Ias exam essay topics in hindi-भारतीय संस्कृति की समग्ररूपता 

Ias exam essay topics in hindi

Ias exam essay topics in hindi-भारतीय संस्कृति की समग्ररूपता 

समग्ररूपता भारतीय संस्कृति की अद्भुत विशिष्टता है। अभिप्राय यह कि भारतीय संस्कृति में जो सम्पूर्णता परिलक्षित होती है, वह इसे एक समग्र स्वरूप प्रदान करती है। यह सम्पूर्णता एक दिन में विकसित नहीं हुई। इसे विकसित होने में सदियां लग गईं। मेल मिलाप, मेल-जोल और समन्वय ने भारतीय संस्कृति को जो समग्ररूपता प्रदान की, वह अन्यत्र दुर्लभ है। वस्तुतः भारतीय संस्कृति की समग्ररूपता विविध जातियों व कबीलों, विविध रीति-रिवाजों, विविध सम्प्रदायों, विविध मानव जातियों तथा विविध समाज व्यवस्थाओं के महामिलन का समग्र परिणाम है। 

“यह कहना असंगत न होगा कि विभिन्नताओं एवं बहुरूपताओं के महामिलन से ही भारतीय संस्कृति को समग्रता प्राप्त हुई। भारतीय संस्कृति को समग्र बनाने वाली यह विविधता किसी एक रूप में नहीं है। यह अनेक रूपों में विद्यमान है।” 

इस महामिलन ने ही भारतीय संस्कृति को महासागर जैसा वैराट्य दिया। इसी वैराट्य का चित्रण गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने 

अपनी कविता ‘हे मोर चित्त’ में किया है, जिसका भावार्थ है- “भारत । देश महामानवता का महासागर है। ओ मेरे हृदय! इस पवित्र तीर्थ में श्रद्धा से अपनी आंखें खोलो। किसी को भी ज्ञात नहीं कि किसके आह्वान पर मनुष्यता की कितनी धाराएं दर्वार वेग से बहती हई कहां कहां से आईं और इस महासमुद्र में मिलकर खो गईं। यहां आर्य हैं, यहां अनार्य हैं, यहां द्रविड़ और चीनी वंश के भी लोग हैं। शक, हूण, पठान और मुगल- न जाने कितनी जातियों के लोग इस देश में आए और सब के सब एक ही शरीर में समाकर एकाकार हो गए। समय-समय पर जो लोग रक्त की धारा बहाते हए एवं उन्माद और उत्साह में विजय के गीत गाते हए रेगिस्तान को पार कर एवं पर्वतो को लांघकर इस देश में आए थे, उनमें से किसी का भी अब अलग अस्तित्व नहीं है। वे सब के सब मेरे भीतर विराजमान हैं। मझसे कोई भी दूर नहीं है। मेरे रक्त में सबका रक्त है और मेरे स्वर में सबका स्वर ध्वनित हो रहा है।” शायद भारतीय संस्कृति की समग्ररूपता का इससे सुंदर कोई और चित्रण नहीं हो सकता। 

यह कहना असंगत न होगा कि विभिन्नताओं एवं बहुरूपताओं के महामिलन से ही भारतीय संस्कृति को समग्रता प्राप्त हुई। भारतीय संस्कृति को समग्र बनाने वाली यह विविधता किसी एक रूप में नहीं है। यह अनेक रूपों में विद्यमान है। अब धार्मिक वैविध्य को ही लें। चार बड़े धर्म–हिन्दू, बौद्ध, जैन एवं सिख इसी भारत भूमि पर उद्गमित हुए तो चार धर्म-ईसाई, इस्लाम, पारसी एवं यहूदी बाहर से आए। इनके अलावा दुनिया के लगभग सभी प्रकार के धर्मों का चलन यहां देखने को मिलता है। इतने धर्मों के बावजूद हमने अपनी धार्मिक सहिष्णुता के जरिए सभी धर्मों को सहेज कर रखा और अपने धार्मिक वैविध्य को अक्षुण्ण बनाए रखा। सहिष्णुता का यह भाव आज का नहीं है, यह तो प्राचीनकाल का है। तभी तो सम्राट अशोक ने अपने 12वें शिलालेख में यह उत्कीर्ण करवाया था “मनुष्य को अपने धर्म का आदर तथा दूसरे धर्म की अकारण निंदा नहीं करनी चाहिए। एक न एक कारण से अन्य धर्मों का आदर करना चाहिए। ऐसा न करके मनुष्य अपने सम्प्रदाय को क्षीण करता है तथा दूसरे सम्प्रदाय का अपकार करता है। जो कोई अपने सम्प्रदाय के प्रति भक्ति तथा उसकी उन्नति की लालसा से दूसरे धर्म की निंदा करता है, वह वस्तुतः अपने सम्प्रदाय की बहुत बड़ी हानि करता है। लोग एक दुसरे के धर्म को सुनें। इससे सभी सम्प्रदाय बहुश्रुत होंगे तथा संसार का कल्याण होगा।” इसी सहिष्णुता की उदात्तभावना ने भारतीय संस्कृति को अद्भुत धार्मिक समग्रता प्रदान की। 

