इच्छा शक्ति कैसे मजबूत करें? इच्छा-शक्ति का विकास कैसे करें |how to strengthen will power

इच्छा शक्ति कैसे मजबूत करें

 इच्छा शक्ति कैसे मजबूत करें? इच्छा-शक्ति का विकास कैसे करें (Develop your strong will-power) 

एक महान संत थे। अचानक उनके पास सत्य की खोज कर रहा साधक आ गया और पूछने लगा, ‘सत्य क्या है? कृपया मुझे बताइए।’ संत ने साधक को ध्यान से देखा और बोले – ‘आज यहां पानी उपलब्ध नहीं है और मुझे बहुत प्यास लगी है । पहले तुम मेरे लिए कहीं से पीने का पानी ले आओ, तभी मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दे सकूँगा।’ साधक पानी की खोज में निकल पड़ा और रास्ते में जो पहला घर मिला वहीं उसने दस्तक दी। एक अत्यंत सुंदर स्त्री ने द्वार खोला । एक-दूसरे को देख दोनों प्रेम में पड़ गए। दोनों ने विवाह कर लिया और फिर उनके बच्चे हुए । एक दिन मूसलाधार बारिश में उनका घर-द्वार डूबने लगा, तो वह साधक पत्नी का हाथ पकड़कर और बच्चों को कंधे पर बैठाकर चलने लगा । पानी की तेज धार में जब वे सब बहने लगे, तो वह चिल्लाया ‘बचाओ-बचाओ।’ संत उसके सामने आ खड़े हुए और बोले – ‘तुम तो सत्य की खोज में घर से निकलकर मेरे पास आए थे और तब मैंने तुम्हें पीने का पानी लेने भेजा था, फिर तुम इतने गहरे पानी में कैसे फंस गए?’ यह सुनकर साधक निरुत्तर हो गया और भूला-सा खड़ा रहकर उनकी ओर देखता रहा। 

तात्पर्य यह है कि इच्छा शक्ति में दृढ़ता का अभाव हमारे लक्ष्य की ओर बढ़ने में रुकावट बन खड़ा होता है और हम अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाते, जैसा कि उपर्युक्त उदाहरण में साधक की सत्य खोजने की इच्छा शक्ति दृढ़ नहीं थी और इसीलिए उसने बीच में दूसरा मार्ग पकड़ लिया था। 

विक्टर ह्यूगो ने कहा है – 

‘People do not lack strength, they lack will-power.’ लोगों में शारीरिक बल का अभाव नहीं होता है, उनके पास ‘इच्छा-शक्ति की कमी होती है। 

क्या है इच्छा-शक्ति (Will-power) 

हमारे मन में ढेरों इच्छाएं (Desires) उत्पन्न होती हैं। जिस वस्तु की हम मन में अभिलाषा करते हैं, हमारा मन अपनी कल्पना में उस वस्तु का निर्माण करता है। हमारी हार्दिक इच्छाएं, प्रेरणाएं कोरी कल्पना नहीं होतीं, बल्कि ये आगाज होती हैं वास्तविकता की। इन ढेरों इच्छाओं में से जो सबसे प्रबल होती है, वह इच्छा-शक्ति कहलाती है। इस इच्छा शक्ति के बाद ही कर्म-सृष्टि की प्रक्रिया शुरू होती है और अंत में वह कार्य रूप में परिणत हो जाती है। मनोवैज्ञानिक भी कहते हैं कि सभी रचनात्मक कार्यों के पीछे इच्छा-शक्ति (will-power) ही क्रियाशील होती है। Will-power is a powerful instinct of mind, like a battery, which generates energy within you. It propels you to an action with great force. You may call it a burning desire, which motivates you to achieve a purpose. In fact, this is a starting point of your move ment to convert your dream into real. 

