भारत में छोटे राज्यों के गठन की मांगों पर निबंध अथवा भारत में छोटे राज्यों का औचित्य (Justification for Small States) 

भारत में छोटे राज्यों के गठन की मांगों पर निबंध

भारत में छोटे राज्यों के गठन की मांगों पर निबंध अथवा भारत में छोटे राज्यों का औचित्य (Justification for Small States) 

भारत में छोटे राज्यों के गठन की मांगों का उठना, इनके लिए आंदोलनों का छिड़ना और कभी-कभी इन आंदोलनों का हिंसक संघर्षों में बदलना कोई नई बात नहीं है। जब-जब छोटे राज्यों के गठन की मांगें जोर पकड़ती हैं, तब-तब छोटे राज्यों के औचित्य पर भी बहस छिड़ती है। भारत जैसे देश में छोटे राज्यों का औचित्य क्या है, यकीनन यह प्रश्न अहम है। इसके दो पहलू हैं। जहां कुछ बातें ऐसी होती हैं, जो कि छोटे राज्यों के औचित्य को सही ठहराती हैं, वहीं कुछ ऐसी भी होती हैं, जो इसे जायज नहीं ठहराती हैं। 

छोटे राज्यों के गठन की मांग के संबंध में यह कहा जा सकता है कि ये अकारण नहीं उठती हैं। इनके पीछे कुछ तो वजहें होती हैं, तभी ये मांगें उठती हैं। मुख्य रूप से इसके पीछे यह धारणा निहित होती है कि अलग राज्य होने से जहां विकास बढ़ेगा, वहीं उस क्षेत्र विशेष के लोगों की सत्ता में भागीदारी भी बढ़ेगी तथा वे क्षेत्रीय समस्याओं के निराकरण में कारगर और प्रभावी भूमिका निभा सकेंगे। क्षेत्र का पिछड़ापन दूर होगा तथा सुख-समृद्धि में बढ़ोत्तरी होगी, ऐसी मांगों के पीछे यह धारणा भी निहित रहती है। कभी-कभी भाषाई आधार पर भी अलग राज्य की मांग की जाती है, जिसे जायज नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि इसमें अलगाववाद की बू आती है। भाषाई आधार पर राज्य का गठन विवाद का मुद्दा रहा है और विरोधाभासों के बाजवूद भारत में ऐसा किया गया। 

वस्तुतः छोटे राज्यों की मांग आजादी के फौरन बाद से ही उठने लगी थी, तो इस संबंध में ‘दार आयोग’ का गठन किया गया। इस आयोग द्वारा भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का विरोध किया गया था। इस मुद्दे पर विचारार्थ बाद में नेहरू, सरदार पटेल और पट्टाभि सीतारमैया समिति का गठन किया गया, जिसने भाषाई आधार पर राज्यों का गठन न किये जाने की दार आयोग की सिफारिशों का समर्थन किया, बावजूद इसके तेलुगू भाषी लोगों के लिए नये राज्य के रूप में आंध्र प्रदेश का गठन किया गया था। वस्तुतः राज्यों का गठन शुरू से ही एक जटिल मुद्दा रहा है। छोटे राज्य लाभकारी होते हैं या नहीं, यह भी तय कर पाना कठिन रहा है। वर्ष 1953-55 के दौन जब न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता में पहले राज्य पुनर्गठन आयोग (StateReconstruction Commission-SRC) का गठन हुआ था, तब भी आयोग के सदस्यों के बीच छोटे राज्यों के औचित्य को लेकर जमकर बहस हुई थी, जो कि लगभग बेनतीजा रही। बहरहाल, छोटे राज्यों के पैरोकारों का यह मानना है कि छोटे राज्य केंद्र को मजबूत बनाते हैं और वे अच्छा विकास कर राष्ट्र निर्माण में भी सहयोग करते हैं। चूंकि बड़े राज्यों की तुलना में ये राज्य केंद्र पर ज्यादा निर्भर करते हैं, अतएव इनसे केंद्र को संबल मिलता है। छोटे राज्यों में प्रशासन सुचारु रूप से चलाया जा सकता है, जिसका लाभ राज्यवासियों को मिलता है। 

भारत ने अगस्त, 2019 में प्रभावी कदम उठाते हुए जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य के दर्जे से मुक्त करते हुए दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख में बांट दिया। 

