भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका एवं महत्त्व | भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व Drishti IAS

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका एवं महत्त्व

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका एवं महत्त्व | भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व Drishti IAS Importance of Agriculture in Indian Economy Drishti IAS

भारतीय अर्थव्यवस्था अति प्राचीनकाल से कृषि आधारित रही है। प्राचीनकाल में कृषि और पशुधन हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे। यही कारण है। कि भारत का स्वरूप एक कृषि प्रधान राष्ट्र के रूप में उभरा। अर्थव्यवस्था के निर्धारण में कृषि ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। देश में कृषि की प्रधानता रही और कृषि ही हमारी अर्थव्यवस्था की धुरी रही। तभी तो हमारे यहां ‘उत्तम कृषि, मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान’ की लोकोक्ति प्रचलित हुई। कृषि को सर्वोत्तम बताया गया। 

आज भी भारत में कृषि की प्रधानता का स्वरूप कायम है और भारत की पहचान एक कृषि प्रधान देश के रूप में बनी हुई है। सत्तर प्रतिशत देश की आबादी अभी भी गांवों में बसती है, जिसकी जीविका का मुख्य साधन कृषि, पशुधन और कृषि से जुड़े अन्य व्यवसाय हैं। हमारी अर्थव्यवस्था के निर्धारण में आज भी कृषि महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। पिछले दो-तीन दशकों में देश में औद्योगिक बयार तेजी से बही, किन्तु यह कृषि की गहरी व मजबूत जड़ों को उखाड़ नहीं पाई। यह जरूर है कि औद्योगीकरण व अन्य वाणिज्यिक गतिविधियों के बढ़ने के कारण सकल देशीय उत्पाद में कृषि क्षेत्र का भाग कम हुआ। भारत सरकार के आर्थिक समीक्षा के आंकड़ों से पता चलता है कि जहां वर्ष 1950-51 में सकल देशीय उत्पाद में कृषि क्षेत्र का भाग 56.5 था, वहीं वर्ष 2010-19 में यह घटकर 1 5.2 प्रतिशत ही रह गया। इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि की प्रभावी उपस्थिति बनी हुई है। 

देश की अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्त्वपूर्ण भूमिका बनी हुई है। ऐसा अनेक कारणों से है। सबसे प्रमुख कारण यह है कि आज भी भारत की कार्यकारी जनसंख्या (working population) का एक बड़ा हिस्सा रोजगार के लिए कृषि पर ही निर्भर करता है। यह भारत में जीवन निर्वाह का सबसे बड़ा माध्यम है। जिस देश की 80 प्रतिशत जनसंख्या प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर होगी, उस देश की अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्त्व को सहजता से समझा जा सकता है। आज भी भारत में कृषि कुल श्रम शक्ति के 50 प्रतिशत को रोजगार उपलब्ध करवाती है। 

कृषि का महत्त्व सिर्फ रोजगार के क्षेत्र में नहीं है। यही वह माध्यम है, जो हमारी उदरपूर्ति का बंदोबस्त करता है। इसी वजह से भारतीय कृषक के लिए अन्नदाता जैसे सम्मानसूचक शब्द का प्रयोग किया जाता है। कृषि क्षेत्र की कितनी व्यापकता है इसका पता इसी से चलता है कि यह क्षेत्र हमें न सिर्फ खाद्यान्न प्रदान करता है, बल्कि रोजमर्रा की अनेकानेक वस्तुओं व वस्त्र आदि के लिए भी हम कृषि पर निर्भर करते हैं। इस तरह से भी यह क्षेत्र अर्थव्यवस्था से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। कृषि क्षेत्र से सिर्फ मनुष्यों को ही खाद्यान्न नहीं मिलता है, बल्कि पालतू जानवरों के लिए चारा आदि भी हमें इसी क्षेत्र से मिलता है। पशधन से हमें दूध-घी जैसे उपयोगी पदार्थ प्राप्त होते हैं। इस तरह हम पाते हैं कि कृषि न सिर्फ देश की अर्थव्यवस्था का आधार है, बल्कि जीवन का भी आधार है। 

