Important Essay Topics for UPSC 2022-सामाजिक आजादी का सपना 

Important Essay Topics for UPSC 2022

Important Essay Topics for UPSC 2022-सामाजिक आजादी का सपना 

भारत को राजनीतिक आजादी तो मिल गई, किन्तु सामाजिक आजादी का सपना अभी साकार होना बाकी है। सामाजिक आजादी से अभिप्राय उस सामाजिक समता (Social Parity) से है, जिसमें सभी के लिए सामाजिक स्थिति, अधिकारों, उत्तरदायित्वों और अवसरों में समानता होती है। यह एक आदर्श सामाजिक संरचना होती है, जो सामाजिक न्याय (Social Justice) का पथ प्रशस्त करती है। इसमें ऊँच-नीच, छोटे-बड़े आदि का भेदभाव नहीं होता है। सामाजिक आजादी की स्थिति में सामाजिक तनाव (Social Tension) और सामाजिक अशांति (Social Unrest) जैसी समस्याएँ सिर नहीं उठाती हैं, जो कि प्रायः सामाजिक समूहों के संबंधों में पाई जाने वाली कुन्ठा अथवा वैमनस्य की भावना से जन्म लेती हैं सामाजिक आजादी के अभाव में सामाजिक शोषण (Social Expolitation) की प्रवत्तियाँ सिर उठाती हैं, जिनके तहत किसी उच्चवर्गीय समूह द्वारा अधीनस्थ समूह का अपने हित में उपयोग अथवा शोषण किया जाता है। भारत में सवर्णों द्वारा दलितों का ऐसा ही शोषण किया जाता रहा है। इस स्थिति में सामाजिक संघर्ष (Social Conflict) की घटनाएँ बढ़ती हैं, जिनका साक्षी हमारा देश है। 

“भारत को राजनीतिक आजादी तो मिल गई, किन्तु सामाजिक आजादी का सपना अभी साकार होना बाकी है। सामाजिक आजादी से अभिप्राय उस सामाजिक समता (Social Parity) से है, जिसमें सभी के लिए सामाजिक स्थिति, अधिकारों, उत्तरदायित्वों और अवसरों में समानता होती है।’ 

दुख का विषय है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम सामाजिक आजादी की आदर्श स्थिति को प्राप्त नहीं कर पाए हैं। 

सामाजिक आजादी के संदर्भ में भारत की स्थिति कल (आजादी से पूर्व) भी अच्छी नहीं थी और आज (आजादी के बाद) भी इसमें सार्थक बदलाव नहीं दिख रहा है। आजादी के पहले तो स्थिति अत्यंत भयावह और विकराल थी। अस्पृश्यता और शोषण की समस्या विकराल थी, जिसका शिकार दलित और शोषित थे। ये मंदिरों में प्रवेश नहीं कर सकते थे, तो उच्च जातियों वालों के साथ उठ-बैठ नहीं सकते थे। इन्हें हिकारत की नजर से देखा जाता था, जिसके शिकार स्वयं डॉ. भीमराव अम्बेडकर थे, जो कि सामाजिक आजादी के अभियान के अगुवा थे। सड़ांध मारती सामाजिक विकृतियों के चलते ही बाबा साहब, जो हिन्दू धर्म में सामाजिक परिवर्तन के सूत्रधार हो सकते थे, हिन्दू धर्म से ही किनारा कर बौद्ध हो गए। औपनिवेशिक काल में सर्वप्रथम महात्मा गांधी की संवेदनाओं ने दलितों की स्थिति को पूरी शिद्दत से महसूस किया और समाज की दलित समस्या को न सिर्फ परजोर तरीके से उठाया. बल्कि इस राष्ट्रीय आन्दोलन का एक प्रमुख कार्यक्रम भी बनाया। गांधीजी का दलित उत्थान का प्रयास क्रांतिधर्मी न होकर एक जनजागरण जैसा था। इन प्रयासों का प्रभाव भी दिखा। दूसरी तरफ डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने दलितों-शोषितों की सामाजिक आजादी के अभियान की अगुवाई की तथा इस बात पर बल दिया कि सामाजिक आजादी सत्ता की भागीदारी से आएगी। 

“सामाजिक आजादी के संदर्भ में भारत की स्थिति कल (आजादी से पूर्व) भी अच्छी नहीं थी और आज(आजादी के बाद) भी इसमें सार्थक बदलाव नहीं दिख रहा है। आजादी के पहले तो स्थिति अत्यंत भयावह और विकराल थी। अस्पृश्यता और शोषण की समस्या विकराल थी, जिसका शिकार दलित और शोषित थे।” 

