साहित्य और संस्कृति का अंतर्संबंध अथवा साहित्य और संस्कृति संबंध

साहित्य और संस्कृति का अंतर्संबंध

साहित्य और संस्कृति का अंतर्संबंध (यू.पी. पीसीएस मुख्य परीक्षा, 2014) अथवा साहित्य और संस्कृति संबंध (यूपी आरओ/एआरओ मुख्य परीक्षा, 2015) अथवा संस्कृति, साहित्य और समाज का अन्योन्याश्रित संबंध (यूपी आरओ/एआरओ मुख्य परीक्षा, 2017) 

साहित्य और संस्कृति के बीच अंतर्संबंध होना स्वाभाविक है, क्योंकि संस्कृति एक समग्रता है और समग्रता का सृजन करने वाला एक महत्त्वपर्ण घटक साहित्य है। वस्ततः संस्कति के निर्माण में साहित्य, ज्ञान, कला, नैतिकता, विधि-विधान एवं रीति-रिवाज आदि का विशिष्ट योगदान होता है। इस दृष्टि से साहित्य वह महत्त्वपूर्ण अवयव है, जिसका न सिर्फ संस्कृति के निर्माण में विशेष योगदान होता है, बल्कि यह संस्कृति को परिष्कृत भी करता है। यह कहना असंगत न होगा कि साहित्य उन अवयवों में से एक है, जो श्रेष्ठ संस्कृति का निर्माण करता है। 

साहित्य वह विशिष्ट सांस्कृतिक तत्व है, जो हमें सांस्कृतिक जड़ता से बचाता है। श्रेष्ठ साहित्य के अभाव में सांस्कृतिक जड़ता बढ़ती है, जिससे समाज और सभ्यताएं पतनोन्मुख होती हैं। 

संस्कृति को संस्कारों के घनीभूत स्वरूप के रूप में अभिहित किया जाता है। यदि संस्कार अच्छे होंगे, तो संस्कृति भी उन्नत होगी, समृद्धशाली और गौरवशाली होगी। जो संस्कार, संस्कृति के निर्धारक होते हैं, उनका प्रदाता कौन है? इस प्रश्न का सीधा-सा जवाब है ‘साहित्य’। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने यह अकारण नहीं कहा है कि सारे समाज को सुंदर बनाने की साधना का नाम साहित्य है। साहित्य का स्वरूप सुंदर और सत्य बताया गया है। यह अपने इस स्वरूप में हमें उच्च चिंतन की शक्ति प्रदान करता है, स्वाधीनता के भावों से भरता है, यह सौंदर्य का सार होता है, तो हमें सृजन के भी लिए प्रेरित करता है, इसमें जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश होता है. तो परहित की भावना भी इसमें निहित रहती है। इतना ही नहीं, साहित्य हमें सुरुचि संपन्न बनाता है, तो हमें चेतन और जागृत भी बनाता है। यह जहां हमें आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति प्रदान करता है, वहीं हममें शक्ति और गति भी उत्पन्न करता है। इसकी एक विशिष्टता यह भी है कि यह हमारे अंदर संकल्प और कठिनाइयों पर विजय पाने की दृष्टि उत्पन्न करता है। इन विविध स्तरों पर साहित्य हमें संस्कारित करता है, संस्कारवान बनाता है। साहित्य से मिलने वाले ये संस्कार ही घनीभूत होकर संस्कृति को निर्मित करते हैं। इस प्रकार साहित्य और संस्कृति के बीच एक अभिन्न संबंध स्थापित होता है। 

