Krishna Story in Hindi-अरिष्टासुर का भय | कृष्ण की 5 कहानियां

Lord Krishna Stories in Hindi

Lord Krishna Stories in Hindi-अरिष्टासुर का भय | कृष्ण की 5 कहानियां

कुछ समय बाद दुष्ट कंस ने अरिष्ट नामक एक राक्षस को वृंदावन भेजा, ताकि वह श्रीकृष्ण का वध कर सके। बैल का वेश धारण किए उस राक्षस ने वृंदावन में कदम रखते हुए मन ही मन में कहा, ‘कृष्ण! मैं तुझे समाप्त कर दूंगा। मैं तेरा काल बनकर आ रहा हूं।’

अरिष्ट गुस्से से लाल आंखें लिए और अपने खुरों से धूल उड़ाते हुए दौड़ा चला जा रहा था। वह राक्षस इतना बड़ा था कि सूरज भी उसके पीछे छिप जाता था। अरिष्ट के विशाल आकार के कारण उस पर सवारी करना लगभग नामुमकिन था। वह इतनी तेजी से आ रहा था कि लोग घबरा उठे। 

अरिष्ट के शरीर से ऐसी नकारात्मक ऊर्जा निकल रही थी कि उसकी झलक पाते ही सब पशु-पक्षी डरकर छिप गए। अरिष्ट ने भीड़ में भगवान कृष्ण को पहचान कर अपना सिर हिलाया। वृंदावन के लोग उस विशाल बैलनुमा राक्षस को देख मारे डर के चिल्लाने लगे, “भगवान कृष्ण! कृपया हमारी मदद करें। बदसूरत बैल का रूप धारण किए यह राक्षस यमराज के समान दिख रहा है। यह हम सबको समाप्त कर देगा। कृपया आप हमारी मदद करें।” 

जब भगवान कृष्ण ने वृंदावन के लोगों की पुकार सुनी, तो वे तत्काल उनकी मदद के लिए पहुंच गए। श्रीकृष्ण उस राक्षस से थोड़ी दूरी पर खड़े हो गए। अरिष्ट ने उन्हें घूरकर घमंड से कहा, “तो तू आ ही गया। अरे बच्चे, मैं बहुत ताकतवर हूं। मैं तो बड़े से बड़े मुनियों को मौत के घाट उतार चुका हूं। उन सबके आगे तेरी औकात ही क्या है? क्या तुझे लगता है कि तू मेरा सामना कर सकता है?” 

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हमले के लिए तैयार खड़े राक्षस अरिष्ट को देखकर भगवान कृष्ण मुस्कराए। उन्होंने अपने हाथों से ताली बजाते हुए उसे अपनी ओर आने का संकेत किया। ऐसे में अरिष्ट का गुस्सा काफी बढ़ गया। 

ज्यों ही वह बैल राक्षस भगवान कृष्ण की ओर आया, उन्होंने उसका एक सींग तोड़कर उसके पेट में घोंप दिया। इसके बाद उन्होंने उसे एक जोरदार चूंसा दे मारा। इसके परिणाम स्वरूप बैल राक्षस उनके पैरों पर गिर पड़ा और उसके प्राण निकल गए। यह देखकर वृंदावन के लोग मारे खुशी के झूम उठे। वे भगवान कृष्ण का गुणगान करने लगे। उनके आनंद की कोई सीमा नहीं रही। इस तरह भगवान कृष्ण वृंदावन के लोगों की रक्षा करने के साथ-साथ उन्हें अपना प्यार भी दे रहे थे। 

इस कथा से लोगों को यह शिक्षा मिलती है कि हमें कभी अपने बल का घमंड नहीं करना चाहिए। हमें अपने विरोधी व्यक्ति के बल का आकलन करके ही उससे युद्ध के लिए तत्पर होना चाहिए। यदि हम ऐसा नहीं करते, तो स्वयं को ही हानि पहुंचने की संभावना रहती है। बुद्धिमान व्यक्ति बिना सोचे-समझे कोई भी कदम नहीं उठाता। 

