मोटिवेशनल कोट्स इन हिंदी फॉर सक्सेस-जानकारी ही व्यक्ति की एकमात्र स्थायी सम्पत्ति है

मोटिवेशनल कोट्स इन हिंदी फॉर सक्सेस

मोटिवेशनल कोट्स इन हिंदी फॉर सक्सेस-जानकारी ही व्यक्ति की एकमात्र स्थायी सम्पत्ति है (Knowledge is The Only Prepetual Asset of An Individual) 

1.प्रत्येक भौतिक पदार्थ अन्ततः अपना स्वरूप खोता है, किन्तु ‘ज्ञान’ न कभी नष्ट होता है, न कुरूप होता है. पदार्थ को चुराया जा सकता है, छीना जा सकता है, किन्तु ‘ज्ञान’ को न चुराया जा सकता है, न छीना जा सकता है. ‘ज्ञान’ ही एक ऐसा मित्र है, जिस पर कभी अविश्वास नहीं किया जा सकता. ‘ज्ञान’ ही व्यक्ति का अभिन्न मित्र है, ज्ञान ही व्यक्ति का चरित्र है.

2, भौतिक सम्पदा यदि कम होती है, तो होने दें. ‘ज्ञान’ को कम न होने दें. ज्ञान रहेगा तो आप कई गुना सम्पदा पुनः अर्जित कर लेंगे. इसलिए अगर कुछ भी खोता है, खोने दें, मगर ‘ज्ञान’ को न खोने दें. ध्यान रहे, ज्ञान रहेगा तो कुछ भी नहीं खोयेगा. इसलिए लगातार ज्ञान में अभिवृद्धि करते चलें. तर्क और ज्ञान के साथ यदि रचनात्मकता को भी जोड़ दिया जाय तो आपकी सफलता सबसे अलग ही होगी.

3. भौतिक सम्पदा तो आज है, कल नहीं रहेगी, किन्तु जानकारी ऐसी सम्पदा है, जो आज भी है और कल भी रहेगी. विशिष्ट एवम् तकनीकी जानकारी सदा आपके साथ रहती है. कैसी भी परिस्थिति हो, आप अपनी जानकारी के आधार पर कहीं भी अपना स्थान बना लेंगे. जितनी जानकारी बढ़ाते चलोगे, उतने ही लाभ में रहोगे. साथ ही यह भी याद रखें, जितना आप काम करते चलेंगे, उतनी ही जानकारी अर्जित करते चलेंगे. सही और स्थायी जानकारी तो वस्तुत: काम करने पर ही प्राप्त होती है.

4. किसी भी व्यवसाय, कार्य अथवा सेवा में सफलता पूर्वक कार्य करते रहने के लिए तत्सम्बन्धी जानकारी का होना जरूरी है, जितनी अधिक जानकारी होगी, उतनी ही आपकी पकड़ मजबूत होगी, जितनी पकड़ मजबूत होगी, उतनी ही मेहनत फलीभूत होगी. समुचित जानकारी के बिना किसी भी कार्य में श्रम, समय एवम् संसाधन लगाना समझदारी नहीं है.

5. अपने मूल कार्यों के साथ-साथ अन्य व्यावहारिक विषयों के सम्बन्ध में भी अपेक्षित जानकारी अर्जित करते चलें. आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा. हर क्षेत्र में आपका वर्चस्व बढ़ेगा. याद रखें, आपकी जानकारी ही आपकी सबसे बड़ी अच्छाई है और आपकी नासमझी ही सबसे बड़ी बुराई है. जानकारी के जादू से आप अपनी बड़ी से बड़ी बुराई को भी अच्छाई में बदल सकते हैं. जानकार व्यक्ति के छोटे-मोटे दोषों को लोग सहज ही नजरअंदाज कर देते हैं.

