Krishna Bal Leela-अर्जुन और आंवला वृक्ष | Little krishna stories in hindi

Krishna Bal Leela

Krishna Bal Leela(श्री कृष्ण की बचपन की कहानी)-अर्जुन और आंवला वृक्ष

जैसे-जैसे भगवान कृष्ण बड़े होने लगे, वैसे-वैसे उनकी शरारतें बढ़ने लगीं। एक दिन मां यशोदा ने परेशान होकर उन्हें एक ओखली से बांध दिया और बोली, “कृष्ण! मैंने तुझे इस ओखली से इसलिए बांधा है, ताकि तू कहीं जाकर शरारत न कर सके।” इसके बाद वे घर के भीतर जाकर काम करने लगीं। तब भगवान कृष्ण मुस्कराए और वे बंधे-बंधे ही चलने लगे। वहीं समीप में अर्जुन और आंवले के दो विशाल वृक्ष थे। जब वे उन पेड़ों के पास से गुजरे, तो उनकी ओखली उन पेड़ों में फंस गई। जब भगवान कृष्ण ने जोर लगाया, तो दोनों पेड़ जड़ से उखड़ गए

यह देखकर गोपियां हैरान हो गईं। एक गोपी दौड़ती हुई मां यशोदा के पास गई और उन्हें सब कुछ बताया। जब मां यशोदा वहां पहुंची, तो उन्होंने देखा कि भगवान कृष्ण गिरे हुए पेड़ों के पास आराम से खड़े थे। वे जान गईं कि उनके पुत्र कृष्ण में अपार बल है। उन्होंने श्रीकृष्ण को अपनी बांहों में भर लिया। बालक कृष्ण मां यशोदा की गोद में जाकर हंसने लगे। 

इधर जब बार-बार राक्षसों के हमले होने लगे, तो मां यशोदा को अपने बच्चे कृष्ण की सुरक्षा की चिंता सताने लगी। उन्होंने नंद बाबा से कहा, “हमें यह जगह छोड़कर अन्यत्र चले जाना चाहिए।” 

Little krishna stories in hindi

 गोपालों के मुखिया नंद बोले, “हम ऐसा क्यों करें। हमारा बेटा कोई आम इन्सान नहीं है। तुम किसी प्रकार की चिंता मत करो।”

नंद की पत्नी यशोदा बोली, “यह तो मैं जानती हूं, लेकिन कृष्ण अभी छोटा है।” यह सुनकर नंद ने निश्चय किया कि वे अपने बेटे की सुरक्षा के लिए वृंदावन चले जाएंगे। फिर वे लोग बलराम और श्रीकृष्ण के साथ वृंदावन रवाना हो गए। मां यशोदा को उम्मीद थी कि इस तरह उनका बेटा राक्षसों के हमले से बच जाएगा। वैसे उन्हें यह बात मालूम थी कि उनके बेटे के रूप में स्वयं भगवान धरती पर पधारे थे। 

शीघ्र ही सारा परिवार वृंदावन पहुंच गया। वृंदावन बहुत सुंदर स्थान था हरे-भरे पेड़, नदी का किनारा, बागों में खिले फूल और चारों ओर घंटियों की मधुर ध्वनि के साथ रंभाती गौएं। उन सबको वहां जाकर बहुत आनंद आया। शीघ्र ही वे वहां के माहौल में घुल-मिल गए। वृंदावन के लोगों ने भी उनके परिवार को बहुत स्नेह से अपना लिया। 

कुछ ही दिनों में भगवान कृष्ण सबके लाडले हो गए। गांव वाले अपने काम निपटाकर बालक कृष्ण के साथ खेलने आ जाते थे। 

