जीवन की सार्थकता पर निबंध |Essay on the meaning of life

जीवन की सार्थकता श्रेष्ठ कर्म में निहित है 

जीवन की सार्थकता पर निबंध |Essay on the meaning of life

जीवन की सार्थकता श्रेष्ठ कर्म में निहित है 

“खलों को कहीं भी नहीं स्वर्ग है, भलों के लिए तो यही स्वर्ग है

सुनो स्वर्ग क्या है? सदाचार है मनुष्यत्व ही मुक्ति का द्वार है सदाचार ही गौरवागार है।” (मैथिलीशरण गुप्त)

वैदिक कल से वर्तमान तक आर्यावर्त में संस्कृति की जो अनवरत् रूप में अजस्त्र धारा प्रवाहित होती आई है. वह इस यथार्थ की साक्षी है कि सद-आचरण, मानवीय करनी और नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण जीवन ही वास्तव में जीवन है. वैदिक ग्रन्थ इस अकाट्य सत्य का उद्घाटन और उदघोष करते हैं कि “वह मानव मानव नहीं है जो मानवीय प्रवृत्तियों और मानवीय कर्मों से रहित हो और ऐसे मानव का जीवन भी पूर्णतः निरर्थक हैं.

जन्म और मृत्यु वैसे तो प्राकृतिक नियमावली का एक अपरिहार्य अंग है, पर जीवन प्राप्ति का एक सुनिश्चित आदर्श भी है और वह है श्रेष्ठ कर्मों की व्यावहारिक रूप में ग्रहणशीलता. यदि जीवन श्रेष्ठ कर्मों से रहित है, तो ऐसा जीवन इस धरा पर बोझ है, निरर्थक है और पशुवत है. मानव रूप में जन्म लेकर यदि हम और हमारे कर्म पतित और निन्दनीय हैं तो हमारा जीवन सार्थकताविहीन होकर मनुष्यता, सामाजिकता और राष्ट्रीयता के लिए अभिशाप बन जाता है. यदि मानव के कर्म दुष्कर्म की परिधि में आ जाते हैं, तो ऐसा मानव सभ्यता और संस्कृति के लिए कलंक बन जाता है. यह निर्विवाद सत्य है कि 

अहिंसा, सत्य, परोपकार, दया, अनुशासन, सहिष्णुता, मानवता, नैतिकता, सामाजिकता, राष्ट्रीयता और नारी सम्मान के समानान्तर व सापेक्ष कर्म ही केवल श्रेष्ठ कर्म के रूप में परिभाषित किए जाते हैं और ऐसे कार्य व्यक्ति के जीवन को सार्थकता के प्रशंसित फ्रेम में जड़कर उसे शत्-शत् अभिनन्दनीय बना देते हैं. इसलिए कहा गया है कि “कर्म वही जो धर्म भरा हो और सात्विकता से पूरित हो.” 

विद्वानों के मतानुसार चौरासी लाख यौनियों में कष्टपूर्ण भ्रमण करने के उपरान्त हमें मानव-यौनि की सम्प्राप्ति होती है, इसलिए हमें इस जीवन को सार्थक सिद्ध करने हेतु दुष्प्रवृत्तियों, कुसंगतियों, अन्याय, अधर्म और अनीतियों तथा पशुवत् व्यवहारों से दूर रहकर सत्मार्ग पर गतिशील रहना चाहिए. श्रेष्ठ कर्म सम्पन्न कर सकने वाला ही यथार्थ में जीवन का आनन्द, आन्तरिक शान्ति और आत्मिक सन्तोष की अनुभूति कर पाता है. कटुता, द्वेष, वैमनस्य, बेईमानी, ईर्ष्या, छल-कपट और षड्यंत्रों से आप्लावित मस्तिष्क शैतानियत का साक्षात्कार कराता है, इन्सानियत का नहीं.

