जातिवाद पर निबंध|Essay on racism In Hindi

जातिवाद पर निबंध

जातिवाद पर निबंध-Essay on racism In Hindi

जातिवाद : एक अभिशाप

जातिवाद पर निबंध – आज हमारे देश का संपूर्ण हिंदूसमाज जातिवाद के भयानक भुजंग के विषदंश से मूर्च्छित हो गया है। इसका सारा शरीर इसके जहर से स्याह हो गया है। चाहे वह साम्यवादी हो या समाजवादी, काँग्रेसी हो या जनसंघी, सभी जाति के आधार पर टिकट का बँटवारा करते हैं, चुनाव-संग्राम में विजयी होने की योजना बनाते हैं।

मंत्रिपरिषद के गठन में जाति के आधार पर कोटा दिया जाता है। परीक्षा में जाति के आधार पर उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण किया जाता है, प्रथम-द्वितीय बनाया जाता है, जाति के ही आधार पर ऊँचे स्थान पर नियुक्ति की जाती है। प्राध्यापक हो या प्राचार्य, मंत्री हो या कुलपति, न्यायाधीश हो या सेवा-आयोग का अध्यक्ष या सदस्य-हर पद अब जातिवाद के तराजू पर तौलकर दिया जाता है। 

जाति की रस्सी पकड़कर इन दिनों साधारण प्रतिभाहीन व्यक्ति भी ऊँचे-ऊँचे पदों के पहाड़ों पर चढे जा रहे हैं। जिनके भुजदंड में शक्ति नहीं, जिनके मानस में बल नहीं, जो बड़े ही पापी हैं, वे इस जाति की पूँछ पकड़कर वैतरणी पार कर जाना चाह । रहे हैं। इसलिए दिनकरजी ने ठीक ही लिखा है 

जाति-जाति रटते जिनकी पूँजी केवल पाषंड। 

जाति-जाति का शोर मचाते केवल कायर, कूर । 

कुछ लोगों का कहना है कि जाति-प्रथा हमारे देश में सनातन काल से चली आ रही है, किंतु उन्हें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि जाति का निर्माण गुण और कर्म के आधार पर हआ था (चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः-गीता)। भगवान बुद्ध और महावीर ने भी कहा कि मनुष्य जन्म से ही नहीं, वरन् कर्म से ही ब्राह्मण या शूद्र होता है। कबीरदास ने ठीक ही कहा है कि हर मनुष्य में एक ही रक्त-मांस-मज्जा है, उसकी उत्पत्ति एक ही ज्योति से हुई है; अतः उसमें ऊँच-नीच का भेदभाव बरतना ठीक नहीं 

एकै बूंद, एकै मल-मूतर, एक चाम, एक गूदा। 

एक जोति तें सब उतपना, कौन ब्राह्म, कौन सूदा।। 

चारों वर्गों की उत्पत्ति परमात्मा के शरीर से हुई है। मुख से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य तथा पैरों से शूद्र की उत्पत्ति हुई है। चारों मिलकर परमात्मा के विराट शरीर की सृष्टि करते हैं। अतः, किसी को नीचा और किसी को ऊँचा मानना ठीक नहीं है। 

किंतु, इतना ही नहीं, ब्राह्मणों में भी कान्यकुब्ज सरयूपारीण, मैथिल, शाकद्वीपीय आदि उपजातियाँ बन गई हैं; क्षत्रियों में भी चंदेल, बुंदेल आदि कितने भेद हैं; वैश्यों में भी कितने प्रकार है और शूद्रों के तो अनगिनत भेद हैं। जाति के भीतर जाति और इनमें आपसी कलह और वैमनस्य, झगड़े और टंटे। 

यह बात बड़ी बेतुकी लगती है कि जब सब मुसलमान एक हैं, सब ईसाई एक हैं, तब फिर हिंदुओं में इतने भेद मानने की जरूरत क्या है। एक ओर जातिभेद ने मनुष्य की प्रतिभा, उसकी क्षमता एवं उसके परिश्रम को पुरस्कारों से वंचित किया है, बेईमानी को बढ़ावा दिया है, तो दूसरी ओर अपने ही भाई-बंधुओं को नीचा ठहराकर अपमानित तथा पदमर्दित किया है और तीसरी ओर बहुत-सारे लोगों को नीच और अछूत ठहराकर दंडित किया है तथा उन्हें अन्य धर्म स्वीकार करने को विवश किया है। इसीलिए, इस जातिविद्वेष के हल से जोती हई जमीन पर इस्लाम का अंकुर जिस तरह पनप सका, उस तरह संसार की किसी और भूमि पर नहीं।

यही कारण है कि आज हमारा राष्ट्र एक राष्ट्र नहीं, वरन अनेक जातियों-उपजातियों की खंडित इकाइयों का समूहमात्र है। भारत एक महाद्वीप है, जिसमें विभिन्न जातियों के अनगिनत द्वीप मिले हुए हैं; एक ऐसा महासागर है, जिसमें विभिन्न जातियों की सरिताओं का जल अपना-अपना रंग दिखा रहा है।

हम एक हिंदू हैं, परंतु रोटी-बेटी एक नहीं है; न साथ खाना-पीना, न साथ उठना-बैठना है, न एक-दूसरे में विवाह-शादी! भारत ऐसा कारखाना है, जहाँ विभिन्न जातियों के संघर्षों के यंत्र कोलाहल कर रहे हैं। जातिवाद के ज्वालामुखी पर बैठा भारत आज अपने विनाश की अंतिम घड़ियाँ गिन रहा है, इसमें कोई संदेह नहीं। 

जातिवाद भारत के आँचल पर लगा वीभत्स धब्बा है, यह इसके मस्तक का कलंक है। यह इसके शरीर का कोढ़ बन गया है। यह भयानक अभिशाप है। यदि हम भारत को एक राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं, यदि इसकी अंतर्वीणा की मधुर झंकार सुनना चाहते हैं, तो इसके लिए यह आवश्यक है कि हम सभी को हिंदू कहकर पुकारे किसी  को ब्राह्मण, क्षत्रिय, कायस्थ, चमार, तेली. धोबी. केवट आदि कहना छाड़ द; सरकार कानून द्वारा जाति-प्रथा समाप्त कर दे. खानपान में भेदभाव न बरता जाए, सभी हिंदू आपस में विवाह-संबंध कायम करें। जब जाति रहेगी ही नहीं, तब अंतरजातीय विवाह का प्रश्न ही नहीं उठता।

वैसी अवस्था में अनुसूचित जातियों के लिए चुनाव, पढ़ाई या नौकरी में आरक्षण समाप्त कर दिया जाए, आवेदनपत्रों में जाति का खाना न बनाया जाए, समाज में एक नई चेतना का मंत्र पूँका जाए, नई जागृति का पांचजन्य पूँका जाए।

हम सभी भारतवासी मन से जाति-संस्कार की काई हटा दें, तभी भारत एक बेदाग आईने की तरह चमकता दीख पड़ेगा। हम डॉ भगवानदास के इस कथन से पूर्णतः सहमत हैं कि वर्तमान काल में जाति-प्रथा जिस रूप में प्रचलित है, उसका एकांत रूप से विनाश करना ही होगा। यदि भारतीय जनता को नवीन जीवन प्राप्त करना है, तो उसे वर्णभेद के वर्तमान स्वरूप को मिटा देना होगा; क्योंकि यह उन्नति के हर मार्ग पर भयंकर रूप से बाधक सिद्ध हो रहा है। यदि हम जाति-प्रथा समाप्त नहीं करते, तो हमारे राष्ट्र की उच्छित्ति निश्चित है |

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