6. सीखने के लिए बच्चों जैसे सरल एवम् सहज बनो, वरना ‘ज्ञान’ का अपमान होगा. यदि मन में निर्मलता और आँखों में उत्सुकता हो तो सीखना आसान होगा. सीखने के लिए कान, नाक, आँख, जीभ और त्वचा के साथ-साथ अपने दिल और दिमाग को भी खुला रखें. जितनी अधिक जानकारी होगी, उतनी ही आत्मशक्ति मजबूत होती चली जायेगी. जानकारी आपको निर्भयता, आत्मनिर्भरता एवम् निपुणता से भर देगी. तब सफलता तो स्वतः ही मिलती चली जायेगी.

7. जानकार व्यक्ति कभी भटकता नहीं है, दूसरों को भी भटकने से बचाता है. सच तो यही है कि यह जगत जानकारी के आधार पर ही आगे बढ़ता चला जाता है. कहा जाता है कि जो दूसरों को जानता है, वही शिक्षित है और जो स्वयम् को जानता है, वही बुद्धिमान है. इसलिए सबके साथ-साथ स्वयम् को भी जानने के प्रयास करते रहें.

8. कानून का सम्बन्ध तुच्छ बातों से नहीं होता. वस्तुत: कानून हमारे ‘सामान्य ज्ञान’ पर ही आधारित होता है, किन्तु यह भी सच है कि ‘सामान्य ज्ञान’ कभी सामान्य नहीं होता. ‘सामान्य ज्ञान’ सामान्यतः असामान्य व्यक्तियों के पास ही मिल सकता है. अर्थात् सामान्य ज्ञान तो ‘असामान्य’ के हाथों बिका होता है. इसीलिए वकीलों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती चली जा रही है.

9. जानकारी की कोई सीमा नहीं होती. फिर एक नितान्त इकलौती छोटी सी जिन्दगी में बहुत ज्यादा जानकारी कर लेना भी संभव नहीं है. हमारा मस्तिष्क कोई कचरा पात्र भी नहीं है कि जो मिले, वही उसमें डालते चलें. इसलिए जो जरूरी हो, जिसके बिना काम नहीं चल सकता हो, वही जानकारी प्राप्त करते चलें. जो भी जानकारी प्राप्त करें, गहनता और गंभीरता के साथ करें. सीमित एवम् चयनित विषयों में परिपूर्ण जानकारी प्राप्त करें. सफलता का सबसे बड़ा रहस्य यही है.

दृष्टान्त- एक जहाज यात्रियों को लेकर समुद्र में चल रहा था. अचानक उसका इंजन बन्द हो गया. चालक दल के सदस्यों ने भरसक कोशिश की, किन्तु इंजन चालू नहीं हुआ. जहाज के इंचार्ज ने यात्रियों को बताया कि अब उन्हें कुछ दिन समुद्र के बीच ही रूकना पड़ेगा. दूसरे जहाज से जब तक मैकेनिक और राहत सामग्री नहीं आ जाती, तब तक हिम्मत से काम लेना होगा. खाद्य सामग्री भी कम पड़ सकती है. इस पर एक वृद्ध यात्री ने कहा-‘इंजन को तो मैं ठीक कर सकता हूँ, किन्तु पारिश्रमिक लूंगा.’ इंचार्ज ने स्वीकृति दे दी. वृद्ध व्यक्ति ने अपने बेग से एक छोटी सी हथौड़ी निकाली और इंजिन का पूरी तरह निरीक्षण करने के बाद एक स्थान पर तीन-चार बार हथौड़ी मारी और चालक से कहा ‘स्टार्ट करो,’ बटन दबाते ही इंजन स्टार्ट हो गया. इस पर सब आश्चर्यचकित रह गये. जहाज चल पड़ा. इंचार्ज के मांगने पर वृद्ध यात्री ने बिल बनाकर दिया, जिसमें दस हजार दस रुपये की राशि अंकित थी. इस पर इंचार्ज ने आश्चर्य के साथ पूछा-‘महोदय, दस रुपये का क्या तुक है ?’ वृद्ध व्यक्ति ने स्पष्ट किया-‘दस रुपये की राशि हथौड़ी मारने का पारिश्रमिक है.’ इस पर इंचार्ज ने उत्सुकतावश पूछा-‘फिर ये दस हजार रुपये ?’ वृद्ध ने आत्मविश्वास के साथ जबाव दिया-‘उस स्थान को ढूँढ़ने के लिए, जहाँ पर हथौड़ी मारी जानी थीं.’ इंचार्ज ने वृद्ध व्यक्ति की जानकारी की तारीफ की और उसे तुरन्त भुगतान कर दिया. हकीकत में वृद्ध व्यक्ति एक मैकेनिक था. अर्थात् जानकारी तो हर जगह काम आती है. 

