प्रेरणादायक पॉजिटिव थॉट्स इन हिंदी-समय को ही सम्पत्ति समझिए(Time Alone is Wealth) 

प्रेरणादायक पॉजिटिव थॉट्स इन हिंदी

प्रेरणादायक पॉजिटिव थॉट्स इन हिंदी-समय को ही सम्पत्ति समझिए(Time Alone is Wealth)

1.किसी के पास कितना धन है, यह महत्वपूर्ण नहीं, उसके पास कितना समय है, यही महत्वपूर्ण है. जिसके लिए समय ही सब कुछ है, वही समय के लिए महत्वपूर्ण है. समय तो निर्बाध रूप से चल रहा है, किसी के रोकने से रूकने वाला नहीं है, जो समझता है कि उसके रूकने पर समय भी रूक जायेगा, उससे बड़ा नासमझ दूसरा नहीं है, जो अपना समय नष्ट करता है, वो अपने आपको ही नष्ट करता है.

2. समय तो सीमित है और हमारी अपेक्षायें असीमित हैं. इसलिए उपलब्ध समय के साथ समन्वय बिठा कर सीमित को असीमित में बदलना ही सफलता है. समय का सदुपयोग और उचित प्रबन्धन ही समय की बचत है. समय की बचत ही हमारा एकमात्र बैंक बैलेन्स है. हमारी सार्थकता इसी बैंक बैलेन्स पर निर्भर करती है.

3. यह सही है कि सभी को एक दिन में चौबीस घण्टे ही उपलब्ध हैं. प्रकृति इस सम्बन्ध में किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करती, न किसी को एक सैकण्ड कम देती है, और न किसी को एक सैकण्ड अधिक, किन्तु यदि आप चाहें तो अपने समय की फिजूलखर्ची को रोकते हुए अपने समय में आशातीत वृद्धि कर सकते हैं. आप दूसरों को भी अपने काम में भागीदार बनाकर उनके थोड़े-थोड़े समय को अपने समय में जोड़कर चौबीस घण्टों को असीमित घण्टों में बदल सकते हैं. अर्थात् समय को बढ़ाया जा सकता है. समय को बढ़ाने का दूसरा नाम ही सफलता है.

4. जो समय का ध्यान रखता है, समय भी उसका ध्यान रखता है. जो समय का सम्मान करता है, समय भी उसका सम्मान करता है. जो समय की बचत करता है, समय भी उसका बचाव करता है. जो समय की फिजूलखर्ची करता है, समय भी उसे रास्ते में ही खर्च कर देता है. जो समय के पीछे चलता है, समय उसे सदा के लिए पीछे ही कर देता है.

5. एक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में समय मिलता ही कितना है. जीवन के प्रथम पच्चीस वर्ष तो वह शिक्षण-प्रशिक्षण व जीवन की तैयारी में लगा देता है. व्यक्ति सामान्यतः साठ वर्ष की आयु तक ही क्रियाशील रह पाता है, इस प्रकार उसे मात्र पैंतीस वर्ष का सक्रिय जीवन ही मिल पाता है, इस अवधि का दो तिहाई कालांश तो सोने-जगने, नहाने-धोने, घूमने-फिरने, खाने-पीने और मौज-मस्ती में ही चला जाता है. जरा हिसाब तो लगाइए, जीविकोपार्जन के लिए उसे कितना कम समय मिल पाता है. अर्थात् हमारे पास समय बहुत ही कम है और जो है वह भी नितान्त ही अनिश्चित है. इस प्रकार समय अनमोल है. याद रखें, जो जितना अल्प होता है, उतना ही अमूल्य होता है.

