Important essay topics for SSC Descriptive paper exam

Important essay topics for SSC Descriptive paper exam

Important essay topics for SSC Descriptive paper exam set-2

प्रश्न : ‘समावेशी विकास’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : भारत में समावेशी विकास की अवधारणा कोई नवीन वस्तु न होकर प्राचीन काल से चली आ रही है। यदि प्राचीन धर्मग्रंथों का अवलोकन किया जाय तो उसमें ‘सभी’ लोगों को साथ लेकर चलने का भाव निहित है। 

“सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।

सर्वे भद्राणि पश्चन्तु मा कश्चिदु:ख भाग्यवेता।। 

किन्तु नब्बे के दशक में उदारीकरण की प्रक्रिया के प्रारम्भ होने से यह शब्द नए रूप में अवतरित हुआ क्योंकि उदारीकरण के दौर में वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी आपस में निकट से जोड़ने का मौका मिला और यह अवधारणा देश और प्रान्त से बाहर निकलकर वैश्विक संदर्भ में प्रासंगिक बन गई है। 

अब प्रश्न उठता है कि समावेशी विकास क्या है ? 

समान अवसरों के साथ विकास करना ही समावेशी विकास है या ऐसा विकास जो न केवल नए आर्थिक अवसरों को पैदा करे, बल्कि समाज के सभी वर्गों के लिए सृजित ऐसे अवसरों की समान पहुंच को सुनिश्चित भी करे, उसे हम समावेशी विकास कहते हैं। समावेशी विकास में जनसंख्या के सभी वर्गों के लिए बुनियादी सुविधाओं अर्थात् आवास, पेयजल, भोजन, शिक्षा, कौशल, स्वास्थ्य के साथ-साथ गरिमामय जीवन जीने के लिए आजीविका के साधनों की सुपुर्दगी करना होगा। किन्तु इसके साथ पर्यावरण संरक्षण पर भी ध्यान देना होता है। 

भारत सरकार द्वारा घोषित कल्याणकारी योजनाओं में इस समावेशी विकास पर विशेष बल दिया गया है। 12वीं पंचवर्षीय योजना 2012-17 का तो समस्त जोर एक प्रकार से त्वरित, समावेशी एवं सतत विकास का लक्ष्य हासिल करने पर है। 

वर्तमान सरकार द्वारा मजबूत लोकतंत्र तथा वित्तीय समावेशन के लिए जन-धन योजना का क्रियान्वयन किया गया जिसमें भारत के प्रत्येक नागरिकों का बैंक खाता खुलवाना आवश्यक माना गया। छात्रों को भी प्रदान की जाने वाली छात्रवृत्ति का भुगतान बैंक खाता के माध्यम से ऑनलाइन की जाने की व्यवस्था की गई। 

अब सवाल यह है कि क्या वास्तविक रूप से प्रत्येक नागरिक के | बैंकिंग शाखा से जुड़ने से विकास संभव है? प्रथम, जन-धन के माध्यम से सरकार ने प्रत्येक भारतीय नागरिक की पहचान को सुरक्षित करते हुए उसे आधार कार्ड से जोड़ा है। द्वितीय, समाज में विभिन्न वर्गों के लिए इस | वित्तीय समावेशन के माध्यम से अलग-अलग लाभ प्रदान किए जा रहे हैं जैसे-बी.पी.एल. वर्ग को गैस सब्सिडी का नगद अंतरण करना, कृषक वर्ग को ऋण सुविधा प्रदान करना, बीज-खाद सब्सिडी प्रदान करना, इस खाते के माध्यम से बी.पी.एल. तक्षा ए.पी.एल. समूह को पेंशन सुविधाएँ देना, कृषकों को फसल-बीमा से जोड़ना। तृतीय, लघु तथा मध्यम व्यापारियों को सब्सिडी देते हुए ऋण प्रदान करना। चतुर्थ, स्किल इंडिया प्रोग्राम के तहत प्रशिक्षुओं को स्वरोजगार के लिए राशि उपलब्ध कराना। पंचम, स्टार्ट अप योजना के द्वारा उद्यमों को पाँच करोड़ रुपए तक की स्टार्ट अप राशि देना। 

उपयुक्त कार्यों द्वारा सरकार आर्थिक गतिविधियों को तेज करने का प्रयास कर रही है जिससे समाज में प्रत्यक्ष प्रभाव आत्मनिर्भरता में वृद्धि, रोजगार, संवृद्धि, गरीबी-बेरोजगारी में कमी, उत्पादन वृद्धि, कौशल-उन्नयन को बढ़ावा देने से है। इसका प्रभाव अर्थव्यवस्था में निर्यात प्रोत्साहन से भी है। 

सामान्यत: देखने पर यह योजना सिर्फ वित्तीय समावेशन को दर्शाता है परंतु इसके दूरगामी परिणाम सामाजिक संवृद्धि के लिए आवश्यक हैं, जो प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से विकास की गाड़ी को आगे खिंचती है। 

Important essay topics in Hindi for Ssc descriptive paper SET-1

SSC CGL Essay Writing in Hindi

प्रश्न :  ‘नारी और उसका संघर्ष’ विषय पर एक निबंध लिखो।

उत्तर : ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ – यह भारतीय दर्शन का प्रमुख अंग है जिसका अर्थ है जहाँ नारियों को सम्मान दिया जाता है वहां देवता विराजते हैं अर्थात् समृद्धि विराजती है। किन्तु यह देखने को मिलता है कि विश्व व्यवस्था में प्राचीन काल से ही नारियों को असम्मान की दृष्टि से देखा जाता है और इन्हें विभिन्न प्रकार से उत्पीड़ित किया जाता रहा है। महिलाओं ने आदिकाल से ही अपनी तरफ से परिवार एवं समाज के विकास में अनेक प्रकार के योगदान दिये हैं किन्तु उनके कार्यों को महत्वहीन मानते हुए पुरुषों ने कभी उन्हें विकास का समान अवसर प्राप्त करने का मौका नहीं दिया है। 

तन के भूगोल से परे, एक स्त्री के मन की गाँठे खोलकर कभी पढ़ा है तुमने उसके भीतर का खौलता इतिहास। 

नारी भारतीय समाज में सृजनहारा के नाम से जानी जाती है। नारी प्रत्येक रिश्ता, मर्यादा, संस्कृति एवं परंपरा की पालनकर्ता तथा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरण का माध्यम है। नव-जीव (बालक/बालिका) के जीवन के प्रथम चरण में पहली अनुभूति माँ नारी का रूप, वयस्क हुआ तो बहन-नारी का रूप, युवा हुआ तो भार्या/पत्नी नारी, पारिवारिक जीवन के संपूर्णता में बेटी नारी का ही रूप है। प्रत्येक मानव के जन्म से अंत तक नारी का रूप बना ही रहता है। 

