राष्ट्रीय चेतना में वैज्ञानिक प्रवृत्ति का समावेश अथवा क्या हमारे देशवासियों में वैज्ञानिक चेतना और सोच का अभाव है?

राष्ट्रीय चेतना में वैज्ञानिक प्रवृत्ति का समावेश 

राष्ट्रीय चेतना में वैज्ञानिक प्रवृत्ति का समावेश अथवा क्या हमारे देशवासियों में वैज्ञानिक चेतना और सोच का अभाव है? (Inculcating Scientific Temper into National Consciousness) 

विज्ञान के क्षेत्र में उत्कर्ष और उन्नयन के लिए वैज्ञानिक प्रवृत्ति का होना अत्यंत आवश्यक है। वैज्ञानिक प्रवृत्ति और चेतना इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि भारत जैसे देश में विद्यमान गरीबी, बेरोजगारी, ऊंची मुद्रा स्फीति, रुढ़िवादिता, अंधविश्वास, अशिक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का समाधान विज्ञान से ही संभव है और इसके लिए वैज्ञानिक सोच एवं प्रवृत्ति का व्यापक होना आवश्यक है। इतना ही नहीं, लोकतंत्र की बेहतरी के लिए भी यह आवश्यक है कि हम वैज्ञानिक प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करें। वस्तुतः जिन देशों में लोकतंत्र के साथ वैज्ञानिक प्रवृत्ति को शामिल किया गया, वहां की स्थितियां बेहतर और विकासोन्मुख हैं, जबकि जिन देशों में ऐसा नहीं हो पाया, वहां के हालात सुखद और संतोषजनक नहीं हैं। वस्तुतः वैज्ञानिक प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मनोवृत्ति को मजबूत करती है और जनता तार्किक वैज्ञानिक प्रवृत्ति पर आधारित अपने अधिकारों को स्पष्ट करने में समर्थ होती है। हम विज्ञान संचार के माध्यम से ही वैज्ञानिक प्रवृत्ति को विकसित व प्रोत्साहित कर सकते हैं, क्योंकि विज्ञान के मूल तरीकों की समझ ही वैज्ञानिक प्रवृत्ति है। 

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू विज्ञान के न सिर्फ प्रबल पक्षकार थे. बल्कि वैज्ञानिक प्रवृत्ति के प्रबल पैरोकार भी थे। वैज्ञानिक प्रवृत्ति (Scientific Temper) उन्हीं का दिया हुआ शब्द है। देश के पहले प्रधानमंत्री पं. नेहरू की चर्चित पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ वर्ष 1946 में प्रकाशित हुई थी। इस पुस्तक में उन्होंने पहली बार ‘वैज्ञानिक प्रवृत्ति’ जैसे शब्द का प्रयोग किया था। पं. नेहरू यह चाहते थे कि देश में विज्ञान की भूमिका व्यापक और बहुआयामी हो। मसलन, विज्ञान को मानव जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाना चाहिए, मानव गतिविधियों के हर क्षेत्र, जिसमें राजनीति भी शामिल ह, में वैज्ञानिक मानसिकता प्रतिफलित होनी चाहिए एवं वैज्ञानिक मानासकता को ज्ञान से जोड़ना चाहिए। पं. नेहरू द्वारा प्रतिपादित इन बिन्दुओं से यह पता चलता है कि विज्ञान को लेकर उनकी दृष्टि कितनी व्यापक और स्पष्ट थी। 

“देश में विज्ञान की भूमिका व्यापक और बहुआयामी हो। मसलन, विज्ञान को मानव जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाना चाहिए, मानव गतिविधियों के हर क्षेत्र, जिसमें राजनीति भी शामिल है, में वैज्ञानिक मानसिकता प्रतिफलित होनी चाहिए एवं वैज्ञानिक मानसिकता को ज्ञान से जोड़ना चाहिए।” 