दूसरी तरफ छोटे राज्यों का विरोध करने वाले वर्ग का यह मानना है कि छोटे राज्यों का गठन देश की एकता और अखंडता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है तथा यह एक तरह का विघटन है। इससे अलगाव की प्रवृत्ति को बल मिलता है। पक्ष-विपक्ष के तर्कों को देखने के बाद कुछ प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठते हैं। क्या छोटे राज्यों के गठन से भारत के संघीय स्वरूप को खतरा उत्पन्न हो जायेगा? क्या छोटे राज्यों के गठन से स्थानीय और प्रशासनिक समस्याओं पर बेहतर ढंग से काबू पाया जा सकता है? क्या हमारी लोकतंत्रात्मक प्रणाली इस प्रकार के पुनर्गठन के लिए तैयार है? आदि-आदि प्रश्न इस मुद्दे को लेकर उठ खड़े हुए हैं। हालांकि इतिहास देखें तो इसके पहले हुए राज्यों के पुनर्गठन से भारत की संघीय व्यवस्था को कोई खतरा अब तक नहीं उत्पन्न हुआ है। 2000 में गठित छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड, झारखण्ड आदि नए राज्य इसका उदाहरण हैं। इनके गठन से एक अंतर जो आया है वह है बड़े राज्यों के प्रभाव में कमी आई है। यह होना भी चाहिए। अमेरिका जैसे छोटे से देश में भी 50 के लगभग राज्य हैं। आकार की दृष्टि से और जनसंख्या की दृष्टि से देखें तो लगभग दस अमेरिकी राज्य मिलाकर उत्तर प्रदेश जैसे भारतीय राज्य की बराबरी कर सकेंगे। लेकिन छोटे राज्यों के कारण अमेरिका की संघीय व्यवस्था कभी कमजोर होती नहीं दिखी। अमेरिका की सिनेट में राज्यों को बराबर का प्रतिनिधित्व प्राप्त है भले ही उनका क्षेत्रफल कम या ज्यादा हो। गौरतलब है कि भारत ने अगस्त, 2019 में प्रभावी कदम उठाते हुए जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य के दर्जे से मुक्त करते हुए दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख में बांट दिया। 

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एक निर्धारित मानदण्ड के अंदर देश में 15-20 और छोटे राज्य बन जाय तो भारतीय लोकतंत्र और मजबूत होगा तथा राष्ट्र के संघीय स्वरूप में और निखार आएगा। हमारे देश में कई ऐसे प्रदेश हैं जो विश्व के कई राष्ट्रों से बड़े हैं। यह सच है कि छोटे राज्यों के अनेक लाभ हैं। मसलन, छोटे राज्य का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे प्रशासनिक व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त होती है तथा जनता जन-प्रतिनिधियों के अधिक निकट होती है। छोटी राज्य होने से मतदाताओं की संख्या कम होगी तो विधायकों और सांसदों का प्रतिनिधित्व भी अधिक घनिष्ठ होगा। राज्यों की संख्या बढ़ने पर शक्ति का विकेंद्रीकरण भी बढ़ेगा। यह दुधारी प्रक्रिया है। केंद्र भी मजबूत होगा। छोटे राज्यों के नेता अपने राज्यों के आर्थिक विकास पर ज्यादा ध्यान दे सकेंगे। नए संवैधानिक संशोधन के अनुरूप मंत्रिमंडल भी छोटे ही होंगे। वहीं इस तस्वीर का दूसरा रुख यह है कि छोटे राज्यों के गठन के बाद राजधानी सहित दसरी आधारभूत जरूरतों के लिए संसाधनों को जुटाना देश की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ता है। तमाम तरह की व्यावहारिक दुश्वारियां भी सामने आती हैं। 

“कहा जाता है कि सत्ता के विकेंद्रीकरण हेतु छोटे राज्यों का गठन आवश्यक है लेकिन क्या छोटे राज्यों का गठन अपने आप में विकेंद्रीकरण का आदर्श रूप है।” 