कृष्ण की बचपन की कहानीनटखट कान्हा

समय बीतने लगा-भगवान कृष्ण और बलरम बड़े होने लगे। भगवान कृष्ण सदा पीले और बलराम सदा नीले रंग के कपड़े पहनते थे। एक दिन एक गोपी ने आकर यशोदा से शिकायत की, “कन्हैया बहुत नटखट है।” सभी लोग श्रीकृष्ण को प्यार से ‘कन्हैया’ या ‘कान्हा’ कहते थे। यशोदा ने पूछा, “अब मेरे कान्हा ने क्या कर दिया?” गोपी बोली, “जब मैं सुबह गाय का दूध निकालने गई, तो देखा कि किसी ने बछड़े को खोल दिया था। बछड़ा गाय का सारा दूध पी गया। मैंने सोचा कि यह शरारत किसकी हो सकती है। तभी मैंने कान्हा को वहां खड़े मुस्कराते हुए पाया।” मां यशोदा जान गईं कि उनका बेटा कितना चतुर और करुणा भाव रखने वाला था।

कृष्ण की बचपन की कहानी-नटखट कान्हा

जब मां यशोदा को लगता कि उनका बेटा सयाना हो गया है और अब कोई शरारत नहीं करता, तो उसी दिन कोई गोपी उनकी शिकायत लेकर आ जाती। एक दिन एक गोपी ने शिकायत की, “मैं तो मक्खन की चोरी से परेशान हो गई हूं। मैंने मटकी को एक छींके में लटका दिया था। मैं वहीं पर थी। तभी अचानक कान्हा अपने दोस्तों के साथ वहां आए। उन सब ने मिलकर मक्खन चुरा लिया। उस ओर मेरी पीठ थी, इसलिए मैं उन्हें ठीक से नहीं देख सकी। बस, मैंने उन्हें मक्खन चुराकर वापस जाते हुए देखा।” 

गोपी की बात सुनकर मां यशोदा को बहुत गुस्सा आया। वे बोली, “क्या तुम यह कहना चाहती हो कि मेरे कान्हा ने मक्खन चुराया है? मेरे घर में दूध, घी और मक्खन की कमी नहीं है। मेरे बालक जी भरकर खाते हैं। तुम मेरे बच्चे पर यह दोष नहीं लगा सकतीं।” 

 गोपी बोली, “नहीं यशोदा मैया, मैंने अपनी आंखों से कन्हैया को ऐसा करते हुए देखा है। कन्हैया अपने सभी साथियों के साथ वहां मौजूद थे और सबके हाथ-मुंह पर मक्खन लगा हुआ था।” 

दरअसल, भगवान कृष्ण के घर में तो दूध और मक्खन की नदियां बहती थीं। लेकिन वे अपने उन मित्रों के लिए मक्खन चुराते थे, जिन्हें अपने घर में गौएं होने के बावजूद खाने के लिए भरपेट नहीं मिल पाता था। 

कृष्ण की बचपन की कहानी-नटखट कान्हा

जब मां यशोदा ने इस बारे में कान्हा से पूछा, तो उसने कहा कि उन्होंने मक्खन नहीं चुराया। कोई बिल्ली खा गई होगी। कन्हैया की बात सुनकर गोपी का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। वह बड़बड़ करती हुई अपने घर लौट गई। 

कान्हा की मां यशोदा बहुत परेशान थीं। गोपियों की ओर से आने वाली शिकायतें बढ़ती जा रही थीं। एक दिन उन्होंने कहा, “देख कान्हा, सब तुम्हारी शिकायतें कर रहे हैं।” कान्हा घर के एक कोने में खड़े थे। अपनी मां को दुखी देखकर उनकी आंखों से आंसू टपकने लगे। कान्हा को रोता देखकर सारी गोपियां दुखी हो गईं और यशोदा से बोली, “आप इस प्यारे बच्चे को कुछ न कहें। यह तो नन्हा बालक है। इसका क्या दोष!” 

