Important essay topics in Hindi for SSC CGL,SSC CHSL or SSC MTS descriptive paper

Important essay topics in Hindi for SSC

Important essay topics in Hindi for SSC CGL,SSC CHSL or SSC MTS descriptive paper SET-1

प्रश्न : ‘सर्जिकल स्ट्राइक या शल्य अन्तर्वेधन’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : आधुनिक समय में युद्ध के परम्परागत तरीके अप्रासंगिक हो गये हैं। वर्तमान में कोई देश नहीं चाहता कि जंग में उसके सैनिक हताहत हों, इस लिए अब अधिकतर देशों ने आमने-सामने की जंग की जगह अन्य हथकंडों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। इन्हीं में से एक है सर्जिकल स्ट्राइक। देश की एकता-अखण्डता के लिए सीमित युद्ध के ऐसे तरीकों का इस्तेमाल इन दिनों काफी चर्चा में है तथा उपयोगी भी सिद्ध हुए हैं। 

सर्जिकल स्ट्राइक दरअसल एक ‘सरप्राइज’ हमला है। दुश्मन को भनक तक नहीं लगती और सेना के विशेष दस्ते बिजली की गति से उसको नेस्तनाबूत कर देते हैं। दुश्मन कुछ समझ पाये, इससे पहले ही उसके ठिकानों का खात्मा कर दिया जाता है। सर्जिकल स्ट्राइक में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि आस-पास के नागरिकों तथा इमारतों को नुकसान न पहुँचाया जाए। 

सर्जिकल स्ट्राइक को काफी सटीकता के साथ अंजाम दिया जाता है। इसके लिए पुख्ता जानकारी (गुप्तचर एजेंसियों के माध्यम से) पहले से जुटाई जाती है तथा एक मास्टर प्लान तैयार किया जाता है और साथ ही यह सुनिश्चित किया जाता है कि दुश्मन पर उस समय हमला किया जाए जब दुश्मन को अधिकतम क्षति पहुँचे। 

सर्जिकल स्ट्राइक में सबसे महत्त्वपूर्ण होता है हथियार तथा आधुनिकतम संसाधन। सर्जिकल ऑपरेशन में लक्ष्य को मात देने के लिए कई अत्याधुनिक तकनीक एवं हथियार की सहायता ली जाती है। इनमें निगरानी ड्रोन, जी.पी. एस. सिस्टम, नाइट विजन डिवाइस, लेजर और साइलेंसर से युक्त मल्टीपल गन, एम-4 कार्बाइन, स्टन ग्रेनेड तथा स्टील्थ हेलीकॉप्टर इत्यादि। इनके इस्तेमाल से न केवल दुश्मन को मात दिया जाता है अपितु ऑपरेशन के दौरान आस-पास के लोगों एवं रक्षा प्रतिष्ठानों को भनक तक नहीं लगती है। 

सर्जिकल स्ट्राइक के तहत ही अमेरिका ने इराक में सद्दाम हुसैन पर कार्यवाही की। पहले उसने सरकारी और सैन्य प्रतिष्ठानों को चुन-चुन कर नष्ट किया। सद्दाम की पकड़ को पहले सर्जिकल स्ट्राइक से ढीली की गयी फिर जमीनी सैन्य कार्यवाही द्वारा उसे अंजाम तक पहुँचाया गया। सबसे बड़ा सर्जिकल ऑपरेशन 2011 में अमेरिका ने ही चलाया था। ऑपरेशन नेपच्यून स्पियर नामक इस ऑपरेशन में आतंकी संगठन अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान के एबटाबाद में अमेरिकी नेवी सील्स कमांडो ने मार गिराया। जून 1976 में इजरायली सेना ने युगांडा के हवाई अड्डे पर बंधक संकट पर सर्जिकल स्ट्राइक की। इजराइल के 100 कमांडो ने हमलावर सभी आतंकियों को मारकर बंधकों को मुक्त कराया था। 

हाल ही में भारत द्वारा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइक करने के कारण यह पुनः विश्व भर में चर्चा का विषय बना हुआ है। 

18 सितम्बर, 2016 को भारतीय सेना के कश्मीर में स्थित उरी सैन्य प्रतिष्ठान पर हमला होता है और आतंकी 18 भारतीय सैनिकों को मौत के घाट उतार देते हैं। इस घटना से भारतीय सेना तथा जनमानस में पाकिस्तान के प्रति उबाल को देखते हुए भारत सरकार ने आतंकियों को सबक सिखाने की ठानी। फलत: पाकिस्तान को पहले कूटनीति में उलझाया गया तथा फिर सर्जिकल ऑपरेशन का कदम उठाया गया। 

भारतीय सेना ने पुख्ता जानकारी मिलने के बाद 28 सितम्बर, 2016 को पूरी तैयारी के साथ एल.ओ.सी. को पार कर 2 किलोमीटर अंदर चल रहे आतंकी शिविरों को नष्ट कर लगभग 50 आतंकियों को मार गिराया। इस ऑपरेशन को भारतीय सेना के विशेष दस्ते ने अंजाम दिया। भारतीय सेना द्वारा किया गया सर्जिकल स्ट्राइक इसलिए और महत्त्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह दो परमाणु बम सम्पन्न देशों के बीच होने वाली पहली घटना है। 

भारत सर्जिकल स्ट्राइक जैसे ऑपरेशंस को पहले भी अंजाम दे चुका है। भारत ने पूर्व में नेपाल एवं म्यांमार जैसे देशों की सहमति से उनकी जमीनों पर अपने दुश्मनों का अंत करने के लिए अभियान चलाया था। 

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि सर्जिकल स्ट्राइक जैसे ऑपरेशन न केवल दुश्मन को प्रतिघात पहुँचाने का बेहतर विकल्प साबित हुए हैं अपितु व्यापक नरसंहार को भी सीमित करते हैं। विशेष तौर पर आतंकियों के खिलाफ कार्यवाही में इसकी सटीकता तथा मारक क्षमता विश्वसनीय सिद्ध हुई है। 

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प्रश्न : ‘बड़े बैंकों की प्रासंगिकता’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : वर्तमान समय में जहाँ लगभग लगभग पूरा विश्व उदारीकरण, निजीकरण, भूमण्डलीकरण (LPG) की ओर आकर्षित होकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में लगा हुआ है, ऐसे में किसी भी देश को पूरी दुनिया के अर्थव्यवस्था से प्रतिस्पर्धा करने के लिए बड़ी मात्रा में पूँजी की आवश्यकता होती है। यह पूँजी देशी स्रोत के आधार पर या तो देश का केंद्रीय बैंक या निजी बैंक या फिर देश के बड़े कारोबारी घराने सरकार को उपलब्ध कराते हैं, ऐसे में बड़े बैंकों के महत्त्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। 

देश में भारतीय रिजर्व बैंक (आर.बी.आई.) केंद्रीय बैंक है तथा साथ में कई बड़े सार्वजनिक एवं निजी बैंक हैं। स्वतंत्रता के बाद से ही बैंकों के राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया शुरू हो गयी थी, जो 1969 में देखने को मिलता है और इसके साथ ही आर.बी.आई. की संस्तुति पर 125 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (R.R.B.) का एकीकरण किया गया। पहले देश में 196 आर.आर. बी. थे। एकीकरण के बाद 71 रह गए। सरकार की योजना है कि वित्त वर्ष 2016 में यह संख्या 64 तक कर दी जाये। छोटे बैंकों में मुख्य समस्या यह होती है कि वे एक बड़े बैंक से पूँजी, तकनीकी, प्रबंधन आदि में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते इसलिए इस संदर्भ में बड़े बैंकों की प्रासंगिकता प्रमाणित हो जाती है। 

सरकार का मानना है कि बेसेल मानदण्डों को पूरा करने के लिए बैंकों को अपनी पूँजी का दायरा बढ़ाना होगा। ऐसे में छोटे बैंकों को इससे काफी समस्या का सामना करना पड़ सकता है। छोटे बैंकों के पास जोखिम प्रबंधन के लिए पर्याप्त पूँजी नहीं होती जिसके आधार पर वे अपने बैंकों को पुन: पटरी पर ला सकें।

