Indian Mythological Stories in hindi-शरीर पर भस्म 

Indian Mythological Stories in hindi

Indian Mythological Stories in hindi-शरीर पर भस्म 

महर्षि भृगु के वंशज एक तपस्वी संत थे। वह अपने आत्म संयम और कठोर तपस्या के लिए जाने जाते थे। तेज गर्मी हो या बारिश… किसी का भी उनकी तपस्या पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। उनके इन्हीं गुणों के कारण सभी वनस्पति और जीव-जन्तु उनका आदर करते थे और उन्हें अपना गुरु मानते थे। भूख लगने पर जीव-जन्तु ही उन्हें कन्द मूल खाने के लिए लाकर देते थे। बाद में उन्होंने कंद-मूल का भी परित्याग कर हरे पत्ते का सेवन प्रारम्भ कर दिया। संस्कृत में पत्ते को ‘पर्ण’ कहा जाता है अतः वह संत पर्णाद के नाम से प्रसिद्ध हुए। समय के अंतराल में उन्हें घमंड हो गया और वे स्वयं को ईश्वर समान समझने लगे। अतः शिव भगवान ने उन्हें सीख देने का निश्चय किया। 

एक दिन अपनी कुटिया में लगाने के लिए लकड़ी काटते समय दुर्घटनावश उनकी बीच वाली उँगली कट गई। उँगली से रक्त की जगह एक छोटी टहनी ने निकलना प्रारम्भ कर दिया। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उन्होंने स्वयं को सांत्वना देते हुए मन ही मन में विचारा, “यह निश्चय ही चमत्कार है… मैं इतना महान और पुण्यात्मा हो गया हूँ कि मेरे शरीर में रक्त का स्थान पौधे के रस ने ले लिया है। रक्त होता तो मनुष्यों के बराबर होता। पर ऐसा नहीं है… इससे लगता है कि मैं एक दिव्य प्राणी की श्रेणी में आ गया हूँ… मुझे तो स्वर्ग में होना चाहिए।” 

शिव भगवान ने ही यह चमत्कार रचा था। उन्होंने एक वृद्ध का रूप धरा और महर्षि पर्णाद के समक्ष प्रकट हुए। प्रसन्नता से उछलते हुए संत से वृद्ध रूपधारी शिव ने पूछा, “श्रीमान्! कृपया अपनी प्रसन्नता का कारण मुझे भी बताएँ।” 

महर्षि ने उत्तर दिया, “हे महानुभाव! अभी-अभी मुझे अपनी दिव्यता की अनुभूति हुई है। मेरे शरीर में मानवों की तरह रक्त न होकर पौधे का रस है। इससे यह निश्चित हो जाता है कि मैं ईश्वर के बराबर हूँ। क्या आप जानते हैं कि मुझे यह दिव्य स्थान किस प्रकार मिला? यह सब मेरी धार्मिकता और कठिन तपस्या का परिणाम है।” 

संत की बातें सुनकर वृद्ध हँस पड़ा। उसने भौंचक्के संत को समझाते हुए कहा, “हे महानुभाव! आप कितने अबोध् और वास्तविकता से कितने दूर हैं… रक्त हो या पौधे का रस… आप तो मानव हैं जो नश्वर है। वनस्पति, जीव-जन्तु या मानव कोई भी हो… अंत में जलकर सभी भस्म में परिणत हो जाते हैं सभी बराबर हैं कोई छोटा या बड़ा नहीं है।” 

“आप यह कैसे कह सकते हैं? मैं, कुछ समझा नहीं…” संत ने पूछा। 

वृद्ध व्यक्ति ने कहा, “ठहरो, मैं अभी तुम्हें दिखाता हूँ। अपनी कुल्हाड़ी मुझे दो।” 

Indian Mythological Stories in hindi

संत से कुल्हाड़ी लेकर वृद्ध ने अपनी एक उंगली काट दी। कटी उंगली से भस्म गिरता देखकर संत के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। तब संत पर्णाद ने अनुभव किया कि वह वृद्ध और कोई नहीं साक्षात् शिव भगवान ही हैं। पर्णाद इस विचार से दुखी हो गए कि उन्होंने व्यर्थ का झूठा घमंड किया। एक संत होकर भी उन्हें अपनी नश्वरता का ज्ञान न रहा। करबद्ध हाथों से उन्होंने प्रार्थना करी, “हे प्रभु! मुझे क्षमा करें। मैंने आपसे बराबरी करनी चाही… आपके समक्ष मैं कितना तुच्छ हूँ… सब कुछ मात्र भस्म ही तो है। यही शास्वत सत्य है।” 

शिव भगवान ने कहा, “पर्णाद! तुम्हें जीवन का सत्य समझाने के लिए ही मैंने यह रूप धरा है। जो दिखता है वह विश्वास योग्य नहीं है। अपनी भक्ति बनाए रखो और मुक्ति के लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखो। तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी।” 

यह कहकर शिव भगवान अदृश्य हो गए। तभी से उन्होंने अपने शरीर पर भस्म लगाना प्रारम्भ कर दिया जिससे उनके भक्त सदा यह याद रखें कि अंत में सब कुछ भस्म ही हो जाता है।

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