अभिनव कृषि तकनीकें पर निबंध

अभिनव कृषि तकनीकें 

अभिनव कृषि तकनीकें 

भारत एक कृषि प्रधान देश है और एक कृषि प्रधान देश होने के कारण हमारे यहां उन्नत कृषि को वरीयता दी जा रही है और इसक लिए प्रयास भी किये जा रहे हैं। देखने को यह मिल रहा है कि अक्सर उन्नत कृषि में भारतीय खेती का परम्परागत स्वरूप अवरोधक की भूमिका निभाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय कृषि को एक प्रौद्योगिकी के रूप में विकसित किया जाए और इसके लिए अभिनव कृषि तकनीकों को अपनाया जाए। यह कृषि की एक आधुनिक व नूतन अवधारणा है कि भारतीय कृषि में नव प्रयोगों की शुरुआत की जाए। पिछले कुछ समय में इन नव प्रयोगों का सूत्रपात भी हुआ है। 

अभिनव कृषि तकनीकों के तहत उन्नत पैदावार के लिए जैव कृषि यानी हरी खाद का प्रयोग ज्यादा कर हम लाभान्वित हो सकते हैं। यह प्राकृतिक रूप से भूमि को पोषण प्रदान करती है और रासायनिक उर्वरकों की भांति भूमि को क्षति भी नहीं पहुंचाती। वस्तुतः फलीदार पौधों की मूल ग्रंथियों में होने वाले नाइट्रोजन यौगिकरण की क्रिया से प्राप्त होने वाली नाइट्रोजन निवेश की व्यवस्था नाइट्रोजन उर्वरक का एक आकर्षक वैकल्पिक प्राकृतिक स्रोत है, जो कि अकार्बनिक नाइट्रोजनी उर्वरकों की तुलना में अधिक टिकाऊ होता है। जैव स्रोतों, मसलन कृषि अवशेषों व गोबर आदि का प्रयोग कर हम प्राकृतिक रूप से भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ा सकते हैं तथा अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते हैं। इसी क्रम में हमें जैव उर्वरकों के प्रयोग को भी प्रोत्साहन देना होगा, क्योंकि जीवाणु बहुत हद तक भूमि की उपजाऊ क्षमता को बढ़ाने में योगदान देते हैं। इन्हें उपजाऊ मिट्टी का महत्त्वपूर्ण अवयव माना जाता है। ये न सिर्फ मिट्टी की संरचना के विकास में योगदान देते हैं, बल्कि पोषक तत्वों को भी बढ़ाते हैं। महत्त्वपूर्ण जीवाणु की उपस्थिति यदि मृदा में नहीं होती है, तो उसकी उर्वरा शक्ति क्षीण हो जाती है और यह निहायत जरूरी हो जाता है कि मिट्टी की जीवंतता को बढ़ाने के लिए उसमें उस आवश्यक जीवाणु का प्रवेश करवाया जाए। अच्छे व महत्त्वपूर्ण जीवाणुओं का प्रवेश मृदा में करवा कर उसमें मौजूद रहने वाले घटिया जीवाणुओं को हटाया जा सकता है। 

अच्छी पैदावार के लिए हमें जैव उर्वरकों के प्रयोग को बढ़ावा देना होगा। मृदा की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए हमें उन जीवाणुओं पर ध्यान देना होगा, जो कि मृदा की सेहत को सुधारने का काम करते हैं। इन जीवाणुओं को उपयुक्त बीजों में वाहक पदार्थों द्वारा रोपित कर जैव उर्वरक के रूप में काम में लाया जा सकता है, जिससे भूमि का स्तर सुधरता है और फसल का भी। जैव उर्वरक, रासायनिक उर्वरकों की तुलना में अधिक लाभदायी होते हैं। जैव उर्वरकों की यह विशिष्टता होती है कि जब ये एक बार खेत को व्यवस्थित कर देते हैं, तो बार-बार इन्हें डालने की जरूरत नहीं होती है, जबकि रासायनिक उर्वरकों के साथ ऐसा नहीं होता है। जैव उर्वरकों का एक लाभ यह भी है कि ये पौधों की जड़ों को रोगों से भी बचाते हैं। जबकि रासायनिक उर्वरकों में यह क्षमता नहीं होती है, क्योंकि वे निर्जीव होते हैं। रासायनिक उर्वरकों को जहां पर्यावरण की दृष्टि से हानिकारक माना गया है, वहीं जैव उर्वरक पर्यावरण के अनुकल माने जाते हैं। 