इसे विडंबना ही कहेंगे कि जिस देश के पहले प्रधानमंत्री द्वारा वैज्ञानिक प्रवृत्ति शब्द दिया गया हो, वह देश आजादी के छह दशकों से भी ज्यादा समय गुजर जाने के बाद इस संदर्भ में यथेष्ट प्रगति नहीं कर पाया। शायद भारत के विज्ञान में पिछड़ने की भी यही मुख्य वजह है। विज्ञान के क्षेत्र में शीर्ष पर पहुंचने के लिए जो वैज्ञानिक प्रवृत्ति और चेतना देशवासियों में होनी चाहिए, वह दूर-दूर तक नहीं दिखती। हम अपने गौरवशाली अतीत से भी प्रेरणा नहीं ले पा रहे हैं। जिस देश के वैज्ञानिकों ने अपने योगदान से गणना को संभव बनाया हो और दुनिया को दशमलव और शून्य जैसी महान सौगातें दी हों, उस देश में वैज्ञानिकता की जड़ता का दिखना यकीनन दुखद है। कभी-कभी तो देश में बढ़ते अंधविश्वास, रूढ़िवादिता और अतार्किकता के माहौल को देखते हुए ऐसा लगता है कि हम बजाय आगे बढ़ने के पीछे लौट रहे हैं। तमाम टीवी चैनलों पर जादू, टोना व अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम खूब दिखाए जाते हैं। ये इसलिए सफल हैं, क्योंकि इन्हें पसंद किया जाता है और इन्हें पसंद इसलिए किया जाता है, क्योंकि हमारे देशवासियों में वैज्ञानिक प्रवृत्ति का स्तर अल्प है। यदि थोड़ा सा है भी तो वह मुखर नहीं है। हम बातों को तर्क की कसौटी पर कसना भूल चुके हैं। देश में वैज्ञानिक प्रवृत्ति विकसित हो भी तो कैसे! मूढ़ और अनपढ़ों की तो बात छोड़िए, पढ़े-लिखे लोग तक अपना रास्ता तब बदल देते हैं, जब कोई काली बिल्ली रास्ता काट देती है। 

वैज्ञानिक प्रवृत्ति और चेतना के अभाव की वजह से ही हम विज्ञान के क्षेत्र में पिछड़ रहे हैं, जबकि छोटे-छोटे देश हमसे बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विज्ञान में हमारे पिछड़ेपन का सिर्फ यही एक कारण नहीं है, दूसरे और भी कारण हैं, किंतु इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि यह एक बड़ा कारण बेशक है। हम न तो वैज्ञानिक प्रवृत्ति की उस परंपरा को आगे बढ़ा पाए, जिसका सूत्रपात पं. नेहरू ने किया था और न ही इसके लिए एक पराशैक्षिक दृष्टिकोण को ही विकसित कर पाए। जब प्रवृत्ति वैज्ञानिक होती है, तब जिज्ञासाएं बढ़ती हैं, तार्किकता बढ़ती है, जो कि अनुसंधान और आविष्कार के लिए प्रेरित करती हैं। जिन देशों में यह प्रवृत्ति है, वे इस क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। जितने भी बड़े आविष्कार हुए, उनके पीछे वैज्ञानिक प्रवृत्ति का विशेष योगदान रहा। 

भारत को यदि विज्ञान के क्षेत्र में अपना परचम बलंद करना है तो इसके लिए यह अतिआवश्यक है कि देश में वैज्ञानिक प्रवृत्ति की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इसकी श्रीवृद्धि की जाये। यह बहुत आसान काम नहीं है, किन्तु अभीष्ट परिणामों के लिए हमें यह कर दिखाना होगा। इसे संभव बनाने के लिए यह जरूरी है कि हर भारतीय के हृदय में विज्ञान की ज्वाला धधके और विज्ञान की पैठ देश के छोटे-छोटे गांवों व परवों तक हो। यह काम विशेष प्रयासों से ही संभव हो सकता है और इसमें मीडिया की भागीदारी काफी उपयोगी साबित हो सकती है। 