स्पष्ट है, इच्छा-शक्ति के कार्य रूप में परिणत होने का एक विकास क्रम होता है, जो इस प्रकार है – 

मन में उठी ढेरों इच्छाओं (Heaps of desires) में से जो अधिक बलवती होती है, वह हमारी इच्छा-शक्ति बनती है।

इच्छा शक्ति में जैसे-जैसे प्रबलता आती है, उसका स्वरूप भी अंत में हमारी रुचि (Liking / Interest) में बदल जाता है, जैसा कि निम्न Diagram में दर्शाया गया है – 

क्या है इच्छा-शक्ति

ध्यान रहे … 

  • दृढ़ इच्छा शक्ति के अभाव में रुचि पैदा नहीं होती।
  • रुचि के अभाव में सफलता नहीं मिलती, क्योंकि अरुचि पूर्ण कार्य बेमन से किए जाते हैं।
  • अपनी रुचि के अनुसार ही कार्य-लक्ष्यों का निर्माण किया जाता है।
  • लक्ष्य निर्धारण के बाद लक्ष्य प्राप्ति की पूर्व-तैयारी (Prepared ness for success) का होना आवश्यक है और इस क्रम में सर्वप्रथम है – इच्छा-शक्ति को सुदृढ़ करना, जिससे अबाध रूप से हम लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें।

अब प्रश्न उठता है कि इच्छा शक्ति के बावजूद भी अधिकांश लोग लक्ष्य-सिद्धि में असफल क्यों होते हैं? इसका कारण स्पष्ट है – सफल व्यक्ति अपनी इच्छा शक्ति को सुदृढ़ करके रुचि, लगन, उत्साह, आत्मविश्वास तथा योग्यता से कार्य करते हैं, जबकि असफल व्यक्ति काम को बोझ समझकर बेमन से करते हैं जिसके कारण वह कार्य या तो अधूरा रह जाता है अथवा घटिया किस्म का होता है, क्योंकि उनकी इच्छा शक्ति में दृढ़ता का अभाव होता है और ऐसी स्थिति में वे काम के प्रति रुचि, उत्साह आदि को विकसित नहीं कर पाते। 

इसलिए अबाध रूप से अपने निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जरूरी है कि आप पहले अपनी इच्छा शक्ति को मजबूत करें। आपकी इच्छा शक्ति जितनी प्रबल होगी, उतनी ही उसमें दृढ़ता आएगी और दृढ़ता के उसी अनुपात में – 

  • आपकी रुचि बढ़ेगी, 
  • आपके उत्साह को ऊर्जा मिलेगी, 
  • आप दृढ़ निश्चयी बनेंगे, 
  • आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी, 
  • आप पूरी तल्लीनता से काम में जुटे रहेंगे और फिर, 
  • आप निश्चित तौर पर सफलता प्राप्त कर लेंगे। 

याद रखें, अपनी प्रबल इच्छा शक्ति के कारण ही विलियम शेक्सपीयर में नाटक लिखने की रुचि थी और इससे वे विश्व के एक महान नाटककार बने; संगीत के अद्भुत शौकीन मोजार्ट विश्व के महान संगीतकारों की पंक्ति में प्रतिष्ठित हुए थे; सारी रात छत पर बैठकर तारे निहारने के शौकीन गैलीलियो ने कई नए-नए तारों की खोज करके अन्यतम श्रेय प्राप्त किया था, आदि। 

गोइथे (Goethe) ने कहा है – 

‘He who is of firm will moulds the world to himself.’ 

दृढ़ इच्छा-शक्ति वाला व्यक्ति दुनिया को अपने माफिक ढाल लेता है। 

 इच्छा-शक्ति का विकास कैसे करें

कुछ प्रेरक उदाहरण (Inspiring Examples) :

(दृढ़ इच्छा-शक्ति रखने वाले व्यक्ति अपनी नई सूझबूझ से नए-नए ईजाद करके अपने जीवन-लक्ष्य की सिद्धि के साथ ही गौरव प्राप्त करते हैं। थॉमस अल्वा एडीसन पेट्रोमैक्स में काम करते-करते परेशान हो गए थे। उन्हें बार-बार लैंप में तेल भरना पड़ता था। वे इस झंझट को समाप्त करना चाहते थे। उन्होंने सोचा, जब ये कालिख तेल के चलते जल सकती है तो बिजली के दो तारों से क्यों नहीं? उन्हें एक उपाय सूझा, क्यों न एक लंबी कालिख बनाई जाए और बिजली के दो तारों के बीच रखकर देखें । उन्होंने अपने एक मित्र को पास बुलाया । रुई के मोटे धागे को तेल में डुबोया और जलाकर राख कर दिया, उस राख को उठाकर फिलामेंट के बीच रखने का प्रयास किया, पर वह टूट गया। कितने ही प्रयासों में वह रास्ते में टूट जाता, जिससे वे परेशान हो गए। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। सातवीं बार वे राख को दो फिलामेंटो के बीच स्थापित करने में सफल हो गए और उन्होंने जैसे ही स्विच ऑन किया, कालिख से जुड़ा फिलामेंट प्रकाशित हो उठा । एडीसन की खुशी का ठिकाना न था। इस तरह बिजली के बल्ब का आविष्कार हुआ | उन्होंने संसार को बिजली की रोशनी दी थी, इसलिए उनकी मृत्यु पर अमेरिका की सभी बिजली की बत्तियां बुझा दी गई थीं। 

