कपड़े का आविष्कार किसने किया -Kapde ka avishkar kisne kiya

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कपड़े का आविष्कार किसने किया -Kapde ka avishkar kisne kiya

प्रारंभ में मनुष्य नंगे बदन रहता था। सर्दी में उसे कपड़ों की जरूरत महसूस हुई। उसने मारे गए जानवरों की खाल और फर को शरीर पर लपेटकर अपनी आवश्यकता की पूर्ति की। पर लपेटने में उसे परेशानी होती थी। कई बार वह खुल जाती थी और उसे अपने हाथों से थामना पड़ता था।

 उसके हाथ दूसरे काम, जैसे-शिकार करना, सामान ढोना आदि नहीं कर पाते थे। उसने एक नुकीली हड्डी से उस खाल में दो छेद किए और फिर हड्डी को उसमें फंसा दिया। इस प्रकार वह हड्डी बटन का काम करने लगी। 

अब मनुष्य को नंगे रहना बुरा लगने लगा; उसने कपड़ों की तलाश प्रारंभ की। उसे ऐसे कपड़ों की तलाश थी, जो धोने पर जल्दी सूख जाएँ और पहनने में अच्छे लगें। कपड़ों का आविष्कार किसने किया, यह तो ज्ञात नहीं है; पर यह अनुमान लगाया जाता है कि उत्तर-पाषाण युग में कपड़े बनाने और उन्हें पहनने की परंपरा प्रारंभ हुई। 

धीरे-धीरे कपड़े पहनना सिर्फ शरीर के बचाव के लिए ही आवश्यक नहीं रहा वरन् वह समाज में व्यक्ति की स्थिति को भी दरशाने लगा। गरीब लोग साधारण वस्त्र पहनने लगे, जबकि अमीर लोग उत्तम वस्त्रों की तलाश करने लगे। राजे-महाराजे अत्यंत नहँगे जड़ाऊ वस्त्र पहनने लगे। महिलाओं में भी वस्त्रों को लेकर होड़ प्रारंभ हुई, जो आज भी जारी है। 

हमारे पौराणिक ग्रंथों में दिव्य वस्त्रों की कल्पना की गई है। वे वस्त्र कभी मैले नहीं होते थे और उन्हें पहननेवाला हमेशा आकर्षक बना रहता था। यह सिर्फ कोरी कल्पना नहीं थी। बाद के काल में ऐसे वस्त्रों को तैयार करने का सिलसिला प्रारंभ हुआ, जो जल्दी मैले नहीं हों और आसानी से साफ हो जाएँ। 

साथ ही उनपर इस्तरी करने में कम-से-कम श्रम लगे। सदियों तक हाथ से बनाए सूत के वस्त्र पहने जाते रहे। रेशम के कीड़ों का उत्पादन भी जारी रहा तथा रेशमी वस्त्र चीन और भारत में पहने जाते रहे। ये वस्त्र महँगे होते थे और आमतौर पर अमीर लोग ही इनका प्रयोग कर पाते थे। 

इन रेशमी वस्त्रों के बारे में अनेक किस्से प्रसिद्ध हैं। कहते हैं कि भारतीय वस्त्र इतना मुलायम होता था कि पूरी-की-पूरी साड़ी एक अंगूठी के अंदर से निकल जाती थी। औरंगजेब की बहन रोशनआरा ने एक साड़ी की सात तहें लपेटी, पर फिर भी औरंगजेब, जो सादगीपसंद था, को वह नहीं भाई। उसने उस पारदर्शी साड़ी को पहनने से बहन को मना कर दिया। 

उधर पश्चिमी देशों में कपास से ही कपड़ा बनना जारी रहा। अमेरिका की भूमि कपास के उत्पादन के लिए उपजाऊ थी। वहाँ मशीनों द्वारा तेजी से उत्पादन होने लगा। यह कपास इंग्लैंड जाता था। वहाँ पहले इसका धागा बनाया जाता था और फिर घरेलू उद्योग में कपड़ा बनाया जाता था। 

जब भाप के इंजन का आविष्कार हुआ तो लोगों को लगा कि उसका उपयोग कपड़ा बनाने के लिए भी किया जा सकता है। जेम्स हरग्रीव्स ने सन् 1767 में स्पिनिंग जेनी तैयार की, जिससे एक व्यक्ति एक बार में 16 से ज्यादा धागों से बुनाई करने लगा। 

वह धागा मोटा होता था। सन् 1769 में रिचर्ड आर्कराइट ने पानी से चलनेवाली अपनी मशीन पेटेंट कराई। यह मशीन उसी प्रकार हर धागे को बुनती थी जैसे हाथ की मशीन बुनती थी। सन् 1779 में सामुवेल क्रॉम्पटन ने जो मशीन तैयार की, उससे अत्यंत पतला धागा तैयार होने लगा। 

सन् 1789 में कपड़ा उद्योग में क्रांति आ गई, जब एडमंड कार्टराइट ने पावरलूम तैयार किया। अब भाप का इंजन बुनाई करनेवाली मशीन चलाने लगा। अमेरिका में 1793 में दो महत्त्वपूर्ण घटनाएँ हुईं। एली व्हाइटने ने कपास के रेशों से बीज निकालने के लिए मशीन तैयार की। दूसरी ओर सामुवेल स्लेटर, जो बुनाई मजदूर था, ने पहली कपड़ा मिल लगाई। 

अब मनुष्य कपास से बने सूती कपड़ों से संतुष्ट नहीं था। उसने कृत्रिम रेशों से मनपसंद कपड़े तैयार करना प्रारंभ किया। नायलॉन इस दिशा में पहला प्रयास था। धीरे-धीरे सिंथेटिक कपड़ों की बाढ़-सी आ गई। 

पहले कपड़े हाथ से सिले जाते थे, फिर सिलाई मशीन आ गई। लोग हाथ या पैरों से चलनेवाली मशीन से कपड़े सिलने लगे। उसके बाद बिजली की स्वचालित मशीनें आईं और अब रेडीमेड कपड़ों की बाढ़-सी आ गई है। . कपड़ों की दिशा में प्रयोग अभी जारी हैं। पर्वतारोहण के लिए अलग कपड़े बनाए जाते हैं। अंतरिक्ष यात्री अलग किस्म के कपड़े पहनते हैं।

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