 Krishna stories in Hindi pdf- नारद ने मचाई खलबली

नारद मुनि स्वभाव से चंचल थे। इधर वे वृंदावन में होने वाली घटनाओं को बहुत दिलचस्पी से देख रहे थे। एक दिन नारद मुनि पुनः राजा कंस के महल में जा पहुंचे और बोले, “अलख निरंजन!” राजा कंस ने उनका काफी स्वागत-सत्कार किया। नारद ने उसे बताया कि वृंदावन में श्रीकृष्ण और बलराम की शक्ति बढ़ती जा रही थी। यह सुनकर दुष्ट कंस चिंता में पड़ गया। वह सोचने लगा कि श्रीकृष्ण और बलराम का वध करने के लिए अब कोई कारगर योजना बनाना अत्यावश्यक है। वह जानता था कि अगर उसने दोनों भाइयों को नहीं मारा, तो उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा। 

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अंततः एक दिन राजा कंस ने एक योजना बना ली। उसने चाणूर और मुष्टिका नामक कुश्तीबाजों को अपने पास बुलाया। कुश्तीबाजों ने कंस के पैर छूकर आशीर्वाद लिया। वे दोनों इतने लंबे थे कि उनके आगे महल के विशाल खंभे भी खिलौनों की तरह दिख रहे थे। उनकी भुजाएं इतनी मजबूत थीं कि वे चट्टान को भी पल में चूर-चूर कर सकती थीं। दुष्ट कंस ने उन्हें आदेश दिया कि वे कुश्ती के खेल में श्रीकृष्ण और बलराम का वध कर दें। फिर उसने उन्हें अपनी योजना समझा दी। दोनों कुश्तीबाज प्रसन्न होकर कंस के महल से वापस लौट पड़े। लेकिन चाणूर और मुष्टिका को यह पता नहीं था कि कुश्ती के दौरान उन्हें स्वयं ही अपनी मौत का सामना करना पड़ेगा। 

इधर कंस ने एक यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें अग्नि देवता को आहुति दी जानी थी। इस अवसर पर उसने श्रीकृष्ण और बलराम तथा अपने पहलवानों के बीच कुश्ती की घोषणा की। इसके पश्चात अक्रूर को वृंदावन भेजा गया, ताकि वह श्रीकृष्ण और बलराम को मथुरा ला सके। दुष्ट कंस ने सोचा, ‘इतना करना ही काफी नहीं होगा। उन दोनों को मारने के लिए मुझे कोई अन्य योजना भी बनानी होगी।’ 

तत्पश्चात कंस ने केशि नामक एक असुर को वृंदावन भेजा, ताकि वह श्रीकृष्ण और बलराम को खत्म कर सके। इसके अलावा उसने कुबलयापीड़ नामक हाथी को भी तैयार करवा लिया। उसने सोचा कि अगर एक योजना सफल न हुई, तो दूसरी या तीसरी योजना से श्रीकृष्ण और बलराम अवश्य ही मौत के मुंह में चले जाएंगे। वह अपनी ओर से दोनों भाइयों को मारने की तीन योजनाएं तैयार करके निश्चित हो गया। 

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लेकिन मूर्ख कंस को यह नहीं पता था कि वह अपनी मौत को बुलावा दे रहा था। उसने सोचा, ‘अब मैं पूरी तरह से सुरक्षित हो जाऊंगा। श्रीकृष्ण चाह कर भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। मेरे राक्षस उसे चुटकियों में मसल देंगे। देखता हूं कि अब वह अपने प्राणों की रक्षा कैसे करेगा।’

