प्रेरणादायक पॉजिटिव थॉट्स -सफल होने का मतलब करोड़पति होना नहीं है (A Successfulman Does Not Mean to Be A Millionaire) 

प्रेरणादायक पॉजिटिव थॉट्स

प्रेरणादायक पॉजिटिव थॉट्स – सफल होने का मतलब करोड़पति होना नहीं है (A Successfulman Does Not Mean to Be A Millionaire) 

१.जहाँ यह सही है कि ‘सफल होने का मतलब करोड़पति होना नहीं है, वहीं यह भी सही है कि ‘करोड़पति होने का मतलब सफल होना नहीं है.’ अर्थात् व्यक्ति बिना करोड़पति हुए भी अपना जीवन सफलतम तरीके से व्यतीत कर सकता है और करोड़पति होते हुए भी सफलता से कोसों दूर रह सकता है.

2. सफलता को सम्पदा से नहीं, केवल प्रसन्नता से आंका जा सकता है. प्रसन्नता को किसी भौतिक सम्पदा से नहीं, बल्कि आत्मिक सम्पदा से आंका जा सकता है. ‘धनवान’ वही जो बिना धन छोड़े, सौ साल की उम्र में मरे. ‘निर्धन’ वही जो सम्पन्न होते हुए भी कंजूसी में जीवन बसर करे. याद रखें, कृपण होने का मतलब सफल होना नहीं है.

3. सफलता कोई अंक गणितीय इकाई नहीं है. सफलता के लिए अपेक्षित मुख्य मापदण्ड निम्न हो सकते 

१.आर्थिक आत्मनिर्भरता

2. पारिवारिक प्रसन्नता

3. मानसिक, शारीरिक एवम् आध्यात्मिक आरोग्यता

4. भविष्य के लिए निश्चितता 

५.सामाजिक मान्यता

4. सफलता का मतलब है, स्वयम् की सुखद अभिव्यक्ति. दूसरों की स्वीकृति होना अपेक्षित नहीं है. जिन्दगी कभी फिसलती हुई न लगे, कभी पिछड़ती हुई न लगे, कभी भार न लगे, यही जिन्दगी का सार है. सम्मान के साथ जीने के लिए तो न्यूनतम संसाधनों की आवश्यकता होती है, किन्तु न्यूनतम की भी कोई सीमा नहीं है. समय की गति एवम् मानवीय विकास के साथ-साथ न्यूनतम में भी नये-नये साधन जुड़ते रहते हैं. जो अपनी क्षमता के अनुरूप संसाधनों से समझौता कर लेता है, वही सफल कहलाता है.

5. असली प्रश्न यही है कि आखिर किसी व्यक्ति की आमदनी कितनी हो ? आय की न्यूनतम सीमा तो निर्धारित की जा सकती है, परन्तु अधिकतम कोई सीमा नहीं हो सकती, औसत के सिद्धान्त के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की वार्षिक आय ‘प्रति व्यक्ति औसत आय से अधिक हो तो विशेष चिन्ता की बात नहीं होनी चाहिए. पर इसका अर्थ यह नहीं है कि आप औसत पर अटक जायें या गरीबी रेखा से लटक जायें. आपकी आय कम-से-कम औसत से दोगुनी तो होनी ही चाहिए, तब औसत का ग्राफ अपने साथ ऊपर चढ़ने लगेगा. ‘प्रति व्यक्ति औसत आय’ में अभिवृद्धि करते रहना ही आपकी सफलता का लक्ष्य होना चाहिए.

6. जिस प्रकार आप किसी दरिया से सीधे ही पानी पीकर अपनी प्यास संतुष्टि के साथ नहीं बुझा सकते, उसी प्रकार अपार सम्पदा के ढेर पर बैठ कर भी अपने जीवन को सदा सुखी नहीं बना सकते. उपलब्ध धन से आप जल्दी ही ऊब जायेंगे, उससे अधिक की योजनायें बनायेंगे और तब जो है, उसे भी पर्याप्त नहीं पायेंगे. इसलिए जो है, उसका संतुष्टि के साथ उपभोग करें और अपनी आय बढ़ाने के निरन्तर प्रयत्न करते रहें.

7. वैसे धन की कोई अन्तिम सीमा नहीं हो सकती. जो करोड़पति है, वह अरबपति बनना चाहता है और जो अरबपति है, वह खरबपति बनना चाहता है. व्यक्ति की अपेक्षायें तो अनन्त होती हैं, किन्तु आय के स्त्रोत सीमित ही होते हैं. इसलिए अपेक्षायें कभी पूरी नहीं हो सकती. परन्तु याद रखें, सीमित अपेक्षायें सीमित आय से अवश्य पूरी हो सकती है.

