जॉन नेपियर की जीवनी |Biography of John Napier in Hindi

जॉन नेपियर की जीवनी

जॉन नेपियर की जीवनी |Biography of John Napier in Hindi

लघुगणक (लौगरिथम) के आविष्कारक जॉन नैपियर का जन्म सन् 1550 ई० में एडिनबरा के निकट मर्चिस्टन कैसल में हुआ था। इस महान गणितज्ञ ने तेरह वर्ष की आयु में सेंट एन्डूज विश्व-विद्यालय में प्रवेश किया, किन्तु उन्हें वहां से बिना कोई उपाधि लिए विश्वविद्यालय छोड़ना पड़ा। 

जॉन नैपियर के पिता एक जमींदार थे। उन दिनों जमींदारों में यह प्रथा प्रचलित थी कि उनके पुत्रों को विदेशों की यात्राएं करनी पड़ती थीं। जॉन नैपियर को भी इस प्रथा का पालन करने के लिए विदेश यात्रा पर जाना पड़ा। इन विदेशी भ्रमणों से वह सन् 1571 ई० में वापस स्कॉटलैंड लौट आए। 

सन् 1572 ई० में जॉन नैपियर का विवाह सम्पन्न हुआ, किन्तु वे अपने इस गृहस्थ जीवन का ज्यादा समय तक आनन्द न उठा सके। विवाह के सात वर्ष बाद ही उनकी पत्नी का देहान्त हो गया। कुछ वर्षों बाद उन्होंने पुनर्विवाह किया। 

कहा जाता है जॉन नैपियर का अधिकांश समय गिरजाघर के विरुद्ध प्रचार कार्यों में व्यतीत हुआ। इस आशय की पुस्तक सन् 1593 ई० में प्रकाश में आई, जो रोम के गिरजाघरों के विरुद्ध थी। उस पुस्तक में जॉन नैपियर ने लिखा कि गिरजाघर के पादरी सम्पूर्ण विश्व को सन् 1668 ई० और सन् 1700 ई० के मध्य में खत्म कर देंगे। इस पुस्तक के कुल इक्कीस संस्करण प्रकाशित हुए, जिनमें से दस संस्करण उनके जीवनकाल में ही प्रकाशित हो गए थे। 

इस पुस्तक की रचना के बाद जॉन नैपियर युद्ध सम्बन्धी यंत्रों के अनुसंधान में जुट गए। उन्होंने दो तरह के आग लगाने वाले दर्पण और एक धातु रथ का आविष्कार किया, उनके छिद्रों के माध्यम से गोलियां बरसाई जा सकती थीं। 

जॉन नैपियर को राजनैतिक तथा धार्मिक कार्यों के बाद जो भी समय मिलता था, उसे वह गणित और विज्ञान के अध्ययन में खर्च करते थे। इस अध्ययन के माध्यम से उन्होंने सन् 1594 में कार्य आरम्भ किया। उस कार्य के निष्कर्ष स्वरूप उन्होंने बताया कि किस प्रकार गुणा, भाग, वर्गमीटर विधि से बड़ी-से-बड़ी गुणा की क्रिया को घनात्मक रूप से तथा भाग की क्रिया को ऋणात्मक रूप में व्यक्त कर लिया जाता है। घातांकों वाली संख्याओं को घातांक से गुणा करके लघुगणक में व्यक्त किया जाता है। तत्पश्चात् मानक सारणी से प्राप्त मानों को चिन्हों के अनुसार जोड़-घटाकर प्राप्त कर सकते हैं। 

इस मतानुसार मानक सारणी से प्रतिलघुगणक देखकर, दशमलव का चिन्ह यथास्थान लगाकर गणना का परिणाम प्राप्त कर लिया जाता है। लघुगणक और प्रतिलघुगणक की अलग-अलग सारणी होती है। उनके इस महत्त्वपूर्ण और उपयोगी आविष्कार ने अन्य गणित सम्बन्धित कार्यों को पीछे छोड़ दिया। इस आविष्कार के अतिरिक्त उन्होंने गोलीय ट्रिक्नोमैट्री और नैपियर एनालोजी पर भी अनुसंधानात्मक कार्य किए। उन्होंने गणित सम्बन्धी दो पुस्तकों की भी रचना की। उनकी पहली पुस्तक ‘Description of the Marvelous Canonof Logarithms’ सन् 1614 में और दूसरी पुस्तक ‘Costruction of the Marvelous Canon of Logarithms’ सन् 1620 ई० में प्रकाशित हुई। 

जॉन नैपियर की मृत्यु 4 अप्रैल, सन् 1617 ई० को मरथिस्टन (एडिनबरा) में हुई। उनके द्वारा गणित विषय पर दी गई विधि का आज भी हमारे देश में माध्यमिक कक्षाओं में ही ज्ञान करा दिया जाता है। यह विधि विश्व प्रसिद्ध है, जो सभी देशों में पढ़ी व पढ़ाई जाती है। 

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