6. जीवन तो वैसे ही बहुत छोटा और अनिश्चित होता है. फिर अपने अमूल्य समय को निरर्थक एवम् अनुत्पादक कार्यों में खर्च कर देने का क्या औचित्य है. याद रखें, आज का युग तो प्रतियोगिता का युग है. अब ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा, जहाँ प्रतियोगिता न हो. हर प्रतियोगिता के लिए निश्चित रूप से समय ही सबसे बड़ी कसौटी है, अर्थात् समय ही सबसे बड़ी सम्पत्ति है. 

7.समय की बचत की दिशा में सृष्टि के आरंभ से ही नये-नये प्रयोग होते रहे हैं, मानव सभ्यता के विकास का प्रमुख कारण भी यही रहा है. आज तो आधुनिक तकनीक की मदद से बहुत अधिक समय बचाया जा सकता है, और आने वाले समय में तो समय को बचाने की दिशा में बहुत बड़ी क्रान्ति होने वाली है, अर्थात् हम आधुनिक तकनीक के माध्यम से अपने समय की बचत करते हुए बचे हुए समय को अन्य सृजनात्मक कार्यों में लगा सकते हैं. समय की उपलब्धता ही हमारी सफलता है.

8. देखा जाय तो जीवन केवल कुछ उपयुक्त क्षणों का योग मात्र है. समय ही हमारी बिसात है और समय ही हमारी थाती है. लेकिन हम प्रायः अपना कीमती समय दूसरों की बुराई, व्यवस्था की आलोचना और अहम् की लड़ाई में ही बर्बाद कर देते हैं. व्यर्थ की बातों से बचने पर हम कितने तरोताजा और ऊर्जावान होते हैं, इसका अनुमान अनुभव में उतरने पर ही लगा सकते हैं. इसलिए बातूनी बनना, फालतू की पंचायत करना, फटे में टांग फंसाना और व्यर्थ की बहस में अपना वक्त एवम् अपनी ऊर्जा लगाना छोड़ कर तो देखिए, आपको समय की कमी कभी नहीं रहेगी.

9. याद रखें, किसी पूजा स्थल या देवालय पर जाकर पूजा अर्चन करने से तन, मन, धन, स्थान और समय का अपव्यय ही होता है. पूजा पाठ की बजाय स्वाध्याय, व्यायाम, प्राणायाम, योगादि करिए और सदैव मानसिक, शारीरिक एवम् आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ्स रहिए. स्वस्थ रह कर ही आप समय का सही उपयोग कर सकते हैं और सफलता अर्जित कर सकते हैं.

दृष्टान्त- एक सन्त ने प्रवचन के दौरान बताया कि समय अनमोल है. समय के बदले मन चाही कीमत वसूली जा सकती है, प्रवचन सुनने के बाद एक अनाड़ी बाजार में जाकर बैठ गया और आने-जाने वालों से कहने लगा-‘मेरा समय बड़ा कीमती है, किन्तु मैं बहुत ही सस्ते में देने के लिए तैयार हूँ. जिसको भी चाहिए, घण्टों के हिसाब से बुक करवा सकते हैं. लोगों ने उसे पागल समझा. कुछ ने उत्सुकतावश पूछ लिया-‘तुम्हारे समय का हम क्या करेंगे ?’ अनाड़ी ने जवाब दिया-‘आप कुछ भी कर सकते हैं. जब आप खरीद लेंगे तो समय आपका हो जायेगा.’ पर अफसोस कि अनाड़ी का एक भी घण्टा नहीं बिका, अनाड़ी वापस संत के पास पहुँचा और गुस्से में अपनी समस्या रखी. संत ने हँसते हुए समझाया-‘वक्त तो ब्लैंक चैक है उस पर श्रम की कलम और विचारों की स्याही से धन राशि लिखनी पड़ती है. तब ही समय की कीमत मिल पाती है.’ 