उद्योगों के लिए भी भारतीय कृषि का महत्त्व कम नहीं है। हमारे प्रमुख उद्योगों को कच्चे माल की आपूर्ति कृषि क्षेत्र से होती है। तमाम उद्योग तो ऐसे हैं, जो सीधे-सीधे कृषि आधारित हैं। मसलन, वनस्पति व बागान उद्योग, सती व पटसन वस्त्र उद्योग, चीनी उद्योग, डेयरी उद्योग आदि ऐसे उद्योग हैं, जिनका सीधा संबंध कृषि से है। इसी प्रकार अनेक उद्योग ऐसे हैं, जिनकी निर्भरता परोक्ष रूप से कृषि पर बनी हुई है। तमाम सारे लघु उद्योग भी कृषि पर ही केन्द्रित हैं। सभी को कच्चे माल के लिए कषि पर ही निर्भर रहना पड़ता है। इस तरह से अर्थव्यवस्था के निर्धारण में भारतीय कृषि न सिर्फ निर्णायक व महती भूमिका निभाती है, बल्कि औद्योगिक उन्नति को मजबूत आधार भी प्रदान करती है। आंकड़ों से पता चलता है कि विनिर्माण क्षेत्र में होने वाली आय का 50 प्रतिशत हिस्सा हमें कृषि क्षेत्र से ही प्राप्त होता है। पिछले कुछ वर्षों में देश में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग तेजी से फले-फूले हैं, जिन्हें कृषि क्षेत्र ने ही संबल प्रदान किया है। हमारे देश में परम्परागत उद्योग का आधार कृषि ही रही है, जिसने सदैव अर्थव्यवस्था के निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार क्षेत्र में भी भारतीय कृषि की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। आज भारत विभिन्न देशों को प्रचुर मात्रा में मसाले, आयल सीड्स, चाय, तम्बाकू, मेवे आदि निर्यात करता है, जिसका आधार कृषि ही है। हम कृषि से बनी वस्तुओं के भी बड़े निर्यातक हैं। कृषि का हमारे निर्यात में कुल 15 प्रतिशत का योगदान है। चूंकि हमारा निर्यात अच्छे स्तर का व गुणवत्तापूर्ण है, अतएव इससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जहां हमारी छवि अच्छी बनी है, वहीं ख्याति भी बढ़ी है। कृषि उत्पादों के निर्यात से हमें अच्छा राजस्व भी प्राप्त होता है, जिससे हमारी अर्थव्यवस्था भी सुदृढ़ होती है। यह निर्यात हमें विदेशी मुद्रा दिलवाता है, जो कि एक अच्छी अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है। 

कृषि क्षेत्र से सरकार को भी अच्छी आय होती है। यह सरकारों के राजस्व का प्रमुख स्रोत है। मालगुजारी, कृषि आयकर, सिंचाई कर व कृषि सम्पत्ति कर के रूप में राज्य सरकारों को कृषि क्षेत्र से अच्छी आय होती है। इसी प्रकार स्टाम्प फीस का मुख्य स्रोत वही लोग हैं, जो कृषि क्षेत्र से जुड़े हैं। इतना ही नहीं, देश में परिवहन उद्योग को भी विकसित करने में कृषि क्षेत्र की मुख्य भूमिका रही, जिससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली। कृषि उत्पादों को ढोने व इनके परिवहन में रेल व सड़क मार्गों की विशेष उपादेयता रहती है। कृषि को ध्यान में रखकर हमने इनका एक मजबूत तंत्र विकसित किया, जिससे कृषि व्यापार को प्रोत्साहन मिला और हमारी अर्थव्यवस्था को भी उच्च आयाम मिले। इस तरह से कृषि हमारे आर्थिक विकास की मजबूत आधारशिला बनी। भारतीय अर्थव्यवस्था हो, या भारतीय जनजीवन, सभी कृषि के इर्द-गिर्द ही चक्कर काटते नजर आते हैं। 

“At the head of all sciences & arts. At the head up civilization & progress, stand not militarism, the science that kills; not commerce, the art that accmulates, But agriculture, the mother of all industries, and the main tainer of human life..” 

