Inspirational quotes in hindi-‘काम’ यानी यौन सन्तुष्टि : कामयाबी की गारन्टी

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Inspirational quotes in hindi- ‘काम’ यानी यौन सन्तुष्टि : कामयाबी की गारन्टी (Fulfilment of Sex is The Guarantee of Being Successful) 

1.वस्तुतः समूची सृष्टि का सृजन ही ‘काम’ पर आधारित है. सृष्टि का हर प्राणी, हर कार्य कलाप ‘काम’ द्वारा संचालित है. इस सृष्टि में यदि कोई प्रथम एवम् अन्तिम प्राकृतिक आवश्यकता है तो वह ‘काम’ ही है. काम ही प्रकृति है और प्रकृति ही काम है. प्रकृति का अस्तित्व बस ‘काम’ पर ही टिका है. ‘काम’ की संतुष्टि पर ही सुन्दर फूल खिलते हैं, ‘काम’ की संतुष्टि पर ही पक्षी चहकते हैं.

2. व्यक्ति की हर गतिविधि, गीत-संगीत, कला-साहित्य, हास-परिहास, वस्त्र-विन्यास, स्थापत्य-शिल्प, निर्माण आदि में ‘काम’ भावना का ही वर्चस्व रहता है. अर्थात् व्यक्ति और प्रकृति का हर कृत्य यौन भावनाओं से ही अनुप्रेरित रहता है. यहाँ सबसे बड़ी ऊर्जा है ‘काम’. इसलिए शांति, संतुष्टि, आनन्द और सफलता के लिए ‘काम’ के स्तर पर तृप्ति अपेक्षित है.

3. मान कर चलें कि यौन संतुष्टि ही सफलता की कसौटी है, जो ‘काम’ के स्तर पर पूर्णतः संतुष्ट नहीं होगा, उसे हर काम के दौरान ‘काम’ ही नजर आयेगा. ‘काम’ की असंतुष्टि हर कदम पर परिलक्षित होती है, इसलिए ऐसे व्यक्ति का जीवन कुंठाओं एवम् विफलताओं से भरा होता है, ‘काम’ के स्तर पर जो जितना संतृप्त होगा, वो जिन्दगी में उतना ही सफल होगा.

4. ‘काम’ तो वस्तुतः जीवन का स्रोत है, ईश्वरीय सौगात है, कोई पाप नहीं है. ‘काम’ तो प्राकृतिक वरदान है, कोई अभिशाप नहीं है. ‘काम’ के बिना तो जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती. ‘काम संतुष्टि’ से प्राप्त ऊर्जा ही सफलता की गारन्टी दे सकती है. ‘काम गतिविधयों’ में ऊर्जा का हास नहीं, सृजन होता है. मन के विकार नष्ट होते हैं, दिल के सब द्वार खुल जाते हैं और दिमाग के तन्तु सक्रिय हो उठते हैं. याद रखें, जीवन की सफलता के लिए तन, मन, दिल और दिमाग की सक्रियता आवश्यक है.

5. ‘काम वासना’ वस्तुतः प्रकृति का सबसे बड़ा रहस्य है. ‘काम’ जितना रहस्यपूर्ण तो ‘परमात्मा’ भी नहीं है. परमात्मा की तो एक झलक से तृप्ति हो जायेगी, किन्तु ‘काम वासना’ की संतृप्ति कभी नहीं हो पायेगी. व्यक्ति जितना ‘काम’ में प्रवेश करता है, उतना ही आनन्द को उपलब्ध होता है. ‘काम’ कभी बासी नहीं होता, ‘काम’ कभी उबाऊ नहीं होता. ‘काम’ तो हमें हर बार नयापन देता है, नयी ताजगी देता है, जो हमें बोर होने से बचाता है.

