भारतीय संस्कृति : एक साझा संस्कृति अथवा हमारी भारतीय सांस्कृतिक विरासत (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2015) 

भारतीय संस्कृति : एक साझा संस्कृति 

भारतीय संस्कृति : एक साझा संस्कृति अथवा हमारी भारतीय सांस्कृतिक विरासत (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2015

पग-यग से संचित संस्कार, ऋषि-मुनियों के उच्च विचार। भीगे – वीरों के व्यवहार हैं निज संस्कृति के श्रृंगार।। -मैथिलीशरण गुप्त

किसी भी देश की संस्कृति वहां के संस्कारों का ही घनीभूत स्वरूप होती है। भारत की संस्कृति में युग-युग से संचित इन्हीं संस्कारों का प्रतिरूप दिखाई देता है। हमारे संस्कार उच्च कोटि के रहे हैं। सहिष्णुता, उदारता, शुचिता और आत्मिक उत्थान हमारे संस्कारों की प्रतीक व विशिष्टताएं हैं, जो कि हमारी संस्कृति में भी परिलक्षित होते हैं। सहिष्णुता भारतीय संस्कृति की एक प्रमुख विशेषता है, जिसने हमारी संस्कृति को गंगा-जमुनी रंग दिये हैं। हमारी मेल-मिलाप की संस्कृति है, जिसमें हमेशा जोड़ने का भाव रहा है। 

हमारी संस्कृति में विविध सभ्यताओं की सुंदर परिणति देखने को मिलती है। हमारे यहां सांस्कृतिक विविधता तो दिखती है, किंतु इसमें एक अनूठी समरसता और एकता भी देखने को मिलती है। सच तो यह है कि हमने अपनी इस संस्कृति को बड़ी तन्मयता से हृदय से गढ़ा है। तभी तो कविवर सुमित्रा नंदन पंत कहते हैं 

प्रखर बुद्धि से भले

सभ्यता हो नव-निर्मित

संस्कृति के निर्माण के लिए

हृदय चाहिए। 

भारत में जिस मिली-जुली संस्कृति के आज हमें दर्शन होते हैं, वस्तुतः वह विभिन्न संस्कृतियों का एक मिश्रित स्वरूप है। विशेष रूप से अरबों, अफगानों, तुर्कों व मुगलों के आगमन के बाद भारतीय संस्कृति का जो मिश्रित स्वरूप उभरा, वह धीरे-धीरे परिमार्जित व परिष्कृत होता गया और आज इसी को हम गंगा-जमुनी तहजीब कहते हैं। पहले सांस्कृतिक संघर्ष हुआ और उसके बाद समन्वय की प्रक्रिया शुरू हुई। हमने एक-दूसरे की संस्कृति की अच्छी बातों को अंगीकार करना शुरू कर दिया और इस प्रकार एक ऐसी मिली-जुली संस्कृति ने पांव जमाने शुरू किये, जिसका प्रभाव जन-जीवन के हर क्षेत्र में दिखना शुरू हो गया, फिर चाहे वह खान-पान हो, पहनावा हो, कला हो या शिक्षा अथवा अन्य कोई भी क्षेत्र। 

“संस्कृतियां स्थिर नहीं रहतीं। यदि स्थिर हो जाएं, तो नष्ट हो जाएं। संस्कृति हमेशा विकास की प्रक्रिया में रहती है। यह बात हम भारतीय संस्कृति से बेहतर समझ सकते हैं।” 

अब भाषा को ही लीजिए। हमने अरबी-फारसी के शब्दों को अपनी भाषा का अंग बनाया, तो हमारे देश में मुसलमानों ने हिन्दी सीखी। सूफी जैसे धर्म सामने आये, जिनमें मानव प्रेम के हिन्दू धर्म का प्रभाव साफ दिखा। वस्तुतः ‘भक्ति आंदोलन’ हिन्दू और इस्लाम धर्म के परस्पर सम्पर्क की ही देन था। हिन्दुओं ने मुसलमानों की स्थापत्य कला को अपनाया, जिसके दर्शन आज भी राजपूत राजाओं के उन महलों में होते हैं, जो ऐतिहासिक धरोहर बन गये हैं। यहां तक कि वृंदावन के मंदिरों तक में भी मुस्लिम स्थापत्य कला की खूबियां देखने को मिलती हैं। मुसलमानों ने जहां हिन्दू पाक कला की खूबियों को अपनाया, वहीं उद्यान कला की बारीकियां हिन्दुओं ने मुसलमानों से सीखीं। इसी प्रकार के आदान-प्रदान से हम न सिर्फ सांस्कृतिक स्तर पर समृद्ध हुए, बल्कि ये बातें हमारे सांस्कृतिक विकास. में भी सहायक बनीं। 