प्रेरणादायक पॉजिटिव थॉट्स – समय के साथ कदम मिलाइए (Keep Pace with The Changing Time)

1.यदि हम समय के साथ नहीं चल पायेंगे, तो पिछड़ जायेंगे. समय तो अपनी ही गति से चलता रहता है. समय किसी का इन्तजार नहीं करता. इसलिए हमें भी अपने अनुकूल समय का इन्तजार न करते हुए तत्काल कार्य आरम्भ कर देना चाहिए. यदि हम अनुकूल समय का इन्तजार करते रहेंगे तो तिथि बाह्य (Out Dated) हो जायेंगे. अनुकूल समय शायद ही आ पाये. किसी के साथ भले ही हम न चल सकें, पर वक्त के साथ तो चलना ही पड़ेगा. अन्यथा पछताने के अलावा कुछ भी नहीं बचेगा.

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2. याद रखें, हर क्षण नया क्षण होता है और हर नया क्षण नयी संभावनायें लेकर आता है. वक्त के साथ व्यक्ति की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवम् दार्शनिक मान्यताओं में परिवर्तन होता रहता है, इसलिए हमें हवा के रूख के अनुसार ही ढलना पड़ेगा. वक्त के अनुसार ही चलना पड़ेगा.

3. यह कहना भी गलत होगा कि आज का वक्त बड़ा खराब है. वस्तुतः समय कभी खराब नहीं होता, व्यक्ति ही अच्छा या बुरा हो सकता है. व्यक्ति ही अपने समय को अच्छा या बुरा बना सकता है. परिस्थितिवश जो समय किसी एक के लिए अच्छा हो सकता है, वही दूसरे के लिए बुरा हो सकता है. याद रखें, बुरा वक्त तब ही आता है, जब व्यक्ति वक्त के साथ चल नहीं पाता है.

4. यह कहना भी गलत होगा कि आज का समय काफी तेज दौड़ रहा है. समय की गति तो वही है, किन्तु आज का आदमी काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है. नित नयी तकनीक आ रही है. नये-नये आविष्कार हो रहे हैं. नये-नये चमत्कार हो रहे हैं. सूचना एवम् संचार के क्षेत्र में तो बहुत बड़ी क्रान्ति आ चुकी है. निकट भविष्य में बहुत कुछ होने वाला है. इसलिए यदि हमें सफल होना है तो आधुनिक तकनीक को आत्मसात करना ही पड़ेगा.

5. जिस प्रकार हमारे दिमाग में वे ही विचार विद्यमान रहते हैं, जिनका कि हम उपयोग करते रहते हैं, उसी प्रकार हमारे साथ भी वे ही क्षण जुड़ जाते हैं, जिनका कि हम सदुपयोग कर पाते हैं. अपने आपको इतना व्यस्त रखो कि अफसोस करने के लिए वक्त ही न मिले. समय के साथ इस कदर चलो कि फालतू बातों के लिए वक्त ही न मिले. कहा जाता है कि समय का सिर ढका रहता है और पैरों में पंख लगे होते हैं. यही कारण है कि हम समय को पहचान नहीं पाते हैं. पहचानने के प्रयास करते हैं, तब तक समय उड़ जाता है. इसीलिए कहा जाता है कि समय को सामने से नहीं पकड़ा जा सकता. यह सही है कि समय को सामने से नहीं पकड़ा जा सकता, किन्तु पीछे से तो पकड़ा ही जा सकता है. पीछे से पकड़ने का अर्थ यह नहीं है कि समय को निकलने का समय दे दिया जाय.

6. आप सबको धोखा दे सकते हो, पर खुद को नहीं दे सकते. आप खुद को भी धोखा दे सकते हो, पर वक्त को नहीं दे सकते. आप वक्त को भी धोखा दे सकते हो, कभी इस धोखे में मत रहना. आप तन को पकड़ सकते हो, पर मन को नहीं पकड़ सकते. आप मन को भी पकड़ सकते हो, पर क्षण को नहीं पकड़ सकते. आप क्षण को भी पकड़ सकते हो, कभी इस अकड़ में मत रहना.

