खुद को कैसे बनाएं बेहतर जानिए ये टिप्स-हर सफलता के पीछे कुछ विफलतायें अवश्य होती हैं

Know these tips on how to make yourself better

खुद को कैसे बनाएं बेहतर जानिए ये टिप्स- हर सफलता के पीछे कुछ विफलतायें अवश्य होती हैं (There Are Certainly Some Failures, Behind Every Success) 

1.जिस प्रकार दुख के बिना सुख की और सुख के बिना दुख की प्रतीति संभव नहीं है, उसी प्रकार विफलता के बिना सफलता की और सफलता के बिना विफलता की अनुभूति संभव नहीं है. अर्थात् सफलता और विफलता तो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, चित्त के बिना पट्ट का और पट्ट के बिना चित्त का कोई महत्व नहीं होता.

2. वस्तुतः विफलताओं में ही सफलता का कमल खिलता है. हर विफलता को अन्ततः सफलता का सम्बल मिलता है. इसलिए अपनी विफलताओं से घबरायें नहीं, वरन् उनसे सीखते चलें. जरा सोचिए, आज आप जहाँ खड़े हैं, क्या आप बिना किसी बाधा के यहाँ आ खड़े हुए हैं ? क्या आपको विफलताओं का सामना नहीं करना पड़ा ? अर्थात् कई विफलताओं में से ही कोई न कोई सफलता उभर कर आ पाती है.

3. आदमी सबसे चालाक प्राणी होता है. सफलता का श्रेय वह खुद लेता है और अपनी विफलताओं का दोष दूसरों के सिर मंड देता है. और इसे ही वह अपनी सफलता समझ लेता है, किन्तु इस तरह वह खुद को ही धोखा देता है. खुद को धोखे में रखना ही सबसे बड़ी विफलता है. आदमी अपनी तमाम विफलताओं के पीछे कुछ न कुछ खुबसूरत बहाने ढूँढ लेता है. और इसे ही अपनी सबसे बड़ी अक्लमंदी समझ लेता है. जबकि सबसे बड़ी अक्लमन्दी तो यही है कि इन बनावटी कारणों की बजाय असली कारण ढूँढे जायें. और अपनी विफलताओं को सफलताओं में बदला जाये. किसी सफलता या विफलता को पिछले जन्मों के कर्मों से न जोड़ा जाय. इस अन्धविश्वास ने समाज का अब तक बहुत बड़ा नुकसान किया है.

4. आदमी अपनी विफलताओं से सीखकर ही सफलता की तरफ बढ़ सकता है. आदमी अपनी सफलताओं की अपेक्षा, विफलताओं से बहुत कुछ सीख सकता है. इसलिए बार-बार विफल होने पर भी मैदान मत छोड़िए. क्या पता, एक कदम के फासले पर ही सफलता खड़ी हो. क्या पता, विफलता के पीछे ही सफलता खड़ी हो. विफलता को जरा पलट कर तो देखिए.

5. हकीकत में तो जिन्दगी एक दौड़ है. जहाँ दौड़ है, वहाँ हौड़ है. हौड़ का मतलब प्रथम स्थान प्राप्त करना नहीं, बल्कि दौड़ना होता है. याद रखें, अगर आप दौड़ में बने रहेंगे तो आपका भी कोई न कोई स्थान तो होगा ही. जो जिन्दगी की दौड़ से बाहर हो जाता है, वो जिन्दगी के दौर से ही बाहर हो जाता है. ढेर सारी विफलताओं के बाद भी आप दौड़ में बने रह सकते हैं. 

6.’भूत’ की जिस गलती को सुधारा नहीं जा सकता, उसे भूल जाना चाहिए. किन्तु भविष्य में ऐसी गलती दोबारा न हो, इसका ध्यान रखा जाना चाहिए. पर हाँ, हर गलती से कुछ न कुछ अवश्य सीखा जा सकता है. सबसे बड़ा बदनसीब वही होता है जो अपनी गलतियों से कुछ भी सीखना नहीं चाहता है. आदमी कुछ भी करे, कुछ मूढ़तायें और मूर्खतायें तो हर व्यक्ति से हो ही जाती हैं. पर इसका अर्थ यह तो नहीं कि आदमी कुछ करे ही नहीं.