हमारे सांस्कृतिक विकास की सबसे बड़ी विशिष्टता यह रही कि यहां बाहर से आने वालों ने एक भारतीय के रूप में पहचान कायम की। भारत में बाहर से आने वालों का सिलसिला कुछ ज्यादा ही रहा। तभी तो रघुपति सहाय ‘फिराक’ कहते हैं| ‘काफिले बसते गये, हिन्दोस्तां बनता गया।’ आने वाले बाहर से आये तो काफिलों की शक्ल में, किंतु यहां आने के बाद पूरी तरह से भारतीय संस्कृति में रच-बस गये। इस बात के साक्ष्य हमें मध्यकाल से प्राप्त होते हैं कि भारत आने वाले भारत के होकर रह गये और उन्होंने अपनी पहचान एक भारतीय के रूप में कायम की। उन्होंने भारतीय कहलाने में फख्र समझा। इस बात को हम इस दृष्टांत से समझ सकते हैं। प्रख्यात सूफी संत और विद्वान अमीर खुसरो कहते हैं—’तुर्क हिन्दुस्तानियम मन हिन्दवी गोयम जवाब’। यानी किसी अवसर पर वह यह कहते हैं कि मैं हिन्दुस्तानी तर्क हं, हिन्दवी (हिन्दी) में जवाब दंगा। यह हिन्दुस्तानियत ही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान है। 

अंग्रेजों के आने के बाद हमारे मन में स्वाधीनता की ललक स बढ़ी। हम आजादी के लिए उद्यत हो उठे। स्वाधीनता की इस ललक स न हिन्द-मसलमानों को ओर करीब ला दिया जिससे हमारी साझा इ सांस्कृतिक विरासत और अधिक समृद्ध व मजबूत हुई। दूसरी तरफ म ऐसा भी नहीं है कि हम आंग्ल संस्कृति से प्रभावित न हुए हों। आंग्ल व और भारतीय संस्कृति में भी परस्पर आदान-प्रदान हुआ। अंग्रेजों से ि प्रभावित होकर हम अपने परम्परागत पहनावे में बदलाव लाए। हमने पेंट, शर्ट, कोट आदि पहनने शुरू कर दिये। भाषा पर भी आंग्ल संस्कृति का प्रभाव पड़ा। हमने अंग्रेजी के शब्दों को बोलना शुरू किया और ये इतने प्रचलित हुए कि आज बोलचाल की भाषा में शामिल हो गये। आंग्ल संस्कृति से प्रभावित होकर जहां हमने रूढ़ियों और अंधविश्वासों से किनारा किया, वहीं समाज सुधार की दिशा में यथेष्ट योगदान देना शुरू किया। अंग्रेजों से प्रभावित होकर ही हमने वैज्ञानिक संचेतना की तरफ ध्यान दिया और चीजों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखना शुरू किया। अंग्रेज भारत छोड़कर चले गये, किंतु उनकी संस्कृति के तमाम अवयव आज भी हमारी संस्कृति में मौजूद हैं। इस तरह से मिली-जुली संस्कृति का एक समन्वित स्वरूप भारतीय संस्कृति के रूप में सामने आया, जो कि आज भी अक्षुण्ण है। 

