द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की भूमिका | Japan’s role in World War II

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की भूमिका 

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की भूमिका (Japan during World War II) (1939-1945 ई०) 

1 सितम्बर, 1939 ई० को द्वितीय विश्व युद्ध आरम्भ हो गया था। इस युद्ध के आरम्भ में जापान तटस्थ राष्ट्र था; लेकिन कुछ समय बाद ही वह इस महायुद्ध में शामिल हो गया। जापान द्वारा इस महायुद्ध में शामिल होने के अनेक कारण थे। जिन पर निगाह डालनी आवश्यक है –

(i) जापान का अमेरिका तथा रूस से मतभेद-मित्र राष्ट्र, रूस, अमेरिका तथा इंग्लैण्ड पूर्वी एशिया में जापान को अपना प्रभुत्व स्थापित करना नहीं देना चाहते थे। इस सम्बन्ध में प्रथम विश्व युद्ध में जानकारी दी जा चुकी है कि प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन के उकसाने में आकर जापान ने विश्व युद्ध में भाग लिया था तथा उसके हिस्से में लाभ ही लाभ आए थे।

जापान को भी यह मालूम था कि सोवियत संघ की सीमाएं मंगोलिया, मंचूकुओ तथा चीन से मिलती हैं। उसका चीन में प्रभुत्व रूस के विशेष हितों के विरुद्ध था। इसी प्रकार ब्रिटेन के हित चीन की खानों (Mines) में निहित थे तथा हांगकांग तो ब्रिटिश शक्ति का केन्द्र ही था। शंघाई, कैण्टन तथा तीनस्तीन के बन्दरगाह और नगर अंग्रेजों के अधिकार में थे। वहां उनके व्यापारिक हित संलग्न थे। जापान, इंग्लैण्ड के इस प्रभाव को सहन नहीं कर पा रहा था। इसी तरह प्रशान्त महासागर के पूर्वी तटों पर कैलिफोर्निया और फिलीपाइन द्वीप-समूह पर अमेरिका का अधिकार था। अमेरिका पूर्वी एशिया की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होने देना चाहता था। इन कारणों को लेकर, जापान, अमेरिका एवं रूस आदि महाशक्तियों के मध्य तनाव उत्पन्न हो गया था।

विशेष- यहां यह जान लेना आवश्यक है कि प्रथम विश्व युद्ध से 1917 में रूस ने खुद को अलग कर लिया था। इस समय रूस में ‘रूसी क्रान्ति’ हो गयी। रूसी क्रान्ति के बाद रूस ने कम्युनिस्ट हुकूमत स्थापित हो गयी थी। 1917 से 1939 के बीच रूस ने अपनी शक्ति इतनी बढ़ा ली थी कि वह महाशक्ति में शामिल होकर, विश्व राजनीति और द्वितीय विश्व युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तैयार था। 

(ii) रोम-बर्लिन-टोक्यो धुरी का विकास-रूस की शक्ति का सामना करने के लिए 25 नवम्बर, 1936 ई० को जापान ने जर्मनी से एक संधि की थी। इस संधि का उद्देश्य यूरोप और एशिया में रूसी साम्यवाद को रोकना था। सन् 1939 ई० में इटली भी इस संधि में शामिल हो गया। आगे चलकर यह संधि इतिहास में रोम, बर्लिन, टोक्यो धुरी के नाम से प्रसिद्ध हुई थी। वस्तुतः जापान धुरी-राष्ट्रों की ओर से ही विश्व युद्ध में सम्मिलित हुआ था।

(iii) जापान की साम्राज्यवादी नीति-द्वितीय विश्व युद्ध में जापान के भाग लेने का एक महत्वपूर्ण कारण उसकी साम्राज्यवादी नीति थी। वह अपनी सैनिक और नौसैनिक शक्ति के मद में चूर होकर अपने साम्राज्य का विकास न केवल पूर्वी एशिया बल्कि पूरे एशिया में करना चाहता था।

(iv) जापान की आन्तरिक व्यवस्था-सन् 1938 ई० में ही जापान की संसद ने अपने समस्त अधिकार मंत्रिपरिषद् को प्रदान कर दिये थे। अतः मंत्रिपरिषद् बगैर संसद की अनुमति के कोई भी कानून बना सकती थी। कुछ समय बाद मंत्रियों पर भी जापानी सेना को नियंत्रण प्राप्त हो गया था। इस तरह जापान में सैनिक राज्य स्थापित हो गया था। राजनीतिकों के अथक प्रयासों के बावजूद युद्ध में गहरी रुचि लेने के कारण जापान का युद्ध में उतरना स्वाभाविक हो गया था।