6. यदि किसी का दाम्पत्य जीवन सुखी नहीं है तो उसका जीवन सुखी हो ही नहीं सकता. तब बहुत सी कुंठायें घर कर लेंगी, मानसिक तनाव रहेगा, जीवन अपूर्ण लगेगा. ऐसी स्थिति में व्यक्ति कुछ भी कर ले, सफलता संदिग्ध ही रहेगी. संभवतः इसीलिए आज तक के इतिहास में उभयलिंगी लोगों ने कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया है.

7. वस्तुतः तृप्त यौन सम्बन्ध हमें आजीवन निरोग रखते हैं, तनाव मुक्त रखते हैं, रोगों से लड़ने की शक्ति प्रदान करते हैं, हृदय रोगों से दूर रखते है, स्निग्ध त्वचा एवम् मांसपेशियों के दर्द में कमी करते हैं और लम्बी उम्र तक आनन्द से जीने के अवसर देते हैं. जिस प्रकार हमारे शरीर को जल, वायु एवम् भोजन की आवश्यकता पड़ती है, उससे भी तीव्रता से ‘काम’ की आवश्यकता पड़ती है. स्त्री और पुरूष दोनों के लिए ‘काम’ समान रूप से महत्वपूर्ण है. दोनों की पूर्णता ‘काम संतुष्टि’ पर ही निर्भर करती है.

8. संतुष्ट एवम् सुखद यौन सम्बन्ध पति पत्नी दोनों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है. यौन क्रिया के दौरान स्त्री की 8 से 10 एवम् पुरूष की 12 से 15 तक कैलोरीज प्रति मिनिट के हिसाब से खर्च होती है. अर्थात् सहवास की अवधि जितनी अधिक होगी, उतनी ही सुखद एवम् स्वास्थ्यप्रद होगी. इसलिए सहवास के हर क्षण को आलौकिक आनन्द से भरें और दिनभर तरोताजा एवम् प्रसन्नचित्त रहने की ऊर्जा संग्रहित करें. सबसे बड़ा आश्चर्य तो यही है कि आज तक तमाम संस्कृतियों ने ‘काम’ का विरोध किया है. ‘काम’ को एक घृणित कार्य माना गया है. किन्तु इससे भी बड़ा आश्चर्य तो यही है कि जितना विरोध किया गया, उससे कहीं अधिक ‘काम’ ने अपना विस्तार किया है. तथा-कथित धार्मिक लोगों ने ‘काम’ को मोक्ष के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध माना है. किन्तु दूसरी ओर यह भी सच है कि ऐसे लोग ‘काम’ के प्रति सबसे अधिक आकर्षित रहे हैं. ऐसे लोगों ने ही ‘काम’ जैसे नितान्त नैसर्गिक कार्य में विकृतियाँ पैदा की है.

निष्कर्ष –‘काम’ का यदि कोई निश्चित प्रयोजन नहीं होता तो परमात्मा इसे बनाता ही क्यों ? याद रखें, प्रेम की समूची यात्रा के दौरान प्राथमिक बिन्दु ‘काम’ ही है. यौन क्रिया के दौरान व्यक्ति का अहम्, समय एवम् चिन्तन रूक जाता है. यही समाधि का प्रथम चरण है. व्यक्ति की बैचेनी और आतुरता वस्तुतः ‘सैक्स’ के प्रति न होकर इसी अहम् शून्यता के लिए होती है. संभोग से क्षणिक अहम् शून्यता प्राप्त होती है. और एक व्यावहारिक एवम् क्रियाशील व्यक्ति के लिए तो समाधि की यह क्षणिक अनुभूति ही पर्याप्त होती है. अर्थात् सफल जीवन के लिए सुखद, सहज एवं सन्तुष्ट सहवास प्रथम आवश्यकता है. ‘काम ऊर्जा’ ही अन्ततः प्रेम में रूपान्तरित होती है, और यह रूपान्तरण ही सृष्टि को रहने योग्य बनाता है. यही जीवन की परिपूर्णता है, यही अस्तिकता है, यही सफलता है. 