संस्कृतियां स्थिर नहीं रहतीं। यदि स्थिर हो जाएं, तो नष्ट हो जाएं। संस्कृति हमेशा विकास की प्रक्रिया में रहती है। यह बात हम भारतीय संस्कृति से बेहतर समझ सकते हैं। हमारी संस्कृति सतत रूप से विकासशील रही। यही कारण है कि हमारी संस्कृति में विविधताओं के फूल खिले, जिन्होंने भारतीय संस्कृति को एक खुशरंग संस्कृति का दर्जा दिया। इसे आकर्षक बनाया और हमारी संस्कृति दूसरों के लिए प्रेरक बनी। हम सांस्कृतिक स्तर पर कभी भी असहिष्णु नहीं रहे। एक भाषा जिस तरह से दूसरी भाषा से शब्द लेकर समृद्ध होती है, उसी प्रकार एक संस्कृति भी दूसरी संस्कृति की अच्छाइयों को आत्मसात कर समृद्ध व व्यापक होती है। इस संबंध में हमारी संस्कृति का कोई सानी नहीं है। हमारी संस्कृति पर विविध संस्कृतियों के रंग आच्छादित हैं और यह आदिकाल से लेकर अब तक कायम है। कहीं कोई ह्रास देखने को नहीं मिलता है। हमारी भारतीय संस्कृति अमिट है, अमूल्य है। 

हमारी संस्कृति ‘जियो और जीने दो’ की है। यानी हमारी संस्कृति का स्वरूप लोक मंगलकारी और कल्याणकारी है। यह वह संस्कृति है, जिसमें सभी के सुख और कल्याण की कामना की जाती है। हमारी संस्कृति आध्यात्मिक चेतना से भरपूर है। इसमें धार्मिक कट्टरता, नहीं बल्कि धार्मिक सहिष्णुता के दर्शन होते हैं। देश में अनेक धर्म हैं और सभी धर्मों के प्रति हमारे देश में अनूठा सामंजस्य देखने को मिलता है। तीज-त्योहार हम मिल-जुलकर मनाते हैं। पर्व किसी भी धर्म से जुड़ा क्यों न हो, हम उसे मिलजुल कर मनाते हैं और अनूठे सौहार्द और सहृदयता का परिचय देते हैं। यह राम और रहीम की संस्कति है। हमारे देश में जब दशहरा आदि पर्वो पर भगवान की शोभा यात्राएं निकलती हैं, तो मुस्लिम भाई आगे बढ़कर भगवान की आरती उतारते हैं, तो ईद के अवसर पर हिन्दू भाई भी चांद के दीदार को उतना ही बेताब रहते हैं, जितना कि मुस्लिम। होली के रंग सभी साथ मिलकर खेलते हैं। क्रिसमस पर हिन्दू और मसलमान भी केक का रसास्वादन करते हैं, तो वैसाखी की उमंग हर सम्प्रदाय में देखने को मिलती है। गुरुद्वारों में शीश नवाने हम साथ जाते हैं। साम्प्रदायिक सौहार्द एवं उच्च सहिष्णु संस्कृति की इससे बड़ी और मिसाल क्या है कि अजमेर में स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती (ख्वाजा साहेब) की दरगाह पर चढ़ाई जान वाली चादरों के फूल पास में स्थित पुकर नामक तीर्थ से आते हैं। मिली-जुली संस्कृति का यह उज्ज्वल स्वरूप भारत में ही देखने को मिल सकता है। 

हमारी संस्कृति का मूल स्वरूप आध्यात्मिक अवश्य है, किंतु इसमें समरसता और सहिष्णुता के परम तत्व भी समाहित हैं। भारतीय संस्कृति के निर्माण में अनेक जातियों व धर्मों का योगदान अवश्य रहा, किंतु इस विविधता के बीच सदैव एक एकता के दर्शन होते रहे। एस. राधाकृष्णन के शब्दों में— “भारत का हजारों वर्षों का सांस्कृतिक इतिहास दर्शाता है कि एकता का सूक्ष्म, किंतु मजबूत धागा, जो उसके जीवन की अनंत विविधताओं से होकर जाता है, सत्ता समूह के जोर देने या दबाव के कारण नहीं बुना गया, बल्कि भविष्य दृष्टाओं की दृष्टि, संतों की चेतना, दार्शनिकों के चिंतन और कवि कलाकारों की कल्पना का परिणाम है, और केवल ये ही माध्यम हैं, जिनका राष्ट्रीय एकता को व्यापक, मजबूत तथा स्थायी बनाने में उपयोग किया जा सकता है।” 

