है। 

लेजर किरणों से जले घावों का भी उपचार किया जाता है। डॉक्टरों ने एक से बढ़कर एक जख्म का सफलतापूर्वक उपचार किया है।

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