जब घोड़ा रूपी राक्षस केशि वृंदावन पहुंचा, तो सभी ग्वाले उसे देखकर डर गए। वह भगवान कृष्ण को जान से मारने के लिए आया था। वह अपने खुरों से धरती को चीरने लगा। फिर उसने सूर्य और चंद्र पर भी हमला कर दिया। भगवान कृष्ण ने वृंदावन के वासियों से कहा, “जब तक मैं यहां हूं, किसी को डरने की जरूरत नहीं है।” जब राक्षस केशि ने भगवान कृष्ण की बात सुनी, तो वह गुस्से से हिनहिनाया, “मैं तुझे और वृंदावन के वासियों को कड़ा दंड दूंगा। मैं किसी को भी जिंदा नहीं छोड़ेगा।” 

तत्पश्चात केशि अपने बलशाली खुरों से धरती को रौंदता हुआ आगे बढ़ा। तभी भगवान कृष्ण ने उसके दो टुकड़े करके उसे मौत के घाट उतार दिया। केशि का वध करने के कारण वे ‘केशव’ कहलाए। 

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तभी अक्रूर ने वृंदावन पहुंचकर श्रीकृष्ण को यह संदेश दिया कि कंस ने उन्हें और बलराम को मथुरा बुलाया है। दुष्ट कंस का संदेश सुनकर नंद, यशोदा, गोपियां और ग्वाले मारे दुख के रोने लगे। राधा भी श्रीकृष्ण से वियोग होने के कारण दुखी थीं। जब श्रीकृष्ण और बलराम दुष्ट कंस द्वारा भेजे गए रथ पर सवार होकर मथुरा जाने लगे, तो वे भी उन लोगों से वियोग होने के कारण दुखी थे। 

मां यशोदा और नंद बाबा को भी अपने बच्चों से वियोग होने का दुख था, परंतु वे जानते थे कि यह स्वयं प्रभु द्वारा बनाई गई योजना है और उनकी योजना कभी असफल नहीं होती। 

Lord Krishna stories-श्रीकृष्ण ने किया कुब्जा का उद्धार

जब श्रीकृष्ण और बलराम मथुरा पहुंचे, तो अक्रूर महल में चला गया। दोनों भाई पैदल ही नगर की शोभा देखने लगे। तभी वहां उनकी भेंट माला बेचने वाले एक व्यक्ति से हुई, जो प्रभु का दिव्य स्वरूप जानता था। उसने अपने फूलों से उनकी पूजा की और भगवान कृष्ण ने उसे आशीर्वाद दिया। इसके बाद दोनों भाइयों की भेंट कुब्जा नामक एक युवती से हुई। 

Lord Krishna stories-श्रीकृष्ण ने किया कुब्जा का उद्धार

कुब्जा बहुत सुंदर थी, लेकिन उसकी पीठ पर एक कूबड़ था। उसके लंबे बाल और प्यारी आंखें भी कूबड़ के कारण कुरूप लगते थे। वह अपने हाथों में चंदन का लेप लिए थी। भगवान कृष्ण ने उससे पूछा, “तुम यह लेप किसके लिए ले जा रही हो?” कुब्जा ने उन्हें बताया कि वह लेप कंस के लिए था। श्रीकृष्ण ने कहा कि वह उस लेप को उन पर और बलराम पर लगा दे। जब कुब्जा ने ऐसा किया, तो उन्होंने आशीर्वाद देकर उसका कूबड़ तुरंत ठीक कर दिया। 

अब कुब्जा बहुत सुंदर लग रही थी, क्योंकि उसका कूबड़ दूर हो गया था। उसने भगवान कृष्ण को सहृदय धन्यवाद किया। इसके बाद भगवान कृष्ण और बलराम कंस के महल की ओर बढ़े। जब वे वहां पहुंचे, तो दिन ढल चुका था। 

उन्होंने दरबानों को बताया कि वे कंस से मिलना चाहते थे। दरबानों ने कहा कि कंस अखाड़े में था। दरबानों की बात सुनकर वे अखाड़े की ओर चल पड़े। 

