सफलता के मूल मंत्र-सही चयन पर ही सफलता निर्भर करती है

सफलता के मूल मंत्र

सफलता के मूल मंत्र- सही चयन पर ही सफलता निर्भर करती है (Success Depends on The Proper Selection) 

१.हम यह तो जानते हैं कि हमें क्या नहीं करना चाहिए, किन्तु हम यह नहीं जानते कि हमें क्या करना चाहिए ? ‘हमें क्या करना चाहिए?’ इसका निर्णय हमारी चयन क्षमता पर निर्भर करता है. और हमारी चयन क्षमता हमारी त्वरित निर्णय दक्षता पर निर्भर करती है. उचित एवम् त्वरित निर्णय पर ही सफलता निर्भर करती है, इसलिए हमें अपनी चयन क्षमता में लगातार विस्तार करते रहना चाहिए.

2. जन्म और मृत्यु के बीच जो भी किया जाता है, उसका चुनाव किया जा सकता है. जैसा हमारा चुनाव होगा, वैसा ही परिणाम होगा. कई बार हम ऐसी परिस्थितियों का भी चुनाव कर लेना चाहते हैं, जो हमारे वश में नहीं हैं. और इसीलिए हम दुःखी रहते हैं. हमारे तमाम उपद्रवों का आधार भी यही है. इसलिए हमें सहज एवम् संभव कार्यों का ही चयन करना चाहिए. यदि हमारा चयन सही होगा तो परिस्थितियाँ अपने आप हमारे पक्ष में होती चली जायेंगी.

3. आनन्द की विकल्पना हमारी चयन संकल्पना पर ही निर्भर करती है. कार्य आरम्भ करने से पूर्व यदि हम उसकी उपयोगिता और कार्यविधि पर गहराई से मनन करेंगे, तो हम अपने अन्तःकरण की आवाज से सफलता अथवा विफलता का पूर्वाभास प्राप्त कर लेंगे. अन्तःकरण से ही सकारात्मक चुनाव के संकेत मिलते हैं. और सकारात्मक चुनाव से ही सफलता के रास्ते प्रशस्त हो सकते हैं.

4. कम-से-कम समय में सर्वोत्तम का चयन कर लेना ही सबसे बड़ी सफलता है. किसी कार्य की सफलतापूर्वक शुरूआत उसके सही चयन पर ही निर्भर करती है. चयन की योग्यता के बिना तो हम कुछ भी नहीं कर सकते. हमें हर क्षण कुछ न कुछ चयन करना पड़ता है और गलत चयन का नुकसान हमें लम्बे समय तक भुगतना पड़ता है. सुख और दुःख हमारे चयन पर ही निर्भर करते हैं. त्रुटिपूर्ण चयन हमें दुःखों की ओर धकेलता रहता है तथा सही चयन हमें सुख पहुँचाता है, दुःख और सुख तो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, फिर भी हम इनमें से किसी एक का चयन कर सकते हैं.

5. जीवन में शिक्षण-प्रशिक्षण, काम-धन्धा, दोस्त-दुश्मन, जीवन-साथी, सहयोगी, शान्ति-अशांति, ज्ञान-विज्ञान, प्रकाश-अंधकार, प्रेम-नफरत, सफलता-विफलता, साधन-संसाधन, समस्यायें और समाधान बहुत कुछ हमारे चयन पर निर्भर करते हैं. सही चुनाव का आधार हमारा आत्मविश्वास, सकारात्मक सोच, स्थिर मन, पूर्वानुभव एवम् भविष्य के प्रति हमारा दृष्टिकोण है. जब भी हम किसी वस्तु या स्थिति का चयन करते हैं, तब हम वस्तुतः अपने आपका ही चयन करते हैं.

