भारतीय लोकतंत्रः एक वयस्क होते राष्ट्र के लक्षण । (Indian Democracy: Signs of a Maturing Nation) 

भारतीय लोकतंत्रः एक वयस्क होते राष्ट्र के लक्षण

भारतीय लोकतंत्रः एक वयस्क होते राष्ट्र के लक्षण । (Indian Democracy: Signs of a Maturing Nation) 

आज हम देखते हैं कि आतंकवाद, अलगाववाद, सांप्रदायिकता आदि के खतरों के बावजूद राष्ट्रीय एकता निरंतर मजबूत हो रही है। इसके कई संकेत नजर आते हैं। आज देश भर में लोग क्रिकेट का आनंद लेते हुए भारतीय टीम की विजय की सामूहिक कामना करते हैं जिससे लगता है कि एक काल्पनिक समुदाय की सच्चाई सही है, जिस काल्पनिक समुदाय की बात बेनेडिक्ट एंडरसन किया करते हैं। यह सामुदायिकता धीरे-धीरे विकासमान रही है। पोकरण-II ने इसी तरह का अखिल भारतीय हर्षोल्लास पैदा किया था। कारगिल युद्ध ने इसे बल प्रदान किया और इसका औचित्य दर्शाया। अगर कोई कसर बाकी रहती है तो देश में आई कोई प्राकृतिक आपदा किस तरह और किस पैमाने पर देशवासियों को एक-जुट करती है, उससे भी पता चलता है।

हमारे राजनीतिक बेहद गैर-जिम्मेवार, लापरवाह और सिद्धांतहीन हैं, पर राष्ट्रीय एकता के सवाल पर इस वर्ग में एकमतता है। राष्ट्रीय हितों पर किसी चोट या हमले से देश को बचाने के लिए पूरा राजनीतिक वर्ग एक हो आगे आकर सरक्षा कवच प्रदान करता है। ये संकेत और कछ नहीं बस एक विकासमान राष्ट की भिन्न-भिन्न अभिव्यक्तियाँ 

भारतीय समाज में बढ़ती धर्मांधता हालांकि चिंतनीय है, पर इसको लेकर आशंकाएँ बस आशंकाएँ भर हैं। यह बस प्रतिस्पर्धात्मक राजनीति के लक्षण भर हैं। महज चुनावी गोलबंदी के लिए राजनीतिक दल इसे मुद्दा बनाते हैं। क्योंकि अन्य किसी प्रभावकारी मुद्दे का अभाव दीखता है। इसलिए अनैतिक तथा बेईमान मुद्दा होते हुए भी इसका इस्तेमाल राजनीति में किया जाता है। लोग भी इन मुद्दों को लपक लेते हैं क्योंकि निराशा और विनाश के माहौल में उन्हें धार्मिकता में ही आशा या मुक्ति नजर आती है। उन्हें लगता भी है इसी से उनकी स्थिति सुधरेगी भी। एक बार संसाधन वितरण में समता प्राप्त कर ली जाती है और हमारा मानव संसाधन शैक्षिक तथा ज्ञान के स्तर पर समृद्ध हो जाता है तो ऐसी संकीर्ण राजनीति के लिए जगह बची नहीं रह जाएगी।