सीखना कभी बन्द नहीं होता (Learning Never Ends) 

1.आदमी सदा इसी गलतफहमी में रहता है कि वह सब कुछ जानता है, जबकि हकीकत तो यही है कि वह खुद को भी ठीक से नहीं जान पाता है. कोई व्यक्ति यदि अपने आपको पूर्णतः ‘अज्ञानी’ मान ले तो उसके जीवन में एक अद्भुत रूपान्तरण घटित हो जायेगा और इस रूपान्तरण से ही आत्मदर्शन संभव है. आत्मदर्शन के बाद व्यक्ति बिना किसी प्रयास के ही अपेक्षित जानकारी अर्जित कर लेता है.

2. केवल शास्त्र पढ़कर या सन्त महात्माओं के प्रवचन सुनकर कोई ‘ज्ञानी’ नहीं हो सकता. पाण्डित्य प्राप्त करने से कोई ज्ञानी नहीं हो सकता. ‘ज्ञानी’ होने के लिए तो तप द्वारा स्वयम् को जानना होगा. देखा जाय तो कर्म ही तप है. कर्म की कसौटी पर अर्जित स्वानुभव ही वास्तविक एवम् व्यावहारिक ज्ञान है. व्यक्ति जितना अध्ययन एवम् मनन करता है, उतना ही ज्ञान अर्जित करता है. किन्तु कर्मरूपी तप में जितना अधिक उतरता है, उतना ही अपने आपको अल्पज्ञानी समझता है. यही समझ उसे जिन्दगी भर अधिक से अधिक सीखने के लिए प्रेरित करती रहती है.

मोटिवेशनल कोट्स इन हिंदी फॉर सक्सेस

3. समुचित शिक्षण-प्रशिक्षण हर प्रकार की परिस्थितियों का सामना करने की योग्यत सृजित करता है. इसलिए समय-समय पर अपने व्यवसाय सम्बन्धी प्रशिक्षण प्राप्त करते रहें. आधारभूत प्रशिक्षण, संस्थागत प्रशिक्षण, आमुखीकरण प्रशिक्षण आदि में सम्मिलित होते रहें. बैठकें, सेमीनार, कार्यशालाओं में समय-समय पर भाग लेते रहें. हर बार कुछ नयी, कुछ उपयोगी जानकारियाँ अवश्य मिलेंगी. अपने आपको बदलने, अपनी कार्यप्रणाली को बदलने और अपने नजरिये में बदलाव लाने के लिए शिक्षण, प्रशिक्षण, सेमीनार आदि अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होते हैं.

4. हर क्षण नया होता है. हर क्षण की अपनी चुनौतियाँ होती हैं, अपनी अपेक्षायें होती हैं. इसलिए यदि वक्त के साथ चलना है तो हर वक्त कुछ न कुछ नया सीखना ही होगा. आप जितने सीखते जायेंगे, उतने ही सफल होते चले जायेंगे. जो बौद्धिक रूप से जितना अमीर होता है, उतना ही आर्थिक रूप से सम्पन्न होता है. जो आर्थिक रूप से जितना सम्पन्न होता चला जाता है, उतना ही अधिक से अधिक सीखता चला जाता है. कहते हैं, पैसा सब कुछ सिखा देता है. जो पैसे के साथ सीखने को राजी नहीं होता, उसका पैसा भी जल्दी ही साथ छोड़ देता है.