6. हमारी प्राथमिकतायें क्या हैं ? आर्थिक स्वावलम्बन सम्बन्धी आवश्यकतायें क्या हैं ? हमारी सामाजिक एवम् नैतिक मान्यतायें क्या हैं ? आदि सभी प्रश्नों पर गंभीरतापूर्वक विचार कर सही कार्य योजनाओं का चयन करते हुए यदि हम इन पर यथा समय अमल कर लेते हैं तो हमें विफलता का मुँह नहीं देखना पड़ेगा. अर्थात् सही समय पर सही चयन की प्रवृत्ति ही सफलता की दिशा निर्धारित करती है.

7. याद रखें, हृदय तक केवल ध्यान पहुँचता है, ज्ञान नहीं. मस्तिष्क तक केवल ज्ञान पहुँचता है, ध्यान नहीं. आश्चर्य तो यही है कि व्यक्ति इनमें से किसी एक का ही चयन करता है, यही उसकी सबसे बड़ी विफलता है. ज्ञान और ध्यान के योग पर ही जीवन की सार्थकता है. इसलिए अपनी आवश्यकतानुसार दोनों का ही चयन करें, दोनों को ही जीवन में उतारें, यही सबसे बड़ी सफलता है.

8. जो भी चुनें, तत्काल चुनें. जो चुनें, उस पर चलें. गलत चुनाव पर सिर न धुनें. चुनाव में ही सारा वक्त न लगाएं, क्रियान्वयन के लिए भी वक्त बचाएं. कहीं ऐसा न हो कि चुनाव में ही कीमती वक्त बर्बाद हो जाए और सही वक्त पर सही व सहज चुनाव भी न कर सकें. 9. देखा जाय तो जिन्दगी का मतलब ही चुनाव है. चुनाव तो जिन्दगी के सुहाने सफर की नाव है. बशर्ते कि आप सही नाव का चुनाव कर सकें, यदि आप किसी उत्पादन कार्य में लगे हैं तो आपको हर स्टेज पर कुछ न कुछ चयन करना ही पड़ेगा. जैसे कच्चा माल, उत्पाद, सह-उत्पाद, फैक्ट्री स्थल, फैक्ट्री का आकार, मशीनरी, कर्मचारी, गुणवत्ता, प्रसार माध्यम, बाजार, नवाचार, निवेश आदि का चयन तो आपको करना ही पड़ेगा. हर क्षण और हर स्टेज पर कुछ न कुछ निर्णय लेने ही पड़ेंगे. आपके निर्णय आपकी चयन क्षमता पर निर्भर करेंगे. इसलिए चयन क्षमता बढ़ाइए और अपने निर्णयों में विलम्ब मत करिए.

दृष्टान्त- मिस्टर दूरदर्शी को घर हेतु भूखण्ड खरीदना था. शहर की विकसित कॉलोनी में दो सौ वर्ग मीटर का भूखण्ड दस लाख रुपये में मिल रहा था. नगरीय सीमा से थोड़ी दूरी पर मुख्य सड़क के किनारे दो एकड़ कृषि भूमि पाँच लाख रुपये में मिल रही थी. दूरदर्शी ने दूर की सोचते हुए दो एकड़ भूमि का चयन कर लिया. उसमें एक छोटा-सा फार्म हाउस बना कर रहने लगा. फल एवम् सब्जियों का उत्पादन भी करने लगा. कुछ आमदनी भी होने लगी. आरम्भ में कुछ असुविधायें अवश्य हुईं. करीब दस साल बाद आबादी का विस्तार दूरदर्शी के फार्म तक हो गया. दूरदर्शी ने इसी दौरान कृषि भूमि का आवासीय प्रयोजनार्थ रूपान्तरण भी करवा लिया था. बीस प्रतिशत भूमि अपने पास रखते हुए शेष भूमि को अस्सी लाख रूपयों में बेच दी. सही चयन और दूरदर्शिता के कारण वह बैठे-बैठे ही करोड़पति हो गया. अन्यथा उसका पूरा जीवन ही मकान की किश्तें चुकाने में बीत जाता. फार्म हाउस का सपना भी कभी पूरा नहीं होता. 

