जीवन का लक्ष्य पर निबंध- Essay on life goals in hindi

जीवन का लक्ष्य पर निबंध-

जीवन का लक्ष्य पर निबंध- Essay on life goals in hindi

 मानव-जावन का लक्ष्य क्या है-यह बड़ी उलझन में डालनेवाला प्रश्न है। रुचि, स्थिति, अवस्था आदि की भिन्नता से भी जीवन के लक्ष्य में पर्याप्त विभिन्नता हो सकती है। इसलिए, इसे इदमित्थम् कहना संभव नहीं। 

किसी के जीवन का लक्ष्य केवल धनार्जन हो सकता है। उसके लिए धनार्जन एकमात्र चातुर्य, एकमात्र पांडित्य हो सकता है- 

न विद्यया केनचिदुद्धृतं कुलं 

हिरण्यमेवार्जय निष्फलाः कलाः । 

ऐसे लोगों के मन में एक धारणा घर कर गई है कि पैसे के द्वारा जीवन में सब कुछ खरीदा जा सकता है—चाहे वह प्रतिष्ठा ही क्यों न हो। लोक की बात कौन कहे ,परलोक का टिकट भी पैसे के द्वारा खरीदा जा सकता है। दरिद्र के जैसा  संसार में  कोई गुणहीन नहीं और धनी से बढ़कर कोई गुणवान नहीं। भर्तृहरि ने लिखा है- 

यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः

 स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः । 

स एव वक्ता स च दर्शनीयः 

सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति । 

[अर्थात्, जिसके पास धन है, वही मनुष्य कुलीन है, वही पंडित है, वही शास्त्रज्ञ और गुणज्ञ है, वक्ता है और वही देखने योग्य है; क्योंकि सभी गुण कांचन (धन) में रहते हैं।] 

ऐसा सोचनेवाला अपना सारा जीवन कुबेर बनने में लगा देगा और ऐसी चेष्टा करेगा कि लक्ष्मी उसका पादपीडन करती रहे। 

कुछ लोगों के लिए जीवनभर ज्ञान की पिपासा, विद्या की साधना ही जीवन का लक्ष्य हो सकती है। समस्त शास्त्रों का रहस्यभेद कर आनेवाली पीढ़ी को ज्ञान का नया खजाना लुटा जाना उसके पांडित्य का उद्देश्य हो सकता है। राजा तो केवल अपने देश में पूजा जा सकता है, पर पंडित समग्र संसार में। किसी का लक्ष्य शास्त्र-निर्माण हो सकता है। वह अपने को मनु, याज्ञवल्क्य और पराशर की कोटि में रखना चाह सकता है। किसी का उद्देश्य काव्य या साहित्य का सर्जन हो सकता है, जिससे एकसाथ यश, अर्थ, व्यवहारज्ञान तथा शिवेतर रक्षा हो सकेगी। कवि तो प्रजापतितुल्य होता है। परमात्मा के लिए अनेक विशेषणों में हमारे वैदिक ऋषियों ने सर्वप्रथम ‘कवि’ शब्द का प्रयोग किया। अतः, क्यों न वह अपनी काव्यसाधना का प्रकाश समग्र संसार के लिए छोड़ जाए? 

ऐसे भी व्यक्ति हो सकते हैं, जिनका लक्ष्य पदप्राप्ति हो। वे सोच सकते हैं कि राजनीति के शिखर पर जाएँ और राष्ट्र का नेतृत्व अपने हाथों सँभालें; क्योंकि वे जानते हैं कि जिसके हाथ में सत्ता रहती है, उसके इंगित के बिना एक पत्ता भी नहीं डोलता। चाहे कलाकार हों, चाहे कवि हों, चाहे पंडित हों, चाहे वैज्ञानिक-सब राजनीतिज्ञों के कृपाकटाक्ष के भिखारी होते हैं। उनके भृकुटिनिक्षेप से देश में उथल-पुथल मच जाती है। अतः, जैसे भी हो, नीति की डगर पकड़कर हो या अनीति की अंधी गलियों से गुजरकर हो, शासन की बागडोर अपने हाथों ही लेनी चाहिए—ऐसा भी जीवन का उद्देश्य हो सकता है। 

कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जो महान वैज्ञानिक बनकर प्रकृति के रहस्यों के तहखानों का पता लगाने में अपने जीवन की बाजी लगा दें। वे भी गैलीलियों, फैराड़े, न्यूटन, आइन्सटीन की कोटि में अपने को लाना चाहते हों और मानवता की सेवा में कोई-न-कोई अमूल्य नियामत उपस्थित करना चाहते हों। 

कुछ ऐसे भी व्यक्ति हो सकते हैं, जिन्हें न राज्य चाहिए, न वैभव चाहिए, न स्वर्ग-सुख चाहिए। उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य है पीड़ितों की सेवा करना। व्यास के दो अनमोल वचन हैं—’परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्’ (परोपकार पुण्य देता है, परपीडन पाप)। अतः, वे दिन-रात कष्टों के कंटकों पर पाँव रखते हुए मानव-सेवा के व्रत में लीन रहना चाहेंगे। 

कुछ ऐसे भी व्यक्ति हो सकते हैं, जो देश की सेवा के लिए एक वीर प्रहरी होना चाहते हों। ऐसों को न वनिता की ममता होती है, न पुत्र का ममत्व खींचता है। वे गोलियों की बौछार सहते हैं। तोप के गोलों पर छाती दिए हुए, बम-विस्फोटों की कर्णस्फार ध्वनियाँ सहते हुए, उनकी लपटों को सीने पर झेलते हुए सदा देशसेवा के लिए तैयार रहते हैं। उनके जीवन में स्पृहा का दीप जलता है-वह है देश की सुरक्षा; उससे बढ़कर संसार में और कुछ नहीं। 

किंतु, दूसरे प्रकार के व्यक्ति भी हो सकते हैं, जो खुद को बाहर की ओर न कर केवल अपनी आत्मा की ओर झाँकें। 

जीवन क्या है? आहों का जलजला ही तो! कराहों का सिलसिला ही तो! पीड़ा की एक रंगीन कहानी ही तो! दर्द की एक लुभावनी दास्तान ही तो! 

सब-कुछ मिथ्या है। धोखा है, भ्रम है, प्रवंचना है। संसार के सारे नाते झूठे हैं, सारी ममताएँ मृगतृष्णा हैं ! सब ओर की ममता के धागे बटोरकर भगवान के चरणों में बाँध देना चाहिए। पुत्र, गेह, धन, धरती सब-कुछ धुएँ की धरोहर हैं। जीवन में सबका त्याग होना चाहिए। प्रह्लाद, ध्रुव आदि भक्तों की कोटि में जाना चाहिए। राजनीतिक के ऊपर, भले ही साहित्य हो, किंतु सबसे ऊपर तो अध्यात्म है। और. इस प्रकार जीवन का लक्ष्य है-भक्ति, परमात्मा की खोज,आत्मान्वेषण, ऐकांतिक साधना, सारे जागतिक बंधनों से मोक्ष।

इस मिट्टी के जीवन में कुछ सार नहीं है, इस हाड़-मांस के तन में कोई रस नहीं है। जो-कुछ आनंद है, वह परमात्मा से एकाकार होने में है। 

इस प्रकार, जीवन के लक्ष्य भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। किसी को उत्तम-अनुत्तम, सत्य-असत्य कहना बहुत उचित नहीं है। हाँ, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि दृष्ट जीवन के लक्ष्य के साथ यदि अदृष्ट जीवन के लक्ष्य का तारतम्य हो जाए, तो अत्युत्तम है !