जाड़े की रात पर निबंध| Essay on Winter’s Night in Hindi

जाड़े की रात पर निबंध

जाड़े की रात पर निबंध (Jade Ki Raat) – Essay on Winter’s Night in Hindi

जाड़े की सुबह, भले ही, किसी कवि को फले हए कास के श्वेत वसन धारण किए, मस्त हंसों की मीठी बोली के सहावने बिछए पहने, पके हुए धान के मनोहर शरीरवाली तथा कमल के अनुपम मखवाली नई ब्याही हई दुलहन-सी लगता हा, जिसका मंगलगान नितदिन चाँदी-सी चमचम गोरी छरहरी नदियाँ गाती है तथा शख की तरह शुभ्र शेफालिका झरकर जिसके पायंदाज की तरह बिछ जाती है, जाड़े का धूप, भले ही, किसी प्रणयी को किसी के रूप का श्रृंगार मालूम पड़ती हो, जाड़े का दिन, भले ही किसी प्रेमी को उनकी प्रेयसी के बदन का निखार मालूम पड़ती हो;

किंतु जाड़े की रात! मत पूछिए, यह तो किसी शैतान की आकृति की तरह अत्यंत भयावह होती है, गरीबों को सताती है, काटे नहीं कटती! सूरज का गोला भी जल्दी निकलता नहीं, मानो कोई पवनसुत उसे बिंबफल समझकर निगलने को तैयार बैठा हो। हाँ, कनक-कुबेरों, सामंतों और सरदारों के पास इतने सामान रहते हैं कि शिशिर का शीत उनका कुछ कर नहीं पाता 

गुलगुली गिलमें, गलीचा है, गुनीजन हैं,

चाँदनी है, चिक हैं, चिरागन की माला हैं।

कहैं पद्माकर त्यों गजक गिजा हैं सजी

सेज हैं, सुराही है, सुरा हैं और प्याला हैं ।।

शिशिर के पाला को न व्यापत कसाला तिन्हैं

जिनके अधीन एते उदित मसाला हैं।

तान तुक ताला हैं, विनोद के रसाला हैं, 

सुबाला हैं, दुशाला हैं, विशाला चित्रशाला हैं ।।

किंतु साधारण गरीब लोग, जिन्हें भरपेट भोजन तक नसीब नहीं, तन ढकने को गर्म कपड़े की बात कौन कहे, साधारण कपड़ा भी जिनके पास नहीं, तीर की तरह भेदती ठंढक से उनकी हालत बड़ी दर्दनाक हो जाती है। 

जाडे की रात, मानो संपन्नता के स्वर्ग और विपन्नता के नरक के दृश्यों को दिखानेवाली यंत्रनलिका हो। हमारे देश में एक ओर अमीरी का इंद्रवैभव है, तो दूसरी और गरीबी का रौरव-इसे दिखानेवाली जाड़े की रात है। किसी के लिए जाड़े की गत मधुयामिनी है। केंद्रतापित कक्षों में मखमल के गद्दों पर जिन्हें दरिद्रता का सर्पदंश नहीं लगता, जिन्हें अभाव की सूइयों की तीखी चभन नहीं सहनी पड़ती, उनके लिए तो जाड़े की रात ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान है, कुदरत की अनोखी नियामत है, बहत दुलारने पर क्षणभर में जन्म सफल करनेवाली किस्मत की परी है।

किंतु, जिनके पास न तन ढकने को कपड़ा है, न पेट भरने को अन्न; फुटपाथों का आकाश ही जिनके आवास की छत है-ऐसे अभागों के लिए जाड़े की रात प्रकृति के सबसे बड़े. अभिशाप के रूप में आती है। उनके लिए जाड़े की रात सुरसा की जमुहाई से भी लंबी, कुंभकर्ण की नींद से भी गहरी ठहरती है। शैत्य के बाणों के डर से सूरज का रथ भी कहीं-कहीं बहुत दूर अटका रहता है-बेचारे गरीबों के पोर-पोर में जाड़ा चुभता रहता है; कभी वे अपने को, कभी अपने बनानेवाले को और कभी अपने समाज को मन-ही-मन कोसते रहते हैं। 

‘जाड़ा’ शब्द संस्कृत के ‘जाड्य’ से निकला है। लोग कहते हैं कि जाड़े में लोग अधिक काम करते हैं। मुझे तो लगता है कि जाड़े की रात लोगों को जड़ बना देती है-जिधर देखिए उधर सुनसान; आठ-नौ बजते ही बाजार श्मशान-सा नजर आता है।

गाँव में दूर-दूर कहीं-कहीं कोई दीया जलता है। ठंढ से काँपते हए सियार की आवाज ठिठुर जाती है। अतः, जाड़े की रात सचमुच अपना नाम सार्थक करती है। किंतु, ढाढ़स इसी से बँधती है कि कभी-न-कभी यह कालरात्रि अवश्य टलेगी और सुनहली सुबह आएगी-मीठ-मीठी धूप सोना लुटाएगी, बेचारे इसे मुट्ठी-मुट्ठी लूटकर निहाल होंगे, चहकेंगे, गाएँगे और मेड़-मचिए पर गुलछर्रे छोड़ते हुए बीते दुःख-दर्द भूल जाएँगे।