7. अपनी कमजोरी पहचाने बिना आगे बढ़ने से कोई फायदा नहीं होगा. विफल होने के तो कई रास्ते हैं. किन्तु अपनी कमजोरियों को नजरअंदाज करना सबसे आसान रास्ता है. जो व्यक्ति कुछ नहीं करता, वह एक ही गलती करता है कि वह ‘कुछ’ नहीं करता. किन्तु यही उसकी प्रथम व अन्तिम गलती है. याद रखें, जब तक जीना, तक तक सीना. जीना है तो कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा.

8. आदमी जन्मों-जन्मों से चूकता चला आया है. अपनी विफलताओं पर अपने भाग्य को कौसता चला आया है. किन्तु वह अपनी विफलताओं का विश्लेषण करने को तैयार नहीं है. यही उसका सबसे बड़ा दुर्भाग्य है. याद रखें, दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदला जा सकता है. यदि हम अपनी छोटी से छोटी विफलता का भी विश्लेषण करेंगे तो हमें हर विफलता में किसी न किसी सफलता के दर्शन अवश्य होंगे, जब हम पीछे देखकर आगे बढ़ेंगे तो अवश्य सफल होंगे. काम करते रहने पर हम अपने आप सीखते चले जायेंगे..

9. गलतियाँ करके सीखने की विलासिता ही क्यों पाली जाए ? मजा तो तब है, जब दूसरों की गलतियों से ही सीखा जाए. जिन्दगी तो हमें एक ही मिली है और वह भी नितान्त अनिश्चित. तब गलतियाँ करने और सीखने में ही जिन्दगी खपा देने का कोई अर्थ नहीं होगा. हम दूसरों की गलतियों से भी बहुत कुछ सीख सकते हैं और इस तरह अपने आर्थिक, भौतिक एवम् बौद्धिक संसाधनों की बचत कर सकते हैं. अर्थात् हम अपनी और दूसरों की गलतियों से गुजरते हुए ही सफलता तक पहुँच सकते हैं.

दृष्टान्त- एक राजा ने किताबी ज्ञान के आधार पर ही ‘योग’ करना आरम्भ कर दिया. प्रायोगिक जानकारी न होने से राजा को ‘योग’ से लाभ की बजाय नुकसान होने लगा. राजा ने अपनी समस्या मन्त्री के समक्ष रखी. मन्त्री ने सुझाव दिया-‘किसी योग-गुरु से परामर्श करें.’ किन्तु अहम् के कारण राजा ऐसा नहीं कर सका. योग चालू रखा. किन्तु विशेष लाभ नहीं हुआ. 

राजा ने अपनी दुविधा पुनः मन्त्री के समक्ष रखी, मन्त्री ने कहा-‘महाराज, जरा सोचने का अवसर दें.’ दूसरे दिन मन्त्री ने राजदरबार में सबके सामने अचानक सिपाहियों को आदेश दिया कि राजा को गिरफ्तार कर लिया जाये. किन्तु सब एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे. आदेशों की पालना नहीं हुई. 

इस पर राजा ने क्रोधित होकर मन्त्री को गिरफ्तार करने के आदेश दे दिये. आदेशों की पालना में मन्त्री को । तत्काल गिरफ्तार कर लिया गया. इस पर मन्त्री ने हँसते हुए अर्ज किया कि सक्षम व्यक्ति के आदेशों की ही अनुपालना हो पाती है. इसलिए अपेक्षित है कि किसी सक्षम गुरु से योग विद्या का प्रशिक्षण प्राप्त किया जाये. राजा को मन्त्री की बात समझ में आ गयी. 