 भारत में लगभग 7 या 8 बड़े आकार के बैंक हैं। समानता के आधार पर ये बैंक एक बड़ी पूँजी की पर्याप्तता को अपने आप में समेटे हुए हैं अर्थात् इन बैंकों का आपस में विलय संभव नहीं है, परंतु इन बैंकों के अलावा वे बैंक जो पूँजी के आधार पर इन बैंकों से काफी कम क्षमतावान हैं, वे इन बड़े बैंकों से प्रतिस्पर्धा करने में बड़ी कठिनाई का सामना कर सकते हैं या करते हैं। 

विलय के कारण होने वाले सकारात्मक पक्षों को देखें तो, इससे बैंकों में खासकर छोटे बैंकों में अयोग्यता (तकनीकी) को दूर किया जा सकता है। विलय के उपरांत पब्लिक सेक्टर बैंक जो भौगोलिक रूप से एक क्षेत्र विशेष में सकेंद्रित हैं, उन्हें अपने बैंक के क्षेत्र या शाखाओं का विस्तार करने में सहायता मिल सकेगी। विलय के बाद बैंकों के बीच चली आ रही अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा का दौर खत्म हो जाए ऐसे में आर.बी.आई. को भी कई बार कठोर नीति बनाते समय छोटे बैंकों के बारे में सोचना नहीं पड़ेगा जो अभी करना पड़ता है। सरकार की छोटे बैंकों को बार-बार दी जाने वाली राशि में कमी आयेगी। 

बड़े बैंक छोटे बैंकों की अपेक्षा ज्यादा पूँजी सक्षम होते हैं, साथ ही अपने ग्राहकों के लिए विशेष छूट, बचत दर आदि कम करने या बढ़ाने के बारे में ज्यादा विचार नहीं करना पड़ता जो उनकी “रिस्क टेकिंग रेट” को दर्शाता है। इसके अलावा कुछ बड़े बैंकों के बाजार में रह जाने से बैंकों के बीच में एक स्वस्थ्य प्रतिस्पर्धा का निर्माण हो सकेगा जो कि, बैंकों के लिए, ग्राहकों के लिए तथा अंतत: देश की अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी होगा। 

प्रश्न : ‘हथकरघा उद्योग – स्थिति, संभावनाएँ, सरकार की पहल’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : हथकरघा उद्योग भारत की सांस्कृतिक विरासत एवं परंपरा से जुड़ा उद्योग है। एक समय था जब हमारे यहाँ के बुने हुए वस्त्रों की बारीकियों, कलात्मकता, एवं उच्च गुणवत्ता का पूरा विश्व मुरीद था। प्राचीन समय में हमारे वस्त्रों का व्यापार पूरे विश्व में फैला हुआ था। हाथ से बुने हुए इन वस्त्रों की बारीकियों एवं गुणवत्ता को समझने के लिए मुगलकाल में औरंगजेब के समय का किस्सा है कि , राजकुमारी जीनत को इस कारण डाँटा गया था कि शायद उन्होंने कपड़े नहीं पहने थे परंतु बाद में यह तथ्य पता चला कि, राजकुमारी ने एक नहीं बल्कि सात वस्त्र पहने हुए थे जो सभी हस्त निर्मित थे। परंतु धीरे-धीरे आधुनिकता की चमक में वे सभी उद्योग जो हमारे निजी जीवन के हिस्सा थे समाप्त होते चले गए और हस्तशिल्प के ऊपर मशीनीकृत कार्य भारी पड़ गया। 

स्वतंत्रता के उपरांत एवं उसके पहले इस समाप्त हुए संस्कृति को पुनर्जीवित करने के लिए महात्मा गाँधी जी ने भरसक प्रयास किया। इसके उत्थान के लिए गाँधी जी ने चरखे को लोगों के आत्मसम्मान से जोड़ना शुरू किया एवं इसकी चरम व्यवस्था असहयोग आन्दोलन के दौरान देखी गई। 

इस अवसान की स्थिति में ये छोटे उद्योग कितने उपयोगी हैं, शायद यह तथ्य हमारे अर्थशास्त्रियों से छिपा नहीं है। अत: वर्तमान में सरकार के सामने रोजगार उत्पन्न करने की बेहद बड़ी समस्या खड़ी है, ऐसे में इन हस्ताशिल्प उद्योगों के माध्यम से नवयुवकों को रोजगार दिया जा सकता है, तथा रोजगार सृजन भी किया जा सकता है। 

इस उद्योग के लिए किसी क्षेत्र विशेष की आवश्यकता नहीं होती है। इस उद्योग का विकास ग्रामीण या शहरी किसी भी क्षेत्र विशेष में शुरुआत किया जा सकता है। इस उद्योग का सकल घरेलू उत्पाद एवं विदेशों के निर्यात में महत्वपूर्ण स्थान है। यह उद्योग देश में वस्त्र उत्पादन में 15 प्रतिशत योगदान करता है तथा ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्र में लाखों लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से रोजगार प्रदान करता है। भारत में कृषि के बाद हथकरघा सबसे बड़े रोजगार प्रदाताओं में से एक है। दुनिया में हाथ से बने हुए कपड़े का 95 प्रतिशत भारत से आता है।

 साथ ही पूर्वोत्तर क्षेत्र को संपूर्ण भारत से जोड़ने में ये हस्तशिल्प उद्योग काफी मददगार हो सकते हैं तथा पूर्वोत्तर के लोगों की संस्कृति को अखिल भारतीय स्तर तक प्रचारित एवं प्रसारित किया जा सकता है। इन उद्योगों के साथ सबसे बेहतर बात यह है कि ये उद्योग पर्यावरण के पूर्णतः अनुकूल हैं, जो निश्चित रूप से वर्तमान समय के अनुसार बेहद कारगर सिद्ध हो सकता है। इस उद्योग के पतन के कारणों को एक नजर में रखा जाए तो, हम पाते हैं कि ये उद्योग, मुख्यतः पूँजी की कमी की समस्या से लंबे अरसे से जूझ रहे हैं, पूँजी की कमी के कारण इन उद्योगों एवं उद्योगपतियों के पास उचित एवं आधुनिक तकनीक की भी कमी होती है, ऐसे में इन उद्योगों का मशीनीकृत उद्योगों से प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी दिखाई पड़ता है। 

इन समस्याओं के साथ हाथ से बने कपड़ों में वह चमक नहीं होती जो मशीनीकृत कपड़े में होती है, ऐसे में आज के नवयुवकों की रूचि ऐसे वस्त्रों में नहीं होती। 

वर्तमान में इस उद्योग को पुनः जीवित करने के लिए केन्द्र के साथ-साथ राज्य सरकारें भी अपनी योजनाओं के माध्यम से संचालित कर रही है। इसे बाजार योग्य बनाने हेतु तकनीकी, विपणन और कार्यशील पूँजी हेतु सहायता प्रदान कर रही है। केन्द्र सरकार के द्वारा खादी के कपड़ों की ब्रांडिंग की जा रही है जो निश्चित रूप से प्रशंसनीय है। इससे नवयुवकों एवं आधुनिक सोच वाले लोगों में भी खादी एवं हस्त निर्मित उद्योगों के प्रति आकर्षण उत्पन्न हुआ है। सरकार के द्वारा किए जा रहे प्रयासों में स्वयं सहायता समूह के द्वारा बेहद खास तरीके से इस उद्योग में सराहनीय कार्य किया गया है। इसके बावजूद भी सरकार के साथ-साथ हमारे और हमारे समाज की यह सामूहिक जिम्मेदारी है कि ऐसे उद्योगों को प्रोत्साहित करें एवं इन उद्योगों को पुनर्जीवित करने में अपनी महत्ती भूमिका अदा करें। 