जितना आनन्द बाँटने में है. उतना बटोरने में नहीं (Giving Would Give You Move Pleasure Than Taking) 

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1.आपके पास जो सबसे बढ़िया है, उसे देकर तो देखो, बदले में उससे बढ़िया ही लौटकर आयेगा. आपके पास जो सबसे घटिया है, उसे देकर तो देखो, उससे भी घटिया ही लौटकर आयेगा. घटिया के बदले बढ़िया पाने की कभी आशा मत करो, जब भी बाँटो, जो भी बढ़िया उपलब्ध हो, वही बाँटो. बाँटने में कभी कंजूसी मत करो, वरना एक दिन आपके पास बाँटने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा.

2. आपके पास कितनी सम्पदा है, यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण तो है, उसे बाँटना. बाँटने में जितना आनन्द प्राप्त होता है, उतना धन को आरक्षित करने में नहीं होता. यहाँ बाँटने का व्यापक अर्थ हो सकता है, किसी वस्तु अथवा सेवा के बदले धन देना, धन का उचित निवेश-पुनर्निवेश करना, रोजगार के अवसर उपलब्ध करना एवम् निर्धनों की मदद करना. असली मकसद है, धन का प्रवाह बनाये रखना. धन के प्रवाह में ही असली आनन्द छिपा होता है. पैसा और पानी तो बहता हुआ ही अच्छा लगता है. गहराई से देखा जाय तो जो भी धन-सम्पदा आपके पास है, वह समाज से ही प्राप्त हुई है. उस पर अन्ततः समाज का ही अधिकार है. इसलिए प्रवाह बनाये रखना आवश्यक है.

3. बाँटने का व्यावहारिक अभिप्राय होता है, खर्च करना. खर्चते रहने से धन समाज में बँटता रहता है और रोकने से अनुत्पादकता की श्रेणी में आ जाता है. व्यक्ति संग्रह इसलिए नहीं करता कि साथ ले जाना है, बल्कि इसलिए करता है कि सब कुछ यहीं बाँट कर जाना है. बाँटना चाहे किसी वस्तु, श्रम या सेवा के बदले हो, चाहे उत्तराधिकारियों में विरासत या वसीयत के रूप में हो अथवा दान उपहार आदि के रूप में हो. अपने हाथों से बाँटने में जो आनन्द है, वह दूसरों के हाथों से बँटवाने में नहीं है.

4. जो केवल संग्रह करता चला जाता है, वह मुसीबतों में फंसता ही चला जाता है. जीते जी कितने ही दुश्मन पैदा कर लेता है और मरने पर महाभारत छोड़ जाता है. अर्थात् न जीते जी शांति से रह पाता है और न मरने पर ही. ऐसा व्यक्ति न खुद आराम से रह पाता है और न दूसरों को रहने देता है.

5. अपने अच्छे विचारों को बाँट कर तो देखो, लोग आपको सिर आँखों पर उठा लेंगे. याद रखें, व्यक्ति अपने अच्छे विचारों को बाँटकर ही सम्पन्न हो सकता है. इस जगत में आज तक जो कुछ भी हुआ है, अच्छे विचारों के आदान प्रदान के कारण ही हुआ है. यदि आपके पास कोई अच्छा विचार है और सामने वाले के पास भी कोई अच्छा विचार है तो परस्पर बाँट लेने पर आप दोनों के पास दो-दो अच्छे विचार हो जायेंगे. अर्थात् ज्ञान एवम् धन खर्चने की वस्तुएं हैं. जितना खर्च करेंगे, उतना ही वापस प्राप्त करते चलेंगे, इसलिए प्रेम, ज्ञान, धन, दौलत सब कुछ बाँटते चलो. किन्तु अपने आप को इतने हिस्सों में मत बाँट देना कि आपके हिस्से में कुछ बचे ही नहीं.

6. प्रकृति का काम है देना और व्यक्ति का काम है लेना. प्रकृति तो देती ही देती है, इसीलिए बेहद खुश रहती है. अर्थात् प्रकृति की खुशी का राज है देना. व्यक्ति तो लेना ही लेना चाहता है, इसीलिए हरदम दुखी रहता है. अर्थात् व्यक्ति के दुखी रहने का राज है लेना. प्रकृति से सीख कर जो देना भी सीख जाता है, वह आनन्द को उपलब्ध हो जाता है. जो दूसरों को देने को तैयार रहे, वही दूसरों से लेने का हकदार बन सकता है.