सफलता के लिए विचार, विकल्प और चिन्तन की एकाग्रता आवश्यक है (Success is the Child of Concentration & Deep Thiking) 

1.यदि आप वही करते रहेंगे, जो अब तक करते रहे हैं, तो आपको वही मिलेगा, जो अब तक मिलता रहा है. याद रखें, दिनों-दिन आपकी आवश्यकतायें बढ़ती जा रही हैं, महंगाई भी निरन्तर बढ़ती जा रही है, इसलिए यदि आप अपने आर्थिक संसाधनों में तदानुसार बढ़ोत्तरी नहीं करेंगे तो आप समय की मांग के अनुरूप नहीं चल पायेंगे. इस यथास्थिति को तोड़ने के लिए विचार, विकल्प और चिन्तन को अपनी जीवनशैली का अंग बनाना होगा.

2. व्यक्ति वही कार्य करना चाहता है, जो उसे पसंद है. जो उसे करना चाहिए, वह नहीं करता. जो वह आसानी से कर सकता है, अरूचि के कारण वह भी नहीं कर पाता है. व्यक्ति अपनी सुविधाजनक स्थिति को ही अपनी पसंद बना लेता है. उसकी प्रगति में यह पसंद ही सबसे बड़ी बाधक है. इसलिए उसे अपनी पसंद में विस्तार करना होगा और इसके लिए महज विचार करने की आवश्यकता है. यथास्थिति वाद में बदलाव सकारात्मक चिन्तन से ही संभव है.

3. विज्ञान के पास आँखें तो होती हैं, पर पैर नहीं होते. धर्म के पास पैर तो होते हैं, पर आँखें नहीं होती. विज्ञान और धर्म के मिलने पर कर्म का आविर्भाव होता है और कर्म के पास आँखें भी होती हैं, पैर भी होते हैं. किन्तु निहित स्वार्थ वाले तथाकथित धार्मिक यौद्धा आरम्भ से ही इसमें सबसे बड़े बाधक बने हुए है. जरा सोचिए, वह धर्म ही क्या, जिसमें विचार, विकल्प और चिन्तन का स्थान न हो. वस्तुतः कर्म से अलग किसी धर्म का कोई अर्थ भी नहीं है.

4. इस सार-युक्त संसार में जो भी उत्पन्न होता है, उसका एक निश्चित प्रयोजन होता है. जरा विचार कीजिए, आपके होने का प्रयोजन क्या है ? अपने प्रयोजन की प्राप्ति के लिए आपका आयोजन क्या है ? क्या आप समूची एकाग्रता के साथ अपने प्रयोजन की ओर बढ़ रहे हैं ? क्या आप अपने विकल्पों का सही समय पर सार्थक उपयोग करते हुए सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ रहे हैं ? यदि हाँ तो यही है, असली सफलता. याद रखें, व्यक्ति के जीवन का एक ही प्रयोजन हो सकता है और वह है ‘सफलता.’

5. यदि हम विचार, विकल्प और चिन्तन को गंभीरतापूर्वक नहीं अपनायेंगे तो जीवन में सफल नहीं हो पायेंगे. और यदि सफल नहीं हो पायेंगे तो जितने कर्ज के साथ पैदा हुए थे, उससे कई गुना कर्ज भावी पीढ़ी के लिए छोड़ जायेंगे. दुनिया में अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य, मित्रता-शत्रुता, सफलता-विफलता, शान्ति–अशान्ति, क्रान्ति और भ्रान्ति सब कुछ आपके ‘मन’ के कारण है. मन को सकारात्मक दिशा देने के लिए एकाग्रता आवश्यक है. मन की एकाग्रता व्यक्ति की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है. मन की एकाग्रता में ही बुद्धत्व घटता है. एकाग्रता में विचार, विकल्प और चिन्तन फलित होता है.