वस्तुतः हमारी संस्कृति एक राष्ट्रीय संस्कृति है। यह एक सर्वांग संस्कृति है, जिसके मूल में तो उच्चकोटि की आध्यात्मिकता छिपी हुई है, किंतु जिसका वाह्य स्वरूप धर्म निरपेक्ष है। यहां धर्मनिरपेक्षता के माने यह कदापि नहीं है कि यह अधार्मिकता या नास्तिकता की सूचक है। यह वह धर्म निरपेक्षता है, जिसमें आध्यात्मिक मूल्यों की सार्वलौकिता पर जोर दिया जाता है। 

भारतीय संस्कृति की आत्मा हमारे संविधान में भी दिखती है। हमारा संविधान धर्मनिरपेक्ष है। इसमें ‘समवाय इवा साधु’ की अवधारणा निहित है। धर्म निरपेक्षता रूपी यह सहिष्णुता हमें अपने ऋषि मुनियों, विद्वानों व राजमर्मज्ञ सम्राटों से मिली है तभी तो अशोक महान कहते हैं- “वह व्यक्ति जो अपने धर्म का सम्मान करता है, दूसरों के अपने धर्म के प्रति निष्ठावान रहने की निंदा करता है और दूसरे धर्मों की तुलना में अपने धर्म को श्रेष्ठ बताता है, वह निश्चित ही अपने स्वयं के धर्म का अहित करता है। वास्तव में धर्मों के बीच सामंजस्य ही श्रेष्ठ है।” यह सामंजस्यता हमारी संस्कृति में विद्यमान है। हमारी संस्कृति ने विभिन्न धार्मिक परम्पराओं को आधार प्रदान किया हुआ है। 

हमारे संविधान में जो धर्मनिरपेक्षता की भावना निहित है, उसे बहुत पहले सम्राट अकबर से कुछ इस तरह से व्यक्त किया था “विभिन्न धार्मिक समुदाय ईश्वर द्वारा हमें सौंपे गये दैवी खजाने हैं। हमें उसी रूप में उनसे प्रेम करना चाहिए। हमारा यह दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि प्रत्येक धर्म एक ईश्वरीय देन है। शाश्वत नियंता सभी मनुष्यों पर बिना किसी भेद-भाव के प्रेम की वर्षा करता है।” अशोक महान और अकबर महान जैसे सम्राटों के उक्त उद्गारों से यह ध्वनित होता है कि हमारी संस्कृति में समरसता व समभाव की जड़ कितनी गहरी रही हैं। 

हमारी संस्कृति में आत्मिक उत्थान की भी भावना निहित रही है। आत्मिक उत्थान के लिए ही हमने ज्ञान प्राप्त किया और श्रेष्ठ लोगों के सान्निध्य में रहकर अपनी संस्कृति को समृद्ध भी बनाया। कठोपनिषद् में कहा भी गया है—’उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधतः’। यानी उठो, जागो और श्रेष्ठ पुरुषों के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करो। हमारी संस्कृति में निहित इसी अवधारणा ने हमें समृद्ध बनाया। भारत को विश्व गुरु’ का मान दिलाया। भारतीय संस्कृति को अमरता प्रदान की। 

“भारत की संस्कृति विविधता के बावजूद एक समान दृष्टिकोण की संस्कृति है, जिसमें भारतीय मस्तिष्क दिखता है, भारतीय मेधा दिखती है, विभिन्न आंदोलनों और संस्कृतियों का बौद्धिक प्रभाव दिखता है।” 