हर मानव के परिवेश में महिला का महत्व विभिन्न रूपों में है, आधुनिक समाज में सहकर्मी, सखी, अधिकारी है। हम वर्तमान युग में लिंग समानता तथा नारी-सशक्तिकरण की बात करते हैं तथा उस दिशा में कार्य भी करते हैं। परंतु वर्तमान समय में समाज में एक विकृत रूप देखने को आया है। नारी को उपभोग की वस्तु मानकर उसका शारीरिक शोषण करना। जी हाँ मैं नारी पर किए गए बलपूर्वक दुराचार की बात कर रहा हूँ। क्या यह वर्तमान व्यवस्था की उपज है? या प्राचीन काल में भी ऐसा कुछ व्याप्त था? या यह वर्तमान दूषित मानसिक वातावरण की उपज है। 

संविधान में दिए गए विशेष अधिकार, सरकार की नारी सशक्तिकरण की पहल, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, नारी पढ़ेगी विकास गढ़ेगी ये नारे केवल नारों और किताबों तक ही सीमित हैं। एक नारी का चरित्र/ व्यक्तित्व उसका आत्मसम्मान होता है। उस पर किसी भी व्यक्ति द्वारा दबाव पूर्वक किया गया कार्य उसके सम्मान को नष्ट करने वाला होता है। वर्तमान समय में ऐसे कई उदाहरण देखे गए जोकि पहला दिल्ली में घटित निर्भया काण्ड, उत्तर प्रदेश में दलित लड़कियों की अस्मत लूट फाँसी पर लटकाना तथा वर्तमान में जाट आंदोलन के समय मुरथल काण्ड का घटित होना। उपर्युक्त उदाहरण समाज में उपस्थित ऐसे लोगों की ओर इंगित करता है जो नारी के प्रति अपनी छोटी मानसिकता और मानसिक रोग की ओर दर्शाता है। ऐसे व्यक्ति मानसिक रोग से ग्रसित हैं। अगर यह शारीरिक आवश्यकता का परिणाम होता तो शहर, गांव तथा परिवार की एक भी स्त्री सुरक्षित नहीं होती, परंतु यह एक मानसिक विकृति है, जो पुरुषों में कुण्ठा, दकियानुसी सोच एवं मानसिक विकलांगता को दिखाता है। वर्तमान में कई उदाहरण इस बात को दर्शाते हैं कि नारी की अस्मत लूटने के बाद भी उनके शरीर के साथ जानवरों जैसा बर्ताव करना, छड़-रॉड से पीटना, नग्नकर गांवों में घुमाना ये पुरुषों (सर्बोधत) में व्याप्त मानसिक रोग को ही दर्शाता है। 

वर्ना हम ऐसे समाज में रहते हैं जहाँ प्राचीन काल से नारी को दुर्गा, काली शक्ति का स्वरूप समझा जाता है और वर्तमान युग में नारी धरती से अंबर तक अपना परचम लहरा रही हैं। इंदिरा गाँधी, मदर टेरेसा, बछेन्द्री पाल, कल्पना चावला, श्रीमती प्रतिभा पाटिल आदि ने पुरुषों के हर कार्य में साथ देकर बराबर की भागीदारी सुनिश्चित की है। समाज में व्याप्त किसी भी रोग का इलाज शिक्षा, स्वास्थ्य, सहयोग, विधि के द्वारा संभव है। 

Important essay topics for SSC CGL

प्रश्न : ‘राजनीति का अपराधीकरण, लोकतंत्र पर एक कलंक’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र एवं जनसंख्या में दूसरे पायदान पर खड़ा हमारा देश अपनी अद्वितीय विशेषताओं के लिए विख्यात् है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश हुकुमत को जड़ से उखाड़ फेंकने वाले महान स्वतंत्रता सेनानियों तथा उनके द्वारा बनाया गया भारतीय संविधान दोनों के आदर्शों व सिद्धांतों का अगर सूक्ष्म परीक्षण करें तो हम पाएँगे कि, देश में एक ऐसे वातावरण का निर्माण किया जाना था जहाँ सभी, धर्म, जाति समुदाय रंग के लोग साथ मिलकर रहें। साथ ही राजनीति को लोकतांत्रिक एवं स्वस्थ राजनीति में तब्दील किया जा सके। 

स्वतंत्रता संग्राम में जिन सेनानियों ने भाग लिया था, लगभग उन्हीं ने 1960 तक देश की राजनीति में भाग लिया था। ऐसे में राजनीति के भटकाव की बात तो की ही नहीं जा सकती। पत्रकार आलोक मेहता ने अपनी किताब राव के बाद कौन में एक बड़ा ही अद्भुत उद्धरण प्रस्तुत किया है, जिसमें उन्होंने एक घटना का उल्लेख किया है और लिखा है कि, पं. जवाहरलाल नेहरू एक बार मध्यप्रदेश के एक क्षेत्र में अपनी पार्टी के प्रत्याशी के लिए प्रचार करने आये थे तभी मंच पर उन्हीं की पार्टी के एक सदस्य ने आकर कान में धीरे से बताया कि, अपनी पार्टी के प्रत्याशी पर न्यायालय में केस चल रहा है और यह अपराधी प्रवृत्ति का इंसान है, तभी तुरंत पं. नेहरू माईक पर आये और उन्होंने जनता से अपील की कि, धोखे एवं गलती से उनकी पार्टी के द्वारा गलत प्रत्याशी चुनाव में उतार दिया गया है और आप लोग कृपया इसे अपना मत ना दें। अंतत: वह प्रत्याशी चुनाव में हार गया। ऐसे समय में राजनीति के अपराधीकरण की बात सोचना वाजिब नहीं होगा। 

राजनीति का का पतन वर्ष 1967 से दिखाई देना प्रारम्भ हो गया था। साठ के दशक के मध्य तक, चुनाव में प्रत्याशियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, नेताओं और मंत्रियों की स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि थी और उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता भी। परन्तु कालान्तर में साठ के दशक के पश्चात् चुनावों में धन, शराब एवं अपराधी दिखाई देने लगे। राजनीतिक व्यक्ति एवं राजनीतिक दल का एक मात्र लक्ष्य चुनाव जीतना था। वे इसके लिए अपराध जगत के अपराधियों से हाथ मिलाया एवं इनके माध्यम से धनबल एवं बाहुबल के सहारे मतदान स्थलों पर कब्जा करते; फर्जी मतदान या लोगों द्वारा मतदान रोकने के कृत्य करते थे। राजनीतिक दल इनके पारितोषिक में अपराधियों को कानून में शिथिलता का संरक्षण प्रदान करते थे। देखते-ही-देखते जिन्हें जेल के सलाखों में होना चाहिए, वे किंग मेकर’ बन गये। कुछ समय पश्चात् अपराधियों को यह महसूस होने लगा कि वे अपने बल से ‘किंग’ बना सकते हैं तो वे ‘माननीय’ क्यों नहीं बन सकते। इसके पश्चात वे लोक सभा एवं विधान सभा में माननीय बन कर पहुंचने लगे। 

