इराक ईरान युद्ध का इतिहास | Iraq Iran War History

इराक ईरान युद्ध का इतिहास

इराक ईरान युद्ध का इतिहास (Iraq-Iran War) (1980-1988) 

ईराक की सत्ता पर तानाशाह के रूप में बदनाम हुए सद्दाम हुसैन ने अपनी जिन्दगी की एक जबरदस्त भूल ईरान पर युद्ध थोपकर की। उन्होंने बाथ पार्टी बनाकर इरान की सत्ता पर 1968 ई० में कब्जा कर लिया था। 1971 ई० आते-आते सद्दाम ने अपनी छवि कट्टर सुन्नी मुस्लिम नेता की बना ली थी। तेल के मसले पर उन्होंने मुस्लिम जगत को एक होने का अह्वान करते हुए कहा था- “हम पश्चिम जगत को तेल देना बन्द कर दें तो वे आर्थिक रूप से दीवालिये हो जाएंगे। वे हमारे तेल के माध्यम से ही अपने देश की तरक्की कर रहे हैं, विकसित देश कहला रहे हैं…हमें लूट रहे हैं और मुस्लिम देशों को खोखला कर रहे हैं।” 

सन् 1972 आते-आते जब सद्दाम ने देखा कि उनके इस आह्वान का मुस्लिम देशों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है तो उन्होंने अपना रुख पलटा। सोवियत संघ के साथ 15 वर्षों का समझौता किया। इस समझौते का लाभ सद्दाम ने इस रूप में उठाया कि इराक की उन तेल कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया, जो पश्चिम देशों को सस्ती कीमत पर तेल दे रही थीं। 

सन् 1978 आते-आते सद्दाम ने इराक की खराब अर्थ व्यवस्था को पूरी तरह सुधार कर इराक की जनता में अपनी छवि राष्ट्रीय हीरो के रूप में स्थापित कर ली। 

बस, इसके बाद ही उनकी तानाशाही बढ़ने लगी। वे मानने लगे कि वे जो चाहे वह कर सकते हैं और इरान की जनता उन्हें सिर आंखों पर बिठाएगी। 

पर ठीक ऐसा न था, जैसा सद्दाम सोच रहे थे। इरान में कुर्द कबीले के लोग और ईरान की सीमा से लगते शिया बाहुल दुजैल क्षेत्र में अलगाव के नारे लगने लगे थे। अपने आपको कट्टर सुन्नी नेता की छवि बनाते हुए कुर्द और शिया दोनों ही अपने को असुरक्षित समझने लगे थे। उनकी ओर से विद्रोह और आन्दोलन की शुरूआत हुई तो सद्दाम का चमन चक्र चला। कुर्दो पर दमनात्मक कार्यवाही करते हुए सद्दाम ने सैकड़ों लोगों को गोलियों से भुनवा डाला यही पर जुल्म नहीं थमा-कुर्दो के इलाके में केमिकल बम का इस्तेमाल कर रातों-रात हजारों लोगों को मौत के घाट उतरवा दिया। 

शियाओं का आन्दोलन कुचलने के लिए उन पर सैनिक कार्यवाही का हुक्म दिया तो ईराक से सीमा लगी होने के कारण शिया ईरान की सीमा पर पहुंच गए और इसी मसले को लेकर इराक को ईरान पर युद्ध थोपने का मौका मिल गया। उसने आरोप लगाया कि ईरान, इराकी विद्रोहियों को भड़का रहा है।

युद्ध की शुरूआत 

इराक ईरान युद्ध का इतिहास

ईरान में, सन् 1979 में शाहरजा पहलवी की हुकूमत उखाड़ फेंकी गयी थी। 

अयातुल्ला खुमैनी, शिया जगत के प्रमुख नुमाइन्दे बनकर उभर चुके थे। सन् 1980 में जब सद्दाम ने ईरान पर हमला करने का विचार बनाया तो ईरान एक बड़ी शक्ति बनकर अमेरिका की तेल आपूर्ति बन्द कर चुका था। अमेरिका भी पश्चिम जगत ईरान से नाराज था। सद्दाम ने वक्त से फायदा उठाते हुए अमेरिका से साठ-गांठ करके इस बात के लिए तैयार कर लिया था कि यदि वे ईराक पर आक्रमण करते हैं तो अमेरिका उनका पूरा साथ देगा। 

