टैगोर का मानवतावाद | रबिन्द्रनाथ टैगोर पर निबंध-Essay On Rabindranath Tagore In Hindi

टैगोर का मानवतावाद

टैगोर का मानवतावाद |रबिन्द्रनाथ टैगोर पर निबंध (Humanism of Tagore)

गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर आधुनिक भारतीय चिंतन की उन महान विभूतियों में से एक थे, जिन्होंने भारतीय संस्कृति और गौरव को संपूर्ण विश्व में फैलाया। उनके चिंतन में मानवतावाद की प्रधानता थी, जिसमें हिंसा, बल और शोषण का कोई स्थान नहीं था। उनके हृदय में निर्धनों तथा असहायों के प्रति गहरी संवेदना थी तथा वे इनका उत्थान चाहते थे। टैगोर विश्व नागरिक थे तथा उनकी दृष्टि भी विश्वव्यापी थी। उन्होंने समूचे विश्व को प्रेम, उल्लास, शांति और सद्भाव का संदेश दिया और सदैव सभी के सुखी होने की कामना की। उनके मानवतावादी दर्शन में ध्वंस का नहीं, निर्माण का स्थान था, वह असहयोग पर नहीं, बल्कि सहयोग और सद्भाव के प्रबल भाव पर केन्द्रित था। 

गुरुदेव कवि हृदय थे और सच्चा कवि अपनी कृतियों के माध्यम से मानव धर्म का ही तो उपदेश देता है। यही काम गुरुदेव ने किया और अपनी कृतियों के माध्यम से अपनी उस विश्व व्यापी दृष्टि का परिचय दिया, जिसके मुख्य अवयव थे—प्रेम, सहयोग, भ्रातत्व एवं सद्भावना। उन्होंने इन्हीं तत्वों के आधार पर विश्व के सभी नागरिकों को एकरूप करने का प्रयास किया। 

टैगोर के मानवतावादी दृष्टिकोण, उनकी संवेदनशीलता तथा सौंदर्यबोध से ही प्रभावित होकर कभी पं. जवाहर लाल नेहरू ने उनके बारे में यह टिप्पणी की थी—“व्यक्तिगत रूप से मैं गांधी के अधिक निकट हूं, लेकिन कई मायनों में भावनात्मक स्तर पर टैगोर के अधिक निकट हूं।” टैगोर का मोह पूरी मानवता के प्रति था और वे सदैव मानवता के कल्याण की कामना करते थे। उनके दर्शन में मानवीय मूल्यों का आधिक्य था। आधिक्य क्या, उनका संपूर्ण दर्शन ही मानवीय मूल्यों पर ही केन्द्रित था। उन्होंने अपने इस दर्शन के माध्यम से यह प्रतिपादित किया कि धर्मशास्त्रों तथा राष्ट्र और समाज के नियम कानून की सार्थकता इसी में है कि वे मनुष्य के मनुष्यत्व के विकास में सहायक हो। राष्ट्र, समाज और धर्म के आदर्श चाहे जितने उच्च एवं उदार क्यों न हों, किन्तु यदि इनके बावजूद मनुष्य का जीवन शृंखलित बना रहे, उसे आत्म-विकास का संयोग प्राप्त न हो, तो उनका कुछ भी मूल्य नहीं हो सकता। 

टैगोर ने अपनी कृतियों एवं दर्शन के माध्यम से कबीर जैसे जनकवि की संवेदनशील दृष्टि की पैरोकारी की और अपने हर कार्य व्यवहार में मानवीय हितों एवं मानवता को सर्वोपरि रखा। इस प्रयास में कहीं-कहीं वे उपनिषद से भी प्रभावित दिखते हैं। अंग्रेजी के भी उन कवियों ने उन्हें प्रभावित किया, जो मानवीय संवेदनाओं एवं सीमारहित मानवता के पक्षधर थे। 