7. व्यक्ति के अतिरिक्त प्रकृति के किसी भी प्राणी में संग्रह करने की प्रवृत्ति नहीं होती. प्राकृतिक होकर भी व्यक्ति दुखी रहता है और उसके दुखों का मूल कारण संग्रह की यह प्रकृति ही है. ध्यान रहे, अर्जित करने एवम् संग्रह करने में बहुत बड़ा अन्तर होता है. इसलिए कमाओ, जमकर कमाओ, किन्तु कमाने के साथ-साथ खुलकर खर्च भी करते रहो. कमाने में उतना आनन्द नहीं आता, जितना खर्च करने में आता है.

8. जरा सोचिए, आप अपने साथ क्या लेकर आये थे और क्या लेकर जायेंगे ? याद रखें, देने से ही अच्छाई मिलेगी और आप केवल अच्छाइयों के लिए याद किये जायेंगे. आज तक जो भी महान बने हैं, वे सब समाज को कुछ न कुछ देने के कारण ही बने हैं. आज तक जिनको भी पुरस्कृत किया गया है, कुछ न कुछ बाँटने के बदले ही किया गया है. अपने में सब कुछ भरने वाला न तो कभी महान बना है, न बन सकता है.

9. व्यक्ति के पास केवल भौतिक सम्पत्तियाँ ही नहीं होती, अन्य अमूल्य सम्पत्तियाँ भी होती हैं. वस्तुतः प्रेम, आनन्द, अपनत्व, ज्ञान एवम् अध्यात्म सम्बन्धी सम्पदायें ही असली सम्पदायें होती हैं. ये बाँटने पर ही बढ़ती हैं, न बाँटने पर घटती चली जाती हैं. इन सम्पदाओं की सार्थकता तो इन्हें बाँटने में ही है. इनका आदान-प्रदान ही सफलता है.

दृष्टान्त- एक राजा ने मंत्रिमण्डल के समक्ष प्रस्ताव रखा कि राज्य में भिखारियों की बढ़ती संख्या को कम करना है. इस पर एक मंत्री ने कहा कि भीख मांगना भी एक कला है. दूसरे की जेब से कुछ निकलवा लेना इतना आसान नहीं है. राजा ने कहा-‘ठीक है, इस प्रस्ताव को फिलहाल स्थगित रखते हैं. एक दिन राजा स्वयम् भिखारी के वेश में राजधानी से दूर किसी गाँव में चला गया और भीख माँगने लगा. किन्तु किसी ने भी इस नये भिखारी को भीख नहीं दी. हताश होकर राजा लौट रहा था. रास्ते में सामने से एक भिखारी आता हुआ मिला. राजा ने हिम्मत करके भिखारी से ही माँगना शुरू कर दिया. ‘मैं दो दिन से भूखा हूँ, कुछ हो तो दे दो.’ भिखारी को उस पर दया आ गई. बोला-‘अपने हाथ आगे करो.’ राजा ने हाथ फैला दिये. भिखारी ने अपना झोला उलटा, उसमें केवल एक मुट्ठी भर चने निकले. भिखारी बोला-‘अभी तो मेरे पास बस यही है, काम चला लेना, आगे कोई न कोई दाता मिल ही जायेगा.’ कहकर भिखारी चला गया. राजा महल में लौटा. उस भिखारी को दरबार में बुलवाया गया. राजा ने भिखारी की दयाशीलता पर प्रसन्न होकर उसे पाँच गाँव जागीरी में दे दिये.. 

