Inspiration stories-जिम्मेदारी 

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बात उस समय की है जब हजरत उमर खलीफा थे। उन्हान ओहदेदारो को आदेश दे रखे थे कि जब भी रियाया का कोई आदमी काम लेकर  उनके पास आए तो उसके काम को तुरंत पूरा किया जाए। एक दिन इशरत नाम के घर शुक्रवार के दिन मध्यरात्रि में एक आदमी आया। उसके द्वारा घर का दरवाजा खटखटाए जाने पर मंत्री ने कह दिया कि इतनी रात को वह बाहर आने से मजबूर हैं। उसने इसके लिए क्षमा मांगी और उससे निवेदन किया कि कल दिन में वह कभी भी आ जाएं।

उस व्यक्ति ने हजरत उमर से दूसरे दिन उस मंत्री की शिकायत कर दी। खलीफा ने सुना तो नाराज होकर उन्होंने उस मंत्री से जवाब तलब किया। इशरत ने नम्रता से जवाब दिया, “हुजूर! अल्लाह गवाह है कि आज तक मैंने किसी को निराश नहीं किया, लेकिन कल जुम्मा था और मजबूरी के कारण मुझे वापस लौटना पड़ा।” 

“तुम्हारी क्या मजबूरी थी, जरा हम भी तो जानें?” खलीफा ने कहा। 

“मेरी मजबूरी को मुझ तक ही रहने दीजिए, हुजूर! अगर बताऊंगा तो मेरे जीवन का राज खुल जाएगा।” 

तुम एक जिम्मेदार मंत्री हो। रियाया का ख्याल तुम्हें रहना ही चाहिए। किसी भी राज्य कर्मचारी का राज, राज नहीं रहना चाहिए, उसे बयान करना ही चाहिए।” इशरत ने कहा, “हुजूर! हफ्ते के छह दिन मैं काम में बहुत ही व्यस्त रहता हूं। जुम्मे की रात को समय निकालता हूं। मेरे पास कपड़ों का एक ही जोड़ा है और उसे जुम्मे की रात को धोता हूं। इस हालत में मैं बाहर कैसे आ सकता था? फिर इबादत भी करनी होती है, उसके लिए भी समय नहीं मिलता। मेरा राज बस यही था।

हजरत ने सुना तो गद्गद हो गए। उनकी आंखों से आंसू बह निकले। उन्होंने खुदा का शुक्र अदा किया कि उनके राज्य में ऐसे भी मंत्री मौजूद हैं, जो अपनी जिम्मेदारी खूब समझते हैं। न तो ये जनता के प्रति गाफिल हैं और न खुदा को भूलते हैं, बल्कि सरकारी खजाने से एक पैसा लेना भी गुनाह समझते हैं। 

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