मानव अधिकार पर निबंध | मानवाधिकार पर निबंध | मानव अधिकार का महत्व | भारत और मानवाधिकार |India and Human Rights

मानव अधिकार पर निबंध

मानव अधिकार पर निबंध | मानवाधिकार पर निबंध | मानव अधिकार का महत्व | भारत और मानवाधिकार |India and Human Rights |मानवाधिकारों के संरक्षण की आवश्यकता और उनके क्रियान्वयन के उपाय  (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2009)

यों तो मानवाधिकार शब्द भले ही नया लगता हो किन्तु इसकी अवधारणा उतनी ही पुरानी है जितनी की मानव जाति। मानव प्रारंभ से ही सामाजिक प्राणी है। समाज में रहने के कारण उसके एक ओर तो कुछ कर्त्तव्य बनते हैं वहीं दूसरी ओर उसे कुछ अधिकार भी मिलते हैं। इस प्रकार किसी व्यक्ति को समाज द्वारा प्रदत्त अधिकार अन्य के लिए कर्त्तव्य का रूप ले लेता है। समाज के हर प्राणी को जीने का अधिकार है तो समाज के हर प्राणी का कर्त्तव्य भी है कि वह उसके जीवन में बाधक न बने। सामान्य अर्थ में इसे आधुनिक मानवाधिकार का प्रारंभिक रूप भी कह सकते हैं। यह मानवाधिकार की मौलिक अवधारणा है। आज मानवाधिकार की जो परिशोधित, परिष्कृत एवं विस्तारवादी अवधारणा हम देखते हैं उसकी जड़ में ‘जियो और जीने दो’ की मूल अवधारणा शामिल है। 

मानवाधिकारों का सृजन भी समाज में ही होता है। सामान्यतया मानवाधिकार से तात्पर्य है लिंग, धर्म, जाति, सम्प्रदाय, देश, आर्थिक स्थिति जैसे भेदभाव मूलक विचारों को त्याग कर मानव को समुचित विकास, संरक्षण तथा ससम्मान जीवन जीने का वह अधिकार प्रदान करना जो उसे जन्म के साथ ही प्राप्त हो जाता है। हमारे संविधान में नीति निर्देशक सिद्धांतों तथा मौलिक अधिकारों को इसी भावना को – ध्यान में रखते हुए स्थान दिया गया है। 

मानवाधिकार की अवधारणा 

मानवाधिकार की अवधारणा का इतिहास जैसा कि पहले कहा जा चुका है बहुत पुराना है। इस अवधारणा का विकास सत्ता के निरंकुश उपयोग पर अंकुश लगाना है। मध्यकाल में 13वीं शताब्दी में राजा और सामंतों के मध्य हुआ समझौता जिसे ‘मैग्नाकार्टा’ कहा जाता है, ने मानवाधिकार की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 1689 में ब्रिटेन में हुई क्रांति ने मानवाधिकार की अवधारणा को विस्तार दिया। इस क्रांति में ‘बिल ऑफ राइट्स’ के द्वारा व्यक्ति की मौलिक स्वतंत्रताओं को मान्यता दी गयी जिनका अब तक हनन किया जाता रहा था। इसके बाद 1776 की अमेरिकी क्रांति जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन की गुलामी से मुक्त हुआ तथा 1789 की फ्रांस की क्रांति जिसका मुख्य नारा था- स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व ने आधुनिक मानवाधिकारों को विकसित होने के लिए आधार भूमि तैयार की। 

“आज मानवाधिकार की जो परिशोधित, परिष्कृत एवं विस्तारवादी अवधारणा हम देखते हैं उसकी जड़ में ‘जियो और जीने दो’ की मूल अवधारणा शामिल है।” 