Inspirational quotes- दूर दृष्टि : सफल दृष्टि (For Forsightedness Gives Successful Vision) 

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1.हम अक्सर बहुत ही नजदीक की सोचते हैं. अपनी तात्कालिक खुशियों के लिए कल की खुशियाँ गिरवी रख देते हैं. और इसीलिए हम धीरे-धीरे समय से पिछड़ते चले जाते हैं. तब आने वाले समय के लिए हम अपने आपको अयोग्य पाते हैं. इसलिए जरूरी है, आज को भोगा जाय, पर कल के लिए भी सोचा जाय. कहीं ऐसा न हो कि कल हमारे पास भोगने लायक कुछ बचे ही नहीं, अर्थात् दूर दृष्टि से काम लीजिए और आज एवम् कल दोनों को सुरक्षित कीजिए.

2. साधारणतः पुत्र की पहचान पिता के कारण होती है, किन्तु इतिहास बदल जाता है, जब पिता की पहचान पुत्र के कारण होती है. इतिहास बदलने वाले कोई अलग नहीं होते, बस दूर दृष्टि और सकारात्मक दृष्टि वाले ही होते हैं. तो आइए, पीढ़ियाँ गर्व कर सकें, कुछ ऐसा कर दिखाइए.

3. यदि आप कोई ऐसा व्यवसाय आरम्भ करते हैं, जिसकी आज नहीं, कल मांग बढ़ने वाली है, तो आप दूरदर्शी हैं, यदि आप किसी ऐसी सम्पत्ति में निवेश करते हैं, जिसकी आज नहीं कल कीमत बढ़ने वाली है, तो आप दूरदर्शी है. यदि आप आज की आवश्यकता से बड़ा भूखण्ड खरीदते हैं, तो आप दूरदर्शी हैं. यदि आप बैठे-बैठे ही करोड़पति बनना चाहते हैं तो ऐसी अचल सम्पत्ति क्रय कर लें, अर्जित कर लें अथवा सृजित कर लें, जिसकी अभी तो कोई विशेष कीमत नहीं हो, किन्तु भविष्य में बढ़ने वाली हो. अर्थात् सूझ-बूझ के साथ किया जाने वाला प्रत्येक कार्य आपकी दूरदर्शिता का परिचायक होगा.

4. याद रखें, दूरदर्शिता के साथ किया गया कार्य एवम् निवेश एक दिन आपकी जिन्दगी बदल देगा, दूरदर्शिता के साथ सृजित परिवेश जीवन के हर निर्णय को सफलता में बदल देगा. दूरदर्शिता के साथ उठाया गया हर कदम अगले कदम के लिए निर्णायक होगा. दूर देखें, मगर जरा ऊपर उठकर. आप जितनी ऊँचाई से भविष्य को देखेंगे, भविष्य उतना ही उज्जवल एवम् स्पष्ट दिखाई देगा. इसलिए दूरदर्शिता के लिए जरूरी है, अपनी ऊँचाई बढ़ाना.

5. दूरदर्शिता का मतलब है, नींव को मजबूत एवम् बहुउपयोगी बनाना. कमजोर नींव पर बहुमंजिली इमारत भला कैसे खड़ी कर सकोगे? हमें दस-बीस साल की ही नहीं, कम से कम सौ साल की तो सोचनी चाहिए, ताकि इमारत हमारे ही नहीं, कुछेक अगली पीढ़ियों के भी काम आ सके. भवन निर्माण की योजना इस प्रकार बनावें कि भविष्य में आवश्यकतानुसार भवन का विस्तार किया जा सके. अपेक्षित परिवर्तन/परिवर्द्धन किया जा सके. अभी से आगामी सौ सालों की आवश्यकताओं के अनुरूप बड़ा भवन निर्मित करवा लेना दूरदर्शिता नहीं है. भूखण्ड एवम् निर्माण में गुंजाइश रखना ही दूरदर्शिता है. 