वर्तमान समय में सभी राजनीतिक दल अपराधियों को निहित स्वार्थ के लिए संरक्षण प्रदान कर रहे हैं। आज सभी दलों में ऐसे सांसद एवं विधायक प्रचुर संख्या में दिखाई दे रहे हैं। आज के समय में अपराधियों, नौकरशाहों, एवं राजनेताओं का संगठित समूह तैयार हो गया है जो एक-दूसरे को संरक्षणात्मक सहायता प्रदान करते हैं। इसके साथ ही राजनीति एवं प्रशासन की गरिमामयी परम्पराएं भी कलंकित हो गयीं। 

राजनीति के अपराधीकरण के प्रमुख कारणों में क्षेत्रवाद की राजनीति, संप्रदाय आधारित राजनीति भी प्रमुख है। लोग इनकी आड़ में राजनीति में होते हुए भी गलत कृत्य करते रहते हैं। ऐसे में हमारी और हमारे देश के राजनीतिक पार्टियों की नैतिक जिम्मेवारी बनती है कि ऐसे लोगों की जगह संसद/विधानसभा में नहीं अपितु हवालातों में है और हमें इन्हें नजरअंदाज करना चाहिए। 

ऐसा नहीं है कि देश की संसद और न्यायपालिका द्वारा ऐसे घटनाक्रम के दौरान कुछ नहीं किया गया। ‘नोटा’ का लाया जाना तथा दो वर्षों से अधिक सजा पाने वालों की राजनीति से कुछ समय के लिए विदाई भी तय कर दी गई। परंतु सिर्फ इतने से राजनीति जैसी स्वच्छ, पवित्र धारा का | सौन्दर्वीकरण नहीं होगा अपितु लोगों में इस बात की जागरूकता भी फैलाए जाने की जरूरत है कि राजनीति विद्वानों, समाजसेवियों का अड्डा है ना कि अपराधियों का अखाड़ा। 

Descriptive topics for SSC CGL

प्रश्न : ‘भ्रष्टाचार सिर्फ आर्थिक नहीं अपितु एक मनोवैज्ञानिक समस्या है’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : भ्रष्टाचार, वर्तमान में देश के सामने एक गंभीर समस्या बनकर उभरा है। भ्रष्टाचार का तात्पर्य है भ्रष्ट आचरण अर्थात् ऐसा कोई भी कृत्य जो स्वार्थ सिद्धि के लिए किया गया हो, दूसरों के लिए उचित ना हो और जिसे वैधानिक या नैतिकता के मानदण्डों में निकृष्ट माना जाता हो। आखिर यह बीमारी लोगों को लगी कहाँ से और यह इतनी बड़ी बीमारी है जिसका इलाज निश्चित रूप से बेहद कठिन एवं बहुआयामी है। 

आज की दुनिया चार्वाक के सिद्धांत भौतिकतावाद की ओर झुकी हुई दिखाई पड़ती है, जिसके अनुसार अर्थ और काम को ही दुनिया के लिए सर्वोत्तम माना गया है। जहाँ अर्थ एवं काम से तात्पर्य धन कमाना एवं सुखवाद की ओर पलायन करना है। आज इंसान को संतुष्टि नहीं है, उसे कमाने की इतनी लालसा है कि यह अपनी पगार से भी खुश नहीं है और वह सदैव ऊपर से कुछ पैसे और चाहता है यद्यपि नाजायज पैसा कमाना सभी धर्मों में गुनाह बताया गया है। कुछ धर्मों में अस्तेय का सिद्धांत दिया गया है अर्थात् जरूरत से ज्यादा धन इकट्ठा नहीं करना चाहिए। महात्मा गाँधी स्वयं “ट्रस्टीशिप” के सिद्धांत को मानने वाले थे अर्थात् इंसान को सिर्फ उतना ही रखना चाहिए जितना की उसकी जरूरत है, बाकी धन गरीबों और बेसहारों को दे देना चाहिए, अगर कोई ऐसा नहीं करता तो वह निश्चित रूप से इंसानियत के धर्म का विरोधी है। मानवतावादी चिंतकों / विचारकों ने भी गलत तरीके से कमाये गए धन को गलत बताया है। 

आज जहाँ दुनिया वैश्वीकरण के युग में आगे बढ़ती जा रही है, ऐसे में हर इंसान रातों-रात पैसा कमाने में लगा हुआ है और इसी दौड़ में वह कब गलत पैसा (घूस) आदि लेने के मायाजाल में फँस जाता है, उसे पता भी नहीं चलता। इस प्रकार वह भ्रष्टाचारी बन जाता है। आज जब बच्चा छोटा होता है, तब उसके पालक उसे हमेशा एक ऐसा ख्वाब पालने के लिए कहते हैं, जिसमें वह अच्छा धन कमा सके। अच्छा पैसा कमाना गलत नहीं परंतु इसके साथ-साथ एक छोटे अबोध बालक को धन की अपेक्षा का पाठ पढ़ाया जाता है तो साथ में उसे नैतिकता के पाठ भी पालकों के द्वारा पढ़ाया जाना चाहिए ताकि वह ईमानदार, कर्त्तव्यनिष्ठ एवं समाज का एक ऐसा नागरिक बन सके जो समाज की आगे बढ़कर मदद कर सके। 

“शिक्षा क्या है? क्या यह महज किताब पढ़ना है? नहीं! क्या यह विविध ज्ञान है? यह भी नहीं। शिक्षा वह प्रशिक्षण है जिसके द्वारा इच्छा का प्रवाह और अभिव्यक्ति नियंत्रित होते हैं तथा लाभकारी बनते हैं।” 

स्वामी विवेकानंद का यह कथन निश्चित रूप से यह स्पष्ट करता है कि शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों के मनमानस में ईमानदारी का बीज बोया जाय, उन्हें नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाए, ताकि वे बड़े होकर एक अमीर व्यक्ति के साथ-साथ एक ईमानदार, सत्य बोलने वाला, कर्त्तव्यनिष्ठ, नैतिकता का प्रेमी एवं सहानुभूति वाला इंसान बन सके और भ्रष्टाचार जैसे मार्ग पर वह कभी जा ना सके। 

“मौज दरिया की मेरे हक में नहीं तो क्या हुआ

कश्तियाँ भी पाँव उल्टं चल पड़ी तो क्या हुआ

देखिए उस पेड़ को तनकर खड़ा है आज भी 

आँधियों का काम है चलना चली तो क्या हुआ

कम से कम तुम तो करो खुद पर यकीं ये दोस्तों

गर जमाने को नहीं तुम पर यकी तो क्या हुआ।” 

