समावेशी विकास UPSC | समावेशी विकास Drishti IAS | समावेशी विकास पर निबंध

समावेशी विकास UPSC

समावेशी विकास UPSC | समावेशी विकास Drishti IAS या समावेशी विकास अथवा द्वारा समावेशित विकास हो पाना संभव है? (आईएएस मुख्य परीक्षा, 2015) 

विज्ञान की गति के अनुसार दुनिया में कोई भी स्थिति स्थिर नहीं होती, वह चाहे इंसान हो, जीवन प्रणाली हो या वृहत्तर अर्थों में व्यवस्था ही क्यों न हो। सामंतवाद से पूँजीवाद तक की गति इस परिवर्तन को व्यक्त करती है। यूरोप में हुई औद्योगिक क्रांति एवं लोकतांत्रिक मूल्यों जैसे उदारवाद एवं व्यक्तिवाद की छत्रछाया में पूँजीवाद अस्तित्व में आया। उदारवाद में व्यक्ति केन्द्रित व्यवस्था की वकालत की जाती है। लोकतांत्रिक मूल्यों के अस्तित्व में आने के बाद लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का जन्म होता है जिसमें राज्य का दायित्व है कि वह आम जन मानस के कल्याण हेतु कार्य करे। यहाँ यह सवाल उठना अवश्यम्भावी हो जाता है कि क्या पूंजीवाद द्वारा समावेशित विकास हो पाना संभव है? इसका उत्तर समझने के लिए हमें बारी-बारी से पूँजीवाद एवं समावेशित विकास को समझना होगा 

जब उत्पादन के साधनों पर किसी व्यक्ति या संस्था का स्वामित्व हो तो इस तरह की व्यवस्था को पूँजीवाद कहा जाता है। वर्तमान में लगभग पूरी दुनिया के देशों में पूँजीवाद का अस्तित्व है। पूँजीवाद के द्वारा निम्नलिखित लाभ जन सामान्य द्वारा प्राप्त किये जाते हैं 

पूंजीपतियों की आपसी प्रतिस्पर्धा में उपभोक्ता को बेहतर कीमत पर वस्तुओं को उपलब्ध करना। 

पूँजीवाद में उत्पादन साधन में निरंतर विकास के लिये नवाचारों को गति प्रदान की जाती है। ध्यातव्य है कि इन नवाचारों से आम इंसान के जीवन में भी परिवर्तन होता है।

पूँजीवादी व्यवस्था में व्यक्ति को अपने मनमुताबिक जीवन विकसित करने का अधिकार होता है।

इंसान अपनी प्रतिभा को सँवार कर ऊँचाइयों पर पहुँच सकता है। 

जब उत्पादन के साधनों पर किसी व्यक्ति या संस्था का स्वामित्व हो तो इस तरह की व्यवस्था को पूँजीवाद कहा जाता है। वर्तमान में लगभग पूरी दुनिया के देशों में पूँजीवाद का अस्तित्व है।

समावेशी विकास वह व्यापक अवधारणा है, जिसका प्रमुख उद्देश्य यह है कि देश की विकास प्रक्रियाओं में सभी नागरिकों को न सिर्फ सम्मिलित किया जाए, बल्कि इनसे मिलने वाले लाभों की शत-प्रतिशत पहुंच भी उन तक सुनिश्चित की जाए। यानी यह अवधारणा सभी भागीदारों के समान अवसर एवं समान लाभ पर केंद्रित है तथा विकास के वितरणात्मक (Distributive) स्वरूप को प्रोत्साहित करती है। यह विकास की वह पोषणीय रणनीति है, जो आर्थिक संवृद्धि को नीचे की ओर ले जाकर यानी विकास दर का रिसाव नीचे की ओर बनाए रखकर उस वितरणमूलक सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करती है. जिसमें भेद-भाव की गुंजाइश नहीं रहती है। सच तो यह है कि देश में व्याप्त निर्धनता, बेरोजगारी, अशिक्षा, कुपोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी 