परिश्रम का कोई विकल्प नहीं है (There is No Alternative to Hard Work) 

१.यह सही है कि बिना काम के आदमी पागल हो सकता है या आत्महत्या कर सकता है. किन्तु परिश्रम करते रहने पर न कोई पागल हो सकता है और न आत्महत्या कर सकता है. आदमी काम से नहीं, ‘आराम’ से मर सकता है. काम के बिना जिन्दगी का कोई अर्थ नहीं है और परिश्रम के बिना किसी काम का कोई औचित्य नहीं है.

2. यह भी सही है कि यहाँ सफल और असफल दोनों ही तरह के व्यक्ति काम करना नहीं चाहते, परन्तु विवशतावश करना पड़ता है. किन्तु जो काम को अपनी आदत बना लेता है, वह कभी असफल नहीं हो सकता. जो काम न करने के बहाने ढूँढ लेता है, वो कभी सफल नहीं हो सकता. जो अपने काम को काम समझ कर निरन्तर संलग्न रहता है और श्रम से कभी समझौता नहीं करता, वही जिन्दगी में सब कुछ प्राप्त कर सकता है.

3. जिस प्रकार तराशे बिना पत्थर को हीरा नहीं बनाया जा सकता, उसी प्रकार संघर्ष के बिना भाग्य को नहीं चमकाया जा सकता. जिस प्रकार घर्षण के बिना अग्नि प्रज्वलित नहीं की जा सकती, उसी प्रकार कर्म क्षेत्र में परिश्रम के बिना सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती. अर्थात् परिश्रम ही जीवन है. निरन्तर परिश्रम करके ही किसी सफलता को बरकरार रखा जा सकता है.

4. यदि कहीं थोड़ी सी भी भूल-चूक रह जाती है तो पर्याप्त परिश्रम के उपरान्त भी अपेक्षित फल नहीं मिल सकता. इसलिए पहले भूल-चूक सुधारें, फिर प्रयास करें. याद रखें, पसीने की बून्दों के बिना सफलता का फूल नहीं खिल सकता. व्यक्ति की संघर्ष क्षमता और श्रम साध्यता असीम, अतुलनीय एवम् अनाम होती है. आज दुनिया जहाँ आ पहुँची है, वह अकूत परिश्रम का ही परिणाम है. कल दुनिया जहाँ पहुँचेगी, परिश्रम के माध्यम से ही पहुँचेगी.

5. हर कार्य में परिश्रम करना पड़ता है. सोचने विचारने में भी श्रम लगता है. श्रम चाहे शारीरिक हो, मानसिक हो या बौद्धिक हो, श्रम तो श्रम ही होता है. बिना परिश्रम किये तो आप प्रस्तुत पुस्तक भी नहीं पढ़ सकते, परिश्रम के बिना सफलता संभव ही नहीं है. सफल हो जाने का यह मतलब कदापि नहीं हैं कि अब आपको श्रम की आवश्यकता ही नहीं रही है. कोई भी सफलता कभी अन्तिम नहीं होती और हर सफलता को अपने स्थायीत्व के लिए लगातार श्रम की आवश्यकता होती है. अर्थात् श्रम से पीछा छुड़वाने का अर्थ होगा जिन्दगी से पीछा छुड़वाना.

6. परिश्रम एक आहुति है. कठोर परिश्रम एक चुनौती है. जीवन यज्ञ में परिश्रम की आहुति देते रहें, हर चुनौती को स्वीकारते चलें. फिर देखें, असंभव भी कैसे संभव हो जाता है. जितना परिश्रम आप साधारणतः कर सकते हैं, उसका दुगुना परिश्रम करके तो देखिए. जितना आप दूसरों से काम ले सकते हैं, उससे डेढ़ गुना काम लेकर तो देखिए, आपको कभी पीछे मुड़कर देखने की फुरसत ही नहीं मिलेगी. 