ऋषि-मनीषियों और साहित्यकारों की वाणी तथा लेखनी सदैव से सात्विक कार्यों, पावन प्रवृत्तियों और सम्यक मानसिकता का अभिनन्दन करती आई है. भारतीय संस्कृति ने सदैव केवल कार्यों की ही पूजा की है. व्यक्ति की नहीं. राम, कृष्ण, गौतम बुद्ध, महावीर, गांधी की पूजा उनकी नहीं वरन उनके कार्यों की पूजा है. यदि हम मानव को परिभाषित करने का प्रयास करें, तो हमें जो परिभाषा प्राप्त होती है वह सिद्ध करती है कि मानव जीवन का अर्थ वास्तव में श्रेष्ठ कर्मों में सन्निहित है. इस सन्दर्भ में हम मानव जीवन को श्रेष्ठ कर्म का पर्याय भी स्वीकार कर सकते हैं, क्योंकि श्रेष्ठ कर्म से रहित जीवन न तो जीवन है और न ही मानवता को सार्थकता करता है. मानव रावण, कंस और कुम्भकर्ण जैसे शक्तिशाली योद्धाओं को भी भर्त्सनीय, निन्दनीय और अभिशाप के रूप में केवल इसीलिए सभी मूल्यांकित करते हैं, क्योंकि उन्होंने दुष्कर्मों की राह ग्रहण कर न केवल औरों को पीड़ा पहुँचाई थी, वरन् स्वयं के जीवन को भी कलंकित कर डाला था. 

हम मनु के वंशज उच्चादर्शों से आप्लावित और तरंगित होकर प्रेम. ममता, भ्रातृत्व, त्याग और करुणा का दीप प्रज्ज्वलित कर यदि विलापमग्न के अश्रु नहीं पोंछ पाए, क्षुधाग्रस्त को अन्न उपलब्ध नहीं करा पाए, दम तोड़ते को सहायता, सांत्वना, सहानुभूति नहीं दे पाए, असहाय, निर्बल व पीड़ित को सहयोग, संवेदना न दे पाए, अन्याय, अनीति, शोषण, अनैतिकता, अमानवीयता, अधर्म का प्रतिरोध नहीं कर पाए तो फिर हमारा जीवन कैसा जीवन? फिर तो हम और हमारा जीवन स्वयं के लिए ही कलंक है. क्या ईश्वर ने हमें इसीलिए जन्म दिया है कि हम श्रेष्ठ कर्मों से च्युत रहें, परे रहें और या तो दुष्कर्मों की ताण्डव लीला उदासीन होकर देखते रहें या स्वयं भी इस पाशविकता में गोते लगाते रहें? 

खलील जिब्रान ने ठीक ही कहा था कि “मानव जीवन प्रकाश की वह सरिता है जो प्यासों को जल प्रदान कर उनके जीवन में व्याप्त अन्धकार को दूर भगाती है.” वैसे भी मानव जीवन ज्ञान, चेतना, विवेक, मानवीय मूल्यों और ‘पर’ (गुण और कर्म की वृत्ति या सत्ता) का नाम है, इसलिए जहाँ पर ये श्रेष्ठताएं विद्यमान होंगी वहाँ पर केवल श्रेष्ठ कर्म ही अस्तित्वमय होगा, पर जहाँ पर अन्धता, दानवता, अविवेक, अदूरदर्शिता, असामाजिकता और विध्वंसात्मकता की मानसिकता होगी वहाँ पर स्वाभाविक है कि लूट, चोरी, हिंसा, मार-काट, अधर्म, अन्याय, पाखण्ड, छल-फरेब, व्यभिचार, कामुकता, अश्लीलता, समाजद्रोहिता, राष्ट्रद्रोहिता और धर्मांधता तथा साम्प्रदायिकता के घृणित कार्य चहकाते हुए दृष्टिगोचर होंगे. वस्तुतः वह जीवन जो दुष्कर्म का पर्याय मात्र बनकर रह जाता है. इसलिए मैथिलीशरण गुप्त जी ने कहा है कि- 