8. कहा जाता है कि लक्ष्मी तो चलायमान है, चंचला है. आज है, कल नहीं. फिर जितना धन, उतनी ही उलझनें, जिनका कोई हल नहीं है, जितना अधिक धन होगा, उतने ही अधिक दुश्मन होंगे. इसलिए सफलता का मापदण्ड कभी बैंक बैलेन्स नहीं हो सकता. सफलता का मापदण्ड किसी का चैलेन्ज स्वीकार करना नहीं हो सकता. सफलता तो एक मनोवैज्ञानिक अवस्था है, जो व्यक्ति के सोच पर निर्भर करती है. और सोच भी सबका एक सा नहीं हो सकता.

9. समय-समय पर गरीबी-अमीरी की परिभाषायें बदलती रहती हैं. आज तो जिसके पास जितना अधिक ‘स्थान’ होगा, वह उतना ही अधिक धनवान होगा. वैसे भी ‘स्थान’ यानी Space आरम्भ से ही सफलता का एक शाश्वत मापदण्ड रहा है और आगे भी रहेगा. हर व्यक्ति खुले में श्वास लेना चाहता है. दूसरों से जरा दूर रहना चाहता है और इसके लिए उसे अपने आस-पास अधिक स्थान की आवश्यकता होती है. अर्थात् ‘स्थान’ में अपेक्षित अभिवृद्धि ही सफलता के लिए आवश्यक होती है.

सफलता का मापदण्ड –वैसे तो सफलता के मापदण्ड समय-समय पर एवम् व्यक्ति दर व्यक्ति बदलते रहते हैं. (क) किसी ने कहा है कि अपनी श्रेणी के लोगों के बीच अपनी योग्यता को सिद्ध करना ही सफलता है. (ख) कोई कहता है कि धन के बल पर अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने की शक्ति रखने वाला ही सफल कहलाता है. (ग) आध्यात्मिक विद्वानों का कहना है कि जो सांसारिक वस्तुओं से ऊपर उठकर सोचता है, वही सफल है. जो अपनी इच्छाओं पर नियन्त्रण कर लेता है, वही सफल है. (घ) किन्तु असली सफलता किसे मानी जाय ? सफलता तो वस्तुतः एक तुलनात्मक स्थिति है. जिससे आप तुलना करते हैं, आपकी सफलता उसी पर निर्भर करती है. (ङ) आपके पास कितनी सम्पदा है ? यह महत्वपूर्ण नहीं है. महत्वपूर्ण तो यही है कि आपकी नियमित एवम् निश्चित् आमदनी कितनी है. आपकी नियमित आय कितनी है, यह भी उतनी महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण तो यही है कि आप अपनी आमदनी का कितना सदुपयोग करते हैं. सदुपयोग करना ही महत्वपूर्ण नहीं है, उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि आप ‘कल’ के लिए कितना बचाते हैं, कितना निवेश करते हैं.  

अपनी ही नहीं, दूसरों की सफलताओं के लिए भी उत्साहित रहें (Take Delight in the Success of Others, As Much As in One of Your Own) 

1.यह सदैव याद रखेंकि आपकी सफलता अकेले आपके कारण नहीं है, उसमें प्रत्यक्षतः एवम् परोक्षतः कई व्यक्तियों का योगदान होता है. जिन व्यक्तियों का योगदान होता है, उनके अपने-अपने निहित स्वार्थ भी होते हैं. सभी अपनी-अपनी सफलताओं के लिए कार्य करते हैं, इसलिए सम्पर्क में आने वाले हर व्यक्ति को यथोचित महत्व दें, उसके कार्यों सम्बन्धी जानकारी लेते रहें और समय-समय पर प्रोत्साहित करते रहें. कठोर परिश्रम के लिए सबसे बड़ा सम्बल प्रोत्साहन ही होता है.

2. अगर आपके पास प्रसन्नता है तो आप दूसरों को भी प्रसन्नता ही देंगे. अगर आपके पास खिन्नता है तो आप दूसरों को भी खिन्नता ही देंगे, जो आपके पास होगा, वही तो दे सकेंगे. जो आप देंगे, वही वापस ले सकेंगे. यदि आप उत्साह से भरे होंगे तो दूसरों को भी उत्साहित कर सकेंगे. मजा तो तब है, जब आप उत्साह को ब्याज सहित लौटाते रहें.

3. आप जब भी, जहाँ भी, जिससे भी मिलें, उत्साह के साथ मिलें. पहले कुशलता पूछे, फिर काम की बात करें, सामने वाले को उसके कार्यों के लिए बधाई अवश्य दें. अपनी बजाय दूसरों की कामयाबी में अधिक उत्सुकता दिखायें. बिना पूछे अपने बारे में कुछ भी न बतायें, जब भी बतायें संक्षेप में ही बतायें, जब आप दूसरों के लिए उत्साहित रहेंगे तो दूसरे भी आपके लिए उत्सुक रहेंगे.