सभी लोग कान्हा से इतना प्यार करते थे कि उन्हें उदास देख ही नहीं सकते थे। उनकी मां भी उन्हें डांटकर खुश नहीं होती थीं। यह सब देखकर भगवान कृष्ण खुश हो गए और उन्होंने रोना बंद कर दिया। धीरे-धीरे गोपियों के मन में उनके लिए प्यार गहरा होता चला गया। 

कृष्ण की बचपन की कहानी-नटखट कान्हा

ऐसा नहीं था कि कान्हा ने शरारतें करनी बंद कर दी थीं। वे अब भी गोपियों के मटके अपनी गुलेल के निशाने से फोड़ देते थे। खूटे से बंधे बछड़ों को खोल देते थे, ताकि वे अपनी मां का दूध पी सकें। कान्हा गोपियों के घर में निकले ताजे मक्खन की हांडी चुराकर दोस्तों के पास ले जाते और सभी लोग मिलकर बड़े मजे से खाते। लेकिन वृंदावन के लोग उनसे इतना प्यार करने लगे थे कि वे अक्सर उनकी शरारतों को नजरअंदाज कर देते थे। वे लोग कन्हैया की शिकायत मां यशोदा से नहीं करते थे। ऐसी स्थिति में मां यशोदा समझती थीं कि उनके बेटे कृष्ण ने अब शरारतें करनी बंद कर दी हैं। लेकिन ऐसा कुछ नहीं था। वे अब भी अपने दोस्तों के साथ मक्खन और दही चुराते थे तथा गांव के लोगों को परेशान करते थे। 

Little krishna stories in hindi- नागों का राजा कालिया

यमुना नदी में कालिया नामक एक विशाल सर्प रहता था। वह नागों का राजा था। कालिया द्वारा नदी में रहने के कारण यमुना का जल जहरीला हो गया था। उसने यमुना नदी और आसपास के सारे जीवों का नाश कर दिया था। ऐसे में वृंदावन के लोगों ने परेशान होकर भगवान कृष्ण से कहा, “कालिया की वजह से कोई भी प्राणी नदी का जल नहीं पी सकता। वह अपने सामने आने वाली हर चीज का नाश कर देता है।” । 

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भगवान कृष्ण ने सोचा, ‘वह दुष्ट तो बहुत से लोगों के प्राण ले सकता है। मुझे उसे रोकना ही होगा।’ फिर वे दुष्ट कालिया को दंड देने के लिए यमुना नदी की ओर चल दिए। 

भगवान कृष्ण जल्द ही यमुना नदी के किनारे पहुंच गए। वे कदंब वृक्ष पर चढ़े और पानी में छलांग लगा दी। जब वे नदी में कूदे, तो जहरीले पानी के छींटों ने पास के पेड़ों को जला दिया। श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के अवतार थे, इसलिए उनके नीले शरीर पर विष का कोई असर नहीं हुआ। 

यह देखकर कालिया सांप को बहुत गुस्सा आया कि किसी ने उसकी नदी में तैरने का साहस किया है। 

सारे सांप आगे आकर भगवान कृष्ण को काटने का प्रयास करने लगे। उन्होंने भगवान कृष्ण के चारों ओर घेरा बना लिया और अपनी जीभ लपलपाने लगे। लेकिन वे भगवान विष्णु के अवतार थे, इसलिए सांप उनके पास नहीं आ सके। इस दौरान बलराम भी अपने दोस्तों के साथ वहां आ गए। नंद और यशोदा भी गांव वालों के साथ नदी के किनारे पहुंच गए। सभी को भगवान कृष्ण की चिंता सता रही थी। यशोदा भय के कारण कांप रही थीं, “मेरा कृष्ण कहां है…कहां है मेरा बच्चा?” 

इसके बाद सब लोगों ने जो नजारा देखा, उससे वे हैरान रह गए। भगवान कृष्ण के शरीर से निकलने वाली तेज रोशनी से सांपों की आंखें चौंधिया रही थीं। भगवान कृष्ण बेहिचक सर्यों के बीच बड़ी बहादुरी से डटे हुए थे। 

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तत्पश्चात देखते ही देखते भगवान कृष्ण और कालिया नाग के बीच भयंकर लड़ाई होने लगी। 

शीघ्र ही कालिया नाग ने उन्हें अपनी जकड़  में ले लिया। यह देखकर सभी लोग मारे डर के चिल्लाने लगे, लेकिन वे क्या कर सकते थे। नन्हे कृष्ण के प्राण संकट में थे। कालिया किसी भी समय उनका दम घोंट सकता था। 