Essay topics for SSC CGL Tier 3

प्रश्न : ‘सांप्रदायिकता देश के लिए घातक है’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, आज से नहीं अपितु, आजादी के पूर्व जब हम आजादी की जंग एक साथ लड़ रहे थे, तब हिंदू-मुसलमान और सभी धर्म के लोग कदम से कदम मिलाकर अपने देश की आन-बान-शान को बचाने में लगे थे। उस समय किन्हीं दो धर्मों के बीच में तनाव की कोई गुंजाइश ही नहीं थी, परंतु इसके बाद भी स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान और उसके पूर्व ही एक ऐसी अनजान सी हवा थी जिसने जाने-अनजाने दो धर्मों के बीच में जहर घोलने का काम जारी रखा और आज वर्तमान में देश के कुछ क्षेत्रों में स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। 

1857 के एक व्यापक संघर्ष के बाद से ही ब्रिटिश सत्ता की फूट करो की नीति काफी हद तक भारत के कई धर्मों के बीच एक तनाव की भावना उत्पन्न करने में सहायक रही। इस नीति के द्वारा व्यक्ति विशेष को एक धर्म से जुड़े होने का बोध करा दिया गया। यही नीति एक समय के बाद आगे चलकर 1909 के अधिनियम में प्रथम निर्वाचक मण्डल का रूप ले ली। इसके साथ प्रतिस्पर्धा के दौर में नौकरियों को पाने में भी धर्म के लोगों के बीच मनमुटाव उभरकर आने लगा। इसी दौरान स्वतंत्रता सेनानी जैसे लोकमान्य तिलक द्वारा लोगों में राष्ट्रवाद की भावना विकसित करने के लिए जो धर्म विशेष के निशान चिह्न तथा पर्यों का सहारा लिया गया और स्वामी दयानंद सरस्वती और विवेकानंद जैसे विचारकों के द्वारा भी इसी क्रम में जाने-अनजाने वैदिक धर्म का महिमामंडन किया गया उसने लोगों के बीच धर्म के रास्तों का बँटवारा कर दिया। 

वर्तमान समय में सांप्रदायिकता का लाभ लेने के लिए राजनीतिक दलों द्वारा चुनावों में मत हासिल करने के लिए प्रयोग किया जा रहा है। इससे सांप्रदायिकता को बढ़ावा मिलता है। आज व्यक्ति अपने धर्म के प्रति श्रेष्ठता एवं दूसरे के धर्म के प्रति निकृष्टता का भाव हमारे समाजिक विघटन का मूल कारण बनते जा रहा है तथा इससे आपसी रिस्ते टूटते जा रहे हैं। आज के समय में भारत में अलगाववादी प्रवृत्तियों का काफी बोलबाला बढ़ गया है और इस अलगाव वादी प्रवृत्तियों का शिकार होकर विघटन के अत्यन्त दुखान्त दौर से गुजर रहा है। सांप्रदायिकता विश्व शान्ति के लिए खतरा बनते जा रहा है। 

आजादी के दौरान धर्म के नाम पर जो दंगे या कल्लेआम हुए या फिर इसी धर्म के नाम पर प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या हो। इससे देश का काफी नुकसान हुआ है और लगातार होता जा रहा है। 

सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाले कारकों को अगर करीब से परखा जाये तो निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि, आखिर कैसे “जन्म-जन्म से एक साथ रहने वाले साथ-साथ खाना खाने वाले लोग धर्म के नाम पर एक दूसरे का कत्लेआम करने के लिए भी तैयार हो जाते हैं”। सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाले कारणों में ब्रिटिश नीति के साथ-साथ अगर हमारे स्वतंत्रता सेनानियों की नीति जो जाने-अनजाने हमारे लिए घातक सिद्ध हुई तो इसके साथ-साथ स्वार्थ से प्रेरित राजनीति ने भी इस आग में घी डालने का काम करती है। 

“ये क्या हुआ कि फासले हमने इतने बढ़ा लिये इन दो घरों के बीच में इक दीवार ही तो है।” 

वर्तमान में मुजफ्फरनगर के दंगे हों या गोधरा गुजरात और बाबरी विध्वंस जैसी वीभत्स घटनाएँ जिनकी जितनी आलोचना की जाए उतनी कम है। इन दंगों की पृष्ठभूमि पर नजर डाली जाए तो ये दंगे राजनीतिक देन थी। चाहे सहाय आयोग की रिपोर्ट हो या उत्तर प्रदेश के पूर्व डी.जी.पी. प्रकाश सिंह की रिपोर्ट। प्रत्येक में इस तथ्य का उल्लेख जरूर किया गया है कि, दंगे / सांप्रदायिक हमले कहीं ना कहीं राजनैतिक सोच की उपज होते हैं। ऐसी सभी वीभत्स एवं दुःखद घटनाओं में हजारों लोग मारे जाते हैं। अनेक बच्चे अनाथ हो जाते हैं। 

अलगाववाद, क्षेत्रवाद एवं सांप्रदायिकता ये कहीं ना कहीं एक दूसरे से जुड़े हुए होते हैं, ऐसे में हमें जरूरत है कि हम एक धर्मनिरपेक्ष सोच विकसित करें, आपस में मिल-जुलकर रहें तथा सौहार्द, प्रेम एवं भाईचारे से भरे एक स्वर्णिम भारत का निर्माण करें। 

“हम क्या हैं, क्या थे और क्या होंगे अभी

आओ विचारे मिलकर समस्याएँ सभी।” 

ध्यातव्य है कि सांप्रदायिकता रूपी दानव से बचने के लिए सांप्रदायिक, अलगावादी तथा रूढिवादी ताकतों के खतरे से त्वरित एवं कड़ाई से निपटना चाहिए। क्योंकि ये ताकतें राष्ट्रीय एकता, लैंगिक संबंधों, सदभाव और हमारे सभी नागरिकों के समानता को खतरा उत्पन्न करते हैं, साथ ही सांप्रदायिक घटनाओं को रोकने के लिए राजनीतिकों सहित समान के प्रत्येक वर्ग के लोगों की ओर से राष्ट्रीय प्रयास आवश्यक है। 

Descriptive topics for SSC CGL

प्रश्न : “स्वयं सहायता समूह की भूमिका’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : देश की आजादी के उपरांत तत्कालीन सरकार (केंद्र / राज्य) तथा स्वतंत्रता सेनानियों के समक्ष एक बड़ी चुनौती थी कि, आखिर कैसे कम संसाधनों के अत्यधिक उचित प्रयोग से देश के पिछड़े वर्ग, महिलाओं, बच्चों और साथ ही वह व्यक्ति जो समाज के आखिरी हासिये पर खड़ा है को आर्थिक, शैक्षणिक, राजनैतिक एवं शारीरिक रूप से सक्षम बनाया जाय। 

इसी कालक्रम में किसी को आरक्षण रूपी सुविधा दी गई तो किसी को कुछ विशेष रियायतें दी गई। इस बीच देश की महिलाओं का विकास भी सरकार के लिए बड़ी जटिल समस्या थी। जहाँ एक ओर महिलाओं के लिए संविधान में रियायतें दी गईं, महिला आयोग के गठन का प्रावधान किया गया वहीं राजनीतिक शक्ति एवं राजनीति में आरक्षण भी दिया गया। 

