प्रथम विश्व युद्ध में जापान की भूमिका | Japan’s role in World War 1

प्रथम विश्व युद्ध में जापान की भूमिका

 प्रथम विश्व युद्ध में जापान की भूमिका(Japan during World War I) (सन् 1914-1919 ई०) 

सन् 1905 के रूस-जापान युद्ध में जापान की विजय से उसका हौसला बहुत बड़ा था। जिसके कारण सारे देश पर सैनिकवाद का उन्माद और प्रसारवाद का भूत सवार हो गया था। 1906 ई० में ही वह प्रसारवाद की नीति अपनाकर आगे की तैयारी करने लगा था। 1914 ई० तक उसका साम्राज्य प्रसार, शक्ति और प्रभाव चरम सीमा पर पहुंच चुका था। इसी समय विश्व राजनीति में प्रथम विश्व युद्ध के बादल छाने लगे थे। 28 जुलाई, 1914 ई० को सर्बिया के विरुद्ध आस्ट्रिया ने युद्ध की घोषणा कर दी, तो रूस ने सर्बिया का साथ देने का निश्चय कर लिया। रूस के इस निश्चय की खबर पाते ही 1 अगस्त, 1914 ई० को जर्मनी ने रूस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। जर्मनी की इस घोषणा के साथ ही 3 अगस्त, 1904 ई० को फ्रांस अपने मित्र रूस की सहायता के लिए युद्ध में कूद पड़ा। तत्पश्चात् 4 अगस्त को इंग्लैण्ड ने भी जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। 

इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध आरम्भ हो गया, परन्तु कुछ समय तक जापान तटस्थ रहा। उसने अपनी सैनिक शक्ति बढ़ा ली थी बावजूद इसके वह एशियाई देशों के विरुद्ध उसका इस्तेमाल कर अपना प्रसार करना चाहता था-योरोपीय देशों के साथ युद्ध में जूझकर वह उस शक्ति को नष्ट करने के पक्ष में नहीं था। पर युद्ध आरम्भ होने के बाद ब्रिटेन ने जापान के सामने प्रस्ताव रखा कि जापानी नौसेना अंग्रेजी व्यापार को क्षति पहुंचाने वाले सशस्त्र जर्मनी जहाजों का पीछा करके उनका विनाश कर दे। जापान द्वारा ब्रिटिश सरकार की इस प्रार्थना को स्वीकार करने का अर्थ था जर्मनी से उसका युद्ध। पर काफी सोच-विचार कर 23 अगस्त, 1914 को जापान ने युद्ध में प्रवेश करने की घोषणा कर दी।

जापान की सफलताएं 

आरम्भ से ही जर्मनी से जापान की प्रतिद्वन्द्विता चली आ रही थी। यह प्रतिद्वन्द्विता चीन के शान्तुंग और क्याऊ-चाऊ प्रदेश पर जर्मनी के अधिकार को लेकर 1898 ई० से शुरू हुई थी। जापान इस पर अपना प्रथम अधिकार समझता था पर जर्मनी ने 200 वर्ग मील का प्रदेश 11 वर्ष के पट्टे पर हासिल करके अपनी किलेबन्दी कर दी थी। यह किलेबन्दी जापान को लगातार खल रही थी। ब्रिटेन ने जापान को इसी विषय को लेकर उकसाया था। जापान इस उकसाबे में आकर युद्ध में उतर गया था। 

ब्रिटेन का प्रस्ताव मिलते ही जापानी मंत्रिमण्डल की बैठक में 8 अगस्त, 1914 ई० को यह बात तय पायी गयी कि जर्मनी से कहा जाए कि वह एशियाई समुन्द्र वाले सभी जहाज उसे सौंप दे, तथा क्याऊ-चाऊ का पट्टा और शातुंग प्रान्त में अपने अधिकार उसे दे दे। 

स्पष्ट था कि जर्मनी ऐसी धौंस में क्यों आता। उसने जापान को कोई उत्तर देने तक की आवश्यकता न समझी-जापान ने 15 अगस्त तक समय दिया था, 26 अगस्त तक कोई जवाब न आया तो 27 अगस्त को जापान ने त्सिंगताओ पर घेरा डाल दिया। 2 सितम्बर, 1914 को त्सिगंताओं से त्सीवान तक के रेलमार्ग पर कब्जा करने के लिए अपनी फौज उतार दी। अक्टूबर के अन्तिम सप्ताह के दिनों में जापानियों ने हर तरफ से धावा बोल दिया। 