 हम आशा करते हैं कि एक सुविकसित तथा अधिक समत्वपूर्ण भारतीय समाज में जाति, धर्म, भाषा आदि अधिक-से-अधिक राजनीति के कई कारक हो सकते हैं, वे राजनीतिक छल-कपट बढ़ाने वाले विषय नहीं रह जाएँगे, आज की तरह। बुद्धिजीवियों का एक वर्ग देश में दक्षिणपंथी संगठनों के बढ़ते प्रभाव को लेकर सशंकित है। पर सवाल है कि कोई इस बारे में कर ही क्या सकता है? क्या वैसे संगठनों पर प्रतिबंध लगाना या उनकी राजनीतिक शैली पर प्रतिबंध लगाना संभव है? बिल्कुल नहीं, खासकर अपने जैसे लोकतंत्र में तो नहीं। उन्हें प्रतिबंधित करना समस्या को और तीखा बना देगा। किसी ने किसी अन्य के बारे में ठीक ही कहा है कि उसे भीतर बुलाकर बाहर की ओर थूको, न कि उसे बाहर अपने अंदर (घर के अंदर) थूको। अतः हमारा प्रयास होना चाहिए कि वे व्यवस्था के अंग बन जाएँ। वैसे विशालयकाय संगठनों को यदि सकारात्मक कार्यों में लगाया जाए, तो वह एक राष्ट्रीय संपदा साबित होंगे। यदि इसकी सदस्यता भारतीय समाज के सभी अवयवी अंगों का प्रतिनिधित्व करे तो और भी अच्छा होगा और राष्ट्र निर्माण में एक और कदम साबित होगा। लेकिन तब इसके लिए उक्त संस्था को स्वयं का पुनराविष्कार करना होगा। 

देश की दक्षिणपंथी पार्टियों को लेकर जो आशंकाएँ हैं, वे अपनी जगह पर हैं। परंतु उन पार्टियों ने अपनी राजनीति की शैली और विशेषताओं/लक्षणों में काफी परिवर्तन किया है क्योंकि वे सीख गए हैं कि टकराव की राजनीति व्यापक भारतीय समाज के गले नहीं उतरेगा और वे बहुत आगे तक अपनी राजनीति को नहीं बढ़ा पाएँगे। जिस प्रकार भारतीय समाज हाल में आकर ध्रुवीकृत हुआ है, उसमें कोई एक दल अपने बलबूते सरकार नहीं बना सकता। भाजपा जैसी पार्टी के लिए कोई भी इसके पास तक नहीं फटकेगा जब तक कि यह अपनी अतिवादी राजनीतिक शैली तथा विचारधारा को फीका नहीं कर लेगी। अपनी इसी परिवर्तित राजनीतिक शैली के कारण भाजपा अंतत: केंद्र में सत्ता में आ पाई, वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रभावकारी विकल्प बन कर उभरी। यह घटना यह भी दर्शाती है कि इस देश में दलीय राजनीति किस तरह विकसित हुई। इसमें कुछ हितभागी अभी भी एक तीसरे मोर्चे की तलाश में हैं जो इन दो राष्ट्रीय पार्टियों का विकल्प दे सके। 

केवल एक राष्ट्रीय दल रहने के अपने दुष्परिणाम रहे हैं जैसा कि कांग्रेस के वर्चस्व के दिनों में हम देखते थे। इस स्थिति में कांग्रेस सर्वांगीण विकास की योजना के प्रति सस्त हो गई।  यह खुद को अतुलनीय, अपराजेय भी समझने अधिनायकवादी तथा गैर-जिम्मेवार हो गई, और परा तंत्र पर चरमराने का खतरा मँडराने लगा। यहाँ हम यह भी कहना चाहेंगे कि स्थिर सरकारों के युग के पराभव की अतिरंजित आशंका बेबुनियाद है। स्थिरता जरूरी तो है परंतु देश के सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक विकास के लिए पर्याप्त नहीं है। 

अगर हमसे पूछा जाए कि स्थिरता और जवाबदेही में से किसे चुनेंगे तो हम आसानी से जवाबदेही को चुन लेंगे। पूर्ण बहुमत की सरकार तानाशाह तथा गैर-जिम्मेवार बन जा सकती है जबकि गठबंधन की सरकार की मजबूरियों के चलते जिम्मेवारी की भावना सरकार में आ जाती है। और इसी जिम्मेवारी को तरजीह दिया जाना चाहिए। गठबंधन के अनेक घटक सरकार पर जिम्मेवार बनने का सदा दबाव बनाएँगे। और जब तक भौतिक नीतियों पर घटकों में सहमति होगी तब तक अस्थिरता की चिंता नहीं करनी होगी। सन 1991 से कई सरकारें केंद्र में आई पर मूल नीतियाँ यथावत रही हैं। उदारवाद तथा निजीकरण के बारे दल कुछ भी विचार रखते हो, पर कोई भी इसे बदला नहीं। 