(2) लक्ष्य को प्राप्त करने की जितनी गहरी इच्छा शक्ति आपके अंदर होगी, उतनी ही सफलता हासिल करने की प्रेरणा आपको मिलेगी। इस संदर्भ में यहां एक उदाहरण है – – एक दिन एक व्यक्ति द्वारा सफलता का रहस्य पूछे जाने पर महात्मा सुकरात उसे एक नदी की तरफ ले गए | नदी के अंदर बढ़ते-बढ़ते जब पानी उनकी गर्दन तक आ पहुंचा, तो उन्होंने अचानक उसका सिर पकड़कर पानी में डुबो दिया । वह सिर को बाहर निकालने के लिए छटपटाया। उन्होंने जैसे ही उसका सिर पानी के ऊपर निकाला तो उस व्यक्ति ने पहले एक गहरी सांस ली। सुकरात ने पूछा – ‘तुम्हारा सिर पानी के अंदर था, तब तुम्हें किस चीज की सबसे ज्यादा इच्छा थी?’ व्यक्ति ने जवाब दिया, ‘हवा की। सुकरात बोले – ‘यही सफलता का रहस्य है जो तुम जानना चाहते हो । सफलता की इच्छा उतनी ही गहरी हो, जितनी कि पानी में डूबने वाले को हवा की होती है।’ 

(3) कहते हैं कि दृढ़ इच्छा शक्ति से लोग आंखों के बिना भी देख सकते हैं। इस बात को साबित कर दिखाया है विस्कोंसिन के टिम कोर्डेस ने, जिन्होंने आंखों की रोशनी नहीं होने के बाद भी मेडीकल साइंस में एम.डी. की डिग्री हासिल की है। 

टिम कॉर्डस जन्म के पांच माह बाद ही लेबर नामक रोग का शिकार हो गए थे, जिसमें आंखों की देखने की क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगी और 15 वर्ष की उम्र तक पहुंचते उनकी आंखों की रोशनी पूरी तरह से चली गई। वे बिल्कुल अंधे हो गए, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपनी पढ़ाई जारी रखकर मेडीकल स्कूल में दाखिला लिया । वहां पर उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, किन्तु वे हर बार सफल होते गए और हाल ही उन्होंने एम.डी. की उपाधि लेकर साहस का उदाहरण पेश किया। दिन में 10 से 12 घंटे अस्पताल में काम करने वाले टिम अपने रोगियों का पूरा ध्यान रखते हैं। 

टिम कहते हैं – ‘मेरी दृढ़ इच्छा-शक्ति ने ही आज मुझे इस सुनहरे मुकाम पर पहुंचाया है। मुझको शुरु में कुछ दिक्कतों का सामना अवश्य करना पड़ा, परंतु बाद में सब कुछ ठीक होता चला गया।’ टिम अपने मरीजों का परीक्षण स्वयं करते हैं, जिसमें एक्स-रे, ब्लड टेस्ट, इंजेक्शन लगाना आदि शामिल है। मेडीकल स्कूल के प्रोफेसर आरडंट कहते हैं, “उसने मुश्किलों से घबड़ाए बिना चिकित्सा की हर विधि को भलीभांति सीखा।’ 

गौरतलब है कि टिम कॉर्डस स्काइंग, संगीत में भी पारंगत हैं। अब उनकी अगली मंजिल फार्माकोलॉजी में पीएचडी की उपाधि प्राप्त करना है। वे मानते हैं कि यह तो उनके जीवन-यात्रा की शुरुआत है, उन्हें मानवता की सेवा में अभी काफी कुछ योगदान करना है । वे कहते हैं – ‘दृष्टिहीनता जीवन की बाधा नहीं है। व्यक्ति को अपनी दृढ़ इच्छा-शक्ति का सम्मान करते हुए लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पूरे समर्पण के साथ प्रयास करना चाहिए। 