(v)जापान और इंग्लैण्ड में मतभेद-प्रथम विश्व युद्ध के बाद, चीन का काफी क्षेत्र हथियाने के बाद भी चीन के अनेक प्रदेश इंग्लैण्ड के अधिकार में थे, जिसके कारण जापान, चीन में अपने साम्राज्य विस्तर नहीं कर पा रहा था, जिसके कारण युद्ध में शामिल होकर जापान उन क्षेत्रों को हासिल करना चाहता था।

(vi) जापान तथा अमेरिका में मतभेद-सन् 1937 ई० में अमेरिका ने चीन के अध्यक्ष च्यांग-काई शेक को सहायता देनी आरम्भ कर दी थी, जिससे जापान और अमेरिका के सम्बन्धों में तनाव आ गया था। इन स्थितियों में जापान का अमेरिका के विरुद्ध द्वितीय विश्व युद्ध में उतरना स्वाभाविक हो गया था।

(vii) राजनीतिक गुटबन्दी-सन् 1937 ई० में सारा यूरोप दो गुटों में विभाजित हो चुका था; जिसमें एक गुट का नेता जर्मनी तथा दूसरे गुट का नेता ब्रिटेन था। इन गुटों में प्रथम गुट धुरी राष्ट्रों का था जिसमें जर्मनी के साथ इटली तथा जापान शामिल थे और दूसरा गुट मित्र राष्ट्रों का था जिसके सदस्य इंग्लैण्ड, फ्रांस तथा रूस थे, बाद में अमेरिका भी इस गुट में शामिल हो गया था। इस गुटबंदी के कारण जापान भी इस युद्ध में शामिल हुआ। 

(vii) तात्कालिक कारण-अमेरिका मित्र राष्ट्र में काफी बाद में शामिल हुआ था। 1939 ई० में जापानी प्रधानमंत्री से जापान-अमेरिका के साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्ध थे। जापान के विदेश मंत्री मत्सुआका ने यूरोप यात्रा की। उसकी इस यात्रा से जापान-अमेरिकी सम्बन्धों में दरार आ गयी। दरार आने की वजह यह थी कि विदेश मंत्री ने हिटलर से भेंट कर 

अपनी मैत्री और गुट में शामिल होने का एलान कर दिया था। इस भेट में जर्मनी ने जापान के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि उसे सिंगापुर पर आक्रमण करके एशिया में ब्रिटिश शासन को समाप्त कर देना चाहिए। इसके बाद जापानी विदेश मंत्री ने मास्को जाकर उनसे आश्वासन पा लिया कि वे दोनों एक-दूसरे से युद्ध नहीं करेंगे। 

अमेरिका जापान के प्रधानमंत्री के संधि के आश्वासन पर विश्वास करता था-पर जब द्वितीय विश्व युद्ध का उन्माद बढ़ा, तो अमेरिका की शक्ति की कुछ भी परवाह न करते हुए जापान ने 7 दिसम्बर, 1941 ई० को अमेरिका के नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर पर आक्रमण कर दिया। इससे अमेरिका को भारी जान-माल और सैनिक शक्ति का नुकसान हुआ। अमेरिका ने उसे अपने सम्मान पर आघात समझा। वह जापान को सबक सिखाने के लिए, पर्ल हार्बर के आक्रमण (7 दिसम्बर, 1941 ई०) के बाद बाकायदा तौर पर युद्ध में उतर पड़ा।

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की उपलब्धियाँ 

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की उपलब्धियाँ 

अमेरिका के विश्व युद्ध में उतरने से पूर्व धुरी राष्ट्र लगातार अपनी जीत दर्ज करता जा रहा था। एक समय तो ऐसा लगा था कि ब्रिटेन, फ्रांस को धुरी राष्ट्र, दुनिया के नक्शों से मिटाकर ही खामोश बैठेंगे। धुरी राष्ट्रों की बढ़त का लाभ जापान को भी मिल रहा था। जापान ने स्याम (थाईलैण्ड) पर अपना कब्जा कर लिया था। स्याम पर कब्जा करने के बाद वह बर्मा तथा मलाया पर आसानी से आक्रमण किया जा सकता था। पर्ल हार्बर पर आक्रमण करके जापान ने इस हवाई द्वीप की 90% अमेरिकी शक्ति तबाहकर उसे पूरी तरह अपने अधिकार में कर लिया था। उसी मित्र जापान ने बेक, युआम, भिड़वे, फिलीपाइन के द्वीप पुंजों तथा हांगकांग पर भी आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में कर लिया। जापान की सैनिक शक्ति का इससे आसानी से अन्दाजा लगाया जा सकता है कि पर्ल हार्बर पर आक्रमण करने के लिए 350 बाम्बर हवाई जहाजों का इस्तेमाल किया था। उसने मलाया के समुन्द्र तट पर स्थित प्रिंस ऑफ वेल्स तथा रिपल्स नामक दो ब्रिटिश जंगी जहाजों पर हवाई आक्रमण करके उन्हें डुबो दिया था। 