समस्याओं को समावेशी विकास के माध्यम से ही दूर किया जा सकता है, क्योंकि इसका लाभ वंचितों तक पहुंचता है। समावेशी विकास के इसी वितरणमूलक स्वरूप को ध्यान में रखकर ही भारत में आर्थिक संवृद्धि को पर्याप्त रूप से समावेशित बनाने की आवश्यकता महसूस की गई और देखते ही देखते ‘समावेशी विकास’ विकासोन्मुख भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे चर्चित शब्द बन गया। 

“भारत की विकासोन्मुख अर्थव्यवस्था की सार्थकता इसी में है कि इसका लाभ समाज के निर्धनतम एवं दुर्बलतम व्यक्ति तक पहुंचे। इसके लिए भारतीय विकास को समावेशी स्वरूप एवं संस्पर्श दिए जाने की आवश्यकता है।” 

यहां यह रेखांकित करना समीचीन रहेगा कि समावेशी विकास अपने विस्तृत आकार में सामाजिक न्याय की उस अवधारणा का पोषण भी करता है, जिसे हमारे संविधान में प्रमुखता से मान्यता प्रदान की गई है। यह भी जान लेना जरूरी है कि विश्व भर में आर्थिक एवं सामाजिक कल्याण की नीतियों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से वर्ष 1961 में स्थापित ‘आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन’ (Organi zation for Economic Co-operation and Development OECD) ने भी आर्थिक चुनौतियों के नए उपागमन (New Ap proach) के रूप में समावेशी विकास को महत्त्वपूर्ण बताया है। स्पष्ट है कि समावेशी विकास स्वयं में एक समग्र एवं संपूर्ण अवधारणा है, जो कि सूक्ष्म-अर्थशास्त्र (Micro-economics) एवं वृहद-अर्थशास्त्र (Marco-economics) के मध्य प्रत्यक्ष अंतर्संबंधों का निर्माण करती है। सामान्य रूप से किसी विकास को समावेशी विकास तब माना जाता है, जब विकास के साथ-साथ सामाजिक अवसरों का भी समान वितरण हो। इसी आधार पर समावेशी विकास के जो तीन अनिवार्य घटक निर्धारित किए गए हैं, वे हैं—(1) सेवाओं एवं मूल्यों का समान वितरण (2) अवसरों की समानतामूलक उपलब्धता एवं (3) विकास द्वारा प्रत्येक व्यक्ति का सशक्तीकरण। इन्हीं के इर्द-गिर्द समावेशी विकास की समस्त प्रक्रियाएं परिभ्रमण करती हैं। 

समावेशी विकास की सामाजिक बदलाव एवं सामाजिक प्रगति की समग्र अवधारणा को ध्यान में रखकर भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह कहा जा सकता है कि हमें एक ऐसी विकास प्रक्रिया की आवश्यकता है, जो और अधिक समावेशी हो, जो गरीबी में अधिक तेजी से कमी लाने के लिए गरीबों की आय को बढ़ाए, जो अच्छी गुणवत्ता वाले रोजगार का विस्तार करे और जो जनसंख्या के सभी वर्गों के लिए स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसी आवश्यक सेवाओं तक पहुंच को भी सुनिश्चित करे। ये हमारे देश की आवश्यकताएं भी हैं, जिन्हें ध्यान में रखकर समावेशी विकास की पहलों का सिलसिला निम्न चरणों में आगे बढ़ाना होगा 

आधारभूत संरचनाओं – सड़क, स्वास्थ्य सेवाएं, पेयजल स्वच्छता, सिंचाई, शिक्षा इत्यादि के क्षेत्र में विशेष प्रयास किए जाने चाहिए तथा आर्थिक विकास की धारा को इस ओर मोड़ा जाना चाहिए।

ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। निचले तबके तक विकास की लहर पहुंचाने के लिए रोजगार के अवसरों का बढ़ना नितांत आवश्यक है।

कृषि तथा ग्रामीण विकास के क्षेत्र में निवेश में वृद्धि की जानी चाहिए ताकि ग्रामीण जनता की आय में वृद्धि हो सके।

सूचना प्रौद्योगिकी आधारित तकनीकों की सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए। 

पिछड़ी तथा दलित जातियों, महिलाओं, आदिवासियों के सशक्तीकरण की दिशा में विशेष प्रयास किया जाना चाहिए।