Important essay topics for SSC CHSL

प्रश्न : ‘कश्मीर समस्या’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : भारत का सबसे उत्तरी प्रांत जम्मू तथा कश्मीर है। यह तीन प्रादेशिक क्षेत्रों से मिलकर बना है- जम्मू कश्मीर तथा लद्दाख। जम्मू तथा लद्दाख क्षेत्र को लेकर कोई अंतर्राष्ट्रीय विवाद नहीं है किन्तु एक जटिल समस्या पैदा कर दिया जिससे कश्मीर समस्या कहते हैं। 

प्रिंसली स्टेट जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह द्वारा अक्टूबर 1947 में भारत के साथ विलय का हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते के आधार पर भारत सम्पूर्ण जम्मू एवं काश्मीर पर अपना अधिकार व प्रभुत्व मानता है। इस समझौते पर हस्ताक्षर होते ही समूचा जम्मू-कश्मीर राज्य वैधानिक रूप से भारत का अभिन्न अंग बन गया। वही पाकिस्तान मुस्लिम बाहुल 

जनसंख्या के कारण उसपर अपना दावा करता रहा है तथा कुछ क्षेत्रों पर अवैध कब्जा भी किया है। यही मुख्यत: कश्मीर समस्या है। 

आजादी के काफी समय पहले से ही भारत विभाजन की बात की जाने लगी थी और अंतत: यह हुआ भी। राज्यों को यह कहा गया कि मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र पाकिस्तान में जाएँगे जबकि बचे राज्य स्वेच्छा से दोनों देश में किसी एक में शामिल हो सकते हैं। जम्मू-कश्मीर के राजा उस समय हरि सिंह हिन्दू थे जबकि उनका राज्य मुस्लिम बाहुल्य था। परंतु इसके बावजूद भी वे अपने आप को दोनों देशों से स्वतंत्र रखना चाहते थे। इस घटनाक्रम के दौरान पाकिस्तान ने हरि सिंह के क्षेत्र से आक्रमण कर दिया। ऐसे में अपने क्षेत्र को बचाने के लिए उन्हें मजबूरन पं. जवाहर लाल नेहरू एवं सरदार वल्लभभाई पटेल से सैन्य मदद लेनी पड़ी एवं विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने पड़े। इसी नाटकीय क्रम में भारत के प्रधानमंत्री मामले को शांतिपूर्वक निपटाने के लिए संयुक्त राष्ट्र चले गए और अंततः यह मामला और भी पेचीदा होता गया।

 वर्तमान में पाकिस्तान एवं भारत दोनों देशों के बीच यह क्षेत्र एक विवाद का मुद्दा बना हुआ है। इस विवाद के बीच में इस क्षेत्र में जिस रफ्तार से अलगाववादियों एवं आतंकवादियों ने अपनी पैठ बनाई है, यह निश्चित रूप से हमारे देश के लिए शुभ संकेत नहीं है। इस क्षेत्र में आये दिन आतंकवादी घटनाएँ एवं घुसपैठ की घटनाएं होती रहती हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस क्षेत्र में आतंकवादियों के मारे जाने पर उनके जनाजे के सामने लाखों की संख्या में भीड़ इकट्ठी होती है, साथ ही साथ उनके समर्थन में लोग सुरक्षा बलों पर भी हमला करते हैं। ऐसा वर्तमान में देखा जा रहा है। कश्मीर निश्चित रूप से भारत के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। इससे भारत में शांति व्यवस्था बनाने में मदद मिलती है परंतु ऐसी स्थिति में सरकार को चाहिए कि, इस क्षेत्र में जैसे भी हो शांति व्यवस्था कायम करने का प्रयास करे तथा वहाँ के युवाओं को मानसिक एवं आर्थिक रूप से भारतीय होने का बोध कराये। अहिंसा का मार्ग निश्चित रूप से हमारे एवं कश्मीर के बीच एक अच्छा रास्ता हो सकता है। सरकार के द्वारा हर संभव प्रयास किए गए हैं तथा किए जा रहे हैं, जैसे संविधान में इस राज्य को अनुच्छेद 370 के तहत विशेष राज्य का दर्जा दिया गया है, इस राज्य का अपना अलग संविधान है। इसके अलावा इस राज्य में आतंकवादी घटनाओं को कम करने के लिए विशेष सुरक्षा बल की तैनाती भी की गई है जो वहाँ शांति स्थापित करने में प्रयासरत है। 

प्रश्न : ‘योग एक अनूठी पहल’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : यह सर्वविदित है कि 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया जाता है, वर्ष 2015 से विश्वभर में प्रतिवर्ष इस दिन को बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा है। 2016 के योग दिवस के अवसर पर लगभग सभी देशों ने इसे अपनाया तथा साथ ही साथ भारत में भी केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकारों के प्रयास से इसे पूरे देश में एक जश्न के रूप में मनाया गया। 

प्राचीनकाल से ही हमारा इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारत अध्यात्म एवं योग विद्या में अग्रणी रहा है। अब प्रश्न उठता है कि योग क्या है? योग शब्द का शाब्दिक अर्थ है- “चित्त वृत्तियों का निरोध”। भारत में योग अध्यात्मिक प्रक्रिया को कहते हैं जिसमें शरीर, मन और आत्मा को 

एक साथ लाने का काम होता है। श्रीमद्भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण एक स्थल पर कहते हैं – “योग : कर्मसु कौशलम्” अर्थात् योग से ही कर्मों में कुशलता आती है। हालांकि आगे चलकर हुए विभिन्न राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तनों ने ऐसे बदलाव किए कि हमारी कुछ चीजें जो मूलरूप से हमसे जुड़ी हुई थी, भी हमसे दूर होती चली गई। कुछ ऐसी पद्धतियाँ जो प्राचीन जीवन में हमारे जिंदगी में दिनचर्या का महत्त्वपूर्ण हिस्सा थीं आज सभी हमसे कोसों दूर चली गई, परंतु बाबा रामदेव सहित अन्य योगाचार्यों के अथक प्रयासों ने ना सिर्फ योग को सारे देश में घर-घर तक पहुँचाया अपितु पूरे विश्व में इस योग को एक मिशाल के तौर पर पेश किया। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र संघ ने 177 देशों का समर्थन लेकर योग को ना केवल अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाने के लिए एक दिवस घोषित किया अपितु इसे एक वैश्विक मंच पर भी स्वीकृति प्रदान की। और तो और यह एक अकेला प्रस्ताव था जो 90 दिन (3माह) के अंदर पारित हो गया। 

आज जहाँ दुनिया नाना प्रकार के रोगों से ग्रस्त है, रोग/बीमारियाँ आम जिंदगी का एक हिस्सा सा बन गया है, और साथ ही इलाज की निकटता ना होना, उपलब्धता ना होना या इलाज एवं दवाईयों का महँगा होना निश्चित रूप से एक आम आदमी के लिए बेहद कठिन होता है। योग के माध्यम से बढ़ी दवाईयों के मूल्यों के बोझ से जहाँ लोगों को छुटकारा मिला वहीं छोटी-से-छोटी एवं कुछ बड़े रोगों को छोड़कर लगभग सभी बीमारियों का इलाज संभव हो सका है। 

योग का ही एक रूप सूर्य नमस्कार है जिसमें 12 चरण होते हैं और इसके माध्यम से स्कूलों में 12 जनवरी (युवा दिवस) को छात्रों से सूर्य नमस्कार को कराया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इन 12 चरण से योग के लगभग बाकी आसनों की भरपाई की जा सकती है। 

इस अंतर्राष्ट्रीय आयोजन के बीच एक गंभीर मुद्दा उभरकर आया है। इसे एक विशेष धर्म समुदाय के कुछ लोगों द्वारा उनके धर्म के प्रतिकूल बताया गया तथा योग को एक धर्म विशेष की विरासत या संस्कृति माना गया, परंतु यह सिर्फ और सिर्फ एक राजनीतिक बहस है, क्योंकि जहाँ पूरी दुनिया ने योग को स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद माना है, वहीं कुछ लोग इसे बेवजह या फालतू बता रहे हैं। योग निश्चित रूप से एक ऐसी विधि है जिसके माध्यम से कोई भी इंसान घर में ही आधा से एक घण्टे तक योग करके कई बीमारियों से अपने आपको बचा सकता है। इसके द्वारा शरीर के भौतिक भाग के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक भाग को भी बेहतर ढंग से सही रखा जा सकता है तथा एक स्वस्थ्य भारत का निर्माण किया जा सकता है। 