टैगोर ने अपने दर्शन में कभी भी मानवता या मानव को तुच्छ नहीं माना। रवीन्द्र नाथ से पूर्व अनन्त, सर्वशक्तिमान, सृष्टिपालक और संहारक ईश्वर अथवा ब्रह्म पर ही मनुष्य का ध्यान केन्द्रित रहता था। उसी ब्रह्म की या ईश्वर की उपासना करना, उसके प्रति श्रद्धा या भक्ति द्वारा अपने सब भावों और इच्छाओं का समर्पण करके उसी को प्राप्त करना अथवा उससे तादात्म्य का अनुभव करना या उसमें लीन हो जाना ही मनुष्य जीवन का सर्वश्रेष्ठ धर्म समझा जाता था, किन्तु टैगोर ने इससे इतर मानवता के महत्त्व को समझा और समग्र रूप से इसे रेखांकित किया। 

मानव जीवन के विविध पहलू टैगोर के चिंतन के केंद्र बिन्दु बने। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से मानवीय सहयोग एवं सद्भाव का ही चित्रण किया। अपने मानवतावादी दर्शन से सुखद और संतुष्ट मानव जीवन के रास्ते दिखाए। उन्होंने सदैव इस बात का प्रयास किया कि कैसे मानव समाज आदर्श समाज और मानव आदर्श मानव बन सके। मानवीय श्रेष्ठता और सौहार्द ही उनके दर्शन की विशिष्टता थी, जिसे स्थापित करने में उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन खपाया। 

टैगोर का व्यक्तित्व एवं कृतित्व दोनों ही मानवता को समर्पित थे। जहां उन्होंने अपनी कविताओं के जरिये इंसान का इंसान से हो भाईचारा का पैगाम दिया, वहीं खुद भी समाज और मानव कल्याण के प्रति समर्पित रहे। यही कारण है कि छुआछूत एवं अस्पृश्यता जैसी कुरीतियों का उन्होंने जमकर विरोध किया और इसे मानवीय मूल्यों के विपरीत बताया। वह सामाजिक साम्य के पक्षधर थे और किसी भी स्तर पर किया जाने वाला विभेद या भेदभाव उन्हें पसंद नहीं था। उनका मन इतना विशाल था कि प्रबल राष्ट्रवादी होते हुए भी सीमाओं का बंधन उन्हें पसंद नहीं था। इसीलिए उन्होंने पूरी मुखरता से विश्व मित्रता (Universal Brotherhood) की पैरोकारी की। इससे यही ध्वनित होता है कि राष्ट्र के बजाय वह जनता के ज्यादा पक्षधर थे। उनका यह मानना था कि जनगण एक और सार्वभौम है। वह यह चाहते थे कि मानव धर्म की अभिव्यक्ति मानव एकता के रूप में हो। लोगों के हार्दिक मिलन से ही मानवता का उन्नयन संभव है। 