5. यूं तो हम हर क्षण परोक्षतः कुछ न कुछ सीखते चलते हैं, किन्तु होश के साथ कहाँ सीखते हैं ? इसलिए जब भी सीखें, पूरे होश के साथ सीखें और जोश के साथ जीतें. होश और जोश भी हमारे सीखने पर ही निर्भर करता है, कुछ न कुछ सीखते चलना हमारे कार्यों का हिस्सा होना चाहिए. यदि हम अपनी जिज्ञासा को सदैव जीवित रखेंगे तो कभी सीखना बन्द नहीं होगा.

6. सीखने की अपार क्षमतायें हमारे भीतर छिपी होती हैं, जिन्हें निरन्तर अभ्यास के जरिए उजागर किया जा सकता है. तब हम हर स्थिति में, हर स्थान पर और हर उम्र में कुछ न कुछ अवश्य सीख सकते हैं. यह सही है कि हमें हमारी क्षमताओं का ठीक से पता ही नहीं होता है. पता लगाने के लिए कुछ प्रयोग किये जा सकते हैं. जैसे अपनी अभिरूचि की पुस्तकें पढ़ना, पढ़कर मुख्य बिन्दु लिखना, टी.वी. आदि पर प्रवचन सुनना, खाली समय में चिन्तन करना, नये विचारों को लिपिबद्ध करना, विभिन्न वर्गों के लोगों के समक्ष भाषण देना, अपनी जानकारियों को कार्य रूप में परिणित करना. इनमें से जिस क्षेत्र में अधिक सफलता मिले, उसी क्षेत्र में लगातार बढ़ने के प्रयास करें और अपनी क्षमताओं का भरपूर सदुपयोग करें. याद रखें आपकी क्षमतायें आपके साथ ही समाप्त हो जायेंगी.

7. निरन्तर सीखना वैसे ही है, जैसे क्षितिज की ओर बढ़ते रहना. जितना आप बढ़ेंगे, क्षितिज उतना ही दूर होता चला जायेगा. यह सही है कि आप क्षितिज नहीं छू पायेंगे, किन्तु बिना बढ़े भी तो आप क्षितिज के बारे में कुछ भी नहीं जान पायेंगे. बढ़ते रहने पर क्षितिज के बारे में बहुत कुछ जान लेंगे और जानना ही क्षितिज को छूना है.

8. किसी कार्य को जब आरम्भ किया जाता है, तब कई बार तो आधारभूत जानकारी का भी अभाव रहता है. किन्तु जैसे-जैसे कार्य आगे बढ़ता है, जानकारी का ग्राफ भी निरन्तर ऊपर चढ़ता चला जाता है. वस्तुतः व्यक्ति अपने कार्यों से ही सीखता है और सीखकर संभलने में ही सफलता है.

9. व्यक्ति में जो कुछ भी निहित है, उन निहितार्थो को फलितार्थों में बदलना ही शिक्षा का उद्देश्य होता है. शिक्षा का लक्ष्य केवल ‘ज्ञान’ नहीं, व्यावहारिक ज्ञान होना चाहिए. जिन्दगी में वही सफल होता है, जो इस व्यावहारिक ज्ञान को पकड़ लेता है. वास्तविक शिक्षा तब आरम्भ होती है, जब कोई शिक्षार्थी विद्यालय छोड़कर बाहर आता है.