SSC CHSL essay topics 2021

प्रश्न : ‘नक्सलवाद एक चुनौती’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए नक्सलवाद वर्तमान में सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। देश के अनेक राज्यों में आज नक्सली हिंसाएँ होती रहती हैं तथा अब तक अनेक पुलिस कर्मियों एवं सुरक्षा बल के जवानों की जानें जा चुकी हैं। मूलत: सामाजिक, आर्थिक कारकों से उपजा नक्सलवादी आंदोलन आज आतंकवाद का पर्याय बन चुका है जिन्हें देश के संविधान में भरोसा नहीं है और वे सिस्टम के खिलाफ हथियार लेकर खड़े हो रहे हैं। 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश के 2000 से अधिक जिलों में इस नक्सलवाद ने अपनी पैठ बना ली है ये लोग राज्यों की सीमाओं का सर्वाधिक इस्तेमाल करते हैं तथा कोई भी हमला या घटना करने के बाद दूसरे राज्य में चले जाते हैं। आज नक्सलवाद निश्चित रूप से देश की 

आंतरिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर समस्या बन चुका है, इसे खत्म करना अब बेहद कठिन कार्य प्रतीत हो रहा है। नक्सलवाद केवल कानून की समस्या नहीं है बल्कि इसके गहरे सामाजिक, आर्थिक आयाम है। व्यापक गरीबी एवं बेरोजगारी, दलितों एवं मजदूरों का शोषण, आदिवासी हितों की उपेक्षा, भ्रष्टाचार एवं पुलिस दमन नक्सलवाद के कुछ प्रमुख कारण हैं।

1960 के दशक में बंगाल के नक्सलवादी में जमीन पर हक के लिए मांग को लेकर चारू मजूमदार, कानू सान्याल, ने मिलकर एक आंदोलन की शुरुआत की जो आज देखते ही देखते देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा बाधक तत्व बन गया है। 

नक्सलवाद के कारणों में उचित भूमिसुधार का ना होना, गवर्नेस का शिथिल होना, लोकतांत्रिक मूल्यों की विफलता तथा साथ ही गरीबी, आदिवासियों के हितों की उपेक्षा, राजनेताओं की बेतुकी बयानबाजी ने भी इस समस्या के विकराल रूप में प्रकट करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। 

आखिर इस आंदोलन से जुड़े लोगों का उद्देश्य क्या होता है। यह सवाल बेहद पेचीदा नजर आता है। एक तरफ तो कई बार ये लोग चुनाव का बहिष्कार करते हैं, तो कई बार दूसरी तरफ किसी प्रत्याशी को जीत दिलाने के लिए प्रचार भी करते हैं। इससे जुड़े लोगों का मानना है कि सरकार ने उनकी उपेक्षा की है, इसलिए वे आज विकास की धारा से अलग-थलग पड़े हैं परंतु वही सरकार जब वहाँ विकास कार्य करने का प्रयास करती है, तो वे उसे तोड़ डालते हैं, वह चाहे रोड हो या स्कूल। आखिर इनकी विचारधारा क्या है, यह समझना थोड़ा जटिल है।, कहीं ऐसा तो नहीं कि हिंसा के रास्ते चलते-चलते ये लोग अपनी मूल मांगों से कहीं दूर आ गए हों। नक्सलवाद के कारण देश के आंतरिक सुरक्षा के साथ-साथ विदेशी शत्रुओं से भी गंभीर खतरे की आशंका रहती है, क्योंकि इनके पास हमेशा विदेशी हथियार मिलते हैं। इसके अलावा जिस क्षेत्र में नक्सलवादी गतिविधियाँ ज्यादा होती हैं, वहाँ विकास कार्य बेहद सुस्त अवस्था में चला जाता है और धीरे-धीरे वह क्षेत्र विकास की मुख्य धारा से कहीं दूर चला जाता है। ऐसे में देश के मानव संसाधन, साथ ही साथ आर्थिक विकास के घटकों को बेहद घाटा/नुकसान पहुंचता है। 

नस्सलवाद को जड़ से खत्म करना निश्चित रूप से लोकतांत्रिक सरकार के लिए एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है, परंतु भारत के सुनहरे भविष्य के लिए इस बरे सपने से बाहर आना वो भी जितनी जल्दी हो सके बहुत जरूरी है, जिससे की संपूर्ण देश एक साथ मिलकर देश के विकास में अपना पूर्ण सहयोग दे सके और भारत के उज्ज्वल भविष्य की कामना कर उसे विकास की ऊँचाईयों तक पहुँचा सके। 

SSC CHSL Descriptive paper topics in Hindi

प्रश्न : “न्यायपालिका एवं संसद के बीच संबंध’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : भारतीय संविधान के अनुच्छेद 50 में शक्तियों के विभाजन को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है, जहाँ कार्यपालिका एवं विधायिका के बीच में आंशिक शक्ति का बंटवारा तथा न्यायपालिका के संदर्भ में पूर्णतः शक्तियों का बंटवारा किया गया है। 

स्वतंत्रता के उपरांत से अब तक न्यायपालिका एवं संसद के बीच में कभी टकराव की स्थिति बनती है तो कभी संबंध मधुर हो जाते हैं, ऐसा क्यों होता है, इसे समझना बेहद जरूरी है। 

विधायिका एवं कार्यपालिका का कार्य विधि निर्माण एवं लागू करवाने का होता है, जबकि न्यायपालिका का कार्य बनाई गई विधि की वैधानिकता को जाँचना होता है अर्थात् क्या कहीं विधि संविधान के आदर्शों के प्रतिकूल तो नहीं है। यह शक्ति न्यायपालिका को अनुच्छेद 13 एवं अनुच्छेद 32 से प्राप्त होती है। 

स्वतंत्रता के बाद काफी अरसे तक न्यायपालिका एवं संसद के बीच टकराव नहीं देखा गया। शंकरी प्रसाद वाद में न्यायपालिका एवं संसद ने बहुत ही संयम का परिचय दिया। इसका मुख्य कारण शायद यह रहा कि, उस दौरान दोनों ही जगह बैठे लोग एक साथ स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुए थे, उनकी सोच, विचारधारा देश के लिए एक जैसी थी, यही कारण था कि, इनके बीच टकराव का कोई प्रश्न नहीं उठा। एक और कारण यह था कि, उस समय संसद में लगभग 70 प्रतिशत वकील थे जो कानूनी दाँवपेंच भली-भाँति जानते थे, इसलिए कानून बनाते समय ऐसी कोई भी चूक नहीं करते थे कि न्यायपालिका को बीच में आना पड़े। 

बदलते परिवेश के साथ न्यायपालिका एवं संसद के बीच संबंध टकराते गए. वह चाहे न्यायाधीशों की नियुक्ति का मामला रहा हो या मूल अधिकारों के संशोधन का। यह टकराहट यहाँ तक पहुँच गई कि, संसद द्वारा पारित विधेयक को न्यायपालिका संशोधित या रद्द करती तो न्यायपालिका के निर्णय को संसद। 17वाँ या 25वाँ संविधान संशोधन विधेयक हो या फिर गोलकनाथ वाद में निर्णय ये सभी न्यायपालिका एवं संसद के बीच के संबंधों पर प्रकाश डालने के लिए काफी हैं। 