अभिनव कृषि तकनीकों के तहत जैव पीड़क कीट नियंत्रण को भी काफी कारगर माना गया है। यह विधि पर्यावरण के भी अनुकूल रहती है। वस्तुतः प्रकृति में पीड़कों के शत्रु भी पाए जाते हैं, किंतु वे इसलिए असर नहीं दिखा पाते, क्योंकि आधुनिक कृषि उत्पादन पीड़कों की वृद्धि को प्रोत्साहित करता है। जैव कीटनाशक नियंत्रण का उद्देश्य एक ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र को तैयार करना है, जो कि पीड़कों के समुदाय के जीवित बचे रह पाने के अवसरों को जैव अभिकर्ताओं के माध्यम से कम कर दे। जैव अभिकर्ताओं का प्रयोग इस तरह से करना चाहिए कि वे पीड़क विशेष को ही नष्ट करें तथा आस-पास के अन्य जीवों को कोई नुकसान न पहुंचाएं। रासायनिक कीटनाशकों के दुष्प्रभावों से हम-आप सभी परिचित हैं। ये पर्यावरण को तो क्षतिग्रस्त करते ही हैं, उन जीवों को भी अपना ग्रास बना लेते हैं, जिन्हें हम नहीं मारना चाहते। जैव पीड़क कीट नियंत्रकों के साथ ऐसा खतरा नहीं रहता है। ये वातावरण में अधिक समय तक बने भी नहीं रहते हैं और कुछ समय बाद स्वतः नष्ट हो जाते हैं। पारिस्थितिकी संतुलन की दृष्टि से जैव पीड़क कीट नियंत्रण को रासायनिक नियंत्रण की तुलना में बेहतर विकल्प माना गया है। अतः उन्नत कृषि व मरक्षित कृषि की दृष्टि से जैव पीड़क कीट नियंत्रण को अपनाकर हम लाभान्वित हो सकते हैं। 

नाइट्रीकरण निरोधकों को अपना कर हम जहां नाइट्रोजनी उर्वरकों के खतरों को कम कर सकते हैं, वहीं अच्छी पैदावार भी प्राप्त कर सकते हैं। नाइट्रोजनी उर्वरकों के बढ़ते प्रयोग से नाइट्रोजन रूपान्तरण की समस्या कृषि क्षेत्र में बढ़ी है। इसके निक्षालन से जहां भूमिगत जल दूषित होता है, वहीं इसके वाष्पन से वायुमंडल में अमोनिया की मात्रा बढ़ती है। इस प्रकार हमारे पर्यावरण को क्षति पहुंचती है। इस क्षति को नाइट्रीकरण निरोधक से कम किया जा सकता है। इसके लिए हमें जैव निरोधकों को प्रोत्साहित करना होगा। 

उन्नत कृषि का एक उत्तम विकल्प सौर कृषि भी है। प्रचुर धूप हमारे देश की एक प्राकृतिक देन है, जो सौर कृषि में अत्यंत सहायक सिद्ध हो सकती है। यह हमारी खुशकिस्मती है कि हमारे देश में प्रतिवर्ष आपतित सौर विकिरण की मात्रा 60×1013 MWh है और देश के अधिकांश भागों में सालाना 250 से 300 दिन पर्याप्त धूप रहती है। यानी कृषि कार्यों हेतु इस संसाधन के दोहन की अपार संभावनाएं हैं। इस बात की विशाल गुंजाइश है कि प्रकाश संश्लेषण की कुशलता को बढ़ाकर संश्लेषित जैव पदार्थों की मात्रा और उपयोगिता में वृद्धि की जा सकती है। सौर ऊर्जा का जैविक उपयोग केवल प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से ही हो सकता है। इसे विकसित कर हम कृषि की प्रगति व ऊर्जा संरक्षण की दिशा में महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कर सकते हैं। भू-जल को खींचने में भी यह ऊर्जा उपयोगी साबित हो सकती है। वस्तुतः सौर ऊर्जा एक विकेन्द्रीकृत ऊर्जा तंत्र है, जो भारतीय समुदाय के लिए अत्यंत उपयोगी है। भोजन पकाने, पानी गरम करने, वायु तापन, फसलों को सुखाने आदि में तापीय रूपान्तरण के जरिये इस ऊर्जा का बेहतर उपयोग सुनिश्चित किया जा सकता है। पम्पों आदि को चलाने में भी यह ऊर्जा प्रयुक्त हो सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों में पीने तथा सिंचाई के पानी के लिए ‘सौर फोटो वोल्टेक’ बेहद उपयोगी साबित हो रहे हैं। 