सारे गांव वाले भगवान कृष्ण की सलामती की दुआ करने लगे। तभी अचानक भगवान कृष्ट ने विशाल रूप धारण कर लिया। उनके शरीर से निकलने वाली रोशनी, सूरज के प्रकाश से भी कहीं अधिक चमकीली थी, जिसे देखकर सभी लोग हैरान रह गए। 

श्री कृष्ण की बाल लीला इन हिंदी(

भगवान कृष्ण ने उस बलशाली सर्प पर हमला कर दिया। उन्होंने कालिया सांप का फन नीचे झुकाया और उस पर चढ़ गए। यशोदा मारे डर के चिल्लाईं, “मेरे बच्चे, कृष्ण! जरा संभलकर, अपना ध्यान रखना।” 

भगवान कृष्ण अपनी मां को देखकर मुस्कराए  और उन्हें दिलासा दिया कि उनके लाल को कुछ नहीं होगा। इसके बाद भगवान कृष्ण सर्यों के राजा कालिया नाग के फन पर सवार होकर नाचने लगे। कालिया नाग उनके भार तले दबने लगा और उसकी सांस घुटने लगी। वह एक ही पल में हार मान गया। भगवान कृष्ण के आगे उसकी एक न चली।

कालिया नाग के लिए एक-एक सांस लेना दूभर होता जा रहा था। जीवन में पहली बार उसका सामना किसी ऐसे व्यक्ति से हुआ था, जिसके आगे उसका सारा बल, सारा विष और सारा साहस व्यर्थ हो गया था। 

कालिया ने अनेक बार अपने विष की फुहार छोड़ी, लेकिन भगवान कृष्ण पर उसका कोई असर नहीं हुआ। वे तो बड़े आनंद से उसके फन पर खड़े होकर बांसुरी बजा रहे थे। शीघ्र ही बलशाली सांप कालिया की समझ में आ गया कि उसके फन पर चढ़कर नाचने वाला वह बालक कोई साधारण मनुष्य नहीं हो सकता। उसी समय उसके मन में विचार आया कि भगवान विष्णु उसका कल्याण करने आए हैं। 

ऐसे में कालिया ने विनती की, “प्रभु! मुझ पर दया करें। मुझे अपनी भूल का एहसास हो गया है।” भगवान विष्णु का अवतार होने के कारण भगवान कृष्ण के मन में उस विषैले सांप के लिए भी बहुत करुणा भाव था। उन्होंने निर्णय लिया कि वे उसे माफ कर देंगे। 

जब कालिया सांप की पत्नियों ने देखा कि उनके पति का बचना मुश्किल है, तो वे भगवान कृष्ण से प्रार्थना करने लगीं कि मेरे पति कालिया के प्राण बख्श दिए जाएं। 

श्री कृष्ण की बाल लीला इन हिंदी(

नागों के राजा कालिया ने उनके आगे सिर झुकाया, तो वे बोले, “मैंने निर्णय लिया है कि मैं तुम्हें माफ कर दूंगा। करुणा और क्षमा ही जीवन के सबसे बड़े मूल्य हैं। तुम्हारे प्राणों की रक्षा होगी, लेकिन तुम्हें हमेशा के लिए यमुना नदी छोड़कर जाना होगा। तुम यहां रहकर इस पानी को जहरीला नहीं बना सकते।” भगवान कृष्ण ने कहा। 