इसी क्रम में सबसे महत्त्वपूर्ण निर्णय हुआ 1973 में केशवानंद भारती वाद में, जब न्यायपालिका ने संसद की शक्ति को नियंत्रित करने के लिए “मूलभूत ढाँचा” का प्रतिवादन किया जो कहीं ना कही संसद के लिए बहुत बड़ा झटका था। इस निर्णय के अनुसार संसद संविधान के प्रत्येक भाग में संशोधन कर सकती है, परंतु इससे संविधान का मूलभूत ढाँचा परिवर्तित नहीं होना चाहिए और यह न्यायपालिका निर्णय करेगी कि मूलभूत ढाँचा क्या है। 

इस तरह न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए चाहे राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग हो या फिर संसद द्वारा पारित अन्य अधिनियम, ये सभी संसद एवं न्यायपालिका के बनते बिगड़ते संबंधों की कहानी बताते हैं। 

इस घटनाक्रम से निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि एक लोकतंत्र में न्यायपालिका , विधायिका, कार्यपालिका इन तीनों के बीच में शक्ति 

सामंजस्य एवं संतुलन की व्यापक स्तर पर आवश्यकता होती है। इनके आपसी टकराव से कहीं न कहीं लोकतंत्र एवं संविधान के मूल भाव को ठेस पहुँचती है जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को शोभा नहीं देता। 

Essay for SSC CHSL

प्रश्न : ‘सत्य परेशान हो सकता है परंतु पराजित नहीं’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : “सत्यमेव जयते”, सत्य की सदा विजय हो। सत्य शब्द सुनते ही व्यक्ति में सकारात्मक गुणों का संचार होने लगता है। यह सत्य क्या है? सिर्फ व्यवहार तक सीमित है? या इसका राजनीतिक सामाजिक भी महत्व है। 

सत्य वह वचन है जो हम अपने ज्ञान, मुख से अपनी जानकारी एवं सार्वभौमिक स्वीकृति से वर्णन करते हैं। जैसे-पेड़ों से पत्तों का गिरना, सूर्य का पूरब से उगना, फलों का पकना ये सारी सत्य घटनाएँ हैं। ऐसे ही मानव मल्यों के संदर्भ में अपने तर्क-ज्ञान का प्रदर्शन भी सत्य कहलाता है। कोई इसे प्रकट न करे या छुपाए तो असत्य कहलाता है। 

वर्तमान में सत्य जो कि नैतिक आचरण का पक्ष है उसकी आवश्यकता क्यों? इस सत्य से ही लोगों को न्याय की आस है। इसलिए वर्तमान में कई घटनाएँ असत्य से प्रेरित हैं। यथा – राजनीतिक स्वार्थ के लिए असत्य का प्रयोग, व्यक्तिगत लाभ के लिए सत्य को छुपाना, आर्थिक लाभ के लिए सरकार को सत्य से अवगत न करना। वर्तमान में सत्य न बताकर छुपाने की प्रवृत्ति दृष्टिगत हो रही है। 

भारतीय संघीय व्यवस्था में सत्य को सामने लाने के लिए न्यायिक व्यवस्था का प्रावधान है जिसके लिए उच्चतम न्यायालय, उच्च-न्यायालय, जिला न्यायालय एवं अधीनस्थ न्यायालय का गठन किया गया है। व्यक्ति यदि सही है तो वह निम्न न्यायालय से उच्च न्यायालय जाकर अपनी सत्यता साबित कर सकता है। वह न्याय का हकदार होगा। 

वर्तमान समय में व्यक्ति को कई ऐसे अधिकार प्रदान किए गए थे जो उसकी शोषण एवं अत्याचार पर संरक्षण प्रदान करने के लिए थे। जैसे-दहेज प्रताड़ना अधिनियम 1961 जिसमें कई बार झूठा वाद दायर कर महिला द्वारा अपने ससुरालवालों पर दहेज की मांग का आरोप लगाया जाता था, दूसरा उदाहरण राजनीतिक-आर्थिक हित से प्रेरित होकर अनुसूचित जाति/जनजाति द्वारा अनुसूचित जाति जनजाति अधिनियम 1989 के तहत केस लगा दिया जाता था। 

परंतु वर्तमान न्याय व्यवस्था ने व्यक्ति की गरिमा तथा सत्य की जांच के लिए अपीलीय न्याय के माध्यम का प्रावधान रखा है। इसमें यदि व्यक्ति अधीनस्थ न्यायालय से असंतुष्ट है तो वह उच्च स्तर पर अपील कर न्याय मांग सकता है एवं अपनी सत्यता सिद्ध कर सकता है। 

प्राचीन समय से इसके कई रूप प्रचलित थे- पंचायत, सामुदायिक समितियाँ जो समाज में होने वाले ऐसे सामाजिक विचलन को ठीक करने के लिए गठित की गई थी। अशोक के समय में व्यक्ति लोभ-लालच तथा स्वार्थ से प्रेरित होकर कार्य न करे इसलिए पत्थरों पर नियमों को उत्कीर्ण कराए गए थे। सत्य की मांग वर्तमान की ही नहीं बल्कि हमारी प्राचीन संस्कृति का बहुमूल्य पक्ष रहा है, जिसकी अपनी ही प्रासंगिकता है जो स्वयमेव सिद्ध हो जाता है और हमें “ सदा-सत्य बोलो” की शिक्षा देता है। 

प्रश्न : ‘साइबर क्राइम एक वैश्विक समस्या’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : साइबर क्राइम से अभिप्राय तकनीक का उपयोग कर बिना किसी खून खराबे के किसी देश की सुरक्षा, आर्थिक एवं प्रशासनिक तन्त्र को विफल करने से है जिसमें प्रमुख भूमिका कम्प्यूटर हैकरों की है। साइबर सुरक्षा इन दिनों चर्चाओं और खबरों में है इससे जुड़ी दो महत्त्वपूर्ण घटनाएं पिछले दिनों घटित हुई। चीन के मिलिट्री हैकरों ने पश्चिम देशों की सरकारों की कम्प्यूटर प्रणाली पर हमला बोला और अमेरिकी एयर फोर्स ने साइबर स्पेस कमान नाम के संगठन का गठन किया। 

इसे संयोग ही कहा जायेगा कि दोनों घटनाएँ एक ही समय हुई लेकिन इनसे 21वीं सदी में साइबर प्रणाली से जुड़े खतरों की वास्तविक और भयावहता का अनुमान लगाया जा सकता है। आज रोजमर्रा की कार्य प्रणाली में साइबर स्पेस का दायरा उत्तरोतर बढ़ता ही जा रहा है। सरकारें प्रशासन, शिक्षा, संचार, सचना के विस्तार में इसका बढ चढ कर इस्तेमाल हो रहा है। वहीं दूसरी ओर आतंकवादी समूह साइबर तकनीक का उपयोग अपने प्रचार गुटों के साथ समन्वय एवं धन प्रबंधन के लिए कर रहे हैं। 

साइबर तकनीक का दुरूपयोग देखते हुए अब विशेषज्ञ भी चिन्तित हैं। आज कम्प्यूटर का प्रयोग करने वाला हर व्याक्ति कम्प्यूटर वायरस के हमले के बारे में जानता है। जब यह खतरा बड़े पैमाने पर हो तो इसकी भयावहता और दुष्परिणाम के बारे में सहजता से समझ जा सकता है। 

आज रेलवे एयरलाइंस, बैंक, स्टॉक मार्केट, हॉस्पीटल के अलावा सामान्य जनजीवन से जुड़ी सभी सेवाएँ कम्प्यूटर नेटवर्क के साथ जुड़ी है। इनमें से कई तो पूरी तरह से इंटरनेट पर ही आश्रित हैं। यदि इनके नेटवर्क के साथ छेड़-छाड़ की जाय तो क्या परिणाम हो सकते है। यह बयान करने की नहीं अपितु समझने की बात है। 

अब तो सैन्य प्रतिष्ठानों का काम-काज और प्रशासन भी कम्प्यूटर नेटवर्क के साथ जुड़ चुका है। जाहिर है कि यह क्षेत्र भी साइबर आतंक से अछूता नहीं बचा है। इसलिए सूचना तकनीक के विशेषज्ञ साइबर सुरक्षा को लेकर बेहद चिंतित हैं। 

