द्रोणाचार्य का पतन | द्रोणाचार्य का वध-Killing of Dronacharya

द्रोणाचार्य का वध

द्रोणाचार्य का पतन | द्रोणाचार्य का वध-Killing of Dronacharya

भीष्म पितामह की मृत्यु के पश्चात् द्रोणाचार्य ने कौरव सेना की कमान संभाली। भीष्म की तरह द्रोणाचार्य भी पाण्डवों के प्रति नरम भावना रखते थे। दुर्योधन ने इस बात की शिकायत करी और द्रोणाचार्य पर अभियोग लगाया कि वे पाण्डवों को हराने की चेष्टा ही नहीं कर रहे हैं। द्रोणाचार्य को चाहकर भी दुर्योधन के अनुचितव्यवहार को रोक नहीं पाने की ग्लानि थी। साथ ही उन्हें ग्लानि थी कि आज उनकी स्थिति इतनी गिर गई है कि उन्हें दुर्योधन के कठोर वचन भी सुनने पड़ रहे हैं। 

दुर्योधन के कटुवचन ने उन्हें बुरी तरह आहत कर दिया था। अभियोग से क्रुद्ध द्रोणाचार्य ने युद्ध मैदान में भीषण युद्ध शुरु कर दिया। पाण्डव के ढेरों सैनिक मारे गए। धृष्टद्युम्न से भयंकर युद्ध हुआ। अपने पिता की रक्षा में आए उसके तीन पुत्र भी मारे गए। द्रोणाचार्य ने धृष्टद्युम्न के पिता द्रुपद एवं विराट को भी मार गिराया। द्रोणाचार्य के ब्रह्मास्त्र के कारण धृष्टद्युम्न को बहुत क्षति उठानी पड़ी। ढेरों सैनिक वीर गति को प्राप्त हुए। 

कृष्ण ने कहा, “द्रोणाचार्य को रोकना होगा। जब तक वह स्वयं अस्त्र नहीं रखेंगे तब तक उन्हें रोकना असंभव है।” हालांकि इस विचार से युधिष्ठिर प्रसन्न नहीं थे पर दूसरा कोई उपाय भी नहीं था। 

द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वत्थामा को बहुत चाहते थे। भीम ने अश्वत्थामा नामक हाथी का वध् किया और ऊँचे स्वर में बोला, “अश्वत्थामा मारा गया।” अर्जुन, नकुल और सहदेव ने भी भीम का साथ देते हुए कहा कि अश्वत्थामा मारा गया। पाण्डवों की सेना में अश्वत्थामा की मृत्यु की खुशियाँ मनाई जाने लगीं। 

द्रोणाचार्य आश्चर्यचकित थे। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वीर अश्वत्थामा कैसे मर गया? उन्होंने युधिष्ठिर से पूछा, “तुम बताओ क्या यह सत्य है? मैं तुम्हारी बात पर ही विश्वास करूँगा।” 

द्रोणाचार्य का वध

युधिष्ठिर हमेशा सच बोलते थे। कहा जाता है कि इतने सत्यवादी थे कि उनका रथ धरती की सतह से थोड़ा ऊपर चलता था द्रोणाचार्य ने जब अश्वत्थामा के विषय में पूछा तो उन्होंने कहा, “जी गुरुदेव, अश्वत्थामा मारा गया’ पर फिर धीमी आवाज में कहा, “हाथी, मानव नहीं।” तभी कृष्ण ने जोर का शंखनाद किया जिससे युधिष्ठिर के वाक्य का अंतिम भाग वे सुन नहीं पाए। द्रोणाचार्य के हाथ से तीर धनुष गिर पड़ा और पुत्र शोक में वे वहीं पर बैठ गए। तभी अवसर का लाभ उठाकर, अपने पिता और पुत्र का बदला लेते हुए, धृष्टद्युम्न ने तलवार से उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। कौरव सेना में सेनापति के गिरते ही भगदड़ मच गई। कौरव युद्ध हारने लगे। 

कहा जाता है कि उस दिन के बाद से युधिष्ठिर के रथ ने धरती के ऊपर उठकर चलना बंद कर दिया। 

अश्वत्थामा को जब अपने पिता द्रोणाचार्य की मृत्यु के विषय में पता चला तो वह क्रोध् से पागल हो गया। उसने पाण्डव वंश का नाश करने की प्रतिज्ञा की। अश्वत्थामा के आने से कौरव सेना में साहप का संचार हुआ। अश्वत्थामा के सेनापति बनने से कौरव सेना एक बार पुनः युद्ध के लिए तैयार हो गई।

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