7.विरासत, लॉटरी, धोखाधड़ी, छल-कपट या किसी भी शॉर्टकट से आप रातों-रात करोड़पति तो हो सकते हैं, किन्तु आकस्मिक धन को सहजने एवम् धन का सदुपयोग करने के लिए भी आपको बहुत कुछ श्रम लगाना ही पड़ेगा. याद रखें, धन जिस तेजी से आता है, उससे भी अधिक तेजी से चला भी जाता है. करोड़पति होने में तो वक्त लगता है, किन्तु रोड़पति होने में कोई वक्त नहीं लगता.

8. किसी भी कार्य की सफलता में श्रम का हिस्सा अस्सी प्रतिशत तक होता है. योग-संयोग, भाग्य-भावना, दक्षता-क्षमता, योजनाबद्धता, समयबद्धता आदि का योगदान केवल बीस प्रतिशत तक ही हो सकता है. याद रखें, भाग्य भी उसी का साथ देता है, जो परिश्रम को अपना साथी बना लेता है. भाग्य से मिली सफलता भी परिश्रम के बिना विफलता में बदल सकती है. अर्थात् परिश्रम तो सफलता की प्रथम एवम् अन्तिम शर्त है.

9. बीमारी किसी मंत्र से नहीं मिट सकती, संकल्प के साथ दवा तो खानी ही पड़ेगी. कामयाबी भी किसी मंत्र से नहीं मिल सकती, मेहनत की जहमत तो उठानी ही पड़ेगी. मेहनत के बिना तो खुदा की रहमत भी कहाँ बरसती है, मेहनत के बिना तो सफलता भी सफलता को तरसती 

दृष्टान्त- किसी उद्योगपति के इकलौता पुत्र था. पुत्र आराम तलब और खर्चीला था. इसीलिए उसे कोई जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई थी. मौज-मस्ती में ही उम्र निकलती जा रही थी. एक दिन उसने अपने पिता से आग्रह किया कि उसे भी फैक्ट्री का कुछ काम संभला दिया जावे. इस पर पिता ने कहा-‘जिस दिन तुम अपनी मेहनत से एक रुपया भी कमाकर ले आओगे, उसी दिन से काम संभला दूंगा. आलसी पुत्र ने अपने किसी मित्र से एक रुपया प्राप्त किया और पिता को लाकर दे दिया. व्यवसायी पिता ने सिक्के को सूंघा और यह कहते हुए कचरे में फेंक दिया कि इसमें उसके पसीने की खुशबू नहीं थी. पुत्र चुपचाप वहाँ से चला गया. दूसरे दिन पुत्र ने अपनी माँ से पाँच रुपये का सिक्का लिया और अपने पिता के सामने रख दिया. पिता ने सिक्का सूंघा और यह कहते हुए कचरे में फेंक दिया कि-‘इसमें भी तुम्हारे पसीने की खुशबू नहीं आ रही है.’ पुत्र वहाँ से चला गया, किन्तु परेशान हो उठा. उसने निश्चय किया कि सचमुच कमाकर ही लाऊँगा. एक दिन वह अपने शहर से जरा दूर चला गया. पास के कस्बे में दिन भर मजदूरी की. उसे पचास रुपये मजदूरी के एवज में मिले. शाम को थका हारा लौटा और अपनी पहली कमाई में से एक रुपये का सिक्का अपने पिता के सामने रख दिया. पिता ने सिक्का सूंघा और यह कहते हुए कि इसमें भी उसके पसीने की खुशबू नहीं है, कचरे में फेंक दिया. इस पर पुत्र ने तुरन्त कचरे में से अपना सिक्का ढूँढ़ा और अपने माथे से लगाते हुए जेब में रख लिया. तब पिता ने उसे अपने पास बुलाया और कहा-‘मैं समझ गया, यह तुम्हारी खरे पसीने की कमाई है. तुम कल से फैक्ट्री आ सकते हो.’ 

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