दृष्टान्त-एक छोटा सा बच्चा दीपक जलाकर अंधेरे में कुछ खोज रहा था. एक महात्मा उधर से गुजर रहे थे. बच्चे के पास रुक कर महात्मा ने बड़े प्यार से पूछा-‘बेटे, बताओ, दीपक जलाने से पहले प्रकाश कहाँ था ?’ बच्चे ने बहुत ही सहज भाव से फूंकमार दीपक बुझा दिया और प्रश्न किया-‘गुरुजी, बताइए, अब प्रकाश कहाँ गया ? महात्मा थोड़ी देर के लिए निरूत्तर हो गये. महात्मा ने अचानक बच्चे के पैर छूये और बोले-‘बेटा, इस वक्त तो गुरु मैं नहीं, तू ही है. तेरे एक ही प्रश्न ने मेरी आँखें खोल दी हैं. तूने कितना बड़ा सत्य उजागर कर दिया कि यहाँ अंधेरा ही शाश्वत है. प्रकाश के आने पर हमारे आस-पास का अंधेरा थोड़ी देर के लिए छिप जाता है.’ अर्थात् किसी से भी सीखा जा सकता है. 

‘ज्ञान’ शक्ति व सफलता में बदल जाता है, जब उसे जीवन में उतारा जाता है (Knowledge is Converted Into Strength & Success When it is Applied to Life) 

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1.आप बहुत बड़े विद्वान हो सकते हैं, सबसे बड़े ज्ञानवान हो सकते हैं, किन्तु ‘ज्ञान’ का सदुपयोग तब ही संभव है, जब उसे व्यवहार में लाया जाय, इसलिए अपने अर्जित ज्ञान का अधिक से अधिक सदुपयोग करते चलें और ज्ञान को सफलता में बदलते चलें. याद रखें, ज्ञान से बड़ी कोई शक्ति नहीं है..

2. हर व्यक्ति प्रगति चाहता है, निरन्तर गति चाहता है. उसमें न केवल जिजीविषा है, अपित गौरव के साथ जीने की तत्वगत मौलिक आंकाक्षा भी है. किन्तु इसके लिए उसे अपनी प्रतिभा को बाहर लाना पड़ेगा, अपने कार्य-कलापों में अर्जित ज्ञान का सदुपयोग करना पड़ेगा. वरना ‘ज्ञान’ उस धन के समान है, जो जमा तो है, किन्तु जिस पर ब्याज नहीं मिल पा रहा है. याद रखें, जो धन बिना किसी उपयोग के जमा होता है, वह दिनों-दिन कम होता चला जाता है. इसलिए ‘ज्ञान’ को गतिशील ‘शक्ति’ में बदलते रहें.

3. ‘ज्ञान’ का सदुपयोग ही विकास है और दुरूपयोग विनाश है. ज्ञान का सदुपयोग किस प्रकार करना है, यह पूर्णतः आपकी सूझ-बूझ पर निर्भर करता है. ज्ञान ‘विकास-गंगा’ में तब ही बदल पाता है, जबकि उसका सही वक्त पर सही ढंग से उपयोग किया जाय. ‘ज्ञान’ इच्छा की आँख है, ‘ज्ञान’ व्यक्तित्व की परख है, ‘ज्ञान’ आत्मा की किश्ती है. वस्तुतः ‘ज्ञान’ ही स्वर्ग है और ‘अज्ञान’ ही नरक है.

4. ज्ञान का प्रवाह नदी के प्रवाह की तरह है, जिसे मोड़ा तो जा सकता है, किन्तु रोका नहीं जा सकता. ज्ञान का प्रवाह विद्युत् प्रवाह की तरह है, जिसे हाथों-हाथ काम में तो लिया जा सकता है, किन्तु आरक्षित करके नहीं रखा जा सकता. ज्ञान खर्चने पर बढ़ता चला जाता है और न खर्चने पर घटता चला जाता है.

5. ज्ञान के उपयोग से ही आपके गुणों की पहचान हो सकती है. सदुपयोग से सद्गुणों और दुरूपयोग से अवगुणों का आविर्भाव होता है. आनन्द तो आत्मा का गुण है, किन्तु ज्ञान रूपी प्रकाश के बिना आनन्द की पहचान भी संभव नहीं है. याद रखें, पत्थर हीरा भी बन जाता है, जब उसे ज्ञान की कसौटी पर तराशा जाता है. तराशने की कला जिसे आती है, सफलता उसी की दासी बन जाती है.

