लाल बहादुर शास्त्री पर निबंध

लाल बहादुर शास्त्री पर निबंध

लाल बहादुर शास्त्री पर निबंध |Essay on lal bahadur shastri in hindi

सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते, 

विघ्नों को गले लगाते हैं, कांटों में राह बनाते हैं।

सचमुच लालबहादुर शास्त्री को अपने लिए कांटों के बीच से ही रास्ता बनाना पड़ा था। शास्त्री जी के पास न तो कोई पृष्ठभूमि थी और न ही कोई शारीरिक सौष्ठव। दूसरी ओर उनके सामने बाधाओं के पहाड़ आए। आर्थिक विपन्नता ऐसी थी कि नाव से गंगा पार करने के लिए भी पैसे नहीं होते थे। महीनों तक दो समय का भोजन भी नहीं मिलता था। पैसे के अभाव में इलाज नहीं होने के कारण उन्हें एक पुत्र से भी हाथ धोना पड़ा। फिर भी वे अपने नाम के अनुरूप बहादुरी के साथ जीवन की बाधाओं को पार करते हुए एक दिन भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुए। इनके प्रधानमंत्री बन जाने पर सर्वत्र यह कहा जाने लगा—’शास्त्री जी गुदड़ी के लाल निकले।’ 

ऐसे कर्मवीर का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को मुगलसराय (उ.प्र.) में एक अति निर्धन परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम शारदा प्रसाद तथा माता का नाम श्रीमती रामदुलारी सिन्हा था। किशोरावस्था में ही इनके पिता जी चल बसे। फलतः घर की आर्थिक विपन्नता अधिक बढ़ गई थी। खेवाई के पैसे के अभाव में शास्त्री जी को नदी में तैरकर वाराणसी जाना पड़ता था। फिर भी बालक शास्त्री हिम्मत नहीं हारे और उनकी पढ़ाई चलती रही। 

सन 1911 में गांधी जी वाराणसी आए थे। उस समय उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया था। गांधी जी की आवाज पर अनेक छात्र स्कूल कॉलेज छोड़कर इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे। इन्हीं छात्रों में शास्त्री जी भी शामिल हो गए। फलतः इन्हें ढाई वर्ष सश्रम कारावास की सजा मिली। जेल से निकलने के बाद वे काशी विद्यापीठ के छात्र बने और वहां से ‘शास्त्री’ की उपाधि प्राप्त करके लालबहादुर से लालबहादुर शास्त्री बने। 

आजादी के बाद लालबहादुर शास्त्री ने कई महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित किया। इन्होंने केंद्र सरकार में रेल, वाणिज्य एवं गृह मंत्री के दायित्व का निर्वाह सफलतापूर्वक किया। पंडित नेहरू की मृत्यु के बाद 9 जून, 1964 को वे भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री बने। इन्होंने मात्र 18 महीने के प्रधानमंत्रित्व काल में देश का चतुर्दिक विकास किया। इनके द्वारा अनेक उत्कृष्ट कार्य किए गए। इन्होंने भारत-नेपाल संबंध, असम भाषा विवाद तथा कश्मीर समस्या का काफी सूझबूझ के साथ हल किया। फलतः इनकी कार्यकुशलता की प्रशंसा होने लगी। 

1965 में भारत-पाक युद्ध में विजय दिलाकर शास्त्री जी ने भारत का मस्तक ऊंचा किया। इन्होंने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया। शास्त्री जी का कहना था, “जिस प्रकार देश की सुरक्षा के लिए सेना के जवान महत्वपूर्ण हैं, उसी प्रकार देश की खुशहाली के लिए किसान महत्वपूर्ण हैं।” 

शास्त्री जी 1966 में रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति कोसिजिन के आग्रह पर पाकिस्तान के साथ मैत्रीपूर्ण रास्ता निकालने हेतु ताशकंद गए। वहां कोसिजिन की मध्यस्थता में भारत और पाक के बीच एक समझौता पत्र तैयार हुआ, जिसे ‘ताशकंद समझौता’ कहा जाता है। ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर करने के कुछ ही घंटों बाद उनकी हृदय गति रुक गई और भारत के लोकप्रिय प्रधानमंत्री की मृत्यु हो गई। इनकी सादगी एवं कर्मठता हम सबके लिए अनुकरणीय है। 

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