 Lord Krishna Stories in Hindi- चाणूर और मुष्टिका का वध

राजा कंस अखाड़े में बनी अपनी यज्ञशाला में यज्ञ कर रहा था। वहां एक धनुष की पूजा शुरू होने वाली थी। भगवान कृष्ण और बलराम अखाड़े में पहुंचे। फिर दुष्ट कंस को चुनौती देते हुए श्रीकृष्ण ने वह धनुष तोड़ दिया। ऐसे में कंस गरजता हुआ बोला, “इन्हें तुरंत जान से मार डालो!” आदेश मिलते ही चाणूर और मुष्टिका ने दोनों भाइयों पर हमला कर दिया। उसी समय बलशाली हाथी कुबलयापीड़ को भी अखाड़े में छोड़ दिया गया। भगवान कृष्ण और बलराम सबसे पहले उस हाथी की ओर बढ़े। उन्होंने हाथी को सूंड से पकड़ा और धरती पर पटककर उसे मार डाला। 

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तभी दोनों कुश्तीबाजों ने श्रीकृष्ण और बलराम को घेर लिया। वे सारी रात दोनों भाइयों से लड़ते रहे, लेकिन भगवान कृष्ण का सामना करना उनके बस में नहीं था। श्रीकृष्ण ने चाणूर का शरीर सौ बार गोल-गोल घुमाने के बाद आकाश में छोड़ दिया। फलतः वह धरती पर गिरकर मर गया। इधर बलराम ने एक ही घूसे के प्रहार से मुष्टिका की जान ले ली। 

यह सब देखकर दुष्ट कंस बुरी तरह घबरा गया, क्योंकि बलशाली पहलवान भी उन दोनों भाइयों को नहीं मार सके थे। 

चाणूर तथा मुष्टिका का वध करने के बाद भगवान कृष्ण और बलराम दुष्ट कंस की ओर बढ़े। वह अखाड़े से थोड़ी दूर अपने महल के सामने बैठा था। जब कंस ने उन्हें अपनी ओर आते देखा, तो उसने भयभीत होकर अपने सिपाहियों को आदेश दिया, “दोनों भाइयों को जंजीरों से जकड़कर कारागार में डाल दो।” लेकिन भगवान कृष्ण के हाथों दुष्ट कंस का वध होगा-यह आकाशवाणी अब सत्य सिद्ध होने जा रही थी। भगवान कृष्ण एक ही छलांग में राजा कंस के पास पहुंच गए र उसे बालों से पकड़ लिया। कंस बेहोश होकर धरती पर गिर पड़ा। फिर देखते ही देखते वह अपनी अंतिम सांसें गिनने लगा। वहां खड़े सभी लोग हैरानी से यह नजारा देख रहे थे। 

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जब कंस के भाई सुमाली ने भगवान कृष्ण को मारना चाहा, तो बलराम ने उसे मौत के घाट उतार दिया। इसके साथ ही दुष्ट कंस का शासन सदा के लिए समाप्त हो गया। मथुरा के लोग राजा कंस की हत्या का समाचार पाते ही खुशी से झूम उठे। भगवान कृष्ण ने कारागार में अपने माता-पिता देवकी और वासुदेव से भेंट की। नंद बाबा और मां यशोदा अपने पुत्र की खुशी में शामिल होने के लिए मथुरा पहुंच गए। 

देवकी और वासुदेव ने अपने पुत्र श्रीकृष्ण को गले से लगा लिया। वे अपने नवजात पुत्र को एक बार देखने के लिए जाने कितना तरसे थे। उन्होंने यशोदा और नंद को धन्यवाद दिया, जिन्होंने काफी स्नेह से उनके पुत्र को पाला-पोसा था। मथुरा में चारों ओर खुशियां फैल गईं। मथुरा वासियों ने बड़ी धूमधाम से भगवान कृष्ण का स्वागत किया। इतने लंबे समय से कष्ट सह रही प्रजा की खुशी का ठिकाना नहीं था। भगवान कृष्ण ने उनके दुखों का अंत कर दिया था। अब उन्हें किसी का भी भय नहीं था। 

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