भारत में भाषाई वैविध्य भी खूब है। विपुल भाषाएं हैं, तो इन भाषाओं में सृजित विपुल साहित्य है। इससे भारतीय संस्कृति की समग्रता की श्रीवृद्धि ही हुई है। रीति-रिवाजों और पहनावों में भी वैविध्य है, तो खान-पान का भी अनूठा वैविध्य है। प्रायः हर स्तर पर हमें अनूठा वैविध्य देखने को मिलता है, फिर चाहे वह कला के विविध क्षेत्र हों, संगीत का क्षेत्र हो, दर्शन हो, धर्म-अध्यात्म का क्षेत्र हो अथवा कोई अन्य। इन सारी विविधताओं के समन्वय से ही समन्वयात्मक संस्कृति जन्मी, जिसने समग्ररूपता को बल प्रदान किया। हमारी समन्वय की संस्कृति मानवतावाद की संस्कृति है, इसीलिए अक्षुण्ण है। यह संस्कृति ईरान, मिस्र, सुमेर व बेबीलोन की संस्कृतियों की तरह ध्वस्त होकर किस्सा-कहानी नहीं बनी। यहां यह रेखांकित करना समीचीन रहेगा कि जिन विभिन्नताओं ने यूरोप को अनेक देशों में बांट दिया, वही विभिन्नताएं न सिर्फ भारतीय सस्कृति की विशिष्टता बनीं, बल्कि इन्होंने भारत को एकता के सूत्र में भा बांधे रखा। सर हरबर्ट रिजले यह अकारण नहीं कहते हैं कि भारत में भाषा, धर्म, रीति-रिवाज, आचार-विचार और जो सामाजिक विभिन्नताएं हमें स्पष्ट दिखाई देती हैं, उन सब के पीछे निश्चित मौलिक एकता है, जिसने हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक के भारतीय जीवन को एक सूत्र में बांध रखा है। डॉ. राधा कुमुद मुखर्जी के अनुसार इस एकता का रहस्य भारत की सांस्कृतिक समग्ररूपता ही है। यही विभिन्नता जहां हमें सम्पूर्णता और समग्रता की ओर ले जाती है, वहीं अद्भुत समन्वयात्मक शक्ति भी प्रदान करती है। 

“इतिहास साक्षी है कि जब-जब इस समग्ररूपता को झटके लगे, यह खंडित हुई, हमें नुकसान उठाना पड़ा। भारत का पराधीन होना, पराधीनता से मुक्त होने में डेढ़ सौ वर्ष लग जाना और पराधीनता के बाद उसका बंटवारा होना, इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, जिनसे हमें सबक लेना चाहिए।” 

सच तो यह है कि भारतीय संस्कृति की समग्ररूपता में ही | इसकी आत्मा का निवास है। संत कबीर, बाबा फरीद, गुरुनानक, | महाप्रभु चैतन्य, दादू, बुल्लेशाह, तुकाराम, सूरदास, तुलसीदास, मीरा, अमीर खुसरो जैसी विभूतियों ने इस आत्मा को गढ़ा है। इस आत्मा की नींव है प्रेम और मानवतावाद। अनेक धर्मों, दर्शनों और रवायतों के बीच प्रेम का धागा अटूट बना रहा। इसी प्रेम और मानवता ने सांस्कृतिक समग्ररूपता को परिपक्वता प्रदान की। तभी तो सूफियों के सरताज मौलाना रूमी अपनी एक कविता में यह भाव व्यक्त करते हैं—“हिन्दुओं के वेद, पारसियों की जेंद अवेस्ता, मुसलमानों के कुरान और ईसाइयों के इंजील, मुसलमानों के काबा, हिन्दुओं के बुतखाना और पारसियों के आतिशकदा इन सबको मेरे दिल ने अपना लिया है। अब मेरे लिए प्रेम के सिवा कोई दूसरा खुदा रह ही नहीं गया है।” भारत की संस्कृति की समग्ररूपता पर ये भाव बहुत मौजूं हैं। यह प्रेम पर टिकी जीवंत संस्कृति है। 

भारतीय संस्कृति की समग्ररूपता मेलजोल से विकसित हुई है। राष्ट्रीय एकता और देश की भलाई के लिए यह समग्ररूपता नितांत आवश्यक है। इतिहास साक्षी है कि जब-जब इस समग्ररूपता को झटके लगे, यह खंडित हुई, हमें नुकसान उठाना पड़ा। भारत का पराधीन होना, पराधीनता से मुक्त होने में डेढ़ सौ वर्ष लग जाना और पराधीनता के बाद उसका बंटवारा होना, इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, जिनसे हमें सबक लेना चाहिए। 

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी सांस्कृतिक समरूपता को न सिर्फ सहेज कर रखें, बल्कि इसे और खुशरंग बनाएं। इसे छिन्न-भिन्न न होने दें। हमारी सांस्कृतिक समग्ररूपता की जीवंतता में ही हमारा हित है। हमें हमारे राष्ट्रीय जीवन में हर हाल में सांस्कृतिक समग्ररूपता को कायम रखना होगा। आज के बदले हुए दौर में हमें कौमी जिन्दगी का एक ऐसा खाका खींचना होगा, जिसमें शक-शुबह की गुंजाइश न हो और प्यार की इंतहा हो। 

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