कृषि क्षेत्र में गोबर गैस के प्रयोग को बढ़ाकर हम ऊर्जा की दृष्टि से आत्मनिर्भर बन सकते हैं। इसका दोहरा लाभ है। कृषि क्षेत्र में ऊर्जा की जरूरतें तो इससे पूरी ही होती हैं, गैस निकलने के बाद बचे हुए पदार्थों का उपयोग हम खाद के रूप में भी कर सकते हैं। ऊर्जा संरक्षण की दिशा में गोबर गैस का प्रयोग अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। गोबर गैस मुख्यतः मीथेन होती है। डाइजेस्टरों में गोबर, लकड़ी, पुआल, अखबारों की रद्दी तथा प्राकृतिक कार्बनिक पदार्थों को डालकर इसका निर्माण किया जा सकता है। इसकी उपयोगिता को हम इसी से समझ सकते हैं कि इस गैस का प्रयोग भोजन पकाने, प्रकाश व्यवस्था करने, तथा अन्य ऊर्जा संबंधित जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जा सकता है। यहां तक कि इससे ट्यूबवेल भी चलाए जा सकते हैं। गोबर गैस बनाने के बाद बचे अवशेषों में नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटैशियम की अच्छी मात्रा पाई जाती है तथा इन्हें खेतों में डालने से उपज बढ़ती है। इनमें महत्त्वपूर्ण जीवाणु पाए जाने के कारण ये अवशेष अच्छे जैव उर्वरकों का भी काम करते हैं और प्राकृतिक रूप से भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते हैं। यह सुखद है कि बायो गैस ऊर्जा के व्यापक सामाजिक लाभों को दृष्टिगत रखते हुए हमारे देश में ‘राष्ट्रीय बायो गैस विकास योजना’ का सूत्रपात किया जा चुका है। 

कृषि जगत की अभिनव कृषि तकनीकों की दृष्टि से पवन ऊर्जा की उपादेयता को भी नकारा नहीं जा सकता। यह ऊर्जा प्राप्त करने का एक नवीकरणीय विकल्प है, जो कि कृषि क्षेत्र में बेहद उपयोगी साबित हो सकता है, बशर्ते इसका सुचारु और योजनाबद्ध तरीके से प्रयोग किया जाए। पवन ऊर्जा को यांत्रिक व विद्युत ऊर्जा में रूपान्तरित कर हम इससे लाभान्वित हो सकते हैं। सिंचाई के लिए तो पवन चक्कियां विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं, क्योंकि ये भू जल को खींचती हैं। इससे चलाये गये टर्बाइन बिजली भी पैदा करते हैं। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार प्रायः द्वीपीय और केंद्रीय भारत के कई स्थानों में वार्षिक पवन घनत्व 3 KWH/m-/दिन से भी अधिक हो जाता है। कुछ क्षेत्रों में जाड़ों में, जबकि ऊर्जा की आवश्यकता अधिक होती है यह 10 KWH/m/दिन से भी अधिक हो जाता है। ये स्थितियां हमारे अनुकूल है, जिनका प्रयोग कृषि में कर हम आगे बढ़ सकते हैं। यह सुखद है कि देश के कुछ क्षेत्रों में कृषि की अभिनव तकनीकों का प्रयोग किया जाने लगा है। यानी हम कृषि में नव प्रयोगों की तरफ ध्यान दे रहे हैं और ऐसा करके ही हम न सिर्फ खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकते हैं, बल्कि उन्नत कृषि का परचम भी विश्व में लहरा सकते हैं। 

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