अभी सामान्य तौर पर साइबर अपराध के जो छोटे-मोटे मामले सामने आते है वह प्रायः युवा या विद्यार्थी वर्ग द्वारा महज मजा लेने या खुराफात करने के होते है। लेकिन यदि इन्हीं तौर-तरीकों का उपयोग व्यापक पैमाने पर आतंकवादी समूह करने लगे तो बहुत बड़ी मुश्किलें खड़ी हो जायेंगी।

यह सही है कि साइबर से जुड़ी अभी तक कोई बड़ी आतंकवादी घटनायें प्रकाश में नही आयी हैं, पर इसका यह मतलब कतई नहीं कि आने वाले दिनों में इस प्रकार की घटना असंभव है। 1998 में एक 19 वर्षीय बालक ने अमेरिका के थियोडोर रूजवेल्ट डैम की कम्प्यूटर प्रणाली को हैक कर उस पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। इस प्रणाली के जरिये बाढ़ नियंत्रण व बाँध के गेट का संचालन किया जाता था। अब यदि वह हैकर चाहता तो कभी भी बाँध के गेट को खोल सकता था और इससे कितनी बड़ी आबादी में तबाही मच सकती थी बताने की आवश्यकता नहीं है। 

आज इस प्रकार की खुफिया खबरें हैं कि अलकायदा जैसे कई खतरनाक आतंकवादी संगठन साइबर स्पेस के जरिये दुनिया भर में आतंक फैलाने कि फिराक में हैं। साइबर आतंकवादी नई संचार तकनीक के औजारों और तौर-तरीकों का इस्तेमाल करके नेटवर्क को तहस-नहस कर सकते हैं। । इसलिए इस खतरे से बचने के लिए भारत जैसे राष्ट्र को भी विश्व के अन्य देशों की तरह अपने सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए ऐसे ही इंतजामों की दरकार है। सौभाग्य से भारत में आई.टी. के ऐसे बहुत से विशेषज्ञ है जिनकी सेवाएँ साइबर आतंकवाद की चुनौती से निपटने के लिए की जा सकती है। सरकार को चाहिए कि नागरिक और सैन्य क्षेत्र की सुरक्षा को देखते हुए वह ऐसी कार्य योजना तैयार करे, जिसे समय रहते ही आइटी और साइबर से जुड़े अपराधों व आतंकी संभावनाओं से निपटा जा सके। 

Important essay topics for SSC CGL

प्रश्न : ‘सूचना प्रौद्योगिकी का प्रवेश लाभ और हानियाँ’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : सूचना प्रौद्योगिकी का संबंध विशेषकर बड़े संगठनों में, सूचनाओं के प्रबन्धन और उनके प्रसंस्करण में प्रौद्योगिकी के उपयोग से है। इसे सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी अथवा इनफोकाम के नाम से भी जाना जाता है। आईटी इलेक्ट्रॉनिक कम्पयूटरों के नाम से भी जाना जाता है। आईटी इलेक्ट्रॉनिक कम्प्यूटरों तथा कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर का उपयोग विशेषकर सचनाओं के रूपान्तरण, संचारण, सुरक्षा प्रक्रमण संचार एवं प्रत्यानयन के लिए किए जाता है। इस लिए कम्यूटर के पेशेवरों को प्रायः आईटी विशेषज्ञ सलाहकार या व्यापार प्रक्रिया सलाहकार कहा जाता है। 

वर्ष 1951 में, पहला व्यवसायिक कम्प्यूटर यू. के. में लिऑन्स कैटरिंग संगठन द्वारा विकसित किया गया था। इसलिए इसे “लियान्स इलेक्ट्रॉनिक ऑफिस” यानि लिओं के नाम से जाना गया। इसे और अधिक विकसित किया गया तथा 1960 एवं 1970 के दशकों में इसका व्यापक उपयोग किया गया। अन्य व्यवसायिक प्रक्रियाओं की ही तरह यह भी शिल्प आध रित व्यवसाय से बहुउपयोगी-आयामों की ओर बढ़ चला है। इसके थोक उत्पादन से उत्पादन खर्च में कमी आयी और आज आईटी की छोटी से छोटी कम्पनी या सभी (स्कूली बच्चों सहित) के पास उपलब्ध है। 

माइक्रोसॉफ्ट और आईबीएम के प्रयासों के चलते विभिन्न क्षेत्रों में सॉफ्टवेयर उन्नति करता गया। अब यह साफॅटवेयर माइक्रोसॉफ्टवेयर ऑफिस या आईबीएम नोट्स के अलावा वेतन-भुगतान व्यवस्था तथा कार्मिक प्रबंध, लेखा संचालन, और ग्राहक प्रबंधन जैसे अनेक कार्यों में उपयोग में आता है। आँकड़ा संचालन का मानकीकरण भी इसके चलते हो गया है। संबधात्मक डाटाबेसों को विभिन्न कॉमन फॉर्मेट तथा कवेन्शन्स के सप्लायर्स द्वारा विकसित किया जा चुका है। भारत आईटी से संबधित उपयोग के क्षेत्र में एक अग्रणीय देश बन चुका है, विशेषतया आईटी सेवाओं तथा साफॅटवेयर विकास के क्षेत्र में। बीपीओ या आईटीईएस में भी भारत नेतृत्व कर रहा है। हाल के दिनों में, भारतीय सॉफ्टवेयर तथा भारतीय बीपीओं भारत के प्रमुख वृद्धि-उद्योग बन गये हैं। 

आईटी नै संचार एवं ज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व क्रान्ति ला दी है। इन्टरनेट ने पारम्परिक संचार के साधनों के स्थान पर ईमेल, टेली और वीडियो- कांफ्रेंसिंग, ऑनलाइन चैटिंग आदि को ला दिया है। अब स्थानों की दूरियों का महत्त्व समाप्त हो गया है और सारा विश्व सीमाहीन हो चला है। वर्ल्ड वाइड वेब ने ज्ञान के स्वरूप एवं स्वभाव में क्रान्ति ला दी है। अब असीमित एवं अमूल्य सूचनाओं तक आम आदमी की पहुँच हो गयी है, जबकि पहले यह कुछ चुने हुए सीमित लोगों तक थीं। आईटी ने ई-कामर्स, ई-गवर्नेस, ई-प्रेस्क्रिप्शन, ई-आरक्षण, जैसी अनेक आईटी जनित सेवाओं को जन्म दिया है। 

आईटी ने एक नये प्रकार के अपराध को भी जन्म दिया है, जिसे ‘साईबर क्राइम’ के नाम से जाना जाता है। जिसे रोक पाना प्रायः असंभव है: उनका हल पाना और अपराधी को दंडित करना भी उतना ही कठिन है। चूंकि साइबर अपराध का स्वरूप डिजिटल है, अतः उसे ढूंढ पाना कठिन है। साइबर अपराध का सबसे खतरनाक पक्ष बाल-कामोद्दीपक चित्रों को इन्टरनेट पर प्रसार-प्रचार है। 

यह सही है कि आईटी द्वारा किये जा रहे कार्यों का महत्व है, लेकिन हमें यह भी विचार करना होगा कि नेट सवाओं का इस्तेमाल विश्व के संसाधनों के प्रबंधन, ऊर्जा की खपत में कमी और लोगों के जीवन स्तर को उठाने में कैसे संभव हो सकेगा। इन्टरनेट के फायदे तभी सामने आएगे जब हर आदमी की पहुँच उस तक हो जायेगी। इसके लिए आवश्यकता है कि ‘डिजिटल डिवाइड को समाप्त किया जाय। 