वर्तमान मानवाधिकार संबंधी गतिविधियां वास्तव में द्वितीय विश्व युद्ध का परिणाम है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान घटित अमानवीय घटनाओं की भर्त्सना करते हुए अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रुजवेल्ट का भाषण, जिसमें रुजवेल्ट ने मनुष्य की चार मूलभूत स्वतंत्रताओं का उल्लेख किया था, भविष्य में मानवाधिकार संबंधी घोषणा का मुख्य आधार बना। 1946 में एलोनोर रुजवेल्ट की अध्यक्षता में गठित मानवाधिकार आयोग द्वारा तैयार किए गए प्रारूप को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा स्वीकृत और घोषित किए जाने के साथ ही विश्व समुदाय द्वारा इसे न केवल मान्यता दी गयी बल्कि अपने-अपने संविधानों में स्थान देकर विधिक स्वरूप भी प्रदान किया गया। 10 दिसंबर 1948 को मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (Universal Declaration of Human Rights) की गयी। यह भी एक संयोग है कि संयुक्त राष्ट्र में जब मानवाधिकारों पर चर्चा हो रही थी उसी समय भारत के संविधान का प्रणयन हो रहा था। हमारे संविधान निर्माता इस तथ्य से पूरी तरह वाकिफ थे और अपने देश के नागरिकों के लिए ऐसी ही व्यवस्था के लिए प्रयत्नशील थे। परिणामस्वरूप भारतीय संविधान में मानवाधिकारों को उच्च स्थान देते हुए उसे मौलिक अधिकारों के खण्ड में न केवल स्थान दिया गया बल्कि इसकी रक्षा की जिम्मेदारी न्यायपालिका को सौंप कर इसे गारंटीकृत भी किया गया।

भारत में मानवाधिकार (Human Rights in India) 

मध्य युग के छोटे कालखण्ड को छोड़कर देखें तो भारत में मानवाधिकार की संस्कृति बहुत पुरानी है। प्राचीन साहित्य चाहे वे वैदिक साहित्य हो या संस्कृत, पालि अथवा प्राकृत साहित्य सभी में मानव अधिकारों को आवश्यक तत्व के रूप में शामिल किया गया है। यही नहीं इस प्राचीन कालीन साहित्य में सहअस्तित्व की भावना तीव्ररूप में हर क्षेत्र में प्राप्त होती है। चाहे वह वन्यजीवों के संबंध में हो या प्रकृति में पायी जाने वाली वनस्पतियों, पेड़ पौधों आदि के संबंध में हो। 

वर्तमान युग में संगठित रूप से भारत में नागरिक अधिकार आंदोलन की शुरुआत 1936 में सिविल लिबर्टीज यूनियन के गठन के साथ हुई। इसके गठन में जवाहर लाल नेहरू की मुख्य भूमिका थी। स्वतंत्रता के बाद इस यूनियन की सक्रियता कम हो गयी। संभवतः यह माना गया कि भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले संविधान के लागू होने के बाद इसकी आवश्यकता नहीं रही। 

“प्रायः देखा गया है कि हमारे भारतीय समाज में मानवाधिकारों का सर्वाधिक हनन निर्धन गरीब व्यक्तियों का या नारियों का होता है।” 

संयक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार घोषणा-पत्र पर भारत ने 1948 में हस्ताक्षर किया था। तथापि लगभग एक वर्ष पूर्व निर्मित भारत के संविधान में मौलिक अधिकारों के माध्यम से मानवाधिकारों को मान्यता दी जा चुकी थी। संविधान के खण्ड तीन में विधि के समक्ष समानता (अनुच्छेद 14), धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग अथवा जन्म स्थान के आधार पर विभेद का निषेध (अनुच्छेद 15), अवसर की समानता (अनुच्छेद 16), अस्पृश्यता का अंत (अनुच्छेद 17) वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण (अनुच्छेद 20), प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21), मानव के दुर्व्यापार एवं बलात् श्रम को प्रतिषेध (अनुच्छेद 23), कारखानों में बालकों के नियोजन पर प्रतिषेध (अनुच्छेद 24), धर्म की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-28), संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29-30) इत्यादि अधिकार भारत के नागरिकों (कुछ मामलों में अनागरिकों को भी) को प्रदान किए गए हैं। इतना ही नहीं संविधान में इन अधिकारों की रक्षा के लिए अनुच्छेद 32 एवं अनुच्छेद 226 में सांविधानिक उपचार भी दिए गए हैं। केंद्र सरकार द्वारा इन अधिकारों के संरक्षण तथा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित किए जाने वाले मानवाधिकार संबंधी अभिसमयों, प्रसंविदाओं के सम्यक पालन हेतु, तथा संबंधित उत्तरदायित्वों के सम्यक् निर्वहन हेतु 1993 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया है। 