(4) ऊंची उपलब्धि हासिल करने के लिए हमें अपनी शून्य इच्छा-शक्ति को विकसित करने की प्रेरणा किसी से भी मिल सकती है, बशर्ते हमारा नजरिया सकारात्मक है । एक ऐसा ही प्रसंग यहां प्रस्तुत है, जिसमें एक राजकुमार ने प्रकृति के सौंदर्य से विमुग्ध होकर स्वयं सर्वोत्तम बनने की इच्छा शक्ति को अपने अंदर विकसित किया – 

एक राजकुमार अपने सुंदर बगीचे में टहल रहे थे कि अचानक उनके मन में ख्याल आया, ‘बगीचे से उन्हें क्या फायदा?’ आम के पेड़ से राजकुमार ने पूछा – ‘बताओ तुम मेरे लिए क्या कर रहे हो? पेड़ ने जवाब दिया-‘गर्मी में मेरी शाखाएं मीठे आमों से लद जाती हैं। माली उन्हें इकट्ठा करके आपको व आपके मेहमानों के सामने प्रस्तुत करता है। ‘शाबाश’, राजकुमार बोले। 

फिर राजकुमार ने विशाल वट वृक्ष से यही प्रश्न किया । वट वृक्ष ने जवाब दिया – ‘सुबह-सुबह जो पक्षी मधुर गीत गाकर आपको उठाते हैं, वह चहचहाते पक्षी मेरी शाखाओं पर आराम करते हैं। मेरी फैली हुई शाखाओं के नीचे ही आपकी भेड़ें व गाय भैंसे आराम करती हैं।’ ‘शाबाश’, राजकुमार ने कहा। 

अब राजकुमार ने घास से पूछा – “तुम मेरे लिए क्या कर रही हो?’ घास ने उत्तर दिया – ‘आपकी भेड़ों व गाय-भैंसों को पुष्ट बनाने के लिए हम अपना बलिदान देते हैं। राजकुमार प्रसन्न होकर बोले- ‘बहुत अच्छा।’ इसके बाद राजकुमार ने नन्हें डेजी फूल से पूछा – ‘नन्हें मियां, तुम मेरे लिए क्या कर रहे हो?’ डेजी ने कहा- ‘कुछ नहीं। मैं आपको मीठे फल नहीं देता, आपके पक्षियों को घोंसला बनाने लायक स्थान नहीं दे सकता । यदि मैं कुछ कर सकता हूं तो वह यह है कि जितना हो सके, मैं एक सर्वोत्तम नन्हा डेजी बनूं । ये शब्द राजकुमार के दिल को छू गए । घुटनों के बल झुककर उन्होंने नन्हें डेजी को चूम लिया। ‘शाबाश! नन्हें फूल। तुम जैसा और कोई नहीं है। मैं तुम्हें हमेशा अपने परिधान के बटन-होल में लगाऊंगा, ताकि मुझे यह महान सच्चाई हमेशा याद रहे कि मैं भी जहां तक हो सके अपने अंदर सर्वोत्तम बनने की इच्छा-शक्ति को विकसित करूं । यह मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। 

Anon ने कहा है – 

‘The limit of man’s achievement is his will.’ मनुष्य की उपलब्धि की सीमा ‘इच्छा’ है। 

 इच्छा-शक्ति का विकास कैसे करें

(5) जिनके पास दृढ़ इच्छा शक्ति है, वे कार्य-लक्ष्य की पूर्ति करने का संकल्प दृढ़ता के साथ कर लेते हैं और ऐसे व्यक्ति दृढ़ निश्चयी कहलाते हैं | संकल्प वह आत्मबल प्रदान करता है, जिससे सफलता का मार्ग स्वयं प्रशस्त होता जाता है । इतिहास, पुराण सभी इसके साक्षी हैं कि संकल्प के सामने देव, दानव और यहां तक कि भाग्य भी समर्पण कर देता है। इस संदर्भ में एक उदाहरण देखिए – 