अमेरिका ने हामी भर दी थी, क्योंकि तेल जगत में सद्दाम से बढ़िया हमदर्द कोई और साबित न हो रहा था। 

कुछ वर्ष पूर्व अमेरिका को बुरा कहने वाला सद्दाम, अमेरिका का चहेता ही नहीं, कठपुतली बन गया था। 

युद्ध और हथियारों के मामले में पूर्ण आश्वस्त होने के बाद, अगले दिन से ही अमेरिकी हथियारों की खेप इराक के हवाई अड्डे पर उतरनी आरम्भ हो गयी। अमेरिका के रणनीतिकार भी इराक की धरती पर आ गए। रातों-रात सद्दाम ने अपने देश के सैन्य अधिकारियों की मीटिंग तलब की। उनके सामने लक्ष्य रखा कि उन्हें ईरान के विरुद्ध एक माह के अन्दर निर्णायक युद्ध का निपटारा करना है। इस निर्णायक युद्ध में ईरान का नामो-निशान मिट जाना है।

इराकी वायुसेना का आक्रमण 

सितम्बर, 1980 के दूसरे सप्ताह के बाद पूरी व्यवस्था के साथ सद्दाम हुसैन ने पहला हवाई हमला ईरान की राजधानी तेहरान के मेहराबाद एअरपोर्ट पर करने का हुक्म दिया। अमेरिका निर्मित हवाई जहाजों के सिद्धहस्त बाम्बर विमानों ने बगदाद एअरपोर्ट से उड़ानें भरी और वे मेहराबाद (तेहरान) हवाई अड्डों पर बमबारी करके वापस आ गए। 

ईराक इस हमले के लिए तैयार नहीं था-उसे मेहराबाद हवाई अड्डे पर भारी तबाही उठानी पड़ी। बाम्बर विमानों ने मेहराबाद की सारी हवाई पट्टियां तबाह कर दी थीं। अगला हमला ईरान के तेल उत्पादक खुजैस्तान (Khuzestan) पर हुआ। इराकी सेना ने हवाई मार्गों से खुजेस्तान में उतरकर भीषण गोलीबारी का बाजार गर्म कर दिया। 

22 सितम्बर, 1980 को खुजैस्तान पर पूरा निमंत्रण करके इराकी सेना ने उसे इराक राज्य का एक हिस्सा घोषित कर दिया। 

अरब लीग ने सबसे पहला समर्थन सद्दाम को दिया। अरब राज्यों का समर्थन पाने के बाद सद्दाम हुसैन को यूनाइटेड स्टेडस, सोवियत यूनियन और यूरोपीय देशों का समर्थन मिला। 

विशेष-यहां पर इस बात का स्पष्टीकरण आवश्यक है सोवियत यूनियन और अमेरिका, एक-दूसरे के घुर विरोधी होने के बावजूद इराक को समर्थन क्यों दे रहे थे? इसके पीछे वजह थी। 

ईरान उस समय, आयातुल्ला सुमैनी के नेतृत्व में अत्यन्त शक्तिशाली देश में शुमार किया जाने लगा था। उसने पश्चिमी देशों का पूरी तरह बायकॉट कर दिया था। पश्चिमी देशों की तेल आपूर्ति बन्द कर दी थी। तेल के मसले पर घुर-विरोधी दोनों राष्ट्र एक हो गए थे साथ ही ईराक की बढ़ती शक्ति में वे इस बात को भी देख चुके थे कि वह परमाणु शक्ति सम्पन्न देश बन चुका है। वह इसी तरह अपनी शक्ति बढ़ाता रहा तो एक दिन पूरे यूरोप और अमेरिका के लिए खतरा बन जाएगा। 

अयातुल्ला खुमैनी न तो दक्षिण पंथियों से कोई सम्बन्ध रखना चाहते थे ना ही वामपंथियों से। वे इस्लामवाद की शक्ति का नारा लगाकर अपने व्यवहार से इस बात को साबित कर चुके थे कि अगर समय पड़ा तो वह अमेरिका, यूरोपीय देशों और रूस से जंग कर सकते हैं। 