“यही पशु प्रवृत्ति है कि आप-आप ही परे, 

वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे।”

जीवन की सार्थकता महावीर स्वामी के इस कथन से कहीं और अधिक देखने को कहाँ मिल सकती है कि -“जिओ और जीने दो” 

सन्त तुलसीदास ने भी मानव जीवन की सार्थकता परोपकार रूपी श्रेष्ठ कर्म में ही देखी थी 

“परहित सरिस धरम नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।”

उपनिषदों ने ईश्वर, मानव जीवन की सार्थकता और आत्मवाद का गहन साक्षात्कार किया है और यह साक्षात्कार किया है और यह साक्षात्कार सिद्ध करता है कि जीवन का लक्ष्य और सार्थकता मर्यादित अर्थोपार्जन, मर्यादित काम के साथ-साथ धर्मपथगमन तथा मोक्ष प्राप्ति के कार्यों में निहित है और मर्यादा तथा धर्म कभी भी दुष्कर्म की अनुमति नहीं देता. इसलिए स्पष्ट है कि मोक्ष प्राप्ति का एकमात्र साधन श्रेष्ठ कर्म ही है. वैसे भी आत्मा की निर्मलता व पावनता श्रेष्ठ कर्मों का उदघोष व दिशा-निर्देशन करती है. भगवान श्रीकृष्ण ने भी अर्जुन को जो ‘कर्मवाद’ व्याख्यायित किया था वह श्रेष्ठ कर्मों, कर्तव्यों व पावन गतिविधियों का शंखनाद करते हुए ऐसे ही कार्यों में जीवन की सार्थकता के दिव्य रूप का दर्शन कराता है. ‘अहम ब्रह्मास्मि’ का भाव भी श्रेष्ठ कर्मों की महत्ता से जाज्वल्यमान है. ‘अहिंसा परमोधर्मः’ की उद्घोषणा भी मानव जीवन की सार्थकता का उच्चादर्श अपने में समाहित किए हुए हैं. 

“असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय”

यह उक्ति भी अपनी अन्तरात्मा में श्रेष्ठ कर्म का पावन आदर्श संजोए हुए है. यह यथार्थ है कि प्रकृति की प्रत्येक प्रक्रिया एवं गतिविधि के मूल में सुविचारित प्रयोजन, मंतव्य व लक्ष्य सन्निहित होता है. इसलिए जब प्रकृति ने मानव का निर्माण किया तो उसे मानवीय करनी से भूषित भी किया और इसलिए प्रकृति ने मानव को कर्म करने हेतु दो हाथ प्रदान करने के साथ-साथ उसे विवेकशील मस्तिष्क और संवेदनशील हृदय भी प्रदान किया, जिससे मनुष्य ज्ञान-चक्षओं को उन्मीलित कर और भावों का जाग्रत करके ही आचरण करे. निःसंदेह चेतना तथा भावों से पगा हुआ प्रत्येक कार्य श्रेष्ठ होता है और जीवन की सार्थकता भी ऐसे ही श्रेष्ठ कार्य में निहित है. निष्ठुरता, निर्दयता, स्वार्थता और अनैतिकता से प्रेरित प्रत्येक कार्य विध्वंसकारी होता है और जो व्यक्ति समाज, राष्ट्र, धर्म, संस्कृति और मूल्यों को अपने कुकृत्यों द्वारा लेशमात्र भी हानि पहुंचाता है, वह पशुतुल्य तो होता ही है उसका जीवन स्वयं के लिए भी अमंगलकारी होता है. प्रकृति द्वारा निर्मित प्रत्येक वस्तु अपना मौलिक स्वभाव रखती और प्रयोजन रखती है और यदि उसका आचरण इस गुणधर्मिता के विपरीत हुआ तो वह निरर्थक सिद्ध हो जाती है. जैसे सूर्य की मौलिक गुणधर्मिता ताप और प्रकाश देने में है, चाँद की शीतलता चाँदनी विकीर्णन में है, तथा बादलों की जलवृष्टि में निहित है. उसी प्रकार मानव जीवन की मौलिक गुणधर्मिता श्रेष्ठ कर्मों, परोपकार और रचनात्मकता में है. यदि सूर्य, चाँद और बादल अपनी स्वाभाविकता छोड़कर आचरण करने लगेंगे तो इस सृष्टि का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा, साथ ही वे निन्दनीय, अनुपयोगी और विनाशक भी सिद्ध होंगे.