6. सफलता का रास्ता भले ही लम्बा हो, पर उसकी मंजिल बड़ी खुबसूरत होती है. सफलता के लिए तन और मन को समझाने की नहीं, जगाने की जरूरत होती है. जब कोई विचार, विकल्प और चिन्तन के साथ आगे बढ़ेगा तो उसका लम्बा रास्ता भी छोटा होता चला जायेगा और मंजिल से भी कई गुना खुबसूरत होता चला जायेगा. तो आइए, मंजिल को ही नहीं, हर डगर को खुबसूरत बनायें, हर क्षण को अपनी मंजिल बनायें.

7. चिन्ता नहीं, चिन्तन करो. चिन्ता से तो एकाग्रता भंग होती है. जो चिन्ता से लड़ना नहीं जानता, वह कभी स्थिर बुद्धि नहीं हो सकता. साफ-साफ कहने वाला, राग-द्वेष न रखने वाला, मैदान छोड़कर न भागने वाला, हर क्षण को आनन्द व आत्म-सम्मान के साथ जीने वाला ही एक अच्छा ‘चिन्तक’ सिद्ध हो सकता है. इसलिए चिन्तन और मनन की आदत डालें. सारे विकल्प खुले रखें, तब विकल्प चुनने में भी कोई कठिनाई नहीं आयेगी, ध्यान द्वारा मन पर नियन्त्रण सम्भव है. जब मन सघ जाता है तो सुमन बन जाता है और तब ही व्यक्ति ‘अमन’ को उपलब्ध हो पाता है.

8. जब तक हम सोचते रहेंगे कि हमारा कोई वश नहीं है, तब तक हम सफलता की तरफ एक कदम भी नहीं बढ़ा पायेंगे. आत्मविश्वास के बिना तो हम एक कदम भी नहीं उठा सकते और चिन्तन के बिना आत्मविश्वास नहीं जगा सकते. जिस प्रकार शरीर की असंख्य विसंगतियों को सन्तुलित करने हेतु प्रकृति ने हमें नींद प्रदान की है, उसी प्रकार जीवन की अनगिनत चिन्ताओं को सन्तुलित करने हेतु परमात्मा ने हमें चिन्तन शक्ति प्रदान की है. यही हमारी सबसे बड़ी धरोहर है. यही हमें अन्य प्राणियों से अलग करती है.

9. जब तक हम विचार, विकल्प और चिन्तन की एकाग्रता में नहीं उतरेंगे, तक तक हम इन तीनों का समन्वय स्थापित नहीं कर सकेंगे. जब तक तीनों का समन्वय नहीं होगा, तब तक हर विचार अलग-थलग होगा. तब तक हम कोई निर्णय भी नहीं ले पायेंगे. इसलिए जरूरी है कि समन्वय स्थापित करते हुए अपने कार्यों में अपेक्षित सुधार करें, अपनी कार्यप्रणाली में आवश्यक परिवर्तन करें, हर विकल्प खुला रखें, तब हमें सफल होने से कोई नहीं रोक पायेगा.

दृष्टान्त-प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने अपने एक सहयोगी के साथ एक शोध कार्य किया. लगभग सात सौ प्रयोग किये. किन्तु सफलता नहीं मिली. इस पर सहयोगी ने हताश होकर इस रिसर्च को बन्द करने का आग्रह कर दिया. आइन्सटीन ने समझाया-‘हम विफल नहीं हुए हैं. हमने सात सौ दिशाओं में खोज की है. दिशायें ही विफल हुई हैं. हम तो सफलता के नजदीक पहुँचते जा रहे हैं. अब हमारे पास बहुत कम विकल्प बचे हैं और जो बचे हैं, उन्हीं में हमारी सफलता निहित है.’ प्रयोग जारी रखे गये और अन्ततः अन्तिम विकल्प पर पहुँच कर सफल हो गये. अर्थात् विचार, विकल्प और चिन्तन की एकाग्रता के माध्यम से ही इतनी बड़ी उपलब्धि प्राप्त हो सकी. यदि बीच में ही कार्य छोड़ दिया जाता तो सही विकल्प तक कभी नहीं पहुँच पाते. 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

14 + 19 =