6.कोई भी कार्य आरम्भ करने से पहले यह तय कर लें कि इससे आपको क्या मिलेगा ? कब मिलेगा ? कैसे मिलेगा ? जोखिम कितनी है ? क्या अपेक्षाकृत कम जोखिम वाला विकल्प भी विद्यमान है ? विचार करें कि कार्य को पूर्ण करने के लिए कितने संसाधनों की आवश्यकता होगी ? उधार चुकाने के लिए आपके पास क्या योजना है ? भविष्य में आपकी आवश्यकतायें क्या होंगी? आपकी संभावित आय क्या होगी? आपकी बचत कितनी होगी? आदि प्रश्नों पर गंभीरतापूर्वक विचार करना ही दूरदर्शिता है.

7. यदि हम दूरदर्शी नहीं होंगे तो आसमान की तरफ देखते ही रह जायेंगे. यदि हम कल के विश्राम की नहीं सोचेंगे तो जिन्दगी भर भागते ही रह जायेंगे. यह तो सही है कि कल कभी आता नहीं है. आता भी है तो आज बन कर ही. इसलिए कल के लिए भी आज ही सोचें. यही दूरदर्शिता है.

8. दूर दृष्टि रखने वाला त्रिकाल दृष्टा होता है. ऊँचा सोच रखने वाला ही भविष्य दृष्टा होता है. जरा ऊँचाई पर चढ़ कर तो देखिए, भविष्य भी वर्तमान होता नजर आयेगा. भूत भी वर्तमान से अधिक दूर नहीं जा पायेगा. अपना कद बढ़ाइए, आत्मविश्वास जगाइए, दूरदर्शी बनिए और असंभव को संभव बनाइए. जीवन का रोमान्च वस्तुतः दूरदर्शिता में ही छिपा होता है. याद रखें, समझदार काम करने से पहले सोचता है और नासमझ काम करने के बाद सोचता है. एक के सोच में दूरदर्शिता है और दूसरे के सोच में महज पछतावा.

9. दैनिक जीवन में हर कदम पर, हर निर्णय पर दूरदर्शिता की आवश्यकता पड़ती है. इसलिए जो भी कदम उठायें, सोच समझ कर उठायें, ताकि बाद में पछताना न पड़े. जिसे भी देखें, दूर तक देखें, ताकि कभी नजर चुरानी न पड़ें. जो भी निर्णय लें, भविष्य को ध्यान में रखकर लें, ताकि बाद में बदलना न पड़े.

दृष्टान्त- एक गाँव भीषण अकाल की चपेट में था. गाँव में करीब सौ घर थे. एक धनी व्यक्ति के अलावा किसी के पास अनाज नहीं बचा था. धनी व्यक्ति के पास जमीन भी काफी थी और गोदाम भी भरे थे. ग्रामवासी उसके पास अनाज उधार लेने पहुँचने लगे. धनी व्यक्ति ने दूरदर्शिता से काम लिया. अनाज उधार देने की बजाय घर पर ही लंगर चालू कर दिया. सभी ग्रामवासियों को सुबह शाम तैयार भोजन मिलने लगा. उसकी एक ही शर्त थी कि काम करने योग्य सभी वयस्क नागरिकों को सामुदायिक महत्व के कार्य करने होंगे. काम के बदले केवल भोजन मिलेगा. गाँव में मौजूद पोखरों को गहरा करने, एनीकट निर्माण करने, सभी खेतों में भू–संरक्षण एवम् जल संरक्षण, मैड़ बन्दी सम्बन्धी कार्य हाथ में लिए गये. अपने ही खेतों में काम करने में ग्रामवासी काफी उत्साहित थे. आठ महिनों में काफी काम हो गये. अगले वर्ष बरसात अच्छी हुई. सभी पोखर व एनिकट भर गये. कुओं का जल स्तर बढ़ गया. अच्छी पैदावार होने लगी. सबसे अधिक फायदा धनी व्यक्ति को हुआ. भरपूर पानी मिलने लगा. खेतों की उपज बढ़ गई. खर्च तो आठ महीने तक ही किया, किन्तु लाभ हमेशा के लिए हो गया. गाँव वालों की नजरों में सेठ का सम्मान भी काफी बढ़ गया. सेठ सचमुच कितना दूरदर्शी निकला. कम दूरदर्शी तो यही सोचता है-‘भगवान सबका भला करो, लेकिन शुरूआत मुझसे करो.’ वहीं दूरदर्शी सोचता है-‘भगवान सबका भला करो, लेकिन शुरूआत मुझसे मत करो. अर्थात् जब सबका भला होगा तो हमारा भला तो अपने आप ही हो जायेगा. सेठ का सोच कुछ ऐसा ही था. 