इस प्रकार समावेशी विकास की प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं। अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों, अन्य पिछड़ी जातियों अल्पसंख्यकों और महिलाओं तथा बच्चों के उत्थान कार्यक्रमों के साथ-साथ कृषि, सिंचाई, जल संसाधन, स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण अवसंरचना में महत्त्वपूर्ण निवेश तथा सामान्य अवसंरचना के लिए जरूरी सार्वजनिक निवेश संबंधी आवश्यकताएं इसमें शामिल हैं। 

भारत को समावेशी विकास से आच्छादित करने के प्रयास जारी हैं। इस दिशा में कारगर पहल करते हुए केंद्र सरकार द्वारा 1 मई, 2016 को अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ का शुभारंभ किया गया, जिसके तहत बीपीएल परिवारों की महिला प्रमुख के नाम निःशुल्क एलपीजी कनेक्शन दिए की व्यवस्था की गई है। देश में अनुसूचित जातियों/अनमचित जातियों एवं महिलाओं को वित्तीय सहायता सुनिश्चित कर उनमें उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से जहां 5 अप्रैल, 2016 को स्टैंड अप योजना का शुभारंभ किया गया, वहीं सामाजिक मरक्षा सनिश्चित करने के उद्देश्य से मई, 2015 में शुरू की गई सामाजिक योजनाओं-अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना तथा प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना को महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। देश के ग्रामीण क्षेत्रों को आर्थिक, सामाजिक और भौतिक रूप से संपोषणीय क्षेत्रों में रूपांतरित करने के महात्वाकांक्षी उद्देश्य से 21 फरवरी, 2016 को ‘श्यामा प्रासाद मुखर्जी रूर्बन मिशन’ की शुरुआत की जा चुकी है। इसी क्रम में ग्रामीण क्षेत्र में आधारिक संरचना के विकास के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, प्रधानमंत्री आदर्श गांव योजना, राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना, ग्रामीण आवास योजना, राष्ट्रीय बायोगैस कार्यक्रम, ग्रामीण पेयजल योजना, उन्नत चूल्हा कार्यक्रम, ग्रामीण विद्युतीकरण योजना का संचालन स्थानीय स्वशासी संस्थाओं के माध्यम से किया जा रहा है। ग्रामीण आवागमन व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना ग्रामीण विकास के क्षेत्र में काफी सहायक सिद्ध हो रही है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क संपर्क से वंचित सभी गांवों को सड़क मार्ग से जोड़ना है। 

फ्लैगशिप कार्यक्रम के अंतर्गत जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम, एकीकत बाल विकास सेवाएं, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, पूर्ण स्वच्छता अभियान, राजीव गांधी पेयजल मिशन, सर्वशिक्षा अभियान, मध्याह्न भोजन योजना पर विशेष ध्यान देकर सरकार समावेशी विकास के लक्ष्य को शीघ्र अतिशीघ्र हासिल कर लेने की योजना पर काम कर रही है। इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार द्वारा भारत निर्माण परियोजना का संचालन किया जा रहा है। इसके अंतर्गत असिंचित भूमि को सिंचाई सुविधा से युक्त करना, दूरवर्ती गांवों को पेयजल उपलब्ध कराना, निर्धनों हेतु आवास का निर्माण कराना, सभी गांवों को विद्युत तथा टेलीफोन सुविधा से युक्त करना इत्यादि लक्ष्य पर काम चल रहा है। नकद हस्तांतरण योजना, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, प्रधानमंत्री जनधन योजना, 2022 तक सभी के लिए आवास मिशन, 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करना, श्रमेव जयते योजना आदि के रूप में इस दिशा में कुछ हालिया अच्छी पहले हुई हैं। 