1991 के वैश्वीकरण के बाद महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए “स्वयं सहायता समूह” योजना बनाई गई। यद्यपि वर्तमान 

परिप्रेक्ष्य में पुरुषों को भी स्वयं सहायता समूह में प्रवेश दिया गया है तथा इसके अंतर्गत बेहद प्रशंसनीय कार्य किया जा रहा है। इसके बावजूद भी महिलाओं के लिए स्वयं सहायता समूह एक संजीवनी के रूप में साबित हुआ है। 

इसके अंतर्गत महिलाओं / पुरुषों के लिए 10 या 15 या 20 लोगों का एक समूह बनाया जाता है और वे साथ मिलकर कोई कार्य जैसे मुर्गीपालन, बकरी पालन, ईंट बनाना, सिलाई, कढ़ाई, पापड़ बनाना या हस्तशिल्प से संबंधित कार्य करते हैं। इसके लिए बैंक से एक साथ एकमुश्त राशि प्रदान की जाती है, जिसे समूह के सदस्य एक साथ मिलकर किश्तों में बैंकों को वापस करते हैं। यह राशि कम ब्याज में समूहों को दी जाती है, यह समूहों के हित में होता है। इन समूहों के द्वारा ऐसा कार्य किया जाता है जो कि सराहनीय हो। इसी क्षेत्र से संबंधित छत्तीसगढ़ “शमशाद बेगम” को भारत सरकार द्वारा “पद्म श्री” पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा ” फूलन बाई यादव” को भी इस पुरस्कार से सम्मानित किय जा चुका है। 

“एक दिन क्या करूँ आप ही बतलाइये

क्या करूँ कहती-कहती उठ पड़ेगी

मुट्ठियाँ भींच लेंगी, कभी नहीं हटेगी

एक दिन पौ सी फटेंगी

छोटे शहर की लड़कियाँ ” 

ग्रामीण स्तर पर स्वयं सहायता समूह के कारण महिलाओं के आर्थिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक जीवन में बेहद सुधार आया है। अध्ययन बतलाते हैं कि, ग्रामीण स्तर पर स्वयं सहायता समूहों के कारण महिलाओं की आर्थिक स्थिति के सुदृढ़ होने से उनके ऊपर होने वाली यातनाओं जैसे दहेज के लिए होने वाली प्रताड़ना, पति के द्वारा मारपीट, यहाँ तक की बालिकाओं के अनुपात में सुधार भी हो रहा है। 

“तुम्हारे पंजे देखकर, डरते हैं बुरे आदमी

तुम्हारा सौष्ठ देखकर खुश होते हैं अच्छे आदमी

यही मैं सुनना चाहूँगा, सिर्फ तुम्हारे बारे में” 

महिला सशक्तिकरण की दिशा में निश्चित रूप से स्वयं सहायता समूह ने अपनी विशेष छाप छोड़ी है। यदि इस कदम की बेहद बारीकियों से जाँच-पड़ताल की जाय तो स्वयं सहायता समूहों में कुछ एक कमियों के अलावा लगभग सकारात्मकता ज्यादा दिखाई पड़ती है। कमियों के अंतर्गत यदि ग्रामीण स्तर पर महिलाओं/ पुरुषों की साक्षरता एवं जागरूकता पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। साथ ही साथ ऐसे लोगों के कौशल विकास के लिए विशेष प्रशिक्षण की जरूरत है। सरकारी अधिकारियों एवं बैंकों के अधिकारियों का समन्वयकारी व्यवहार भी स्वयं सहायता समूहों के वास्तविक लक्ष्यों को वास्तविकता के पटल पर मूर्त रूप प्रदान किया जा सकता है। 

” स्वयं सहायता समूहों ने डाली ग्रामीणों में जान है

सशक्तिकरण के द्वारा बढ़ी महिलाओं की शान है आर्थिक,

सामाजिक जीवन में बदलाव अब होगा जरूर

इसी पथ पर चलकर बढ़ेगा महिलाओं का अभियान है।” 

Important Essay topics for SSC CGL in Hindi

प्रश्न : ‘विधायिका की अनदेखी’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : लोकतंत्र को विश्व की आधुनिकतम शासन पद्धति के रूप में जाना जाता है। जिसके तीन प्रमुख स्तंभों में विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका शामिल हैं। जिसमें विधायिका (भारत में संसद) को लोकतंत्र के मंदिर की उपमा भी दी जाती है। विधायिका देश की सर्वोच्च नियामक संस्था है। भारत जैसे देश में जहाँ संसदीय लोकतंत्र स्थापित है, विधायिक अतिरिक्त रूप से कार्यपालिका पर नियंत्रण भी लगाती है। 

परंतु यदि कार्यपालिका द्वारा विधायिका की अनदेखी की जाने लगे तो लोकतंत्र के इस महान स्तंभ का क्षरण होने लगता है। भारत में विध यिका की गिरती साख को इसी रूप में देखा जा सकता है। विगत दशकों में अनेक ऐसे अवसर देखे गए हैं जब कार्यपालिका ने विधायिका पर अंकुश लगाने का कार्य किया है। इसके हालिया उद्धणों में संसद सत्रों की अवधि में आने वाली कमी को लिया जा सकता है। जहाँ स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रारंभिक दो दशकों में संसद सत्रों की कुल वार्षिक अवधि 120 से 130 दिन हुआ करती थी वह विगत् एक दशक में 80 से भी कम हो गयी है। 

हाल ही में गुजरात राज्य में चुनावों के कारण संसद के शीतकालीन सत्र की अवधि मात्र 21 दिन ही निर्धारित की गयी। जिस पर विपक्ष तथा संविधान विशेषज्ञों द्वारा आपत्ति दर्ज करायी गयी। 

यदि उक्त कारण का विश्लेषण किया जाए तो हम पाते हैं कि चुनाव प्रचार में केन्द्रीय कार्यपालिका की व्यस्तता के कारण संसद सत्र की अवधि को विलम्बित करना और सत्र की अवधि में कटौती करना तार्किक प्रतीत नहीं होता है। इसके अतिरिक्त विगत वर्षों में संसदीय सत्रों का कार्यनिष्पादन भी अंसतोषजनक रहा है। संसद को विचार विमर्श के स्थान पर विरोध प्रतिरोध के मंच के रूप में प्रयोग किया जाना संसदीय गरिमा के प्रतिकूल है। संसद की कम उत्पादकता के चलते कार्यपालिका द्वारा अध्यादेश के माध्यम से आवश्यक कानूनों को प्राप्त करने से विधायिका का महत्व कम होता जा रहा है जो लोकतंत्र की सुदृढ़ता के लिए शुभ संकेत नहीं है। 

अत: निर्वाचित प्रतिनिधियों का यह दायित्व बनता है कि वे संसदीय मूल्यों की रक्षा के प्रहरी बनें। भविष्य के भारत का निर्माण संसद की बैठकों में सार्थक चर्चा के बिना नहीं किया जा सकता है, क्योंकि संसद ही भारत के भावी नीतियों की निर्माणस्थली है जो देश को सही दिशा में ले जाने के लिए आवश्यक है। 