इस तरह भले ही भारतीय राष्ट्र राज्य विश्व के विशालतम लोकतंत्र के उठा-पटक वाली चुनावी राजनीति के होते हुए भी धीरे-धीरे स्वयं को शक्तिशाली बना रहा है, हम यहाँ आपत्ति सूचना दे देना चाहते हैं। हमें जरूरत है एक ऐसे नेतृत्व की जो अब तक जैसा रहा है, उससे ज्यादा जवाबदेह हो, जो मिले अवसरों से खिलवाड़ न करता रहे। देश को ऐसे नेतृत्व की सख्त आवश्यकता है जो समर्पित, जिम्मेवार और कर्तव्यनिष्ठ हो, जिसके पास दृष्टि हो, भले ही वह एक आण्विक शक्ति भर न हो। जो नेतृत्व अपनी जनता के बल पर बढ़ता है और भीमकाय बनता है जो लोगों को बौना बनाता है, उनकी प्रतिमा को कमजोर कर देता है, वह अंत में यही पाता है कि देश भर में बौनी क्षमता वाले लोग भर गए हैं जिससे कि देश महान नहीं बन सकता। इसलिए हालांकि हमारी अर्थव्यवस्था शाखा निजीकरण तथा वैश्वीकरण के जरिये राज्य की शक्ति को सीमित कर देती है, लेकिन यह इतना नहीं बढ़े कि राज्य सामाजिक प्रक्षेत्र से पूर्णतः वापस ही न हो जाए। यह एक सबक है जो हम विकसित देशों तथा पूर्व एशिया के पड़ोसियों से सीख सकते हैं। पूर्वी एशिया देशों में जो विकास हुआ है उसका आधार है वहाँ का स्वस्थ और सुशिक्षित मानव संसाधन। 

एक लोकतांत्रिक व्यवस्था बहुमत के सिद्धांत पर चलती है। जो सरकार इस बहुमत को अनदेखा कर चलती है वह ज्यादा समय तक शासन नहीं कर सकती। इस तरह एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था का स्थायित्व संदेहास्पद जो स्पष्ट बहुमत के हितों की अनदेखी करती है। अतः यदि उदारीकरण-निजीकरण वैश्वीकरण की नीतियाँ जारी रहना है तो सरकार को बहुमत की मूलभूत जरूरतों का ध्यान रखना है, अन्यथा, 1991 के बाद से परिणामस्वरूप जिस असमानता की बात की जा रही है, वह पूरी प्रक्रिया को उलट देगा और सामाजिक तनाव के लिए उर्वर जमीन तैयार करेगा। 

अत: सरकार को सामाजिक क्षेत्र पर भारी खर्च करना होगा। निजी क्षेत्र से उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह इस क्षेत्र में खर्च करने का साहस करेगा लेकिन वह कई तरीकों से इस जिम्मेवारी में भागीदार हो सकेगा। निजी क्षेत्र ऐसी जिम्मेवारी से कतराएगा नहीं क्योंकि इसके अपने स्थिर विकास के लिए एक संपन्न मानव संसाधन आधार तथा एक संपन्न समाज जरूरी है क्योंकि ऐसा ही समाज निजी क्षेत्र के लिए अत्यावश्यक माँग मुहैया कराता है तथा पैदा भी करता है। सरकार को भी चाहिए कि वह अंदर तथा बाहर के दबाव में आकर सामाजिक क्षेत्रक से पीछे न हटे, नहीं तो यह उसके लिए संकट पैदा करेगा। 

फिर हमारे राजनीतिक नेतृत्व को देश में सांस्थानिक उत्थान के लिए कुछ करना होगा। इसे सिविल सोसायटी मीडिया तथा बौद्धिकवर्ग के सहयोग करना होगा। यदि ये सब मिलकर काम करेंगे तो हम सब शीघ्र एक विकसित भारत में होंगे। ऐसा भारत संविधान में लिखे आदर्शों मूल्यों तथा सिद्धांतों पर चलेगा ऐसे ही भारत में हम रहने का सपना देखते हैं|

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