7. “समय तो नदी का पानी है, जो निरन्तर बह रहा है. पानी तो वक्त की कहानी है, जो सागर कह रहा है.’ याद रखें, इस जगत में समय की गति सबसे तेज है. समय के जिस अंश का हम उपभोग कर लेंगे, वही हमारा होगा. सूर्य के प्रकाश के साथ ही कुछ पल हमें ऐसे भी मिलते हैं, जब हम अपनी नकारात्मक स्थिति को सकारात्मक स्थिति में परिवर्तित करने के लिए सक्षम होते हैं. ऐसे क्षणों को यदि हम पकड़ते चलेंगे तो सफलता की ओर बढ़ते चलेंगे.

8. हमें अपना खान-पान, रहन-सहन, अपने आचार-विचार, आर्थिक और भौतिक संसाधन समय के अनुसार बदलते रहना चाहिए. ज्ञान-विज्ञान, घर-दुकान, व्यापार-व्यवसाय आदि में समय के अनुसार बदलाव करते रहना चाहिए. हमें अपने हर कार्य एवम् गतिविधि में नवाचारों को अपनाना चाहिए, ताकि हम समय के साथ चल सकें.

9. पहले पुरूषों और महिलाओं के कार्य बंटे हुए थे, किन्तु अब ऐसा नहीं है. अब तो महिलायें भी पुरूषों के लगभग सभी कार्य करने लगी हैं. दुनिया जिस गति से आगे बढ़ रही है, उसके लिए यह आवश्यक भी है. आज जिस गति से महँगाई बढ़ती जा रही है, सुख-सुविधाओं में वृद्धि होती जा रही है, जीवन स्तर को बनाये रखने के लिए आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता बढ़ती जा रही है, उसी गति से आमदनी भी बढ़ानी पड़ रही है. और यह तब ही संभव है, जब परिवार के स्त्री-पुरूष एवम् कार्य करने योग्य सभी सदस्य कमाऊ सदस्य हों.

दृष्टान्त- एक छोटे शहर में एक व्यापारी का जनरल स्टोर था. व्यापारी थोड़ा दूरदर्शी था. ग्राहकों की सुविधा के लिए हर संभव प्रयास करता रहता था. दुकान के बीच में खाली स्थान सृजित करते हुए उसने दुकान को डिपार्टमेण्टल स्टोर में बदल दिया. काउण्टर पर कम्प्यूटर लगा दिया. सभी वस्तुओं के बिल कम्प्यूटर से निकलने लगे. ग्राहक दुकान में आराम से घूमते और आवश्यकतानुसार उपभोग की वस्तुएं टोकरी में डालते रहते. काउण्टर पर बिल बनते और पैसे जमा होने लगे. एक कौने में वाटर कुलर लगा दिया. डिस्पोजएबल गिलास रख दिये. ग्राहकों को शीतल जल मिलने लगा. टी.वी. व म्यूजिक सिस्टम भी दुकान में लगा दिया. स्टोर को पूरी तरह एयर कण्डीशन्ड कर दिया. बच्चों के लिए विड़ियो गेम्स व टॉफियों की निःशुल्क व्यवस्था कर दी गई. खुशनुमा माहौल बना दिया गया. दुकानदार एवम् सेल्समेन की ड्रेस, बोलचाल एवम् व्यवहार में आधुनिकता झलकने लगी. वस्तुओं की दरें भी बाजार की तुलना में वाजिब रखी गईं. अच्छी कम्पनियों की अच्छी वस्तुएं ही रखी जाने लगी. धीरे-धीरे ग्राहकों की संख्या बढ़ने लगी. दरें कम होते हुए भी बिक्री अधिक होने से मुनाफा अधिक होने लगा. कम्प्यूटर द्वारा बिल बनने से ग्राहकों ने दरें कम करवाना छोड़ दिया. सामान भी नकद में ही बिकने लगा. यह सब समय के साथ कदम मिलाने का ही परिणाम था.

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