भगवान शिव की अमर कथा-नेत्र अर्पण करने वाला भक्त 

भगवान शिव की अमर कथा

भगवान शिव की अमर कथा-नेत्र अर्पण करने वाला भक्त (Immortal story of Lord Shiva)

थिमन नामक एक शिकारी था। एक दिन किसी जंगली जानवर का पीछा करते-करते वह जंगल के भीतर उस भाग में चला गया जहाँ वह पहले कभी नहीं गया था। उसे वन में बना हुआ एक शिवलिंग दिखाई दिया। उसने शिवलिंग को ईश्वर का कोई रूप समझकर मन ही मन विचार किया, “ओह! अहोभाग्य! कितना सुंदर लिंग है यह… मैं इसे सजाकर प्रतिदिन इसकी पूजा करूंगा।” पर उसे पूजा करने का सही तरीका तो आता ही नहीं था। 

वस्तुतः उस शिवलिंग की पूजा प्रतिदिन शिव कोचर अय्यर नामक एक ब्राह्मण किया करता था। अगले दिन थिमन उस शिवलिंग की पूजा करने गया। उसने सोचा पहले ईश्वर को स्नान कराना चाहिए। यह विचारकर वह पास की नदी पर गया। उसने नदी का जल अपने मुँह में भरा, कुछ फूल तोड़े, और शिवलिंग को मुँह के जल से नहलाकर, पुष्पों से सज्जित कर दिया। उसे ध्यान आया कि ईश्वर को प्रसाद भी अर्पित करना चाहिए। 

वह शिकारी तो था ही। उसे अपने शिकार किए हुए पशु का ख्याल आया। उसमें से कुछ माँस के टुकड़े काटकर उसने शिवलिंग के बगल में प्रसाद रूप में रख दिया। शिव भगवान थिमन की भक्ति और हृदय की पवित्रता से द्रवित हो गए। 

थिमन के चले जाने के पश्चात् ब्राह्मण अपने शिवलिंग की पूजा करने आया। शिवलिंग पर थूक, पास में रखे माँस के टुकड़ों को देखकर उसे बहुत अचंभा हुआ। वह जोर से बड़बड़ाया, “हे मेरे प्रभु! यह कैसा कुकृत्य हुआ है… यह कौन हो सकता है… अवश्य ही किसी पशु का कार्य है” यह कहकर वह उस स्थान की सफाई में जुट गया। 

अगले दिन भी यही घटना घटी। थिमन ने अपनी पूजा करी और ब्राह्मण ने सफाई करी। कई दिनों तक बार-बार ऐसा होने के कारण ब्राह्मण ने उस जानवर को देखने का निश्चय किया किन्तु असफल रहा। प्रतिदिन घटने वाली इस घटना से ब्राह्मण अत्यंत क्षुब्ध् और अशांत था। अंततः उसने शिव भगवान से प्रार्थना करी, “हे महादेव! मुझे नहीं पता कि यह सब क्यों घटित हो रहा है। कृपया मेरी सहायता करें।” 

शिव भगवान ने ब्राह्मण के समक्ष प्रकट होकर कहा, “हे वत्स! तुम इस घटना से अशांत मत होओ। यह सब मेरे भक्त की करामात है। उसके हृदय की पवित्रता और अनन्य भक्ति के कारण मुझे यह स्वीकार है। देखना चाहते हो तो उसकी भक्ति की पराकाष्ठा को मैं तुम्हें दिखाता हूँ… जरा धीरज रखो।” 

अगले दिन सुबह सवेरे ही ब्राह्मण एक पेड़ के पीछे छिपकर चुपचाप बैठ गया और सब देखने लगा। प्रतिदिन की भांति उस दिन भी थिमन आया और पूजा करने लगा। सर्वप्रथम उसने अपने मुँह में लाए जल से शिवलिंग को नहलाया, फिर पुष्प अर्पण कर माँस के टुकड़ों का भोग लगाते हुए उसने कहा, “हे प्रभु! अपने भक्त का लाया तुच्छ भोग ग्रहण करें।” 

भगवान शिव की अमर कथा

पेड़ के पीछे छिपा ब्राह्मण यह सब देखकर भयभीत हो उठा। तभी शिवलिंग की एक आँख से रक्त रिसने लगा। थिमन घबरा उठा। आस-पास कुछ जड़ी-बूटी लाकर उसने उनका रस निकाला और आँख पर लगा दिया। रक्त रिसना बंद हो गया और थिमन संतुष्ट हुआ। ज्योंही जाने के लिए वह मुड़ा त्यों ही रक्त पुनः रिसने लगा। सारे उपायों के बाद भी जब रक्त का रिसना न रुका, तब उसने शिव भगवान से प्रार्थना करी, “हे प्रभु! मुझसे क्या भूल हो गई है? मैं आपकी आँखों से रक्त का रिसना कैसे रोकूँ? मुझपर दया करने की कृपा करें और मार्ग सुझाएँ।” प्रार्थना करते ही उसके मस्तिष्क में एक विचार कौंधा। उसने अपने तीर से अपनी एक आँख निकाली और शिवलिंग की रिसती आँख पर लगा दिया। रक्त का रिसना आश्चर्यजनक रूप से रुक गया। थिमन प्रसन्न हो गया और ब्राह्मण हक्का-बक्का से देखता ही रह गया। 

थिमन वहाँ से जाने ही वाला था तभी शिवलिंग की दूसरी आँख से रक्त रिसने लगा। यह देखकर वह व्याकुल हो उठा। उसने अपनी दूसरी आँख के साथ भी वही प्रक्रिया करनी चाही। फिर उसने सोचा कि वह दूसरी आँख निकाल तो लेगा पर शिवलिंग पर सही स्थान पर किस प्रकार उसे विराजित करेगा। ऐसा सोचकर उसने अपने पैर के अंगूठे को रिसती आँख पर रखा और फिर तीर से अपनी दूसरी आँख निकालने लगा। तभी उसे शिवलिंग से आती आवाज सुनाई दी, “रुको, थिमन! मैं तुम्हारी अनन्य भक्ति से द्रवित हुआ। मैं तुम्हारी भक्ति की परीक्षा ले रहा था… तुम्हें आने वाली पीढियाँ सदा याद रखेंगी।” 

इस प्रकार शिव भगवान का आशीर्वाद मिलते ही आश्चर्यजनक रूप से थिमन की आँखें वापस आ गईं। वृक्ष के पीछे छिपा ब्राह्मण, हाथ जोड़े हुए बाहर निकलकर आया और थिमन से बोला, “हे श्रीमान्! आप प्रभु भक्ति में मुझसे कहीं आगे हैं। इस बात को भगवान शिव के प्रति अपनी असीम निष्ठा से आपने सिद्ध कर दिया है।” 

इस प्रकार थिमन नयनारों के मध्य कनप्पा नयनार के नाम से जाना गया। 

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