ठीक इसी प्रकार प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ जीवित कृति मानव भी यदि अपनी गुणधर्मिता को छोड़कर विध्वंसक, विघटनकारी व पतित कर्मों में लीन हो जाएगा तो उसका जीवन निरर्थक तो सिद्ध होगा ही, वह इस धरा और सभ्यता के लिए बोझ भी बन जाएगा. मानव जीवन का प्रयोजन रचनात्मक क्रिया-कलापों, सांस्कृतिक उत्थान, सामाजिक प्रगति, आन्तरिक शान्ति, मूल्यगत उत्कर्ष तथा राष्ट्रीय विकास में सन्निहित है. इसीलिए सदाचार और चारित्रिकता से युक्त सम्पादित कार्य ही मानव जीवन की सार्थकता को सुरभित करने में समर्थ सिद्ध हो पाते 

यदि हम जीवन प्राप्त कर मानवोचित आचरण करने में असमर्थ रहे और दानव-सम आचरण करने में लीन रहे तो निरर्थक, भटकावपूर्ण और कलंकपूर्ण हमारा जीवन समाज और मनुष्यता के लिए तो सांघातक सिद्ध होगा ही, स्वयं हमारे लिए भी किसी प्रकार दुर्वासा के श्राप से कम न होगा और तब हम भी उन्हीं कीड़े-मकोड़ों की भाँति होंगे जो जन्म लेते हैं, उद्देश्यहीन और निरर्थक जीवन जीकर आजीवन बिलबिलाते रहते हैं और मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं. श्रेष्ठ कर्म तो मानव जीवन का आभूषण है व आवश्यक अंग है. इतिहास साक्षी है कि श्रेष्ठ कर्म सम्पादित करके ही व्यक्ति अमरत्व को प्राप्त होता है और उसका सार्थक जीवन उसे यश-कीर्ति प्रदान करने के साथ-साथ अपने राष्ट्र, समाज और संस्कृति के लिए सुपरिणामों की रचना करता है. 

वस्तुतः व्यक्ति के जीवन की ऐश्वर्यता, श्रेष्ठता सफलता और सार्थकता भौतिक वैभव व चमक-दमक में नहीं वरन् उसके श्रेष्ठ कर्मों में निहित होती है. इसीलिए आज हम सिकन्दर को आक्रांता और रक्त-पिपासु तथा अशोक को महान् कहकर सम्बोधित करते हैं. शोषक अत्याचारी, अन्यायी और अधर्मी बनना तो अति सहज है, पर बड़प्पन तो तब है जब हम सत्कर्मी बनकर स्वयं को सच्चे इन्सान के रूप में प्रस्तुत कर सकें. यदि हमारा धर्म लोक धर्म है, हमारा संस्कार मानवता का संस्कार है और प्रयोजन परोपकार है तो हम निज जीवन को सार्थकता की परिधि में रख सकते हैं. जिस व्यक्ति के कार्य सामाजिक संवेदना, मानवीय भावों, त्याग व मूल्यों से आप्लावित होते हैं, केवल उसी व्यक्ति का जीवन न केवल समाज, राष्ट्र युग वरन् सम्पूर्ण सभ्यता के लिए वरदान सिद्ध होता है. वस्तुतः जीवन की सार्थकता श्रेष्ठ कर्म में निहित है. 

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