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन मानव अधिकार संरक्षण | अधिनियम 1993 (Protection of Human Rights Act 1993) के अंतर्गत किया गया। मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 । में सभी राज्यों को मानवाधिकार आयोग (State Human Rights Commission) के गठन का भी निर्देश दिया गया है। अधिनियम में मानवाधिकार संबंधी मामलों के त्वरित निपटान हेतु प्रत्येक जिले के मुख्यालय पर एक मानवाधिकार न्यायालय की स्थापना तथा अधिनियम की धारा 31 के अनुसार इन न्यायालयों में अभियोजन अधिकारियों की नियुक्ति का भी प्रावधान है। उल्लेखनीय है कि भारतीय संसद ने । जलाई, 2019 में मानवाधिकार संरक्षण संशोधन विधेयक को पारित | कर दिया। यह विधेयक मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 में संशोधन करता है। इस विधेयक का उद्देश्य राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा राज्य मानवाधिकार आयोगों को अधिक सक्षम बनाना है |

प्रायः देखा गया है कि हमारे भारतीय समाज में मानवाधिकारों का सर्वाधिक हनन निर्धन गरीब व्यक्तियों का या नारियों का होता है। पुलिस विभाग को भी मानवाधिकारों के हनन में सर्वाधिक दोषी पाया जाता है। बाल श्रमिकों का नियोजन, बंधुआ मजदूर की प्रथा, आदिवासियों का शोषण, बड़े बांध, जलाशयों, विद्युत परियोजनाओं के निर्माण में बड़ी संख्या में स्थानीय निवासियों का विस्थापन, जंगल और जमीन पर जन सामान्य के अधिकारों की अस्वीकृति आदि मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है। इस प्रकार के प्रकरणों में आए दिन नागरिक अधिकार संबंधी संगठनों द्वारा आवाज उठाई जाती है। सर्वोच्च न्यायालय में मानवाधिकार के उल्लंघन से संबंधित अनेक मुकदमे आए दिन दायर किए जाते हैं। इनमें से अधिकांश मुकदमे केंद्र सरकार अथवा राज्य सरकार के विरुद्ध होते हैं। अधिकांश मामलों में सरकार ही दोषी पायी जाती है। कहने का आशय यह है कि जब सरकार ही मानवाधिकारों का उल्लंघन करने को तत्पर है तो सामान्य जन अपने अधिकारों की रक्षा कैसे कर सकता है। यह विडम्बना ही तो है।

पुलिस और मानवाधिकार 

पुलिस और मानवाधिकार पारस्परिक रूप से एक-दूसरे से सम्बद्ध हैं। प्रायः मानवाधिकार उल्लंघन के सर्वाधिक मामलों में पुलिस विभाग की संलिप्तता पायी जाती है। प्रायः अपराधियों से निपटने के लिए पुलिस विभाग मारपीट और प्रताड़ना का सहारा लेता है। ऐसी स्थिति में अपराधी के मानवाधिकारों के उल्लंघन की संभावना लगातार बनी रहती हैं। प्रायः महिलाओं के मामले में पुलिस को और भी संवेदनशील और सतर्क होना पड़ता है। पुलिस अभिरक्षा में महिलाओं के शारीरिक शोषण का खतरा बना रहता है। इसीलिए यह नियम बनाया गया है कि महिलाओं को सूर्यास्त के बाद एवं सूर्योदय के पूर्व गिरफ्तार न किया जाय। न्यायालय भी पुलिस हिरासत में किसी महिला के मानवाधिकार हनन को बहुत गंभीरता से लेता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग एवं पुलिस शिकायत प्राधिकरण भी प्रयास में है कि ऐसी घटनाओं पर रोक लगे तथा अपराधी को कड़ी से कड़ी सजा मिले। पुलिस अभिरक्षा में महिलाओं के साथ होने वाले उत्पीड़न, विशेषतौर पर यौन उत्पीड़न पर सर्वोच्च न्यायालय काफी गंभीर है और समय समय पर दिशा-निर्देश भी दे चुका है। किन्तु इन सब स्थितियों के बावजूद पुलिस विभाग द्वारा मानवाधिकारों का लगातार उल्लंघन किया जा रहा है। 

“पुलिस और मानवाधिकार पारस्परिक रूप से एक-दूसरे से सम्बद्ध हैं। प्रायः मानवाधिकार उल्लंघन के सर्वाधिक मामलों में पुलिस विभाग की संलिप्तता पायी जाती है।” 