motivational thoughts in hindi- कम सामान : सफर आसान (Lesser the Luggage, More Joyful The Journey) 

1.जिन्दगी एक छोटा सा सफर है, हमारे लिए तो यही प्रथम एवम् अन्तिम सफर है. इस इकलौते सफर में भी यदि हम भारी लगेज से लदे रहेंगे तो सफर का आनन्द नहीं उठा पायेंगे. जीवन यात्रा में जितनी कम मात्रा में उत्तरदायित्व लेकर चलेंगे, उतने ही आराम से रहेंगे. यात्रा का असली आनन्द उठा सकेंगे और जीवन को हल्का एवम् खुशगवार बना सकेंगे.

2. बढ़ती हुई जनसंख्या ही आज की सबसे बड़ी समस्या है. हमारे देश का कुल भू-भाग विश्व की तुलना में मात्र 2.42 प्रतिशत है, जिस पर विश्व की 17 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है. अर्थात् हमारे यहाँ जनसंख्या का भार विश्व की तुलना में सात गुना अधिक है. जरा सोचिए, ऐसी स्थिति में देश का विकास कैसे संभव है ? देशवासियों की सफलतायें तो समूचे देश के आर्थिक विकास पर ही निर्भर करती है. इसलिए जनसंख्या के बढ़ते ग्राफ को नीचे लाने में प्रत्येक नागरिक को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी.

3. सर्वप्रथम अपने परिवार के आकार पर ध्यान दें. परिवार जितना छोटा होगा, जिन्दगी का सफर उतना ही आसान होगा. यदि अभी आपने शादी नहीं की हो तो जल्दी मत कीजिए. शादी हो गई है तो बच्चों की जल्दी मत कीजिए. यदि बच्चे भी हो गये हैं तो अब बस कीजिए. याद रखें, बच्चा हो या बच्ची, एक ही काफी है, बड़ा परिवार एक ऐसी गलती है, जिसका न कोई समाधान है, न प्रायश्चित ही.

4. हम केवल अपने बच्चों के लिए कमाते हैं, परन्तु बच्चे इसका अहसान कहाँ मानते हैं. अगर बच्चे कम हुए तो हम उन्हें अच्छे संस्कार दे सकेंगे, उन्हें किसी योग्य बना सकेंगे. अधिक बच्चे होने पर हम उन्हें योग्य नहीं बना सकेंगे और तब जिन्दगी भर बच्चों की जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकेंगे. यानी कम संतान, सफर आसान. कहा जाता है कि ‘किसी राष्ट्र पर शासन करना आसान है, किन्तु अपने पुत्र पर नियन्त्रण रखना उतना ही कठिन है.’

5. ग्रामीण पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति किसी सेवा या व्यवसाय में आने पर सर्वप्रथम अपने गाँव में मकान बनवाता है और कृषि भूमि खरीदता है. फिर नजदीकी कस्बे में मकान बनवाता है और अन्ततः किसी सुविधायुक्त अच्छे शहर में बस जाता है. अर्थात् अपनी समूची जिन्दगी एवम् ऊर्जा मकान बनवाने में ही लगा देता है. विभिन्न स्थानों पर बिखरी सम्पत्तियों को संभालने में ही जिन्दगी का भूगोल बिगड़ जाता है. ऐसे में गणित तो बन ही कहाँ पाता है, इसलिए अपने को बिखेरिए मत. जो कुछ करना हो, उचित समय और उचित स्थान पर ही करें, सम्पत्ति वही भली, जो अच्छी आमदनी दे और निरन्तर महँगी होती चली जाय. 