जापान ने सिंगापुर पर हवाई आक्रमण कर अपनी सेना उतार दी। वहां ब्रिटिश सेना, जापानी सेना का मुकाबला करने आयी। 15 दिनों के भीषण युद्ध के बाद वहां के ब्रिटिश कमाण्डर ने 73 हजार से अधिक ब्रिटिश सेना के साथ, जापानी सेना के समक्ष आत्म समर्पण कर दिया। 

12 फरवरी, 1942 को जापान ने सुमाया पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में कर लिया। इससे पूर्व वह ईस्ट इण्डीज पर अधिकार कर चुका था। 14 फरवरी, 1942 को जापान ने सुमात्रा पर अपनी विजय करने के उपरान्त बोर्नियो, जावा, बाली आदि द्वीपों पर अधिकार करक हालैण्ड का विशाल साम्राज्य अपने अधिकार में कर लिया। मार्च, 1942 में बर्मा की राजधानी रंगून पर भी जापान का अधिकार हो गया।

द्वितीय विश्व युद्ध में विनाश 

द्वितीय विश्व युद्ध मानव सभ्यता के युद्ध इतिहास का सबसे जघन्य और घृणित युद्ध था। इस युद्ध ने मानवता का विनाश करने की सारी सीमाएं तोड़ दीं। हिटलर ने 60 लाख यहूदियों की गैस चैम्बर में निर्दयता पूर्वक हत्याएं करायीं। युद्ध के परिणाम स्वरूप अनेक देशों का नक्शा बदला। हिटलर का पतन हुआ और जब रूस की सेनाएं जर्मनी की राजधानी में दाखिल होकर आगे बढ़ने लगीं तो अपनी दुर्दशा से बचने के लिए हिटलर ने अपनी शरण स्थली में आग लगा, आत्महत्या कर ली। इटली का तानाशाह मुसोलिनी को इटली के राष्ट्रवादियों ने अंधाधुंध गोली मारकर उसकी लाश को पेट्रोल गैस स्टेशन पर उल्टी लटकाकर, लोगों को थूकने का मौका मिला। सारी दुनिया उस घृणित युद्ध के विरुद्ध नफरत में भरी हुई थी। 

द्वितीय विश्व युद्ध में प्रथम विश्व युद्ध से तीन गुने से भी ज्यादह इन्सानी जिन्दगी का नुकसान हुआ था। आंकड़ा है कि लगभग 7 करोड़ लोग युद्ध की विभीषिका के भेंट चढ़े। आर्थिक नुकसान लाखों-करोड़ों अरब डालर पार कर गया था। सबसे भीषण तबाही जापान को सहनी पड़ी-बर्लिन और इटली पतन के बाद भी जापान युद्ध जारी रखे हुए था। तब जापान के दो नगरों हिरोशिमा और नसासाकी पर अमेरिका द्वारा अणु बम गिराकर पूरा का पूरा नगर मौत की कब्रगाह बना दिया गया। यह बम, जापानी प्रतिरोध और प्रशान्त महासागर में युद्ध को शीघ्र समाप्त कराने तथा पर्ल हार्बर पर जापान द्वारा की गयी तबाही का बदला लेने के लिए अमेरिका ने गिराये थे। पहला अणु बम 6 अगस्त, 1945 को हिरोशिमा नगर पर गिराया गया। उसके तीन दिन बाद 9 अगस्त, 1945 को दूसरा अणु बम नागासाकी नगर पर गिराया गया। 

उपरोक्त दोनों नगरों के पूर्णतयः नष्ट हो जाने से जापान की जनता त्राहि-त्राहि कर उठी। अन्त में जापान ने आत्म समर्पण कर दिया। 

इस तरह जापान की जो पराजय हुई वह युद्ध इतिहास की सबसे बड़ी पराजय है। उसके जीते हुए सारे द्वीप क्षेत्र न सिर्फ हाथ से निकल गए थे, बल्कि उन क्षेत्रों में जापान सिमट गया जहां उसका साम्राज्यवादी रूप फैल चुका था। जापान की सीमाएं 1894-95 ई० वाली स्थिति में पहुंच गयी, जिससे विशाल जापानी साम्राज्य नष्ट हो गया।

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