4. जब आप दूसरों का भला चाहेंगे तो दूसरे भी आपका भला चाहेंगे. जब आप देना सीख जायेंगे, तब आपको मांगना नहीं पड़ेगा. तो देने के लिए उत्सुक रहें, लेने के लिए नहीं. आप दूसरों को क्या देंगे ? वही तो देंगे, जो आपके पास होगा. क्या आप चाहेंगे कि दूसरे आपको बिल्कुल खाली समझें ? जब आप किसी की प्रशंसा नहीं कर सकते, जब आप किसी को प्रोत्साहित नहीं कर सकते, जब आप किसी का भला नहीं चाहते, तब आप बिल्कुल खाली समझे जायेंगे,

5. यदि आप अंहकार, अधंकार, घृणा, लालच, मूर्खता, अस्वस्थता और ईर्ष्या जैसी नकारात्मक ऊर्जाओं से भरे होंगे, तब दूसरों को भी यही सब देंगे. इसलिए कुछ देने से पहले अपने आपको नकारात्मक ऊर्जाओं से मुक्त करें, सकारात्मक ऊर्जाओं से भरें. तब आप सदा उत्साहित रहेंगे, आपसे मिलने वाले भी उत्साह से भर जायेंगे. सकारात्मक ऊर्जाओं के प्रकाश से अपने आभामण्डल को सदैव प्रकाशित एवम् विकसित रखें, ताकि सम्पर्क में आने वाला हर व्यक्ति स्वतः ही प्रभावित हो उठे.

6. सफल व्यक्ति सदा उदार होता है और अहसानमन्द भी. सफल व्यक्ति सदा संवेदनशील होता है और भरोसेमंद भी. जो जितना कृतज्ञता से भरा होगा, उतना ही सफल होगा, जो सफल होगा, उसे दूसरों की सफलताओं में भी अपनी ही सफलता के दर्शन होंगे. जो दूसरों की सफलताओं के लिए उत्सुक रहेगा, वही वस्तुतः सफल हो सकेगा.

7. याद रखें, आपका नौकर भी आपकी परवाह तब तक ही करेगा, जब तक कि आप उसका ध्यान रखेंगे. दूसरे भी आपका ध्यान तब तक ही रखेंगे, जब तक कि आप उनका ध्यान रखेंगे. दूसरों के सुख-दुख में शामिल होकर तो देखिए, दूसरे भी आपकी परवाह करने लगेंगे. जब आस-पास के लोग सम्पन्न होंगे, तब ही तो आप सम्पन्न हो पायेंगे. यदि आप व्यापारी है तो आपकी बिक्री तब ही बढ़ेगी, जब आपके ग्राहकों की क्रय शक्ति बढ़ेगी,

8. हमारे विचारों से ही हमारी संवेदननायें जन्मती हैं. हमारी संवेदनशीलता से ही हमारी भावनायें बनती हैं. हम अपनी भावनाओं के आधार पर ही दूसरों से व्यवहार कर पाते है. इसलिए अपेक्षित होगा कि सर्वप्रथम हम अपनी खोज करें, स्वयम् को विकसित करें, प्रौढ़ करें, फिर दूसरों की पहचान करें. दूसरों की पहचान प्राप्त करें और आगे बढ़ते रहें. दूसरों के साथ खुशियाँ बाँटने से हमारी खुशियाँ दोगुनी हो जाती हैं.

9. आज के तकनीकी युग में तो एक दूसरे पर हमारी निर्भरता अत्यधिक बढ़ चुकी है. हमारी सफलता दूसरों की कुशलता, तत्परता और सहयोगात्मक प्रवृत्ति पर निर्भर करती है. इसलिए हमें एक दूसरे की कामयाबी की कामना करते रहना चाहिए. दूसरों की सफलताओं को अपनी सफलता के साथ जोड़कर देखना चाहिए. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दूसरों की सफलतायें सुनिश्चित होने पर ही हमारी सफलता सुनिश्चित हो सकती है.

दृष्टान्त-एक अति उत्साही व्यक्ति ने औद्योगिक क्षेत्र के बीच अपना छोटा सा ढ़ाबा चालू किया. जल्दी ही हर ग्राहक से आत्मीय सम्बन्ध बना लिए. ढाबा चल निकला. वह हर ग्राहक से उसके धन्धे के सम्बन्ध में पूछने लगा और आवश्यक सलाह भी देने लगा. अक्सर पूछता-‘कहिए साहब, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ?’ आपका काम कैसा चल रहा है ? कहीं पैसा तो नहीं फंस रहा है ? किससे बच कर रहना है ? कौनसी पार्टी कैसी है ? साथ ही सलाह भी देता रहता-‘लाभ कैसे बढ़ाया जा सकता है ? कौन-कौनसी सावधानियाँ रखनी हैं ? बिजली कटौती का मुकाबला कैसे किया जा सकता है ? श्रमिक क्या चाहते हैं ? अर्थात् सबकी हर संभव सहायता करता. इस प्रकार ढाबे पर आने वाला हर ग्राहक ढाबे को अपना ही समझने लगा. तब उसे अपने ढाबे के बारे में सोचने की आवश्यकता ही नहीं रही. सबके सहयोग से ढाबा अपने आप चलने लगा. 

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