SSC CGL Essay

प्रश्न : ‘इतिहास को विकृत करना’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : किसी भी देश का इतिहास उस देश की पीढ़ियों का उसके अतीत से साक्षात्कार करवाती है। जिससे हम अतीत की घटनाओं के कार्यकारण को समझ कर भविष्य का बेहतर निर्माण कर सकें। इसका अत्यधिक महत्व इस रूप में भी है कि हम अतीत में की गयी भूलों की पुनरावृत्ति करने से भी बच सकते है। इतिहास हमें हमारी प्राचीन संस्कृति से जुड़ने तथा समाज के क्रमिक विकास को समझने का अवसर देता है। जो देश के नागरिकों के विकास का मुख्य अवयव है। 

परंतु उपर्युक्त लाभों को प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि हम अपने इतिहास को उसके मौलिक एवं वास्तविक रूप में जानें। यदि ऐतिहासिक घटनाओं का वास्तविक और तार्किक अन्वेषण ना किया जाए तथा उसे विकृत रूप में प्रस्तुत किया जाए तो यह समाज का सही मार्गदर्शन कर पाने में असमर्थ सिद्ध होगा। यही कारण है कि समाज के कुछ बुद्धिजीवी वर्ग इतिहास के प्रस्तुतीकरण पर अपनी पैनी नजर रखे रहते हैं। 

विगत वर्षों में हमने ऐसे अनेक अवसर देखे हैं जब ऐतिहासिक घटनाओं को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने के आरोप लगाए गये हैं। उदाहरण के लिए विगत वर्ष टीपू सुल्तान की जयंती के अवसर पर कर्नाटक राज्य में अनेक स्थानों पर उत्सव और समारोहों के आयोजन पर कुछ वर्गों द्वारा तीव्र प्रतिक्रिया दिखायी गयी। उनका मानना था कि टीपू सुल्तान का जीवन चरित समाज के लिए प्रेरणा स्रोत बनने के योग्य नही है। अतः ऐसे अवसरों पर आयोजन नहीं किया जाना चाहिए। इसी प्रकार राजस्थान सरकार द्वारा अपने राज्यस्तरीय पाठ्यक्रम में हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर की विजय वाले भाग को परिवर्तित करके उसे अनिर्णित युद्ध के रूप में प्रस्तुत किया गया। जिस पर बुद्धिजीवीयों ने कड़ा ऐतराज जताया। 

सर्वाधिक विवाद हमें ऐतिहासिक संदर्भो पर बनी फिल्मों को लेकर देखने को मिलता है जिसमें जोधा-अकबर, बाजीराव मस्तानी तथा पद्मावती जैसी फिल्मों का उदाहरण लिया जा सकता है। जिसे लेकर सम्पूर्ण देश में विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया जा रहा है। यद्यपि उक्त फिल्मों की ऐतिहासिक सत्यता के विषय पर इतिहासकार बँटे हुए हैं। तदापि कुछ सामाजिक संगठन इसे इतिहास को विकृत रूप में चित्रित करने के रूप में देखकर तीव्र विरोध करते हैं। 

उपर्युक्त का विवेचन करने पर हम कह सकते हैं कि ऐतिहासिक घटनाक्रमों को वास्तविक रूप में प्रस्तुत करना हम सभी का दायित्व है यदि किसी विषय की सत्यता संदिग्ध है तो इतिहासकारों के एक दल का गठन करके उसे प्राथमिकता के साथ विश्लेषित किया जाना चाहिए। तथा इस देश के इतिहास को विकृत रूप में प्रस्तुत करने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती है। 

SSC CHSL Descriptive paper topics in Hindi

प्रश्न : ‘नमामि गंगे’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : गंगा एक नदी मात्र नहीं बल्कि हमारे देश की जीवन रेखा है, जो असंख्य भारतीयों की आस्था का केन्द्र बिन्दु भी है। परन्तु विडंबना यह है कि यह पवित्र नदी लम्बे समय से प्रदूषण की मार झेल रही है, जिससे इसकी भव्यता तिरोहित हो चुकी है। ऐसा नहीं है कि सरकारी स्तर पर गंगा की दुर्दशा पर ध्यान न दिया गया हो। नदी में व्याप्त प्रदूषण के उपशमन एवं जल गुणवत्ता में सुधार करने के उद्देश्य से केन्द्र सरकार द्वारा 1985 में ‘केंद्रीय गंगा प्राधिकारण’ एवं ‘गंगा परियोजना निदेशालय 1986 में ‘गंगा कार्य योजना’ 2009 में ‘मिशन क्लीन गंगा’ योजना का शुभारंभ किया गया। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में ‘राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण’ का गठन किया गया। किन्तु इन योजनाओं के बावजूद परिणाम सुखद नहीं रहा बल्कि दवा के साथ मर्ज बढ़ता गया। 

गंगा सफाई के पूर्व में हुए प्रयासों की निष्फलता देखते हुए, 13 मई 2015 को प्रधानामंत्री की अध्यक्षता में गंगा नदी को स्वच्छ एवं सरिक्षत रखने हेतु फ्लैगशिप कार्यक्रम ‘नमामि गंगे’ की स्वीकृति प्रदान की गयी। 

पूर्व योजनाओं की तुलना में क्रियान्वयन के प्रारूप में एक बड़ा परिवर्तन किया गया जिसके तहत गंगा नदी के किनारे रहने वाले लोगों को परियोजना में शमिल करने में विशेष ध्यान केन्द्रित किया जायेगा। इसके तहत 15 जनवरी, 2016 को केन्द्रीय जलसंसाधन नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री ने उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में ‘गंगा ग्राम योजना का शुभारंभ किया जिसके तहत गंगा के किनारे स्थित देश के 1600 ग्रामों का विकास किया जायेगा। इस योजना के तहत खुली नालियों नालों के अपशिष्टों की निकासी, पक्के शौचालयों का निर्माण की व्यवस्था की जायेगी, जिससे अपशिष्टों का गंगा नदी में गिरने से रोका जा सके। 

जनवरी, 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में ‘नमामि गंगे’ हेतु पीपीपी मॉडल को स्वीकृति प्रदान की गयी। जिसके तहत सरकार निष्पादन, सक्षमता, व्यवहारिकता सुनिश्चित करने हेतु पूँजीगत निवेश के 

एक हिस्से का भुगतान (40%) निर्माण संबद्ध निर्देशांकों के अनुसार करेगी तथा शेष राशि 20 वर्षों की अवधि में वार्षिक भुगतान के रूप में दी जायेगी। ‘नमामि गंगे’ की खास बात यह है कि राज्य के साथ-साथ जमीनी स्तर के संस्थानों- शहरी स्थानीय निकाय एवं पंचायती राज संस्थानों को क्रियान्वयन स्तर पर शामिल किया गया है।

‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम क्रियान्वयन को बेहतर बनाने हेतु त्रिस्तरीय प्रणाली प्रस्तावित है 

  • राष्ट्रीय स्तर पर कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय कार्य बल जिसकी सहायता एनएमसीजी द्वारा की जायेगी। 
  • राज्य स्तर पर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय समिति जिसकी सहायता एसपीएमजी द्वारा की जायेगी। 
  • जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में जिला स्तरीय समिति। 

केन्द्र सरकार ने इस कार्यक्रम के तहत विभिन्न गतिविधियों में शत्-प्रतिशत वितीय भार वहन करेगी साथ ही 10 वर्षों तक परिचालन एवं परिसंपत्तियों की व्यवस्था करने का स्वयं निर्णय लिया है। इस कार्यक्रम के तहत प्रदूषित स्थलों के लिए पीपीपी एवं एसपीवी व्यवस्था को अपनाया जायेगा। गंगा को प्रदूषण से बचाने हेतु ‘गंगा इको-टास्क फोर्स’ के 5 बटालियन स्थापित करने की योजना है साथ ही नदी के नियंत्रण एवं संरक्षण के लिए कानून बनाने पर विचार चल रहा है। इसी के तहत गढ़मुक्तेश्वर में ‘गंगा वाहिनी’ गंगा के तट पर तैनात रहकर यह सुनिश्चित करेगी की औद्योगिक इकाईयों एवं नागरिक गंगा को प्रदूषित न कर सकें। 

इस प्रकार कार्यक्रम को सही रूप में क्रियान्वित होने पर सामाजिक-आर्थिक लाभ होंगे। वृहत जनसंख्या को स्वास्थ्य लाभ, आजीविका स्तर में सुधार, रोजगार सृजन की भी प्रत्याशा है। 

प्रश्न : ‘विश्व योग दिवस की प्रासंगिकता ‘ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : योग भारत की प्राचीन पंरपरा का एक अमूल्य उपहार है। यह दिमाग और शरीर के एकता का प्रतीक है। मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है। विचार संयम और स्फूर्ति प्रदान करने वाला है, तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है। यह व्यायाम के बारे में नहीं है, लेकिन अपने भीतर समता की भावना दुनियाँ और प्रकृति के खोज के विषय में है। हमारी बदलती जीवन शैली में यह चेतना बनाकर हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता है।

 प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने संयुक्त राष्ट्र के पहले संबोधन में योग की प्रासंगिकता को उपरोक्त शब्दों में रेखांकित करते हुए दुनिया को इसे अपनाने के लिए आवाह्न किया। जिसके फलस्वरूप विश्व के 199 देशों ने इस आशय की पुष्टि की जिसके फलस्वरूप 21 जून को प्रतिवर्ष ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ मनाने पर सहमति बनी।

योग को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिलाने के लिए श्री. श्री. रविशंकर ने दुनियाँ के अनेक देशों के प्रतिनिधियों से मिल कर इसके प्रति अपनी सहमति दिलाने का आग्रह किया तथा योग की सूक्ष्म पहलूओं को बताया कि किस प्रकार योग से मन और शरीर स्वस्थ होता है। 

वर्तमान में अनेक कायिक रोग है, जैसे मधुमेह गठिया, रक्तचाप, हृदय रोग, फेफड़ा, किडनी स्टोन, लकवा, कुष्ठ, एलर्जी इत्यादि सभी योग दिनचर्या का अनुपालन न करने के कारण ही उत्पन्न होते हैं। और इनका उपचार केवल शरीर को उपचारित करने के लिए किया जा रहा है। जबकि इनका वास्तविक उपचार मन आधारित होना चाहिए। मन का इलाज योग आधारित पद्धति के अतिरिक्त कहीं है ही नहीं। अत: आधुनिक सभ्यता के कष्टों का निवारण योग से ही संभव है। 

परन्तु इसके इसके साथ हमें अपने आहार की मात्रा, गुणवत्ता एवं आहार करने के समय को भी संतुलित रखना होगा। उचित समय एवं उचित मात्रा में सात्विक आहार आवश्यक है। आहार के द्वारा हमारा मेटाबोलिज्म एवं तदनुसार मनोवृत्तियां नियंत्रित होती हैं। सब कुछ कर लेने के बाद भी यदि आहार नियन्त्रित नहीं किया गया तो आपेक्षिक परिणाम प्राप्त नहीं हो सकते। 

इस प्रकार योग एवं उसकी अनुषांगिक क्रियाओं द्वारा व्यक्ति की समग्र चेतना एवं ऊर्जा का विकास होता है। मानव की विशेषता केवल उसकी विशिष्ट चेतना ही है। इस चेतना को जितना अधिक विकसित किया जायेगा, उतना ही मुनष्य की विशिष्टता बढ़ती जायेगी। इस प्रकार योग एक जीवन पद्धति है जिसका संबंध किसी धर्म सम्प्रदाय एवं मत से न होकर सम्पूर्ण मानवता से है। यह कहना कि यह केवल हिन्दू जीवन पद्धति है, त्रुटिपूर्ण है। इस प्रकार योग सम्पूर्ण मानवता की धरोहर है, जिसका संबंध मात्र किसी विशेष धर्म अथवा सम्प्रदाय से न होकर अखिल विश्व समुदाय से है। मनुष्यों के कष्टों का निवारण एवं कल्याण केवल और केवल योग जीवन पद्धति को अपनाने से ही संभव है।

 इसी का परिणाम है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानवता के कल्याण एवं उनकी रक्षा के लिए 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने का प्रस्ताव पारित कर इस धरोहर को संरक्षित करने पर बल दिया। 

प्रश्न : ‘जनधन योजना’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : सरकार द्वारा चलाई गयी किसी भी योजना का उद्देश्य सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण से होता है। इसी क्रम में 15 अगस्त, 2014 को प्रधानमंत्री ने लालकिले से अपने पहले उद्बोधन में जनधन योजना की उद्घोषणा की जिसे 28 अगस्त 2014 से पूरे देश में लागू किया गया। यह एक वित्तीय समावेशन योजना है, जिसका उद्देश्य भारत के गाँवों, कस्बों एवं दूर-दराज क्षेत्रों में बसे समाज, की मुख्य धारा से कटे लोगों तक वित्तिय संस्थाओं की पहुँच को सुनिश्चित करना है। 

इस योजना के अन्तर्गत हर परिवार में एक बैंक खाता जरूरी होने का लक्ष्य रखा गया। साथ ही जिस व्यक्ति का खाता पहले से बैंकों में है वह भी इस योजना द्वारा जुड़कर इससे प्राप्त होने वाले लाभों का भागीदार बन सकता है। यह योजना सम्पूर्ण भारत को आर्थिक दृष्टि से सशक्त करने के लिए लागू की गयी है। यह योजना दो चरणों में लागू की जा रही है। पहले चरण में समूचे भारत के सभी परिवारों तक बैंक करायी जा रही है। दूसरे चरण 15 अगस्त, 2015 से 14 अगस्त, 2018 तक प्रस्तावित है, जिसमें लोगों को सूक्ष्म बीमा सुविधाएँ उपलब्ध कराने के साथ बैंक मित्र के माध्यम से स्वावलंबन जैसी असंगठित क्षेत्र की पेंशन योजनाओं के लाभ भी प्रदान किये जायेंगे। 