वस्तुतः छोटे राज्यों के संदर्भ में आज एक नये और प्रगतिशील नजरिये की जरूरत है। भारत में छोटे राज्यों की बलवती होती मांग को आज के बदलते परिवेश में नई दृष्टि से देखा जाना चाहिए। यह भारतीय लोकतंत्र का नया अध्याय भी साबित हो सकता है। उदारीकरण के पिछले दो दशकों में उत्पन्न आर्थिक विकास की असमानता के खिलाफ उठ रही मांग के रूप में भी इसे देखा जा सकता है। इसे क्षेत्रीय आंदोलन की अंगड़ाई भी कह सकते हैं। नेहरू युग में भी इसी तरह की मांग उठी थी। वह भी नवजागरण काल था। विकास में गतिशीलता की शुरुआत थी। नेहरू जी व्यक्तिगत रूप से छोटे राज्यों के पक्षधर कतई नहीं थे किन्तु उन्हें भी पुनर्गठन आयोग को गठित करना पड़ा था। माना यह जाता है कि अगर छोटे राज्यों के आंदोलन के पीछे उपराष्ट्रीयता की भावनाएं और इनकी अगुआई करने वाले नेताओं की क्षत्रप बनने की महत्त्वाकांक्षा काम करती है तो जनता की अपने ढंग से अपना विकास करने की आकांक्षा भी रहती है। 

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि छोटे राज्यों की मांग ने सत्ता के विकेंद्रीकरण की बहस को एकदम पीछे छोड़ दिया है। बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग छोटे राज्यों के निर्माण को ही विकेंद्रीकरण मान कर चल रहा है। किन्तु यह उनकी भूल है। वास्तव में यह केंद्रीय सत्ता का सुदृढ़ीकरण होगा। दूर-दराज के क्षेत्र जो शासन की पहुंच से दूर हैं, जहां उनकी अपनी पंचायतें और गैर-सरकारी संगठन ही समाज को संचालित करते हैं, वहां राज्यों के लघुकरण के बाद शासन की सारी इकाइयां नजदीक आ जाती हैं तथा सर पर चढ़ कर शासन करने लगती हैं। यह सत्ता का निकटीकरण होगा और सत्ता का निकटीकरण आज की नौकरशाही और नेताशाही को देखते हुए दमनकारी अधिक साबित होगा, विकासकारी कम।

यह भी विचारणीय है कि अगर राज्यों को छोटा बना देने मात्र से बात बनती होती तो आज मिजोरम, मेघालय, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश जैसे प्रदेश हाशिए पर न होते। मूल प्रश्न है व्यवस्था को अधिक से अधिक लोकतांत्रिक बनाने का। शोषण व दमन की प्रवृत्ति को समाप्त करने की। वस्तुतः सुदृढ़ जनतांत्रिक व्यवस्था और समतामूलक विकास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। छोटे राज्यों के निर्माण से इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इस लक्ष्य को पाने का एकमात्र उपाय है सत्ता का विकेंद्रीकरण। ग्रामीण और शहरी स्वायत्तशासी निकायों को अधिकाधिक अधिकार देकर हम यह लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। 72वें एवं 73वें संविधान संशोधन द्वारा देश में यह कार्य लगभग 18 वर्ष पूर्व शुरू किया जा चुका है जिसके परिणाम अब प्राप्त होने लगे हैं। 

भारत में जातीयता और पिछड़ापन एक गंभीर समस्या है। विकास के असमान वितरण के कारण ही नक्सलवाद जैसे हिंसक आंदोलन जन्म ले रहे हैं। इसको ध्यान में रखते हुए अब छोटे राज्यों की मांगों पर दीर्घकालिक रणनीति बनाकर चलना होगा। कहा जाता | है कि सत्ता के विकेंद्रीकरण हेतु छोटे राज्यों का गठन आवश्यक है | लेकिन क्या छोटे राज्यों का गठन अपने आप में विकेंद्रीकरण का आदर्श रूप है। भारत के संघीय ढांचे में क्या राज्यों के छोटे होने से केंद्र और अधिक मजबूत नहीं हो जायेगा? इस सवाल पर व्यापक रूप से विचार किए जाने की आवश्यकता है। वैसे, लोकतांत्रिक देश में जनभावनाओं की उपेक्षा नहीं की जा सकती है, किंतु छोटे राज्यों के संबंध में यदि इस जनभावना से उपराष्ट्रीयता, भाषाई या धार्मिक साम्प्रदायिक अलगाव की बू आए, तो इसे उपेक्षित करना ही देशहित में रहता है। राज्य संबंधी कोई भी निर्णय लेने से पूर्व हमें राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखना चाहिए। 

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