साहित्य वह विशिष्ट सांस्कृतिक तत्व है, जो हमें सांस्कृतिक जड़ता से बचाता है। श्रेष्ठ साहित्य के अभाव में सांस्कृतिक जड़ता बढ़ती है, जिससे समाज और सभ्यताएं पतनोन्मुख होती हैं। गति और शक्ति साहित्य के अद्भुत गुण होते हैं, जो कि संस्कृति को गतिशील और प्रगतिशील बना कर उसे जड़ता से ग्रस्त होने से बचाते हैं। साहित्य हमें नवचेतना एवं नवजागृति प्रदान कर संस्कृति को स्थिर होने से बचाता है। यहां यह रेखांकित करना समीचीन रहेगा कि गतिशीलता को संस्कृति का महत्त्वपूर्ण अवयव माना जाता है। जिस संस्कृति में यह गतिशीलता नहीं रहती, वह स्थिर हो जाती है। जब कोई संस्कृति स्थिर हो जाती है, तो उसमें विकार पैदा होने लगते हैं और यह स्थिति सांस्कृतिक जड़ता को जन्म देती है। साहित्य की यह विशिष्टता है कि वह संस्कृति को स्थिर नहीं होने देता। वह संस्कृति को गति एवं लय दे कर जहां उसे जीवंतता प्रदान करता है, वहीं उसे स्थिरता से बचाता है। इस प्रकार साहित्य जहां संस्कृति को विकार रहित बनाए रखता है, वहीं जड़ता से सुरक्षा प्रदान करता है। 

यदि यह कहा जाए कि साहित्य, संस्कृति को उच्च आयाम देता है, तो असंगत न होगा। यह संस्कृति को न सिर्फ निखारता है, बल्कि उसे दिशा-बोध भी करवाता है। अक्सर ऐसी संक्रामक स्थितियां पैदा होती हैं, जिनसे संस्कृति के पतनोन्मुख होने का खतरा बढ़ जाता है। इन स्थितियों में साहित्य ही हमें सही दिशा का बोध करवाता है और संस्कृति को पथभ्रष्ट होने से बचाता है। साहित्य हमें वे उच्च सांस्कृतिक मूल्य | प्रदान करता है, जिनसे संस्कृति श्रेष्ठ रूप में पहचानी जाती है। साहित्य ही वह तत्व है, जो संस्कृति को अवमूलियत होने से बचाता है। 

साहित्य का संस्कृति से इस दृष्टि से भी अटूट रिश्ता है कि यह संस्कृति को जानने का एक प्रमुख स्रोत भी है। भारतीय संस्कृति अत्यंत प्राचीन संस्कृति है। इसके अलग-अलग कालखण्ड भी हैं। अब यदि किसी कालखण्ड की संस्कृति के बारे में हमें प्रामाणिक जानकारी जुटानी है, उसके बारे में जानना और अध्ययन करना है, तो इसके लिए सबसे पहले उस कालखण्ड के साहित्य पर ही दृष्टि डालनी होगी। जैसे यदि हम पूर्व वैदिक संस्कृति के बारे में जानना चाहते हैं, तो इसके लिए हमें अपने प्राचीनतम वेद ‘ऋग्वेद’ का अध्ययन करना होगा। इसी प्रकार यदि उत्तर वैदिक संस्कृति का अध्ययन करना है, तो हमें इसके लिए ‘यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषद’ जैसे ग्रंथों का अवलोकन करना होगा। संस्कृति के बारे में जानने में ‘संस्मरण साहित्य’ की भी विशेष उपयोगिता होती है। इसका सृजन प्रायः विदेशी यात्रियों द्वारा किया गया होता है। जैसे-यूनानी शासक सेल्यूकस के राजदूत के रूप में गया होता है। जैसे-यूनानी शासक सेल्यूकस के राजदूत के रूप में मेगस्थनीज चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया और उसने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ (Indica) में भारत की तत्कालीन व्यवस्थाओं का अत्यंत जीवंत चित्रण किया, जिससे भारत की तत्कालीन संस्कृति के बारे में समुचित जानकारी मिलती है। प्रसंग को ध्यान में रख कर यह रेखांकित करना समीचीन रहेगा कि कभी-कभी तो साहित्य को सहेजने के लिए ही संस्कृतियों का सूत्रपात किया जाता है। इसका सक्षम उदाहरण है प्राचीन भारत की वह ‘सूत्र संस्कृति’, जिसका सूत्रपात उत्तर वैदिक कालीन संस्कृति के बाद हुआ। ‘सूत्र संस्कृति’ का मुख्य उद्देश्य प्रचुर वैदिक साहित्य को सहेजना और सुरक्षित रखना था। इसके लिए सूत्र रूप में वैदिक साहित्य का संक्षेपीकरण करने के लिए सूत्र साहित्य रचा गया। स्पष्ट है कि साहित्य और संस्कृति के मध्य कितना गहरा अंतर्संबंध है। 