सद्दाम हुसैन के हमले को उपरोक्त राष्ट्रों ने उचित कदम बताते हुए खुजैस्तान पर इराक के कब्जे को वैध मान लिया। 

इसके बाद सद्दाम हुसैन ने ईरान के विरुद्ध खुली जंग का एलान करते हुए अरब राज्यों, फारस के खाड़ी देशों से आर्थिक सहातया की मांग की, जिसे इन लोगों ने तुरन्त स्वीकार कर लिया तथा उनकी आर्थिक सहायता आरम्भ कर दी। सद्दाम हुसैन ने ईरान के विरुद्ध खुद को अरब देशों का क्रान्तिकारी रक्षक कहा। इन सब समर्थनों के बाद भी मीडिया जगत ने निष्पक्ष भूमिका निभा रहा था, वह इराक को ईराक पर हमलावर बता रहा था। कुछ अखबारों ने लिखा- “सद्दाम हुसैन अन्तर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन कर रहे हैं। उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय सीमा रेखा की परवाह नहीं की है।” 

इसके साथ ही, सद्दाम को अपने ही देश इराक में शियाओं और कुर्दो द्वारा, जबरदस्त विरोध और प्रदर्शन का सामना करना पड़ रहा था। 

जवाब में सद्दाम ने इन दोनों ही जातियों के विरोध का बर्बरता पूर्वक दमन, करवाना आरम्भ कर दिया। शियाओं और कुर्दो पर घातक हथियारों का इस्तेमाल कर उनकी लाशों को सामूहिक कब्रस्तान में बदल दिया। इराकी सैनिकों ने सैनिक ट्रकों में लाशों को भर-भर कर सामूहिक कब्रिस्तान में लाकर दफन कर दिया ताकि इस नरसंहार की सही गिनती न की जा सके। 

उस समय सद्दाम का पलड़ा बहुत भारी था। मीडिया के अलावा ईरान के पक्ष में कोई भी देश बोलने के लिए खड़ा न हो रहा था। सबकी बोली सद्दाम के साथ थी, क्योंकि इस समय सद्दाम अमेरिका और यूरोपीय देशों का खास चहेता था। 

और, पासा पलटने लगा 

अपने शुरूआती हमले में इराक ने अच्छी बढ़त हासिल की। पर, जब ईरान की ओर से जवाबी हमले की कार्रवाई होने लगी। तो सद्दाम के हाथों से तोते उड़ने की कहावत चरितार्थ हुई। इराकी सेना के सैनिकों की, युद्ध मोर्चे पर भयानक क्षति होने लगी। 

सद्दाम हुसैन को अमेरिका, यूरोप, सोवियत रूस और पूरे अरब गण राज्यों की सहायता मिल रही थी-ईरान के साथ कोई न था-यदि कुछ था तो ईराकी जवांमर्द लड़ाके जो इरान के सैनिकों को हर मोर्चे पर धूल चटा रहे थे। ईरान का हर नागरिक यहां तक कि बूढ़े-स्त्रियां तक घरों से निकलकर मैदाने-जंग में उतरकर, सिर पर कफन बांधकर इराकी सैनिकों को मौत के घाट उतार रहे थे। 

जिस सद्दाम ने एक माह के अन्दर ईरान की हस्ती दुनिया के नक्शे से मिटा देने का दावा, अमेरिकी आकाओं से किया था, वह दिन बीतने के साथ, बगले झांकते नजर आने लगा था। सन् 1982 ई० तक इराकी सेना की तबाही इस कदर हो चुकी थी कि वह रक्षात्मक रुख अपनाने को मजबूर हो गया। अब सद्दाम इस बात को चाहने लगा था कि किसी तरह युद्ध रुक जाए। ___ इराक के स्वास्थ्य मंत्री डॉ० रियाद इब्राहीम ने उस समय सद्दाम हुसैन को परामर्श दिया था-“मौजूदा हालत में बेहतर यही है कि इरान के साथ सुलह के हालातों को रखा जाए।” 