भारतीय संस्कृति समाज का कल्याण करती है, क्योंकि यह सामुदायिकता को प्रश्रय देती है। हमारी संस्कृति में जीवन के उच्चतम मूल्यों के दर्शन होते हैं। यह उस सामाजिक चेतना की संस्कृति है, जिसमें सामाजिक प्रथाओं, व्यक्तियों की चित्तवृत्तियों, भावनाओं, मनोवृत्तियों, आचरण के साथ, उसके द्वारा भौतिक पदार्थों को विशिष्ट स्वरूप दिए जाने की अभिव्यक्ति होती है। यह वह संस्कृति है, जो अनेक धर्मों को साथ लेकर चलती है। वस्तुतः, धर्म अपने विस्तृत अर्थों में संस्कृति के समान ही है और उससे बाहर भी है। यह संस्कृति का एक अभिन्न अंग भी है। धर्म, उच्चतम सत्य की आंतरिक उपलब्धि के रूप में, कभी संस्कृति का विरोधी नहीं बन सकता। यह बात हमारी संस्कृति में प्रकट होकर उसे विशिष्टता प्रदान करती है। हमारे देश के धर्माचार्यों, संतों और सूफियों ने केवल सहनशीलता का ही वातावरण पैदा नहीं किया, बल्कि पारस्परिक सद्भाव भी पैदा किया, जिससे कि जब हिन्दू और मुस्लिम नरेश सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब दोनों धर्मों के आम लोग मिलजुल कर रहने की स्थिति में थे। वास्तव में, जब हम भारत के सांस्कृतिक इतिहास पर गौर करते हैं, तो यह पाते हैं कि विभिन्न मतभेदों के बावजूद, भारतवासियों के विचारों, भावनाओं तथा रहन-सहन के तरीकों में एक बुनियादी एकता है, जो राजनीतिक नक्षत्रों के बदलने से घटती बढ़ती है, किंतु कभी समाप्त नहीं होती है। अनेक बार बाहरी और भातरी अलगाववादी शक्तियों ने इस एकता को नष्ट करने का भय उत्पन्न किया. किंत भारत वर्ष में एक रहने की भावना सदेव प्रबल रही। इसी भावना ने विरोधी प्रवत्तियों और आंदोलनों को एक समन्वयात्मक संस्कृति में लपेट लिट।। 

ऐसा नहीं है कि जंगली मनोवृत्ति वाले तत्व, भाषाई विवाद खड़ा करने वाले तत्व, जातीय विद्वेष को हवा देने वाले तत्व तथा साम्प्रदायिक विभाजक की भूमिका निभाने वाले तत्व हमारी राष्ट्रीय संस्कृति को क्षति पहुंचाने के लिए क्रियाशील न रहे हों। राष्ट्रीय संस्कृति को खंडित करने का प्रयास करने वालों तथा ऐसे तत्वों को प्रश्रय देने वालों की हमारे देश में कमी नहीं रही, किंतु सांस्कृतिक क्षेत्र में स्थानीय एवं साम्प्रदायिक भिन्नताओं की सतह के नीचे, एक गहन बुनियादी एकता की भावना छिपी रही जिसने सदैव हमारी राष्ट्रीय संस्कृति के परचम को ऊंचा रखा। 

भारत की संस्कृति विविधता के बावजूद एक समान दृष्टिकोण की संस्कृति है, जिसमें भारतीय मस्तिष्क दिखता है, भारतीय मेधा दिखती है, विभिन्न आंदोलनों और संस्कृतियों का बौद्धिक प्रभाव दिखता है। यह सामूहिक और साझा संस्कृति है, जिसमें समरसता के तत्व सर्वोपरि हैं। यह सद्भावना की संस्कृति है, जिसने लोगों को जोड़ा है। वस्तुतः संपूर्ण रूप से विविधता में एकता का प्रत्यक्ष ज्ञान और विचारों की सर्वोच्चता, भारतीय मस्तिष्क की मूल्यवान विशेषताएं हैं, जो हमारी संस्कृति में मुखर रूप से देखी जा सकती हैं। 

हमारी भारतीय संस्कृति स्वतंत्रता की संस्कृति है, लोकतंत्र की संस्कृति है। उन उच्च जीवन मूल्यों की संस्कृति है, जिसमें कल्याण की भावना निहित है। तभी तो विक्रमोवीय में महाकवि कालिदास कहते हैं 

सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु। सर्वः कामानवाप्नोतु सर्वः सर्वत्र नन्दतु। 

अर्थात् सभी लोग कठिनाइयों को पार करें। सब लोग कल्याण को देखें। सब लोग अपनी इच्छित वस्तुओं को प्राप्त करें तथा सब लोग सर्वत्र आनन्दित रहें। इसी समृद्ध वैदिक दर्शन ने हमारी संस्कृति की बुनियाद रखी है, जो आज एक उज्ज्वल व विकसित स्वरूप में हमारे सामने है। यही संस्कृति हमसे कहला उठती है—’सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।’

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