यानी कृषि ही सभी उद्योगों की जननी है और मनुष्यों को जीवन प्रदान करने वाली है। 

यह सच है कि भारत आज भी एक कृषि प्रधान देश है और यहां की अर्थव्यवस्था की निर्धारक कृषि ही है, किन्तु विगत कुछ वर्षों में भारतीय कृषि क्षेत्र से जुड़े कुछ चिंतनीय पक्ष भी उजागर हुए हैं। इन पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। सबसे अधिक चिंतनीय पक्ष यह है कि राष्ट्रीय आय में कृषि का हिस्सा धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। इससे संबंधित आंकड़ों को हम शुरू में ही दे चुके हैं। विश्लेषणों से यह पता चलता है कि देश में निरंतर कृषि व गैर कृषि व्यवसायों में काम करने वाले श्रमिकों की औसत आय में अंतर बढ़ता चला जा रहा है, जिसकी तरफ भारत के नीति निर्धारकों का ध्यान संभवतः नहीं है। कृषि में काम करने वाले श्रमिकों का प्रति व्यक्ति जी.डी.पी. गैर कृषि व्यवसायों में काम करने वाले श्रमिकों की तुलना में मात्र पांचवां भाग है, जिसकी तरफ ध्यान दिया जाना आवश्यक है। दूसरा चिंतनीय पहलू यह है कि उद्योगों में कृषि का महत्त्व पहले की तुलना में घटा है। बीते कुछ वर्षों में हमारे देश में तमाम ऐसे उद्योग स्थापित तथा विकसित हुए हैं, जिनकी निर्भरता कृषि पर नहीं है। इस श्रेणी में रसायन उद्योग, लौह-अयस्क व इस्पात उद्योग, सूचना प्रौद्योगिकी, विभाग निर्माण तथा मशीनी-औजार व अन्य इंजीनियरी उद्योग आते हैं। इन उद्योगों की तरफ विशेष ध्यान दिये जाने से कृषि की भूमिका थोड़ी सिकुड़ी है, जो कि इस कृषि प्रधान देश के लिए अहितकर है। 

हमारे देश की आत्मा कृषि प्रधान है, अतएव यहां उन उद्योगों को प्रोत्साहन दिया जाना आवश्यक है, जिन्हें कृषि क्षेत्र अवलम्ब प्रदान करता है। वर्तमान समय में भारतीय कृषि का तीसरा चिंतनीय पहलू यह है कि नये दौर में निर्यात में आये विविधीकरण (Diversifica tion of Exports) के रुझान के कारण निर्यात में कृषि क्षेत्र के उत्पादों का ह्रास हआ है। वर्तमान में जहां कृषि उत्पादों के निर्यात का प्रतिशत 15 है, वहीं यह 1950-51 में लगभग 50 प्रतिशत था। यह गिरावट उचित नहीं है, हमें इस दिशा में ध्यान देना होगा। 

कृषि हमारा मूल है, हमें यह विस्मृत नहीं करना चाहिए। यह भारतीय अर्थव्यवस्था का भी मलाधार रहा है. तभी तो यह कहा गया है कि आर्थिक जीवन एक वृक्ष के समान है, जिसकी जड़ें कृषि, तना उद्योग तथा शाखाएं एवं पत्तियां व्यापार हैं। हमें अपने देश की नीतियों का निर्धारण करते समय इस कहावत को सदैव ध्यान में रखना चाहिए। जब हमारी जड़ें मजबूत व गहरी होंगी, तभी ऊपर का वृक्ष भी हरा-भरा रहेगा। यानी जब कृषि उन्नत होगी, तभी उद्योग व व्यापार फले-फूलेगा। अतः हमें उदारवाद व बाजारवाद से एहतियात बरतते हुए, उन नीतियों को प्रोत्साहित करना होगा, जो विशेष रूप से कृषि को प्रोत्साहित करें। भारत का परिवेश कृषि प्रधान है। यहां आयातित नीतियां सफल नहीं हो सकती हैं, इस बात का ध्यान हमारे नीति-नियंताओं को रखना होगा। हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था तभी प्रगति करेगी, जब हम कृषि की अनिवार्यता को समझेंगे व इसके अनुरूप नीतियों आदि का निर्धारण करेंगे। हमें इस तथ्य को समझना होगा कि जब कृषि होती है, तभी अन्य कलाएं भी पनपती हैं, अतः कृषक लोग ही मानव सभ्यता के निर्माता हैं। 

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