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम देश की जनता के मध्य वैज्ञानिक प्रवृत्ति का सृजन करें। इसके लिए सहभागिता और संवाद की प्रक्रिया तो आवश्यक है ही, एक धारणा के रूप में इसे व्यापक और बलवती बनाना भी आवश्यक है। अब यह आवश्यक हो चुका है कि हम विज्ञान को जनाकर्षण का केंद्र बनाएं और इसके लिए वैज्ञानिक साक्षरता और विज्ञान से जुड़ी जन समझ को प्रोत्साहित करें। शोध संस्थानों को अधिक प्रभावी बनाएं और शोध छात्रों को दिल खोलकर राजकीय संरक्षण प्रदान करें। ऐसा करते हुए हमें अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से सामंजस्य स्थापित करने और समन्वय बनाने पर विशेष बल देना होगा। 

“यह सर्वविदित है कि विज्ञान ही विकास का पर्याय है। इस वैज्ञानिक युग में प्रगति तब तक संभव नहीं है, जब तक कि हमारे पास विज्ञान और प्रौद्योगिकी का मजबूत आधार न हो।” 

किसी भी चीज की पैठ बढ़ाने में भाषा की एक खास अहमीयत होती है। कारण, अपनी भाषा में किसी भी बात को समझना ज्यादा सहज और आसान होता है। वैज्ञानिक प्रवृत्ति के संदर्भ में भी यह बात लागू होती है। यदि हमें इसकी पैठ आम आदमियों तक बढ़ानी है, तो स्थानीय भाषाएं प्रसार का बेहतर माध्यम हो सकती है। व्यावहारिक पहले स्थानीय भाषाओं के माध्यम से प्रभाव दिखाती हैं, अतएव इस दिशा में विशेष रूप से ध्यान दिए जाने की जरूरत है। 

इसे विडंबना कहें या विज्ञान के प्रति नीति नियंताओं में व्याप्त अचेतना, कि हमारे देश में आज तक कोई ऐसा व्यापक अध्ययन नहीं हुआ, जो वैज्ञानिक प्रवृत्ति के स्तर की पैमाइश कर सकता आर इससे जुड़े ठोस और पारदर्शी आंकड़े जुटा पाता। राष्ट्र के अग्रणी पंक्ति के वैज्ञानिक संस्थानों को मिलकर इस दिशा में काम करना चाहिए ताकि सही परिदृश्य स्पष्ट हो सके और उसके अनुरूप हम समग्र रूप से ठोस प्रयास कर सकें। इसके साथ ही वैज्ञानिक प्रवृत्ति के प्रसार के लिए उपकरणों एवं संसाधनों के विकास को भी वरीयता देनी होगी। अब वह समय आ गया है कि हम वैज्ञानिक गतिविधियों क दस्तावेजीकरण की तरफ ध्यान दें और इसके लिए एक ऐसा वेब आधारित डाटाबेस तैयार करें, जिसमें उपलब्धियों के रूप में सफलता भी संकलित हो और विफलताएं भी। शोधार्थियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा और प्रोत्साहन मिले, इसके लिए हमें नये सम्मान सृजित करने होंगे, जिनसे उदीयमान वैज्ञानिक प्रतिभाओं को नवाजा जा सके। इन्हें वित्त पोषित करना एवं अनुसंधान कायों के लिए आर्थिक मदद उपलब्ध करवाना भी हमारी जिम्मेदारी है। 

