भारत-पाकिस्तान का द्वितीय युद्ध | India-Pakistan Second War

भारत-पाकिस्तान का द्वितीय युद्ध

भारत-पाकिस्तान का द्वितीय युद्ध (Second Battle of Indo-Pak) (अप्रैल 1965 से सितम्बर 1965) 

प्रथम भारत-पाक युद्ध के उपरान्त कश्मीर का झगड़ा संयुक्त राष्ट्र संघ के पास निर्णय के लिए चला गया था। परन्तु वहां बड़े पैमाने पर पारस्परिक मतभेद के कारण कोई निर्णय नहीं हो पाया। 

पाकिस्तान उतावला हो रहा था। सन् 1965 में पाकिस्तान में सैनिक शासन था। जनरल अम्यूब खां पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे। उन्होंने अप्रैल 1965 की पाकिस्तानी सेना को कच्छ के रन में प्रवेश की आज्ञा दे दी। उनका कहना था कि यह क्षेत्र पाकिस्तान का है, जिस पर भारत ने जबरदस्ती अधिकार कर लिया है। युद्ध आरम्भ हो गया। 

कच्छ के रन का युद्ध चल ही रहा था कि पाकिस्तान ने पांच हजार घुसपैठियों को कश्मीर में तोड़-फोड़ के लिए भेज दिया। कश्मीर की जनता और पुलिस ने सेना की सहायता से उन घुसपैठियों को मार भगाया। 

कच्छ रन युद्ध के शुरू में केवल सीमा सुरक्षा बल ही शामिल थे, पर बाद में दोनों देश की सेना भी युद्ध में शामिल हो गयी। जून, 1965 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री हैरोल्ड विल्सन ने दोनों पक्षों के बीच लड़ाई रुकवा कर इस विवाद का हल करने के लिए एक निष्पक्ष मध्यस्थ न्यायालय की स्थापना की। 

इस न्यायालय ने (जिसका निर्णय तो बाद में 1968 में आया पर रुख पहले ही स्पष्ट हो चुका था) कच्छ के रन की करीब 900 वर्ग किलोमीटर जगह पाकिस्तान को दे दी। हालांकि पाकिस्तान का दावा 3500 वर्ग किलोमीटर पर था। 

कच्छ ने रन में मिली सफलता से उत्साहित पाकिस्तान के राजनेताओं खासकर तत्कालीन विदेशमंत्री जुल्फीकार अली भुट्टो ने राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष जनरल अयूब खान पर दबाव डाला कि वे कश्मीर पर हमले का आदेश दें। भारत उस समय चीन से युद्ध हार चुका था और उनका मानना था कि भारत उस समय युद्ध करने की स्थिति में नहीं था। 

इसके अलावा भुट्टो और उनके विचार से सहमत अन्य जनरल याह्या खान और टिक्का खान का यह भी मानना था कि कश्मीर की जनता भारत से आजाद होकर पाकिस्तान से विलय की इच्छुक है और सैनिकों को घुसपठियों के वेश में भेजने पर उनके समर्थन में विद्रोह कर देगी। आखिर जनरल अयूब खान दबाव में आ गए और उन्होंने गुप्त सैनिक अभियान जिब्राल्टर का आदेश दे दिया। 

इस अभियान का मुख्य उद्देश्य कश्मीर की जनता में विद्रोह भड़काना और भारतीय संचारतंत्र एवं परिवहन व्यवस्था को नुकसान पहुंचाना था। पाकिस्तान के घुसपैठियों को जल्दी ही पहचान लिया गया। विद्रोह करने के बजाय जनता ने उनकी सूचना भारतीय सैनिकों को दे दी और यह अभियान पूर्णतः विफल हो गया।

युद्ध की गतिशीलता 

युद्ध की गतिशीलता 

5 अगस्त, 1965 को 26,000 से 30,000 के बीच पाकिस्तानी सैनिकों ने कश्मीर की स्थानीय आबादी की वेषभूषा में नियत्रण रेखा को पारकर भरतीय कश्मीर में प्रवेश कर लिया। भारतीय सेना ने स्थानीय आबादी से इसकी सूचना पाकर 15 अगस्त को नियंत्रण रेखा को पार किया। 

शुरूआत में भारतीय सेना को अच्छी सफलता मिली। उसने तोपखाने की मदद से तीन महत्वपूर्ण पहाड़ी ठिकानो पर कब्जा जमा लिया। पाकिस्तान ने टिथवाल, उरी और पुंछ क्षेत्रों में महत्वपूर्ण बढ़त कर ली पर 15 अगस्त तक पाकिस्तानी अभियान की ताकत में काफी आ गयी थी। भारतीय अतिरिक्त टुकड़ियां लाने में सफल हो गये। भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में 8 किलोमीटर अन्दर घुसकर हाजी पीर दर्रे पर कब्जा कर लिया। इस कब्जे से पाकिस्तान स्तब्ध हो गया। 