10 नवम्बर, 1914 को क्वाऊ चाऊ का पतन हो गया और जापान ने न केवल पट्टे पर दिए गए प्रदेशों पर अधिकार करने के लिए कदम उठाये बल्कि त्सिगंताओ-त्सीनान रेलवे सहित शातुंग के अन्य सभी जर्मनी के अधिकार वाले भागों पर कब्जा करके उसे अपने हित में इस्तेमाल करने लगा। जर्मनी को नीचा दिखाने के लिए जापान ने चीन को धौंस दिखा कर अधिकार में लिए गए क्षेत्रों के पट्टे अपने नाम करा लिए। 

कहा जा सकता है कि उसने उस क्षेत्र से जर्मन प्रभाव का पूर्णतया सफाया कर दिया-सारा शातुंग प्रदेश जापान के कब्जे में आ गया। 

जर्मनी को इस शिकस्त को देने के बाद जापान का हौंसला इस कदर बढ़ गया था कि उसने अपनी नौसेना दल को प्रशान्त और हिन्द महासागर में ब्रिटेन नौसेना के साथ मिलकर जर्मनी के विरुद्ध युद्ध अभियान छेड़ दिया। जापानी जंगी जहाजों ने भू-मध्य रेखा के उत्तर में मारियाना, केलोरिया तथा मार्शल द्वीपों पर अधिकार कर लिया। इसी के साथ जापान ने अपने विध्वंसक दस्ते भू-मध्य सागर में भी भेजे। उस समय आस्ट्रेलिया से दक्षिणी अफ्रीका तक का सारा समुन्द्र जापानी जल रक्षकों की देख-रेख में था। 

जापान ने अपनी नौसैनिक शक्ति का एहसास सभी यूरोपीय देशों को कराकर उसने चीन को दबाने का अभियान शुरू किया। उसका लाभ समुन्द्र क्षेत्रों पर अधिकार करने में न होकर चीन का ज्यादह से ज्यादह क्षेत्र हथियाने में था। 18 फरवरी, 1915 ई० को जापान ने पीकिंग स्थित जापानी राजदूत होओकी एकी ने सुआन-शी-काई के सामने 21 मांगें पेश कीं। 

इन मांगों में से कुछ निहायत दादागीरी भरी थीं-जैसे-चीन, जापान से 50 प्रतिशत युद्ध का सामान खरीदेगा, दक्षिणी चीन में जापान को रेल मार्ग बनाने की अनुमति होगी। चीन में जापानी प्रचारकों को प्रचार का अधिकार होगा। चीन, फूकियान को जापान प्रभाव-क्षेत्र के अन्तर्गत समझेगा। चीन अपने आन्दरूनी इलाकों में जापानी अस्पताल, मन्दिर और विद्यालयों के लिए जमीन रखने का हक मानेगा। चीन, जापान के अतिरिक्त किसी अन्य देश को अपने तट पर बन्दरगाह, खाड़ी या द्वीप पट्टे पर नहीं देगा। 

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जापान ने चीन से यह नहीं कहा था कि वह खुद को उसके आधीन देश घोषित कर दे, अन्यथा सब कुछ कह डाला था। युद्ध की उन परिस्थितियों में कोई भी देश चीन की मदद करने नहीं आ रहा था। अतः चीन को वह सब कुछ मानना पड़ा, जो-जो जापान चाहता था।

युद्ध का परिणाम 

युद्ध का परिणाम 

परिणाम की दृष्टि से प्रथम विश्व युद्ध विश्व के नक्शों में राज्यों के परिवर्तन का काल था। इससे जन और जान की हानि हुई। इसने एक साथ कई साम्राज्यों और राजवंशों को ध्वस्त कर दिया। आस्ट्रिया हंगरी का साम्राज्य बिखर गया और हैप्सबर्ग राजवंश का अन्त हो गया। 1917 ई० में ही रूस की क्रान्ति ने राजवंश को समाप्त कर वहां गणराज्य की स्थापना कर दी और अधिकृत प्रदेशों को स्वतन्त्र कर दिया। जर्मनी और तुर्की की जबरदस्त दुर्गति हुई। 

इस युद्ध के चालीस से कम उम्र के लगभग 1,00,000,00 (एक करोड़) लोग मारे गए और लगभग 2,00,000,00 (दो करोड़) लोग घायल हुए। 