चूंकि साहित्य हर व्यक्ति की पहुंच में होता है, अतएव इसका प्रभाव भी व्यापक होता है। यह विजातीय समाजों में एकजुटता को बढ़ाकर उन्हें एक मंच पर लाता है और उस जन-संस्कृति का सूत्रपात करता है, जो प्रत्येक को आसानी से उपलब्ध होती है। 

सच तो यह है कि संस्कृति के विकास में न सिर्फ साहित्य का अमूल्य योगदान होता है, बल्कि यह श्रेष्ठ संस्कृति की आधार स्तंभ भी होता है। आज यदि इतिहास में दक्षिण भारत की ‘पल्लव संस्कृति को एक श्रेष्ठ संस्कृति के रूप में अभिहित किया जाता है, तो इसका मुख्य वजह यह है कि पल्लव नरेशों ने सांस्कृतिक विकास के दृष्टिकोण से साहित्य, शिक्षा एवं कलात्मक प्रगति को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया। साहित्यिक गतिविधियों में उन्होंने गहरी रुचि प्रदर्शित की तथा भारवि, दण्डिन एवं मातृदत्त जैसे विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया, जिन्होंने श्रेष्ठ ग्रंथों का सृजन किया। 

साहित्य की यह विशिष्टता है कि वह विजातीय समाज को एक सूत्र में बांध कर सांस्कृतिक एकीकरण को प्रोत्साहित करता है। इस प्रकार वह एक ऐसी जन-संस्कृति का निर्माण करता है, जो जटिल समाजों की प्रमुख विशेषता होती है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि साहित्य एक ऐसा जन माध्यम है, जो कि जनमानस पर व्यापक प्रभाव डालता है और लोगों को जोड़ने का काम करता है। चूंकि साहित्य हर व्यक्ति की पहुंच में होता है, अतएव इसका प्रभाव भी व्यापक होता है। यह विजातीय समाजों में एकजुटता को बढ़ाकर उन्हें एक मंच पर लाता है और उस जन-संस्कृति का सूत्रपात करता है, जो प्रत्येक को आसानी से उपलब्ध होती है।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिन संस्कृतियों में ज्ञान का अभाव रहा, वे नष्ट हो गईं। यहां भी संस्कृति के संदर्भ में साहित्य की उपादेयता सिद्ध होती है, क्योंकि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में ज्ञान राशि के संचित कोष का ही नाम साहित्य है’। साहित्य, शिक्षा जिसका एक अनिवार्य घटक है, ज्ञानवान समाज के निर्माण में अमूल्य योगदान देता है। स्वाभाविक-सी बात है कि जब समाज ज्ञानवान होता है, तो सभ्यता भी ज्ञानवान बनती है और इस प्रकार एक ज्ञानवान एवं गतिशील संस्कृति अस्तित्व में आती है। ऐसी संस्कृति जहां एक उन्नत संस्कृति कहलाती है, वहीं यह दूसरी संस्कृतियों । के लिए प्रेरणास्रोत भी होती है। ऐसी संस्कृति के क्षरण की संभावना कम रहती है, क्योंकि उसमें ज्ञान का प्रकाश विद्यमान रहता है, जो कि उसे पतनोन्मुख नहीं होने देता है। 

सारतः हम यह कह सकते हैं कि साहित्य और संस्कृति के मध्य गहरा अंतर्संबंध है, दोनों के बीच के बीच एक अटूट रिश्ता है। यह जहां श्रेष्ठ संस्कृतियों को गढ़ने वाला शिल्पकार है, वहीं कालातीत हो चुकी संस्कृतियों को जानने का महत्त्वपूर्ण स्रोत भी है। यह वह सांस्कृतिक अवयव है, जो संस्कृतियों के कालातीत हो जाने के बाद भी उन्हें जीवित बनाए रखता है। यह कहना असंगत न होगा कि साहित्य, संस्कृति के हृदय का आदर्श रूप है। 

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