सत्ता आ गई, हम आजाद हो गए और सत्ता ने सामाजिक आजादी के लिए अपनी भागीदारी भी सुनिश्चित की, तथापि सामाजिक मोर्चे पर बहुत कुछ किया जाना बाकी रह गया और हमारी स्वतंत्रता एक पडाव मात्र साबित हुई। राजनीतिक आजादी के साथ सामाजिक आजादी का स्वप्न तो साकार नहीं हो पाया, किन्तु हवा उतनी भी विषैली नहीं रही, जितनी आजादी से पहले थी। इसका श्रेय वंचित सपनों के महामनीषी डॉ. भीमराव अम्बेडकर को जाता है, जिन्हें सामाजिक न्याय का इतिहास-पुरुष और प्रेरणा-पुंज माना जाता है। विविध वर्गों-वर्गों में बँटी भारतीय मानवता को कानून की मदद से संविधान के दायरे में लाने और सामाजिक न्याय की स्थापना का उनका प्रयास अतुलनीय रहा। 

सामाजिक आजादी को ध्यान में रखते हुए ही हमारे संविधान में | जहाँ गांधीवादी विचारधारा के महत्त्वपूर्ण घटकों-अस्पृश्यता तथा धर्म | जाति आधारित भेदभाव निवारण को भरपूर स्थान दिया गया, वहीं वंचित सपनों के महामनीषी डॉ. अम्बेडकर की विचारधारा को भी | सम्मान दिया गया। भारतीय संविधान निर्माता भारत में एक ऐसी | संवैधानिक व्यवस्था की स्थापना करना चाहते थे, जो सिर्फ प्रशासकीय | नियमों का संग्रह न होकर सामाजिक-आर्थिक विकास का एक सम्पूर्ण | दस्तावेज हो। यही कारण है कि जो संविधान बनकर तैयार हुआ उसे विश्व के अनेक विद्वानों द्वारा ‘सामाजिक न्याय का चार्टर’ (Charter of Social Justice) कहकर विभूषित किया गया। आस्टिन (Aus tin) के अनुसार, “भारतीय संविधान सर्वप्रथम और प्रमुख रूप से एक सामाजिक प्रलेख है। इसके अधिकांश प्रावधान या तो प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक क्रांति के विकास को संभव बनाते हैं अथवा इसके लिए आवश्यक परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं।” 

“यही कारण है कि जो संविधान बनकर तैयार हुआ उसे विश्व के अनेक विद्वानों द्वारा ‘सामाजिक न्याय का चार्टर’ (Charter of Social Justice) कहकर विभूषित किया गया।” 

संविधान में असमानता और गैर-बराबरी का निषेध करते हुए जाति, रंग, समूह, धर्म तथा लिंग आदि के स्तरों पर हमें समान अधिकार प्रदान किए गए एवं निम्न श्रेणी वाले वर्गों के उत्थान को भी बल दिया गया। संविधान का अनुच्छेद 14जहाँ सभी को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है, वहीं अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, वर्ग, जन्म-स्थान और लिंग के आधार पर भेद-भाव का बहिष्कार करता है। अनुच्छेद 16 में सार्वजनिक आयोजनों और रोजगारों में समानता के अवसर का प्रावधान है, तो अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत करता है। संविधान के अनुच्छेद 18 में वर्णित उपाधियों का अंत (Aboliton of Titles) भी समानता के अधिकार का एक उदाहरण है। संविधान के अनुच्छेद 23-24 में जहाँ शोषण के विरुद्ध अधिकार प्रदान किए गए हैं, वहीं पांचवीं अनुसूची में अनुच्छेद 214 (1) द्वारा अनुसूचित जातियों और जनजातियों को न्याय दिलवाने की व्यवस्था की गई है। संविधान के अनुच्छेद 335, 16 (4) तथा 46 द्वारा लोकसेवा में दुर्बल तथा दलित वर्गों के लिए स्थान आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है। सामाजिक आजादी और सामाजिक न्याय के संवैधानिक प्रयास यहीं समाप्त नहीं हो जाते। हमारी जरूरतों के हिसाब से जहाँ अनेक कानून प्रचलन में हैं, वहीं सामाजिक लाभों के वितरण के लिए ढेरों योजनाएँ हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आदि के समान अवसर सामाजिक न्याय के आधार स्तंभ हैं। 