6.आप जो भी सामान खरीदें, अत्यन्त आवश्यक होने पर ही खरीदें. अच्छी क्वालिटी का खरीदें. कहीं ऐसा न हो कि कबाड़ को सहज कर रखने के लिए ही दो-चार कमरों की जरूरत पड़ जाय. अर्थात् अगर आराम से रहना हो तो भौतिक वस्तुयें कम से कम खरीदें, अन्यथा उनके रख-रखाव और मरम्मत आदि में ही अधिकांश धन, समय और स्थान खर्च कर देंगे.

7. घर के निर्माण हेतु बेशक बड़ा भूखण्ड खरीद सकते हैं, किन्तु फिलहाल उस पर आवश्यकतानुसार छोटा सा, सुन्दर सा घर बनवा लें. घर के आस-पास का रिक्त भूखण्ड बहुत उपयोगी होता है. भविष्य में आवश्यकतानुसार अतिरिक्त निर्माण करवाया जा सकता है. आवश्यकता से अधिक बड़ा घर बनवाकर अभी से अधिक कर्जदार होने और बड़े घर के रख-रखाव में अनावश्यक खर्च करते रहने में कोई समझदारी नहीं है.

8. कुछ लोग अपने घरों पर घरेलू उपयोगार्थ गाय, भैंस, बकरी आदि पाल लेते हैं. अपना कीमती समय एवम् स्थान पालतू जानवरों के लिए लगा देते हैं. जरा हिसाब तो लगाइए, घर का दूध कितना महंगा पड़ता है. दूध की निश्चितता न होते हुए भी कितना व्यस्त रहना पड़ता है. घर में बदबू और अव्यवस्था का साम्राज्य कायम हो जाता है. पर्यावरण बिगड़ जाता है. इसलिए जहाँ तक हो सके, ऐसे जानवरों से बचा जाए.

9. कुछ लोग कुत्ता, बिल्ली, तोता, मैना कुछ भी पाल लेते हैं और अपने आपको इनकी सेवा में लगा देते हैं. वस्तुतः ऐसे जानवरों का घर में कोई विशेष प्रयोजन नहीं होता है. हकीकत तो यही है कि जो आदमी से नफरत करता है, वही ऐसे जानवर पालने की फितरत करता है. इसलिए फालतू में पालतू जानवर पालन की बीमारी न पाली जाय. पालना ही हो तो किसी अनाथ अथवा गरीब बच्चे को पाला जा सकता है. आसान सफर को जानबूझ कर बोझिल मत बनाइए.

Case Study- दो दोस्त थे, ‘क’ और ‘ख’. ‘क’ अमीर और ‘ख’ गरीब. दोनों साथ पढ़ते थे. ‘क’ पढ़ने में कमजोर और ‘ख’ होशियार था. ‘क’ की जल्दी ही शादी कर दी गई. पढ़ाई पूरी करते करते दो बच्चे भी हो गये, पढ़ लिख कर दोनों दोस्त अध्यापक हो गये. ‘ख’ ने नौकरी मिलने पर शादी की. उसके दो बच्चे हुए, एक बच्चा, एक बच्ची. तब तक ‘क’ के पाँच बच्चे हो गये थे. ‘क’ ने अपने गाँव में बड़ा मकान बनवाया. ‘ख’ ने पास के कस्बे में छोटा सा सुन्दर सा घर बनवा लिया. ‘क’ ने भी देखा-देखी कस्बे में बड़ा मकान बनवाया. पहले मोटर साइकिल खरीदी, फिर कार भी खरीद ली. ‘ख’ ने मोटर साइकिल से ही काम चलाया. ‘क’ ने काफी सामान इकट्ठा कर लिया. ‘ख’ ने केवल बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान रखा. ‘ख’ के बच्चों को रोजगार मिल गये. ‘क’ जिन्दगी भर दुखी रहा, आखिर में गरीब हो गया. ‘ख’ आराम से रहा और हर तरह से साधन ॥ सम्पन्न हो गया. अर्थात् कम सामान, सफर आसान, 

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