विशेष-सन् 1790 ई० से 1930 ई० तक संसार के विभिन्न भागों में होने वाले सभी प्रमुख युद्धों में जितने सैनिक मारे गए थे, उससे दुगुने से 

भी अधिक संख्या में लोग प्रथम युद्ध में मारे गए। 

सम्पत्ति के विनाश की दृष्टि से यह युद्ध अभूतपूर्व था। युद्ध में सम्मिलित सभी पक्षों को लगभग 11 करोड़ 60 लाख डॉलर खर्च करने पड़े। युद्ध में लगभग 39 अरब डालर मूल्य की सम्पत्ति नष्ट हुई। कुल मिलाकर विभिन्न खण्डों के युद्ध के कारण 337 करोड़ डालर का आर्थिक बोझ उठाना पड़ा। 

उपरोक्त स्थितियां युद्ध समाप्त होने के बाद की हैं-युद्ध जब चल रहा था तब की स्थिति यह थी कि पूर्वी एशिया में जापान को मनमानी करने की पूरी छूट मिली हुई थी। 

सन् 1917 के आरम्भ में ब्रिटेन ने जापान को गुप्त आश्वासन दे दिया कि वह शान्ति सम्मेलन में जापान की उपलब्धियों को सुदृढ़ करने के लिए अपना पूरा समर्थन देगा। 

ब्रिटेन जैसा आश्वासन जापान को संयुक्त राज्य अमेरिका से भी मिल गया था। नवम्बर, 1917 ई० में अमेरिकी विदेश सचिव राबर्ट लॉन्सिग और जापानी राजदूत ईशी कीकजीरो के मध्य एक समझौता हुआ जिसके द्वारा अमेरिका में प्रादेशिक निकटता के आधार पर चीन में जापान के विशेष हितों और अधिकारों को मान्यता दे दी।

पेरिस का शान्ति सम्मेलन और जापान 

युद्ध के बाद पेरिस में होने वाले शान्ति सम्मेलन में, जापान के हिस्से में लाभ ही लाभ आया था। पूर्वी एशिया में उसके शान्ति को स्वीकारा गया। यह शान्ति सम्मेलन 1919 में हुआ था। उससे जापान ने तीन मुख्य मांगें रखीं थीं 

(1) उत्तरी प्रशान्त महासागर में स्थित भूतपूर्व जर्मन द्वीप मारियाना, कैरोलीन 

और मार्शल उसे दे दिए जाएं।

(2) शातुंग प्रदेश पर उसका दावा मान लिया जाए।

(3) प्रस्तावित राष्ट्रसंघ के लिए मूल सिद्धान्त के रूप में विभिन्न प्रजातियों का दर्जा बराबरी का मान लिया जाए।

उसके उपरोक्त दो दावों पर अन्य प्रतिनिधि देशों ने कड़ा विरोध किया। तब जापान ने यह धमकी दी कि यदि उसका दावा स्वीकार नहीं किया गया तो उसके प्रतिनिधि-सम्मेलन का बहिष्कार कर देंगे तथा राष्ट्रसंघ का सदस्य भी नहीं बनेगा। 

अमेरिकी राष्ट्रपति बुड्रो विल्सन के प्रयास से वह शान्ति सम्मेलन आयोजित किया गया था-बुड्रो विल्सन पर जापान की धमकी का असर हो गया-अतएव प्रशान्त महासागर में स्थित कई द्वीपों पर जापान के संरक्षण को मान लिया गया। इन द्वीपों का शासन जापान को राष्ट्रसंघ की संरक्षण पद्धति के अन्तर्गत करना था। 

पर समझौते के बाद जापान ने राष्ट्रसंघ या संरक्षण पद्धति को महत्वहीन मानकर उनकी कोई परवाह न की। इन द्वीपों को अपने अधिकृत प्रदेशों जैसा समझा तथा इन पर अपना औपनिवेशक शासन लाद दिया। शातुंग पर जापान के अधिकार को मान्यता दे दी गयी, पर बाद में लौटाने की शर्त भी रखी गयी। 

उस युद्ध में उतरने के कारण जापान के हिस्से में लाभ ही लाभ आये थे। वर्साय संधि (1919) के बाद वह संसार की एक महान् शक्ति बन गया था। अब पूर्वी एशिया में उसका स्थान सर्वोच्च था और प्रशान्त महासागर में उसकी तूती बोलने लगी थी।

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