6. केवल शब्दों की पूजा करने से ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता. ‘ज्ञान’ के लिए तो गहरे में उतरना ही पड़ेगा. ‘साक्षर’ का उल्टा ‘राक्षस’ भी होता है, इसे भी याद रखना ही पड़ेगा. जब ज्ञान को व्यवहार में नहीं उतारा जाता, तब यही ज्ञान गले की फांस बन जाता है. अर्थात् प्रयोगों के माध्यम से आप जितना सीख सकते हैं, उतना पुस्तकों के माध्यम से नहीं सीख सकते. किसी कार्य के विषय में अनुभव के आधार पर ही लिखा जा सकता है, बिना अनुभव के लिखना सार्थक नहीं हो सकता. इसलिए ज्ञान को कर्म में बदलो, कर्म को अनुभव में बदलो और अनुभव से ज्ञान में अभिवृद्धि करते चलो. यही सफलता का शाश्वत मंत्र है.

7. जब तक परमात्मा की झलक न मिले, तब तक जीवन अधूरा है. जब तक जीवन में सफलता न मिले, तब तक ज्ञान अधूरा है और याद रखें, परमात्मा की झलक व्यक्तिगत अनुभव से ही मिल सकती है. अनुभव के लिए कुछ तो करना ही पड़ेगा. जीवन संग्राम में कूदे बिना अनुभव की उपलब्धि नहीं हो सकती. अनुभव की उपलब्धि के बिना यह जिन्दगी आपकी नहीं हो सकती.

8. होने का नाम जिन्दगी है, खोने का नहीं. जगने का नाम जिन्दगी है, सोने का नहीं. जरा ध्यान दें, ज्ञान की चदरिया ओढ़ कर सोने से भी क्या कभी कुछ पाया जा सकता है ? ज्ञान को व्यवहार में और व्यवहार को सफलता में बदलते चलें, ताकि लोग आपको आपके बाद भी याद रख सकें. गहराई से देखा जाय तो संसार का अर्थ होता है, ‘समय’. समय अर्थात् मन. यूँ समय और मन एक ही ऊर्जा के दो नाम हैं. इसलिए समय और मन का सदुपयोग करते चलें. अपने उपलब्ध ज्ञान को ऊर्जा में बदलते चलें. ऊर्जा को सफलता में बदलते चलें. यही आपके होने का अर्थ है.

9. ज्ञान ही सबसे बड़ी शक्ति है, यह शक्ति ही सफलता है. सफलता ही सबसे बड़ी भक्ति है, भक्ति ही सबसे बड़ी व्याकुलता है. इस व्याकुलता को कार्य-रूप में रूपान्तरित करते चलें. व्याकुलता में भी कभी होश न खोयें. यह न भूलें कि हजारों मील की यात्रा भी एक-एक कदम चल कर ही पूरी होती है. एक साथ दो कदम तो कोई उठा भी नहीं सकता. इसलिए समुचित जानकारी के साथ कदम दर कदम बढ़ाते चलें और हर कदम से कुछ न कुछ सीखते चलें.

दृष्टान्त- एक व्यक्ति नदी किनारे रहता था, किन्तु उसे तैरना नहीं आता था. उसने तैरना सिखाने वाली दो-तीन पुस्तकों का अध्ययन किया. जानकार लोगों से तमाम जानकारियाँ प्राप्त की, किन्तु तैरने का आत्मविश्वास अर्जित नहीं कर सका. छिछले पानी में तैरने का अभ्यास किया, किन्तु व्यर्थ रहा. अन्ततः वह किसी अच्छे तैराक के पास पहुँचा. तैराक उसे नदी के गहरे घाट पर ले गया और तैरने की बारीकियाँ समझाने लगा. इसी दौरान तैराक ने उसे अचानक पानी में धक्का दे दिया और देखने लगा. जिज्ञासु पानी में ऊपर नीचे होने लगा. अपने आपको बचाने का लक्ष्य ही उसके सामने था. पानी में हाथ-पैर मारने लगा और अन्ततः किनारे आ लगा. तैराक ने पकड़कर उसे बाहर निकाला. जिज्ञासु इस बार खुद ही पानी में कूद गया और आसानी से तैरने लगा. अर्थात् जानकारी को अमल में लाना जरूरी है. 