युद्ध लम्बा खिंचता जा रहा था। नुकसान इराक को उठाना पड़ रहा था। खिसियाहट में, दक्षिण मोर्चे पर इराकी फौजों ने कुर्दो पर रासायनिक हथियार (Chemical Weapone) का इस्तेमाल किया। 

सब तरह का नुकसान पर नुकसान उठाने के बाद की इराकी सेना युद्ध मोर्चे से एक इंच भी आगे न बढ़ पा रही थी। युद्ध की वजह से इराक की तेल सम्पदा और कारोबार पर बहुत बड़ा फर्क पड़ा था। तेल की कीमतों में लगातार गिरावट आ रही थी। 

सोवियत यूनियन, फ्रांस, यूनाइटेड स्टेट्स, यूरोपीय अन्य देश तो सद्दाम के खेमे में पहले से ही थे, चीन भी सद्दाम का साथ देने के लिए सामने आ गया था। पर जब दिन पर दिन गुजरते गए-साल-दर-साल युद्ध खिंचता चला गया तब उपरोक्त देशों ने ही युद्धबन्दी की बात कहनी आरम्भ कर दी। 

यूनाइटेड नेशन्स सिक्योरिटी कौंसिल ने ईरान से युद्ध बन्द करने की अपील की। 

ईरान ने कहा- “यदि युद्ध क्षतिपूर्ति की शर्त इराक को स्वीकार नहीं तो युद्धबंदी पर कोई विचार नहीं किया जा सकता।” 

सन् 1980 से 1988 शुरू हो गया था। ईरानी नौसेना द्वारा इराकी तेल कुंओं को भारी-क्षति उठानी पड़ी थी। यह नुकसान फारस की खाड़ी क्षेत्र में हुआ था। 16 मार्च, 1988 को कुर्दिशों के नगर हलाब्जा (Halabja) पर इराकी सेना द्वारा मस्टर्ड गैस (Mustard Gas) का हमला किया गया। इस हमले में 5000 बेगुनाह कुर्दिश नागरिक मारे गए तथा 10,000 लोग अपंगता के शिकार हुए। 

आठ साल तक चले युद्ध की न तो कोई मध्यस्थता करने आया ना ही ईराक ने युद्धबन्दी की बात मानी। 

थक-हार कर 20 अगस्त, 1988 ई० को सद्दाम हुसैन ने नुकसान का आंकड़ा जुटाकर, इराकी सेनाओं को सीमाओं से वापस लौट आने का आदेश दे दिया।

इस युद्ध में दोनों ओर के सैनिकों और नागरिकों की युद्ध में मारे जाने की संख्या 10,00,000 तक पहुंच गयी थी।

युद्ध का परिणाम 

ईरान पर युद्ध थोपकर सद्दाम हुसैन जबरदस्त नुकसान में आए थे। इराक, 75 बिलियन डालर का अमेरिका आ कर्जदार हो गया था। इस कर्ज को अदा करने में इराक किसी भी तरह सक्षम न था। इस यह कर्ज उन हथियारों की कीमत का था, जो युद्ध के लिए इरान ने अमेरिका से लिए थे और वे हथियार युद्ध में झोंक दिए गए थे।

कर्ज अदायगी के लिए सद्दाम ने अरब खाड़ी देशों से सहायता की गुहार लगायी; पर कोई भी उसकी सहायता के लिए सामने न आ सका। 

दूसरी ओर ईरान और ईराक के सर्वमान्य नेता अयातुल्ला खुमैनी प्रशंसा के पात्र बन चुके थे। देश उन्हें नायक (Hero) के रूप में जहां मान रहा था, वहीं दुनिया उनकी शक्ति का लोहा मानने को मजबूर हो गयी थी। 

ईरान ने सद्दाम के ‘अरब नेता’ बनने का सपना चकनाचूर करके रख दिया था। 

ईरान-इराक की सीमा रेखा 1979 ई० वाली ही निर्धारित की गयी थी। इस प्रकार ईरान ने कुछ न खोया था, जबकि इराक ने अपना सब कुछ खो दिया था। वह अपने सिर पर चढ़े हथियारों के कर्ज का बोझ उतारने को छटपटा रहा था।

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