टैगोर का यह भी मानना था कि मानव कल्याण के लिए यह आवश्यक है कि लोगों के बीच आध्यात्मिक भावों को पुष्पित एवं पल्लवित किया जाए। टैगोर ब्रह्मवादी तो थे, मगर उनका ब्रह्म जगत से परे, निर्विकार, निर्गुण निराकार और शुद्ध सच्चिदानंद रूप नहीं था। उन्होंने इसकी व्याख्या अपने ढंग से इस प्रकार की है— “जगत् और ब्रह्म का इस प्रकार संबंध है, जैसा कि नर्तक का उसके नृत्य से, किसी गायक का उसके गीत से, किसी कवि का उसकी कविता से। यह जगत् ब्रह्म का एक गीत है, नाटक है, नृत्य है और इस कविता, गीत, नृत्य अथवा नाटक में वह अपने को पूरे प्रेम, रुचि और लगन के साथ अधिक से अधिक व्यक्त करने, प्रकट करने और परिणत करने का प्रयत्न कर रहा है। हम सब ही उसकी इस लीला के पात्र हैं। हमें पूर्ण रूप से तन-मन-हृदय से उसकी इस आनन्दमय लीला को अधिक से अधिक पूर्ण और सफल बनाने में अपना सहयोग देना चाहिए। इस लीला को पूर्ण रूप से समझने और इसमें प्रविष्ट परमात्मा के साथ एकता का अनुभव करके आनंद का अनुभव करना चाहिए।” वस्तुतः गुरुदेव मानवीय पक्ष को सर्वोपरि रखते थे, इसीलिए उनका मानना था कि मानव जीवन में ही मनुष्य एवं ब्रह्म का मिलान होना चाहिए। यहीं पर सीमित और असीमित का मेल होना चाहिए। इसके लिए गुरुदेव यह जरूरी मानते थे कि मनुष्य अपने में अनन्त होने की प्रवृत्ति को जागृत करके विचारों, भावनाओं और क्रियाओं को अनंत से अनुप्राणित करे, अपनी और समाज की बनाई हुई झूठी सीमाओं को देश, जाति, रंग तथा सम्प्रदायकृत दीवारों को तोड़कर अनन्त प्रेम से प्रेरित होकर केवल सब प्राणियों से ही नहीं, बल्कि समस्त प्रकृति के साथ अपनत्व एवं बंधुत्व का व्यवहार करे। समस्त ब्रह्मांड जब एक ही ब्रह्म की लीला है, तो भला उसमें गैर कौन है। किससे मेरा संबंध नहीं है? सब सबसे संबंधित हैं। सब में एक ही । प्राण और एक ही मन व्याप्त है। जब इस अनंत अनेकता में एक ही व्याप्त है, तो विश्व बंधुत्व ही हमारे जीवन का लक्ष्य और हमारे सब कामों का मूल प्रेरक होना चाहिए। टैगोर के मानवतावादी दर्शन की सबसे खास बात यह थी कि वह विश्व को मनुष्य की आत्मा का मंदिर समझते थे। मानवतावाद की रक्षा के लिए ही उन्होंने सामूहिक सुरक्षा को आवश्यक बताया। 

गुरुदेव का यह स्पष्ट नजरिया था कि शिक्षा वही श्रेष्ठ है, जो मानव को मानव के निकट लाए और उसमें परस्पर प्रेम का भाव जागृत करे। वे उस शिक्षा के पैरोकार थे जो मानव को प्रेम करना सिखाती है। टैगोर के मानवतावादी दर्शन में शिक्षा की विशेष भूमिका थी। वे कविता, संगीत, चित्रकला आदि द्वारा बालकों में मानवीय गुणों के विकास के हिमायती थे। वह शिक्षा को विश्व बंधुत्व के प्रसार का मुख्य माध्यम मानते थे। 

वस्तुतः टैगोर मानवतावादी मनस्वी थे और उन्होंने सच्चे ज्ञान की अनुभूति की थी। मानवता से प्रेरित इसी सच्चे ज्ञान की अनुभूति उन्होंने समूचे विश्व के लोगों को करवाने का पूरा प्रयास किया। 

आज के मौजूदा दौर में टैगोर के मानवतावादी दर्शन की प्रासंगिकता कहीं ज्यादा है। जिस तरह से मानवीय मूल्यों का ह्रास हो रहा है, संवेदनशीलता घट रही है, उग्रवाद एवं आतंकवाद जैसी दुष्प्रवृत्तियां सिर उठा रही हैं, असहिष्णुता बढ़ रही है, उसे देखते हुए आवश्यकता इस बात की है कि हम अधिक से अधिक लोगों को टैगोर के मानवतावादी दर्शन की सीख दें तथा उससे निकटता बढ़ाने के लिए प्रेरित करें। विश्व में प्रेम, भाईचारा, सौहार्द और सद्भाव की स्थापना के लिए हमें टैगोर के मानवतावादी दर्शन का वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार करना होगा। शायद ऐसा करके ही हम गुरुदेव के मानवता के पुनरुद्धार के स्वप्न को साकार कर पाएंगे और एक ऐसे विश्व की स्थापना कर सकेंगे, जो दुख, शोक, विक्षेप एवं विनाश से मुक्त होगा। जिसकी आधारशिला होगी, प्रेम, निर्माण और सहयोग। 

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