SSC CHSL essay topics in Hindi

प्रश्न : ‘सूचना का अधिकार RTI’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : सूचना का अधिकार अधिनियम 2005, सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम 2002 के स्थान पर लाया गया. सूचना का अधिकार कानून की जिम्मेदारी तय करेगा। तथा इसका निर्वाह न करने वालों को कड़ी सजा दी जायेगी। 12 अक्टूबर, 2005 में अस्तित्व में आने के बाद इसने शासन में पारदर्शिता एंव जवाबदेहिता सुनिश्चित करने की दिशा में कार्य किया है। फलस्वरूप देश में सूचना का अधिकार जन अधिकारों के सशक्तिकरण के उपकरण के रूप में सराहा जाने लगा है। शासन को अधिक सहभागिता मूलक विमर्शात्मक और प्रतिनिधि मूलक बनाकर इसने लोकतंत्र को नये स्वरूप प्रदान किये हैं।

पहली बार यह विश्वास किया जाने लगा है कि आम नागरिकों से लोकप्राधिकारी केवल प्रश्न ही नहीं पूछ सकते हैं बल्कि जनता के प्रश्नों को सुना भी जायेगा और उनका जबाब भी दिये जायेंगे। शासन को बेहतर बनाने और भ्रष्टाचार खत्म करने की दृष्टि से सूचना का अधिकार भारतीय लोकतंत्र का अभिनव प्रयोग था। जिसके जरिये जनता को स्वामी और सरकार को सेवक का दर्जा दिये जाने का प्रयास किया गया। इस विधि को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए केन्द्रीय सूचना आयोग के अलावा राज्य और जिले से लेकर ब्लाक स्तर तक सूचना आयुक्तों व सूचना प्राधि कारियों की एक विस्तृत व्यवस्था की गयी हैं। सूचना प्राप्त करने के लिए निर्धारित शुल्क (दस रूपया नकद, ड्राफ्ट या चेक) के साथ प्राधिकारी के समक्ष आवेदन करने वालों के लिए नि:शुल्क आवेदन का भी प्रावधान है। सूचना प्राधिकारी 30 दिनों के भीतर वांछित सूचना उपलब्ध करवाएगा और यदि सूचना किसी व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता से संबन्धित है तो इसे आवेदन के 48 घण्टों के भीतर प्राप्त किया जा सकता है। जहाँ सूचना का आवेदन अस्वीकृत किया जाता है, तो इस संबंध में लोक सूचना अधि कारी को अस्वीकृति का कारण बताना होगा। 

यदि सूचना अधिकारी या अपील अधिकारी विहित समय में सूचना उपलब्ध नहीं करवाता है या आवेदन पत्र बिना उपयुक्त कारण के निरस्त करेगा या आधी-अधूरी सूचना देगा, भ्रामक सूचना देगा आदि के लिए प्रशासनिक कार्यवाही की जायेगी। बिना कारण विलम्ब से सूचना देने वाले अधिकारी पर दो सौ पचास रूपये प्रतिदिन तथा अधिकतम 2500रु. तक का प्रावधान किया गया है। आवेदक को सूचना प्राप्ति का कारण व व्यक्तिगत विवरण देना आवश्यक नहीं होगा केवल अपना नाम एवं पता देना होगा। कुछ सूचनाओं को इस अधिनियिम से बाहर रखा गया है, जिन्हें सार्वजनिक करने से भारत की संम्प्रभुता और अखण्डता प्रभावित होती हो। 

इस अधिनियम को यदि कारगर ढंग से लागू किया जाय तो भारत में भ्रष्टाचार में लिप्त नौकरशाही से मुक्ति मिल सकती है व एक पारदर्शी प्रशासन का नया अध्याय शुरू होगा। इससे भारतीय नागरिक अपने आप को सशक्त महसूस करेंगे, और सामान्य रूप से प्रतिदिन अपनी छोटी-छोटी सूचना संबंधी प्रशासनिक आवश्यकताओं के लिए कष्टकारी प्रशासनिक पेरशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा। 

इस प्रकार सूचना अधिकार अधिनियम, 2005 निश्चित ही जनता और प्रशासन दोनों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा। हालांकि इस सम्बंध में जहाँ एक ओर दृढ़ प्रशासनिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है वहीं दूसरी तरफ आम जनता के मध्य अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता भी जरूरी है। 

SSC CHSL Descriptive Paper

प्रश्न : “नाविक’- भारत का अपना ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : ‘द इंडियन रिजनल नेविगेशन सेटेलाइट सिस्टम’ जिसका नाविक नाम प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने दिया, जिसे 28 अप्रैल 2016 को सफलता पूर्वक पृथ्वी की कक्षा में प्रक्षेपित किया गया। इसके साथ ही भारत दुनियाँ के उन पाँच राष्ट्रों की सूची में शमिल हो गया जिसके पास अपनी स्वतंत्र क्षेत्रीय दिशा सूचक उपग्रह प्रणाली है। इसका अर्थ है कि थल, जल और आकाश में किसी भी बिंदु की भौगोलिक स्थिति को स्पष्ट करने वाले ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम के मामले में भारत आत्म निर्भर हो जायेगा। इससे अब हमें अपनी आंतरिक सुरक्षा, परिवहन, भू-सर्वेक्षण, नक्शा निर्माण और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में जीपीएस के प्रयोग के लिए अमेरिका पर निर्भर नही रहना पड़ेगा। 

उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्रीय दिशा सूचक उपग्रह प्रणाली में कुल सात उपग्रह प्रक्षेपित किये गये हैं। वह अंतरिक्ष से हमारे देश एवं आस-पास के क्षेत्रों पर नजर रखेंगे। इसके लिए सात उपग्रहों का प्रक्षेपण इसलिए किया गया ताकि देश का कोई भी भाग अछुता न रह जाय। इसके दायरे में पूरा भारत और हमारी सीमाओं के परे 1500 किमी. का क्षेत्र आयेगा। परिवहन के साथ-साथ सुरक्षा दृष्टि से भी इसकी अहमियत महत्त्वपूर्ण हो जाती है, युद्ध के समय हमें अमेरिकी नौवहन प्रणाली पर निर्भर रहना पड़ता था। 

वह हमारे आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं हो सकती थी। यदि कारगिल युद्ध के समय अपना जी.पी.एस. होता तो स्थितियाँ सम्भवतः इतनी गम्भीर नहीं होती। 

भारत के अलावा जिन देशों के पास यह प्रणाली है, वह हैं, अमेरिका, रूस, यूरोपीय संघ और चीन। अमेरिकी प्रणाली को जीपीएस रूसी प्रणाली को ‘ग्लोनास’ यूरोपीय प्रणाली को गैलिलियों और चीनी प्रणाली को ‘बेईदू’ कहा जाता है। 

‘नाविक’ की न्यूनतम स्थैतिक सटीकता 20 मीटर बताई गयी है। इसका अर्थ यह है कि हर 20 मी. के दायरे में मौजूद वस्तु स्थान या व्यक्तियों पर इस प्रणाली की नजर होगी। यह प्रणाली भारत एवं पड़ोसी देशों के लिए भविष्य में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होगी। सुबह-शाम टहलते समय तक की दूरी का पता लगाने वाले उपकरणों से लेकर मिसाइलों के जरिए सटीक मार करने वाली प्रणलियों तक के काम-काज में इसकी भूमिका है। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसे दर्जनों उदाहरण है जहां ये प्रणलियाँ बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। दूर समुद्र में जाने वाले मछुआरों के लिए यह खासी मददगार सबित हो सकती है। समुद्र में से भारतीय मछुआरों के भटककर पाकिस्तान या श्रीलंका की सीमा में चले जाने की खबरें आए दिन समाचार पत्रों एवं न्यूज चैनलों में आती रहती हैं ऐसे में नाविक जैसी प्रणाली मौसमी परिस्थितियों से पूरी तरह मुक्त रहते हुए इन मछुआरों को सही मार्ग दिखाती रहेगी। यही बात दुर्गम रेगिस्तान , जंगली और पहाड़ी क्षेत्रों पर भी लागू होती है। इससे अंतरिक्ष, सैन्य सुरक्षा तथा नागरिक सुविधा के क्षेत्र में घटित हो रही गौरवशाली भारतीय क्रान्ति के लिए एक मील का पत्थर सबित होगा। 