यह सुनकर कालिया नाग रोने लगा, “हे प्रभु! यह तो मेरा घर है। अगर मैं उस विशाल सागर में वापस गया, तो गरुड़ मुझे, मेरी पत्नियों और साथियों को जीवित नहीं छोड़ेगा।” कालिया मारे दुख के बेहाल था। भगवान कृष्ण बोले, “कालिया! तुम मत डरो। जब तुम सागर में जाओगे, तो तुम्हारे माथे पर पड़ा मेरे पैरों का निशान, तुम्हें गरुड़ के प्रकोप से बचा लेगा। वह इसे देखकर तुम्हें कुछ नहीं कहेगा।” यह सुनकर कालिया की सांस में सांस आई। कालिया नाग अपनी पत्नियों और अपने साथियों के साथ विशाल सागर की ओर चला गया। जब वे वहां से चले गए, तो यमुना नदी का पानी पहले की तरह पवित्र और शुद्ध हो गया। सबने भगवान कृष्ण को लाख-लाख धन्यवाद दिया और यमुना का किनारा एक बार फिर चहल-पहल से भर उठा। 

 श्री कृष्ण की बाल लीला इन हिंदी(shri krishna baal leela)- धेनुकासुर का वध 

धेनुक एक राक्षस था, जो दिखने में गधे जैसा लगता था। वह अपने मित्र दैत्यों के साथ ताल वन में रहता था। धेनुक बहुत दुष्ट और भयंकर था। उसे देखते ही सभी लोग भाग जाते थे। एक दिन ग्वालों ने श्रीकृष्ण और बलराम से विनती की कि वे ताल वन से कुछ फल ले आएं। उन्होंने बलराम से कहा, “जरा सावधानी से जाना। दुष्ट राक्षस धेनुक वहां कदम रखने वालों को ठोकर मारकर वन से बाहर निकाल देता है।” यह सुनकर भगवान कृष्ण मुस्कराए। वे इसका कारण जानते थे। उन्हें मालूम था कि ज्यों ही वे ताल वन में कदम रखेंगे, धेनुकासुर को अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा।

 श्री कृष्ण की बाल लीला इन हिंदी(

ताल वन में पहुंचकर बलराम और श्रीकृष्ण पेड़ों से फल तोड़ने लगे। तभी अचानक एक फल ‘धड़ाम’ से धरती पर आ गिरा। यह आवाज वन की रक्षा करने वाले दुष्ट राक्षस धेनुक के कानों में पड़ी। वह तेजी से उनकी तरफ बढ़ा। धेनुक राक्षस दोनों भाइयों पर हमला करना चाहता था। उसकी आंखें क्रोध से लाल हो रही थीं।

गंदी शक्ल वाले उस राक्षस को देखकर भगवान कृष्ण निडरता से मुस्कराने लगे। धेनुक पहले बलराम की ओर बढ़ा और उन्हें जान से मारना चाहा। बलराम ने उसे अपने दोनों हाथों में उठा लिया। इसके बाद उन्होंने उसे चारों तरफ घुमाकर एक चट्टान पर फेंक दिया।

चट्टान पर गिरने के कारण धेनुकासुर मर गया। तभी उसके मित्र राक्षस भारी गर्जना करते हुए वहां आ गए। गधों की शक्ल वाले सारे राक्षस दोनों बालकों पर टूट पड़े। लेकिन उनमें से कोई भी राक्षस श्रीकृष्ण और बलराम के हाथों न बच सका। वे सभी एक-एक कर मारे गए। 

 श्री कृष्ण की बाल लीला इन हिंदी(shri krishna baal leela)- धेनुकासुर का वध 

अंततः ताल वन राक्षसों से पूरी तरह खाली हो गया। अब वह एक सुरक्षित स्थान था। वहां सभी लोग जा सकते थे। सभी ग्वालों ने भगवान श्रीकृष्ण और बलराम को बहुत-बहुत धन्यवाद दिया। श्रीकृष्ण और बलराम ने अपने मित्रों को समझाया कि उन्हें किसी भी बाधा या चुनौती से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि एकजुट होकर उसका सामना करना चाहिए। इस तरह बाधा को समाप्त होने में देर नहीं लगती। 

कुछ ही समय में भगवान कृष्ण के साथियों ने भी संकटों का सामना करना सीख लिया। अब वे किसी भी संकट या बाधा के सामने आते ही चीखने-चिल्लाने के बजाय पूरे साहस से उसका सामना करते थे। यह देखकर भगवान कृष्ण और बलराम को बहुत अच्छा लगता था। 

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