जैसा कि हम पहले भी कह चुके हैं, वैज्ञानिक प्रवृत्ति की पैठ को नागरिकों के मध्य बढ़ाने के लिए मीडिया की विशेष उपादेयता हो सकती है। इस दिशा में हमें जिस गंभीरता से ध्यान देना चाहिए था, नहीं दिया, नतीजतन मीडिया ने मनोरंजन के छिछले खोल में खुद को छिपा लिया। हमें उसे इस खोल से बाहर निकालना होगा। हमें ‘मास मीडिया’ को आगे रखकर विज्ञान से जुड़ा एक प्रेरक माहौल निर्मित करना होगा। इस माहौल के निर्माण के लिए संचार माध्यमों के लिए एक ऐसी नियमावली भी बनाई जा सकती है, जो उन पर बाध्यकारी हो। देश में कम से कम एक टीवी चैनल तो ऐसा होना चाहिए, जो विज्ञान से जुड़ी सूचनाओं, अनुसंधानों व आविष्कारों आदि पर केन्द्रित हो तथा विज्ञान से जुड़े शैक्षणिक कार्यक्रम भी चलाए। इस रूप में एक समर्पित ‘भारतीय विज्ञान टेलीविजन चैनल’ की आवश्यकता है, जिसकी तरफ हमारा ध्यान अभी तक नहीं गया है। 

हम विज्ञान संचार के एक मजबूत और प्रभावी माध्यम के रूप में इलेक्ट्रानिक मीडिया का प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं। विज्ञान से जो मनोरंजक कार्यक्रमों की उपस्थिति टीवी चैनलों पर नगण्य है। तस्वीर का दूसरा रुख यह है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया पर भूत-प्रेत, अंधविश्वास. अपराध व सनसनी परोसने वाले कार्यक्रम छाये हुए हैं, जो वैज्ञानिक प्रवृत्ति के विकास में अवरोधक की भूमिका निभाते हैं। ये कार्यक्रम गैर वैज्ञानिक विचारों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। ‘डिस्कवरी’ जैसे इक्का दुक्का विदेशी टीवी चैनल अवश्य वैज्ञानिक सरोकारों से जुड़े हैं, पर भारतीय टीवी चैनलों ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी से पूरे तौर पर मंह मोड़ रखा है। प्रामाणिक वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त करने के लिए हमारे पास अपना कोई चैनल उपलब्ध नहीं है। इस दिशा में फौरन से पेश्तर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। 

यह सर्वविदित है कि विज्ञान ही विकास का पर्याय है। इस वैज्ञानिक युग में प्रगति तब तक संभव नहीं है, जब तक कि हमारे पास विज्ञान और प्रौद्योगिकी का मजबूत आधार न हो। इस आधार को तभी तैयार किया जा सकता है, जब हम वैज्ञानिक प्रवृत्ति को अपनाएं। समृद्धि और उत्कर्ष के लिए देश के नागरिकों के मध्य वैज्ञानिक प्रवृत्ति की गहरी पैठ आवश्यक है। यह पैठ इतनी सशक्त होनी चाहिए कि भारत के प्रत्येक नागरिक की दिनचर्या प्रदर्शित हो। ऐसा होने पर जहां देश विकास और समृद्धि की नई इबारत लिख सकेगा, वहीं संपूर्ण विश्व को विज्ञान के अनमोल उपहार भी दे सकेगा। इस संदर्भ में हमें पं. जवाहर लाल नेहरू के इस विचार के मर्म को समझना होगा-“केवल विज्ञान ही इस देश की समस्या को सुलझा सकता है- भूख और गरीबी, अस्वच्छता और निरक्षरता, अंधविश्वास और जान लेवा रीति रिवाज, विशाल संसाधनों की बर्बादी और एक संपन्न देश में भुखमरी से पीड़ित जनता की समस्या को। कौन है, जो आज के युग के विज्ञान की उपेक्षा कर सकता हो। हमें हर मोड़ पर इसका सहायता की दरकार होगी। भविष्य विज्ञान का और विज्ञान के साथ मैत्री करने वालों का है।” 

तो आइये हम भी वैज्ञानिक प्रवत्ति को प्रोत्साहित कर विज्ञान के साथ अपनी मैत्री को प्रगाढ़ बनाकर देश के भविष्य को संवार। 

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