यह सच है कि भारत में समावेशी विकास की पहले जारी हैं, किंतु समावेशी विकास की रणनीति को और पैना बनाने के लिए अभी और प्रयासों की आवश्यकता है। बेहतर परिणामों के लिए जहां स्वस्थ प्रतिस्पर्धा, नवाचार एवं सृजनशीलता को बढ़ावा दिए जाने की आवश्यकता है, वहीं वित्त एवं ऊर्जा के क्षेत्र में मितव्ययता को प्रोत्साहन दिए जाने की आवश्यकता है। समावेशी विकास के स्वप्न का साकार करने के लिए हमें श्रमिकों एवं कर्मियों के कल्याण पर ध्यान देना होगा, तो वंचित वर्गों के लिए अवसरों की उपलब्धता का बढ़ाना होगा। जहां शोध एवं विकास को प्रोत्साहन दिए जाने की आवश्यकता है, वहीं पर्यावरण संरक्षण एवं अनुकूलन की पहले भी आवश्यक हैं। समावेशी विकास के लिए उद्योग जगत को भी आगे आना होगा। यह नितांत आवश्यक है कि समावेशी विकास के लिए उद्योग जगत ‘कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी’ (CSR) का निर्वहन करते हुए अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का पूरा-पूरा ध्यान रखे। वह विलासिता पर किए जाने वाले व्यय में कमी लाकर उस धन को समाज कल्याण में लगाए। उद्योग जगत से यह भी अपेक्षित है कि वह अपने उत्पादों की वाजिब कीमत रखकर, अपने यहां कार्यरत श्रमिकों एवं उनके परिवारों के लिए कल्याणकारी नीतियां बना कर. प्रतिभावान छात्रों को छात्रवृत्तियां देकर, पर्यावरण संरक्षण व अनुकूलन की पहले कर तथा अनुसंधान एवं शोध कार्यों को प्रोत्साहित कर समावेशी विकास को प्रभावी बनाने में अपना यथेष्ट योगदान दे। समावेशी विकास के लिए मीडिया का भी रचनात्मक सहयोग आवश्यक है। 

यहां यह रेखांकित करना समीचीन रहेगा कि एशियाई विकास बैंक (ADB) द्वारा समावेशी वृद्धि का जो त्रिस्तरीय नीति स्तंभ (Three Policy Pillars) निर्मित किया गया है, उसके तीन स्तंभ हैं—(1) आर्थिक वृद्धि (उच्च प्रभावी एवं टिकाऊ वृद्धि) (2) संस्थागत विकास एवं (3) सामाजिक सुरक्षा (समाज के कमजोर वर्गों | का संरक्षण)। समावेशी विकास के इस नीति स्तंभ की कसौटी पर खरा उतरने के लिए सुशासन (Good Governance) की ता महता आवश्यकता है ही, सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाओं का उदार सहयोग भी अपेक्षित है। उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि आर्थिक विकास के परिणामस्वरूप समाज में भ्रष्टाचार बढ़ता है, साथ ही समावेशी विकास की प्रक्रियाओं को भी भ्रष्टाचार बाधित करता है। भारत जैसे विकासशील देश की सबसे बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार है, जिसके नियंत्रण के बिना समावेशी विकास संभव नहीं है। 

भारत की विकासोन्मुख अर्थव्यवस्था की सार्थकता इसी में है कि इसका लाभ समाज के निर्धनतम एवं दुर्बलतम व्यक्ति तक पहुंचे। इसके लिए भारतीय विकास को समावेशी स्वरूप एवं संस्पर्श दिए जाने की आवश्यकता है। हम इस दिशा में बढ़ भी रहे हैं। आशा है, भारतीय विकास को समावेशित बनाकर हम देश में सामाजिक न्याय को स्थापित कर सकेंगे। 

अर्थशास्त्र के महान विद्वान एडम स्मिथ के अनुसार आर्थिक विकास उत्पादन के साधनों पर किये गये निवेश पर निर्भर करता है। भारत के संदर्भ में बात करें तो आर्थिक उदारीकरण (1991) के 

पश्चात् भारत की आर्थिक विकास की दर लगातार बढ़ी है। बढ़ी हुई । आर्थिक विकास के कारण देश में गरीबी को रोकने में काफी मदद मिली है। वर्ष 2017 में भारत चीन को पीछे छोड़ते हुए सबसे तेज विकास दर वाले देश के रूप में सामने आया। ध्यातव्य है कि भारत । में वर्ष 2011 में जहाँ 36करोड़ लोग गरीब थे वहीं यह आंकड़ा वर्तमान में (2019 में) 27 करोड़ है। 

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