प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी बनिए (Be Owner of Impressive Personality) 

1.आपका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली हो कि आपको देखते ही या आपकी आवाज सुनते ही लोग प्रभावित हो उठे. व्यक्तित्व इतना चुम्बकीय हो कि लोग आपको बार-बार देखने एवम् सुनने के लिए लालायित हो उठे. यानी करिश्माई व्यक्तित्व के धनी बनिए, ताकि आपकी उपस्थिति ही अपने आप में एक करिश्मा हो.

2. व्यक्तित्व का सम्बन्ध उस चेतना से होता है, जो व्यक्ति के व्यवहार, आचरण एवम् मनोभावों को नियन्त्रित करती है. व्यक्तित्व का सम्बन्ध उस आन्तरिक शक्ति से होता है, जो इच्छा शक्ति, अभिरूचि, आत्मविश्वास, उत्साह एवम् सकारात्मक सोच को विकसित करती है. आपका व्यक्तित्व आपके चरित्र पर निर्भर करता है. आपका चरित्र ही आपकी पहचान है. आपकी पहचान ही आपका व्यक्तित्व है. इसलिए बस व्यक्तित्व पर ध्यान दें, सभी गुण अपने आप आपके प्रभावी व्यक्तित्व में जुड़ते चले जायेंगे.

3. सदैव प्रसन्न रहें और हर समस्या का समाधान प्रसन्नता के साथ करें, अपने आस-पास का वातावरण खुशनुमा रखें और हर क्षण का स्वागत प्रसन्नता के साथ करें, प्रसन्नता ही ईश्वर प्रदत्त वह सम्पत्ति है, जो फेफड़ों में स्वच्छ वायु का संचार करती है. स्वच्छ वायु ही दिल, दिमाग एवं शरीर को स्वस्थ रखती है. व्यक्तित्व वस्तुतः प्रसन्नता, आरोग्यता एवम् बुद्धिमता पर निर्भर करता है.

4. जैसा आपका उठना-बैठना, चलना-फिरना, सुनना-सुनाना, बोलना-गुनगुनाना, सजना-सवंरना, खाना-पीना, हास-परिहास होगा, वैसा ही आपका व्यक्तित्व होगा. जो कुछ आपके चेहरे से झलकेगा, वह आपके वस्त्र, शरीर और शब्दों से अधिक महत्वपूर्ण होगा. इसलिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर ही ध्यान केन्द्रित करें. एक प्रभावी एवम् अनुकरणीय व्यक्तित्व विकसित करें.

5. कम से कम बोलें, नपा-तुला बोलें, सारगर्भित बोलें, अधिकार पूर्वक बोलें, केवल लोगों की बुराई के लिए ही मुँह न खोलें, किसी की बुराई करके अपनी अच्छाई प्रदर्शित न करें. जहाँ तक हो सके, दूसरों की अच्छाई ही करें. यदि यह संभव न हो तो तटस्थ रहें. आपकी तटस्थता आपको कई बुराइयों से बचा कर रखती है. अच्छे श्रोता बनें. अपनी बात पर कायम रहें. जो कायम रह सके, वही बोलें. दूसरों के व्यवहार को उचित सम्मान दें. तर्क करें, किन्तु कुतर्क न करें, सदैव सतर्क रहें.