अभियान जिब्राल्टर के घुसपैठिये सैनिकों का रास्ता भारतीयों के कब्जे में आ जाने से अभियान विफल हो गया। यही नहीं पाकिस्तान की कमान को लगने लगा कि पाकिस्तानी कश्मीर का महत्वपूर्ण शहर मुजफ्फराबाद अब भारतीयों के कब्जे में जाने ही वाला है। मुजफ्फराबाद पर दबाव कम करने के लिए पाकिस्तान ने एक नया अभियान ग्रैंड स्लेम शुरू किया। 

1 सितम्बर, 1965 को पाकिस्तान ने ग्रैंड स्लैम नामक एक अभियान के तहत सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण शहर अखनूर, जम्मू और कश्मीर पर कब्जे के लिए आक्रमण कर दिया। 

इस अभियान का उद्देश्य कश्मीर घाटी का शेष भारत से संपर्क तोड़ देना था ताकि उसकी रसद और संचार व्यवस्था भंग कर दी जाए। पाकिस्तान के इस आक्रमण के लिए भारत तैयार नहीं था। 

पाकिस्तान को भारी संख्या में सैनिकों और बेहतर किस्म के टैंकों का लाभ मिल रहा था। शुरूआत में भारत को भारी क्षति उठानी पड़ी। इस पर भारतीय सेना ने हवाई हमले का उपयोग किया। इसके जवाब में पाकिस्तान ने पंजाब और श्रीनगर के हवाई ठिकानों पर हमला कर दिया।

युद्ध के इस चरण में पाकिस्तान अत्यधिक बेहतर स्थिति में था और इस अप्रत्याशित हमले से भारतीय खेमे में घबराहट फैल गयी थी। अखनूर के पाकिस्तानी सेना के हाथ में जाने से भारत के लिए कश्मीर घाटी में हार का खतरा पैदा हो सकता था। 

ग्रैंड स्लैम के विफल होने की दो वजहें थीं सबसे पहली और बड़ी वजह यह थी कि पाकिस्तान की सैनिक कमान ने जीत के मुहाने पर अपने सैनिक कमाण्डर को बदल दिया। ऐसे में पाकिस्तानी सेना को आगे बढ़ने में एक दिन की देरी हो गयी और उन 24 घण्टों में भारत को अखनूर की रक्षा के लिए अतिरिक्त सैनिक और सामान लाने का मौका मिल गया। खुद भारतीय सेना के स्थानीय कमाण्डर भौचक्के थे कि पाकिस्तान इतनी आसान जीत क्यों छोड़ रहा है। 

एक दिन की देरी के बावजूद भारत के पश्चिमी कमान के सेना प्रमुख यह जानते थे कि पाकिस्तान बहुत बेहतर स्थिति में है और उसको रोकने के लिए उन्होंने यह प्रस्ताव तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल चौधरी को दिया कि पंजाब सीमा में एक नया मोर्चा खोलकर लाहौर पर हमला कर दिया जाए। 

जनरल चौधरी इस बात से सहमत नहीं थे लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने उनकी बात अनसुनी कर इस हमले का आदेश दे दिया। 

भारत ने 6 सितम्बर को अन्तर्राष्ट्रीय सीमा रेखा को पार कर पश्चिमी मोर्चे पर हमला कर युद्ध की आधिकारिक शुरूआत कर दी। 

6 सितम्बर को भारत की 15वीं पैदल सैन्य इकाई ने इच्छोगिल नहर के पश्चिमी किनारे में पाकिस्तान के बड़े हमले का सामना किया। इच्छोगिल नहर भारत और पाकिस्तान की वास्तविक सीमा थी। इस हमले में खुद मेजर जनरल प्रसाद के काफिले पर भी हमला हुआ और उन्हें अपना वाहन छोड़कर बचना पड़ा। भारत ने प्रतिआक्रमण में बरकी गांव के समीप नहर को पार करने में सफलता अर्जित कर ली।। 

इससे भारतीय सेना लाहौर के हवाई अड्डे पर हमला करने की सीमा में पहुंच गयी। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका ने अपने नागरिकों को लाहौर से निकालने के लिए कुछ समय के लिए युद्ध विराम की अपील की। इसी बीच पाकिस्तान ने लाहौर पर दबाव को कम करने के लिए खेमकरण पर हमला कर उस पर कब्जा कर लिया। बदले में भारत ने बेदियां और उसके आप-पास के गांवों पर हमला कर दिया। 

6 सितम्बर को लाहौर पर हमले में भारतीय सेना के प्रथम पैदल सैन्य खण्ड (इनफैंट्री डिवीजन) के साथ द्वितीय बख्तरबंद उपखण्ड (ब्रिगेड) के तीन टैंक दस्ते शामिल थे। वे तुरन्त ही सीमा पार करके इच्छोगिल नहर पहुंच गए। पाकिस्तानी सेना ने पुलियाओं पर रक्षा दस्ते तैनात कर दिए। जिन पुलों को बचाया नहीं जा सकता था उनको उड़ा दिया गया। पाकिस्तान के इस कदम से भारतीय सेना का आगे बढ़ना रुक गया। 