पुलिस विभाग को मानवाधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए राष्ट्रीय पुलिस अकादमी हैदराबाद तथा राज्य पुलिस प्रशिक्षण संस्थानों के पाठ्यक्रम में अब मानवाधिकार विषय को भी शामिल किया गया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा राज्य मानवाधिकार आयोग विशेषतौर पर पुलिस द्वारा किए गए मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में काफी सतर्क हैं और त्वरित कार्यवाही करते हैं। मानवाधिकार आयोग ने सभी जिला मजिस्ट्रेटों तथा जिला पुलिस अधीक्षकों को निर्देश दिया है कि पुलिस अभिरक्षा में होने वाली सभी मौतों तथा बलात्कार आदि की घटनाओं की सूचना 24 घंटे के अंदर आयोग को दी जाय। 

कार्यालयों, घरों तथा कार्य के अन्य स्थलों पर प्रायः यौन उत्पीड़न की घटनाएं घटती हैं। मानवाधिकारों के उल्लंघन के क्षेत्र में यह अति संवेदनशील मामला है। यह सर्वमान्य सत्य है कि स्त्री और पुरुष के मध्य जो लैंगिक अंतर है उसे हटाया नहीं जा सकता है किन्तु लैंगिक संवेदनशीलता के मामले में हमारा यह पिछड़ापन इस बात का सबूत है कि हम अभी भी मानवाधिकारों को मान्यता देने के हक में नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा महिलाओं के यौन उत्पीड़न पर कई बार दिशा निर्देश जारी करने के बाद केंद्र सरकार द्वारा इस संबंध में कानून भी बना दिया गया है। लैंगिक संवेदनशीलता को पाठ्यक्रम में भी शामिल करने पर विचार किया जा रहा है। किन्तु स्त्रियों के मानवाधिकारों के प्रति हमें स्वयं ही जागरूक होना होगा। 

यद्यपि मानव अधिकारों को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की मान्यता मिल चुकी है तथापि भारत जैसे देश में अभी यह शैशवावस्था में ही है। हमारे यहां इसके प्रति वह जागरूकता नहीं है जिसकी अपेक्षा है। हालांकि केंद्र सरकार द्वारा इस दिशा में कई ठोस उपाय पिछले कुछ वर्षों में किए गए हैं। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना, शिक्षा का अधिकार अधिनियम, प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून आदि इस दिशा में कुछ ठोस कदम हैं। इन सबके द्वारा उन मानवाधिकारों को मान्यता दी गयी है जिन्हें संविधान में स्थान नहीं मिल सका था। पूर्व के वर्षों में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का गठन भी केंद्र सरकार द्वारा किया गया है। 

कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न रोकने हेतु अधिनियम, रैगिंग के विरुद्ध अधिनियम, बाल श्रमिक पुनर्वास कोष की स्थापना इत्यादि सरकारी कदमों को इस दिशा में ठोस उपाय की संज्ञा दी जा सकती है। किन्तु इसके अतिरिक्त अभी भी अनेक कार्य इस दिशा में किए जाने हैं। इनमें सबसे आवश्यक कार्य है जनसाधारण को मानवाधिकारों के प्रति जागरूक बनाना। सच पूछा जाय तो इस दिशा में सरकार द्वारा कोई ठोस कार्य नहीं किया गया है। इसके लिए कुछ सुझाव इस प्रकार हैं- 

1.मानवाधिकार को शुरुआती स्तर के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।

2. निरक्षर जनता के लिए विधिक साक्षरता कार्यक्रम चलाया जाय और उसमें मानवाधिकार को भी एक विषय के रूप में शामिल किया जाए। 3. मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता के लिए संचार माध्यमों का उपयोग किया जाए।

4. स्वैच्छिक संगठनों को मानवाधिकार के प्रति जागरूक किया जाए।

5. सरकारी संस्थानों, कार्यालयों को मानवाधिकारों के प्रति समय समय पर सतर्क करने हेतु परिपत्र जारी किए जाए।

6. मानवाधिकारों की दिशा में कार्यरत संस्थानों, स्वैच्छिक संगठनों का चिह्नीकरण किया जाए तथा उन्हें विशेष प्रोत्साहन दिया जाए। 

भारत में मानवाधिकारों से जुड़ा मौजूदा परिदृश्य बहुत आशाजनक नहीं है, बावजूद इसके इस दिशा में पहलें हो रही हैं। इस परिदृश्य को बदलने में जहां सामाजिक पृष्ठभूमि में बदलाव लाना होगा, वहीं हमें खुद अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना होगा। इसके लिए जन जागृति आवश्यक है। आवश्यकता इस बात की भी है कि भारत में मानवाधिकारों के संरक्षण की कोशिशें बढ़-चढ़कर हों तथा इनके क्रियान्वयन के समुचित उपाय हों। 

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