सामाजिक आजादी के सपने को पूरा करने के संवैधानिक प्रावधानों और प्रयासों के परिप्रेक्ष्य में वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत को सामाजिक आजादी मिल गई है? इसका उत्तर यही होगा कि सामाजिक आजादी पूरे तौर पर अभी प्राप्त नहीं हुई है। कल से आज बेहतर तो है, किन्तु जिस सामाजिक स्वतंत्रता संग्राम का सूत्रपात अम्बेडकर ने किया था, वह अभी अपने अभीष्ट को प्राप्त नहीं कर सका है। सभ्यता और समाज की कमजोर कड़ियाँ यथा-अलगाव, विभेद, वैमनस्य, अत्याचार, शोषण एवं असमानता आदि अभी भी अपना वर्चस्व कायम किए हुए हैं। अथक शाश्वत सेनानी डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अन्याय और शोषण के खिलाफ जिस नैतिक सामाजिक व्यवस्था की मुहिम चलाई थी, वह व्यवस्था समग्र रूप से अभी कायम नहीं हो पाई है। जातीय विद्वेष और हिंसा की घटनाएँ नित नए रूपों में सामने आ रही हैं। स्तरीकृत वर्ग संरचना के बीच आज भी सामाजिक उत्थानशीलता (Social Capillarity) पूरे तौर पर प्रक्रिया में नहीं आ सकी है। संकीर्णता की भावना के शिकार लोग नित नए बखेड़े कर रहे हैं। सामाजिक आजादी के अभाव में सामाजिक तनाव, सामाजिक अशांति, सामाजिक संघर्ष और सामाजिक शोषण की घटनाएं जारी हैं। हिंसा प्रतिहिंसा बढ़ी है, तो अलगाव और आतंक का वातावरण बनता | दिख रहा है। 

यहाँ इस बात पर भी विचार करना उचित रहेगा कि अभी तक सामाजिक आजादी का सपना अधूरा क्यों बना हुआ है? जाहिर है कि ‘व्यवस्था तब तक फलीभूत नहीं होती है, जब तक कि उसके अनुरूप प्रयास न हों और इस व्यवस्था को सभी का सहयोग न प्राप्त हो। समाज के वंचित, शोषित, उपेक्षित और कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप जिस तरह के प्रयास होने चाहिए थे, नहीं हो पाए। कभी राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव रहा, तो कभी उपेक्षा आड़े आई। असहयोग और असहिष्णुता बरकरार रही और हम अपने ‘माइंड सेट’ में सकारात्मक बदलाव भी नहीं ला पाए, जिससे घृणा और वैमनस्य की खाई पट नहीं पाई। यहाँ तक कि इस सम्बन्ध में संवैधानिक व्यवस्थाओं को लेकर भी प्रतिक्रियाएँ होती रहीं, तो नई-नई मांगों ने भी जोर पकड़ा, जिनसे तनाव और अशांति का परिदृश्य बना, जो आज भी कायम है। भ्रष्टाचार ने भी अपना असर दिखाया और हम विकास के समावेशी स्वरूप से दूर बने रहे। यही कारण है कि भारत का सामाजिक स्वतंत्रता अभियान अभी जारी है। 

ऐसा नहीं है कि भारत का सामाजिक स्वतंत्रता का अभियान निष्फल हो गया है। यह काफी सफर तय कर चुका है और थोड़ा सफर अभी बाकी है। एक ताजा हवा बही है, जो कह रही है कि सपना पूरा होने के करीब है। जो अधूरापन दिख रहा है, उसे पाटने के प्रयास जारी हैं। सरकारें संकल्पित दिख रही हैं, तो समाज में भी बदलाव देखने को मिल रहा है । सामाजिक न्याय की प्रक्रिया भी तेज हुई है, जो हमें आपस में जोड़ रही हैं। भेदभाव खत्म हो रहा है और समान अवसर बढ़ रहे हैं। विभेदों को पीछे छोड़ते हुए भारतीयता हमारी पहचान बन गई है। सभी मुख्यधारा का अंग बन रहे हैं। 

सामाजिक आजादी और सामाजिक न्याय की अवधारणा तो | हमारी वैदिक संस्कृति में निहित रही है। इस स्वप्न को साकार करने के लिए हमें अपनी वैदिक संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की प्राचीन भारतीय अवधारणा सामाजिक आजादी | और न्याय की ही गहनतम अभिव्यक्ति है। अथर्ववेद के ‘पथ्वीसक्त’ | में ‘पृथ्वी परिवार’ की परिकल्पना की गई है। पूरी धरती को परिवार | मानने की भारतीय संस्कृति सामाजिक आजादी और न्याय का प्राचीनतम | रूप है। यही वह संस्कृति है, जिसमें वैमनस्य, घृणा, शोषण विजया | और अमानवीयता का प्रतिरोध अनेक रूपों में होता रहा है और दी संस्कति सामाजिक आजादी के स्वप्न को साकार करने की सामग्री रखती है। 

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