जाट रेजीमेन्ट की एक इकाई 3 ने नहर पार करके डोगराई और बातापोर पर कब्जा कर लिया। उसी दिन पाकिस्तानी सेना ने बख्तरबंद इकाई और वायुसेना की मदद से भारतीय सेना की 15वें खण्ड पर बड़ा आक्रमण किया। हालांकि इससे 3 जाट का मामूली नुकसान हुआ। 

लेकिन 15वें खण्ड को पीछे हटना पड़ा उसके रसद और हथियारों के वाहनों को काफी क्षति पहुंची। भारतीय सेना के बड़े अधिकारियों को जमीनी हालात की सही जानकारी नहीं थी, अतः उन्होंने इस आशंका से कि 3 जाट को भी भारी नुकसान हुआ है उसे पीछे हटने का आदेश दे दिया। इससे 3 जाट के कमान अधिकारी को बड़ी निराश हुई और बाद में उन्हें डोगराई पर फिर कब्जा करने के लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। 

8 दिसम्बर, सन् 1965 ई० को 5 मराठा लाईट इनफैन्ट्री का एक दस्ता रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कस्बे मुनाबाव में तैनात राजस्थान सैन्य बल को मजबूती प्रदान करने के लिए भेजा गया। उनको पाकिस्तानी सेना के पैदल दस्ते को आगे बढ़ने से रोकने का आदेश मिला था पर वे केवल अपनी चौकी की रक्षा ही कर पाए। 

पाकिस्तानी सेना के तोपखाने से हुई भारी बमबारी और हवाई और पैदल सैन्य आक्रमण के बीच 5 मराठा के जवानों ने बड़ी वीरता का परिचय दिया। परिणाम स्वरूप आज उस चौकी को मराठा हिल के नाम से जाना जाता है। 5 मराठा की मदद के लिए भेजे गए 3 गुरखा और 154 भारी तोपखाना का दस्ता पाकिस्तानी वायु सेना के भारी हमले के कारण पहुंच नहीं पाया और रसद लेकर बारमेर से आ रही ट्रैन भी गर्दा रोड रेल अड्डे के पास हमले का शिकार हो गयी। 10 सितम्बर को मुनाबाओ पर पाकिस्तान का कब्जा हो गया। 

9 सितम्बर के बाद की घटनाओं ने दोनों देशों की सेनाओं के सबसे गर्वित खण्डों का दम्भ चूर-चूर कर दिया। भारत के 11 बख्तरबंद खण्ड, जिसे भारतीय सेना की शान कहा जाता था, ने सियालकोट कि दिशा में हमला कर दिया। छाविंडा में पाकिस्तान की अपेक्षाकृत कमजोर 6 बख्तरबंद खण्ड ने बुरी तरह हरा दिया। भारतीय सेना को करीब-करीब 100 टैंक गवांने पड़े और पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। 

इससे उत्साहित होकर पाकिस्तान की सेना ने भारतीयों पर प्रतिआक्रमण कर दिया और भारतीय सीमा में आगे घुस आयी। दूसरे मोर्चे पर पाकिस्तान की शान माने जाने वाले 1 बख्तरबंद खण्ड ने अमृतसर पर कब्जे के इरादे से खेमकरण पर हमला कर दिया। 

पाकिस्तानी सेना खेमकरण से आगे ही नहीं बढ़ पायी और उसे भारत के 4 पैदल खण्ड के हाथों करारी शिकस्त मिली। करीब 95 टैंक असल उत्तर नामक भारतीय अभियान में भारतीयों के कब्जे में आ गए। जबकि भारत के केवल 30 टैंक क्षतिग्रस्त हुए थे। 

इसके बाद यह जगह अमेरिका में बने पैंटन नाम के पाकिस्तानी टैंको के ऊपर पैंटन नगर के नाम से जानी जाने लगी। इस लड़ाई के बाद पाकिस्तान की शान माने जाने वाले 1 बख्तरबंद खण्ड ने 1965 ई० के युद्ध में आगे भाग नहीं लिया। 

इस समय तक युद्ध में ठहराव आ गया था और दोनों देश अपने द्वारा जीते हुए इलाकों की रक्षा में ज्यादा ध्यान दे रहे थे। लड़ाई में भारतीय सेना के 3000 और पाकिस्तानी सेना के 3800 जवान मारे जा चुके थे। भारत ने युद्ध में 710 वर्ग किलोमीटर इलाके में और पाकिस्तान ने 210 वर्ग किलोमीटर इलाके में कब्जा कर लिया था। भारत के कब्जे में सियालकोट, लाहौर और कश्मीर के उपजाऊ इलाके थे। 

भारत-पाकिस्तान का द्वितीय युद्ध

अन्त में संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप के फलस्वरूप युद्ध रोक दिया गया। इसके बाद जनवरी, 1966 के प्रथम सप्ताह में रूस के प्रधानमंत्री कोसगिन की अध्यक्षता के फलस्वरूप ताशकंद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खां तथा भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के बीच 10 जनवरी, 1966 को समझौता हो गया। यह समझौता ‘ताशकंद समझौता’ के नाम से जाना गया। 

परन्तु इस समझौते के कुछ ही घण्टे के बाद लाल बहादुर शास्त्री का हृदय गति रुक जाने से ताशकंद में ही निधन हो गया। 

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