6. चिन्ता छोड़ें, चिन्तनशील बनें. मन को छोड़ें, मननशील बनें. ईर्ष्याद्वेष से ऊपर उठे, क्षमाशील एवम् विवेकशील बनें. तब आपके चेहरे पर जो आभा छलकेगी, वह स्थायी होगी, सच्ची होगी, प्रभावी होगी. छोटी-छोटी बातों को भी उतना ही महत्व दें, जितना कि बड़ी बातों को दिया जाता है. अपनी उन गलतियों से भी सीखने की आदत डालें, जिन्हें कि अक्सर भुला दिया जाता है.

7. कुछ न कुछ सीखते रहने की भूख बनाये रखने पर ही आप नयी-नयी जानकारियाँ प्राप्त कर सकते हैं. अपनी विविध जानकारी एवम् विशिष्ट कार्यशैली के कारण ही आप सबसे अलग नजर आ सकते हैं. इसलिए सदैव जिज्ञासु बने रहें. हर सफलता के बाद अगली सफलता के लिए बैचेन रहें. सोचने, समझने, समीक्षा करने एवम् प्रतिक्रिया व्यक्त करने के सबके तरीके अलग-अलग होते हैं. इसमें शरीर के तीनों भाग शरीर, आत्मा एवम् प्रवृत्ति काम करते हैं. इन सब पर आपके व्यक्तित्व की छाप होनी चाहिए. हर तरीके पर अपनी विशिष्ट शैली अपनाते हुए अपनी पहचान अलग ही बनाइए.

8. लोगों से न अधिक नजदीकी बनायें और न अधिक दूरी ही. लोगों को न अपनी कमजोरी बनने दें और न मजबूरी ही. खुद के बारे में कभी कोई गलतफहमी न पालें. दूसरों को समझने में कभी भूल न करें. याद रखें, सफलता और विफलता दो धारणायें मात्र हैं. यदि आपके व्यक्तित्व पर सफलता सम्बन्धी धारणा अधिक प्रबल हो तो आपको सफल होने से कोई रोक नहीं सकता.

9. विचारों से ही शब्द बनते हैं और शब्द ही क्रिया में ढलते हैं. क्रियायें ही आदतें बनती हैं और आदतों से ही व्यक्तित्व संवरते हैं. व्यक्तित्व को शब्दों से नही, अपने विशिष्ट कार्यकलापों से अभिव्यक्त होने दें. अपने शब्दों को बदहजमी में न बदलने दें. याद रखें, शब्दों की बदहजमी सबसे खतरनाक होती है, इसलिए शब्दों के चयन, शब्दों के प्रयोग और शब्दों के उच्चारण में पूरी सावधानी बरतें. आपके व्यक्तित्व की प्रथम झलक आपके चेहरे से छलकती है और द्वितीय झलक आपके बोलने के अंदाज से मिलती है.

निष्कर्ष- प्रभावी व्यक्तित्व का धनी वही हो सकता है 1. जो दृढ़ विश्वासी हो, पर घमण्डी नहीं हो. 2. जो स्वाभिमानी हो, पर अभिमानी नहीं हो. 3. जो नरमदिल हो, पर कमजोर न हो. 4. जो बहादुर हो, पर असभ्य नहीं हो. 5. जो दृढ़ हो, पर अड़ियल नहीं हो. 6. जो शान्त हो, पर ठण्डा नहीं हो. 7. जो जिन्दगी से प्यार करता हो, पर मृत्यु से डरता नहीं हो. 8. जो ईमानदार हो, पर संवेदनहीन नहीं हो. 9. जो चरित्रवान् हो, पर शंकालु न हो. 10. जो कम बोलने वाला हो, पर बहरा न हो. 11. जो सदैव प्रसन्न रहता हो, पर दूसरों को अप्रसन्न नहीं करता हो. 12. जो वर्तमान में जीता हो, किन्तु दूसरों का वर्तमान नहीं छीनता हो. 13. जो चिन्तनशील हो, पर चिन्ताग्रस्त न हो. 14. जिसका आभामण्ड विकसित हो, पर महिमा मण्डित न हो. 15. जो आशावादी हो, पर निरा भाग्यवादी न हो. 

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