प्रश्न : ‘आतंकवाद एवं नक्सलवाद – एक सिक्के के दो पहलू’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : किसी देश में नीति, सुरक्षा एवं सौहार्दपूर्ण व्यवस्था ही वहाँ की प्राथमिकता होती है। समाज में सहयोग, एकता एवं विकास को ध्यान रखकर ही नियम विनियम बनाए एवं निभाए जाते हैं। मानव कल्याण, वैज्ञानिक प्रगति प्रतिस्पर्धात्मक सहयोग जैसे तत्व ही राष्ट्र की एकता और स्थायित्व का निर्माण करते है। 

वर्तमान समय में तथा पिछले कुछ दशकों से समाज में एक विचलन को देखा जा रहा है जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद एवं राष्ट्रीय स्तर पर नक्सलवाद का रूप है। यह किसी भी राष्ट्र की आंतरिक तथा बाह्य सुरक्षा के लिए घातक है। 

आतंकवाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंसा द्वारा संचालित संगठन है जो बारूद एवं बंदूक से तख्तापलट, आंतकी-विस्फोट कर सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था का हास करते हैं। नक्सलवाद इसी का दूसरा रूप है जोकि किसी राजकीय क्षेत्र के अंतर्गत पहले तीर-धनुष, कुल्हाड़ी से संचालित थी परंतु वर्तमान में अवैध हथियारों की उपलब्धता से इनके हाथ मजबूत हो गए हैं। आतंकवाद में ISIS, सिमी, हिजबुल, अलकायदा जैसे संगठनों ने बम-बंदूक से समाज के सामाजिक ताने-बाने के साथ राजनैतिक (तख्तापलट) एवं आर्थिक पक्षों को प्रभावित किया है। यही कार्य नक्सलवाद द्वारा भारत के ओडिशा, आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों में देखने को मिलता है जिनकी बलि वहाँ के राजनेता, जनता तथा सैनिक समूहों को चढ़ना पड़ता है। 

ये दोनों संगठन कार्य रूप में एक जैसे हैं बस इनका प्रभाव क्षेत्र अलग-अलग है। पर इससे भारत जैसे देश की आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा के लिए प्रमुख चुनौती है, क्योंकि इनकी कोई विचारधारा नहीं होती। ये हिंसा, अव्यवस्था क्यों उत्पन्न करते हैं, इनकी मांग क्या है, ये किस तरह का शासन चाहते हैं समाज में किस तरह के सुधारों के लिए इस तरह के कार्यों को अंजाम देते हैं। इनकी कोई स्पष्ट विचारधारा नहीं है। 

कभी-कभी सुनने में आता है कि ये समाज में समता स्थापित करना चाहते हैं, आर्थिक असमानता को पाटना चाहते हैं, रोजगार के अभाव में हथियार उठाए हैं। कई बार तो सिर्फ पेट-पालन के लिए ही इन संगठनों में जुड़ने की खबरें सुनाई देती हैं। 

सच्चाई जो भी हो इस तरह के संगठन से न देश का हित है न संगठन का। जब तक ये संगठन समाज में सरकार के माध्यम से, विभिन्न गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से व्यक्तिगत रूप से अपनी समस्याओं को सामने नहीं रखेंगे, समाधान ढूँढना मुश्किल होगा। 

सरकार के लिए नक्सलवादी को ढूँढना उतना ही मुश्किल होगा, क्योंकि दिन में ये खेतों में काम करते हैं रात में हथियार उठा लेते हैं। सरकार द्वारा इनके लिए पुनर्वासन, खेती, कौशल विकास जैसे कार्यों के द्वारा मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया जा रहा है। साथ ही साथ इन्हें सुरक्षा भी प्रदान किया जा रहा है। व्यक्तिगत तौर पर प्रत्येक व्यक्ति को सहयोगात्मक व्यवहार अपनाते हुए प्रत्येक स्तर पर इनकी मदद करनी चाहिए। नहीं तो मानव अपने ही निर्मित समाज को अपने हाथों से नष्ट कर देगा। 

प्रश्न : ‘वर्तमान समय में राजनीति के गिरते मूल्य’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : भारत राज्यों का एक संघ है। संविधान के अनुच्छेद । के अनुसार प्रत्येक राज्यों एवं संघ के कार्यों के संचालन के लिए विधायिका कार्यपालिका का गठन किया गया है। विधायिका कार्यपालिका के ये सदस्य सुदूर भारतीय क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं एवं विधि निर्माण का कार्य करते हैं। इनका चयन जनता प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से करती है जो राजनीति की दिशा तय करती है। ये सदस्य क्षेत्रीय या राष्ट्रीय स्तर पर एक दल अथवा विचारधारा से बंधे होते हैं जो अपने उद्देश्यों को बताकर जनता का समर्थन लेते हैं। परंतु क्या इनका कार्य संसद में बहस तक सीमित है? क्या जनता द्वारा इनका चुनाव बाहुबली, दलीय आधार पर करने के अलावा नैतिक पक्ष भी देखना चाहिए? क्या भारतीय राजनीति में भी शिक्षा योग्यता का निर्धारण करना चाहिए? 

इतने सारे सवालों की आवश्यकता क्यों? वर्तमान राजनीति की धारा को देखकर प्रत्येक व्यक्ति के मन में यह प्रश्न उठता है। वर्तमान राजनीति में व्यक्तिगत सम्मान को प्रश्नय दिया जा रहा है। नैतिक मूल्यों का पतन होते जा रहा है। सरकार बनाने एवं बचाने के लिए ‘नोट फॉर वोट’ की पद्धति को अपनाकर सांसदों एवं विधायकों की खरीद-फरोख्त की जा रही है। संसदीय मर्यादाओं का दिन-प्रतिदिन उल्लंघन देखने को मिल रहा है। संसद में कुर्सियों का चलना, तू तू, मैं आए दिन देखने को मिल रहा है। राजनीतिक लोगों द्वारा ओछी टिप्पणी की जा रही है। कोई किसी को पप्पू, तो कोई इटली की निर्यातित माल तो कोई किसी को टेलीविजन अदाकार कह रहा है। राजनीतिक मूल्यों का पतन इस कदर नीचे गिर गया है कि लोग चुनाव जीतने के लिए अपराधियों को संरक्षण मूल्यों के स्वरूप ही रहे हैं। 

क्या हमारा लोगों के शिक्षा पर व्यय करना व्यर्थ है? जो लोग अनुच्छेद 19(1) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग करते हुए, सामने वाले व्यक्ति की सम्मान व गरिमा का ध्यान न रखते हुए टिप्पणी करते हैं। यह हम किस दिशा में जा रहे हैं? क्या यह वैश्वीकरण का प्रभाव है? 

भारत अपनी प्राचीन सभ्यता-संस्कृति का विश्व में डंका बजा चुका है। गुप्त काल में विष्णुगुप्त ने राजनीति, प्रशासन से संबंधित अर्थशास्त्र की रचना की, आजादी के बाद कई ऐसे दौर आए जब संसद की सदन में बहस पर विरोध हुए, परंतु यह विरोध वैचारिक एवं तर्कसंगत होता था तथा विरोधी दल एक दूसरे का सम्मान भी करते थे। 

क्या वैश्वीकरण आधुनिकता की दौड़ में व्यक्ति की गरिमा का कोई मोल नहीं? ये बहुत ही चिंतनीय विषय है। हम लोगों को शिक्षा सिर्फ रोजगार उन्मुख होने के लिए नहीं देते बल्कि इसका वास्तविक स्वरूप लोगों में नैतिक गुणों के विकास से है। यदि हमारे बड़े-बड़े राजनेता जो विदेशों से पढ़ाई करके आए हैं वे राजनीति में विरोध के बावजूद अगर व्यक्तिगत गरिमा को न बनाए रखें तो नि:संदेह हम पतन की ओर हैं। ऐसे में हमें ऐसे राजनेताओं की आवश्यकता है जो राजनीति तथा व्यक्ति की गरिमा को बनाए रखते हुए भारतीय राजनीति की सांस्कृतिक क्षमता का परचम लहराए।

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