कैसे काम करते हैं गोताखोर- kaise kam karte Hain gotakhor

कैसे काम करते हैं गोताखोर

कैसे काम करते हैं गोताखोर? 

मनुष्य में पर्वत की ऊंचाइयों से लेकर समुद्र की गहराइयों में छिपे सुलझे-अनसुलझे रहस्यों को जानने की जिज्ञासा सदियों से रही है। वह प्राचीन काल से ही समुद्र की तलहटियों के बारे में जानने को उत्सुक रहा है। 

लेकिन उस समय न तो उसके पास साधन थे, न ही कोई उपकरण, जिनकी सहायता से वह कुछ ज्ञात कर सकता। इस दिशा में वैज्ञानिकों के प्रयास तथा उनके द्वारा आविष्कृत उपकरणों की सहायता से आज मनुष्य ने सागर की तलहटी में विचरण करना प्रारंभ कर दिया है।

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अब वह काफी समय तक वहां रहकर सागर की गहराइयों को खंगाल सकता है, आधारभूत जानकारियां एकत्र कर सकता है। गोताखोरों के लिए आधुनिक परिष्कृत वैज्ञानिक उपकरणों और साधनों में उनके लिए पहनी जाने वाली विशेष तरह की पोशाक भी महत्वपूर्ण होती है। इस आधुनिक ढंग की पोशाक का निर्माण पहली बार सन् 1819 में जर्मनी के ऑगस्टस सीबे नामक वैज्ञानिक ने किया था। 

इस पोशाक में धातु से बना एक हैल्मेट था, जिससे कंधों तक आने वाली एक प्लेट लगी थी। इसको चमड़े की जैकेट से जोड़ दिया जाता था। उस जैकेट में पानी प्रवेश नहीं कर सकता था। धातु से बने उस हैल्मेट में एक नली लगी होती थी, जो पानी की सतह से ऊपर रहती थी।

इसी के द्वारा गोताखोर सांस लेता था। समुद्र की गहराइयों को मापने वाले गोताखोरों द्वारा पहनी जाने वाली पोशाकों में समय के साथ परिवर्तन होते रहे। सन् 1830 में श्री सोबे ने उस पोशाक में कुछ परिवर्तन किए। आज भी गोताखोरों द्वारा उपयोग में ली जाने वाली पोशाकों में ‘सीबे’ का मूल सिद्धांत ही प्रयोग में लाया जाता है।

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