प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत खाता धारकों को 30000 रुपए की न्यूनतम राशि का जीवन बीमा दिया जायेगा, इसके साथ ही । लाख का एक्सीडेंटल बीमा दिया जायेगा। गरीबों को विपत्ति के समय पैसा के लिए साहूकार पर निर्भर होना पड़ता है, जिस कारण साहूकार उनकी बेबसी का फायदा उठाकर उनसे मनचाहा व्याज लेते हैं जिस कारण गरीब कर्ज मुक्त नहीं हो पाता है। इसी के मद्दे नजर प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत खाताध गरी छह महीने के अंतराल में 5000 तक की राशि ऋण के तौर पर सीधे बैंक से ले सकता है। जिससे गरीबों में आत्मनिर्भरता का भाव जगता है। 

अन्य एटीएम कार्ड के समान ही प्रधानमंत्री जन धन योजना के खाताध री को रुपे कार्ड की सुविधा दी जा रही है, यह रुपे कार्ड अन्य कार्ड की तरह, ही कार्य करता है। रुपे कार्ड के जरिए खाता धारक किसी भी बैंक की एटीएम से रुपये निकाल सकते है, यह एक माह में चार बार उपयोग किया जा सकता है। इससे ज्यादा बार भुगतान करने पर कुछ राशि का भुगतान करना पड़ता है। प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत खाता 10 वर्ष से अधिक आयु का बालक/ बालिका द्वारा भी खोला जा सकता है, जिसकी देख-रेख उनके माता-पिता कर सकते हैं। 

प्रधानमंत्री जनधन योजना की सफलता का पता इसी से चलता है कि पहले ही दिन इसके 1.5 करोड़ खाते खुल गये, 23 से 25 अगस्त के मध्य 18096130 खाते खोले गये, जिसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स द्वारा मान्यता दी गयी।

इस योजना की सफलता में जन भागीदारी का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा, इससे स्पष्ट हो जाता है कि अब हम धीरे-धीरे वित्तिय समावेशन की ओर बढ़ते जा रहे हैं. इससे लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी वे बचत करने के लिए प्रेरित होंगे। साथ ही बैंक में मुद्रा की अधिकता से जन कल्याण कार्यों में गति आयेगी। 

प्रश्न : ‘ब्रेक्जिट: आर्थिक संरक्षणवाद की ओर’ विषय पर एक निबंध लिखो। 

उत्तर : अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने देशीय हितों को अत्यधिक महत्त्व देने के लिए यूनाइटेड किंगडम का यूरोपीय यूनियन से बाहर होने की घटना को ‘ब्रेक्जिट’ के नाम से जाना जाता है। 23 जून, 2016 को किये गये जनमत संग्रह में लगभग 52 प्रतिशत ब्रिटेनवासियों ने ब्रेक्जिट के पक्ष में मतदान किया। इस मतदान से ब्रिटेन को यूरोपीय यूनियन से बाहर होने का रास्ता साफ हो गया। किसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन से किसी देश-विशेष के अलग होने की यह पहली घटना नहीं है, इससे पूर्व ग्रीस का यूरोजोन से अलग होने तथा अन्य भी इसी प्रकार की कई घटनाएँ घट चुकी है। परन्तु ब्रेक्जिट के कारणों में अंतर्निहित तत्त्वों के अवलोकन से अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों को यह सोचने को बल मिलता है कि यह कहीं आर्थिक संरक्षणवाद का अंतराष्ट्रीय स्तर पर प्रारंभ तो नहीं है। 

आर्थिक संरक्षणवाद वह आर्थिक नीति है जिसका अर्थ विभिन्न देशों के बीच व्यापार निरोधक लगाना है। व्यापार निरोधक विभिन्न प्रकार से लगाये जा सकते हैं- आयातित वस्तुओं पर शुल्क लगाना प्रतिबंधक आरक्षण, और अन्य बहुत से सरकारी प्रतिबंधक नियम। इसका उद्देश्य आयात को हतोत्साहित करना और विदेशी समवायों (कंपनियों) द्वारा स्थानिय बाजारों और समवायों को रोकना है। यह वैश्वीकरण तथा मुक्त व्यापार के बिल्कुल विपरीत है जिसमें सरकारी प्रतिबंधक बाधाओं को अतिन्यून रखा जाता है ताकि विभिन्न देशों के बीच व्यापार सुगमता से चलता रहे। दूसरे शब्दों में संरक्षणवाद का अर्थ ऐसी नीतियों को अपनाया जाना है जिससे उस देश के व्यापार और कर्मचारियों की विदेशी अधिग्रहण से रक्षा की जा सके। इसके लिए उस देश की सरकार द्वारा दूसरे देश के साथ किये जाने वाले व्यापार का विनियमन या प्रतिबंध किया जा सकता है। 

प्रश्न उठता है कि कौन से कारण थे जिसने ब्रिटेन को यूरोपीय यूनियन से बाहर होने को बल प्रदान किये। वहाँ के राष्ट्रवाद के समर्थक तथा रूढ़िवादियों ने शरणार्थी संकट, यूरोपीय यूनियन में ब्रिटेन के सापेक्ष जर्मनी तथा फ्रांस को अधिक महत्त्व, यूनियन के अनुरूप ब्रिटेन के अंतर्राष्ट्रीय हितों को निर्धारित करने का दबाव, यूरोपीय यूनियन के देशों के साथ मुक्त व्यापार, तथा देश में सृजित होने वाले रोजगार अपने देशवासियों के लिए आरक्षित करने इत्यादि इन तत्त्वों को उठाकर व्यापक जनसमर्थन प्राप्त किये। जिसका परिणाम संघ छोड़ने के लिए जनमत संग्रह तथा अन्ततः उसकी परिणति ‘ब्रेक्जिट’ के रूप में हुआ। 

इससे यह तो स्पष्ट है कि ब्रिटेन द्वारा ब्रेक्जिट का निर्णय उसके द्वारा मुक्त तथा बहुराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विरुद्ध एवं एकल अर्थव्यवस्था को अधिक महत्त्व देने का परिणाम है। ब्रिटेन का यूरोपीय यूनियन से बाहर निकलना तथा ट्रंप का अमेरिका में राष्ट्रपति चुना जाना आर्थिक संरक्षणवाद का एक पहल है। व्यापारिक संरक्षणवाद और पेशेवरों की आवाजाही रोकने से विकसित देशों की अर्थव्यवस्था को अल्पकाल में भले ही फायदा दिख रहा हो परंतु लंबी अवधि में उनका विकास धीमा हो जाने की पूरी संभावना है।

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