एक माता-पिता ने एक प्रकाण्ड पंडित को अपने बालक का हाथ दिखाया। पंडित जी ने हाथ देखकर बड़ी निराशा से बताया कि बालक के भाग्य में विद्या नहीं है। यह सुनकर बालक ने पूछा – ‘महाराज, कहां होती हैं विद्या की रेखाएं, कृपया मुझे बताएं ।’ पंडितजी ने बालक के हाथ में संकेत से रेखा का स्थान बता दिया। उसी क्षण बालक एक तेज धार वाला चाकू लाया और उसकी नोंक से एक गहरी रेखा उसने हथेली पर खींच दी। खून की धार बह चली । पंडितजी बालक के साहस से चकित हो उठे । उन्होंने बालक के साहस की सराहना करते हुए कहा – ‘चाकू से तो हाथ पर रेखाएं नहीं बनतीं, लेकिन दृढ़ निश्चय से यह संभव है कि तुम विद्या प्राप्त कर सको।’ 

चूंकि बालक के मन में विद्या प्राप्त करने की दृढ़ इच्छा शक्ति विद्यमान थी, उसने उसी क्षण दृढ़ता से शपथ ली और भाग्य में विद्या न होने की घोषणा को मिथ्या सिद्ध कर वह एक दिन महान व्याकरणाचार्य बन गया । उस बालक का नाम था – पाणिनी, जिन्हे विश्व में संस्कृत के महान् व्याकरणाचार्य के नाम से जाना जाता है।

निष्कर्ष 

नदी सागर से मिलने के लिए बहती है । यदि उसके मार्ग में अवरोध आ जाए तो उसको तोड़कर वह आगे बढ़ जाती है। इसी प्रकार से अभीष्ट सफलता पाने के लिए हमारी इच्छा शक्ति में दृढ़ता होनी चाहिए। दृढ़ इच्छा शक्ति से ही रुचि का विकास होता है और रुचि के अनुकूल ही लक्ष्यों का निर्माण होता है। अगर इच्छा-शक्ति में कभी शिथिलता आ जाए, तो हमारे कार्य अरुचिपूर्ण मन (यानी ‘बेमन) से होंगे जो या तो अधूरे रह जाएंगे अथवा कार्य में सुंदरता नहीं आएगी। टीम वर्क में टीम की भावना (Team spirit) का होना अनिवार्य है, क्योंकि टीम स्प्रिट ही टीम मैम्बर्स की सामूहिक रुचि (Collective Interest) होती है और यह शक्ति ही टीम के निर्धारित लक्ष्यों को समयबद्ध पूरा करती है। 

दृढ़ इच्छा शक्ति के अभाव में हमारे मन-मस्तिष्क में नकारात्मक विचारों के पनपने से हृदय की दुर्बलता को बल मिलता है, जो हमारी लक्ष्य-सिद्धि में घातक सिद्ध होता है। इसका ज्वलंत उदाहरण महाभारतकाल के अर्जुन का है – ‘कुरुक्षेत्र के युद्ध-स्थल पर सैन्य-परीक्षण के दौरान अपने स्वजनों, गुरु आदि को देखकर अर्जुन का मन इस भ्रम से भर गया कि उसके हाथों ये सब मारे जाने से वह पाप का भागी बनेगा । यह इसलिए हुआ, क्योंकि उसकी इच्छा शक्ति इतनी सुदृढ़ नहीं थी कि वह इस भ्रम को मन में आने से रोक दे। फलस्वरूप वह हृदय की दुर्बलता को प्राप्त होकर अपना साहस, उत्साह, लगन और आत्मविश्वास सभी कुछ खो बैठा और अपना ‘गांडीव’ धनुष-बाण जमीन पर रखकर एक कायर की भांति रथ पर जाकर बैठ गया । 

अंत में ऐसी स्थिति से बचने के लिए हम अपने संकल्प को भी मजबूत करें। इसके लिए हम अपनी इच्छा-शक्ति का विकास करें। 

इच्छा शक्ति कैसे मजबूत करें?

यह हम सभी जानते हैं कि धर्म-अधर्म क्या है? अच्छा-बुरा क्या है? परन्तु हम अक्सर अधर्म (यानी बुरे) पक्ष की ओर ज्यादा झुकाव रखते हैं । इसका कारण है – हमारी सुदृढ़ इच्छा-शक्ति का अभाव। 

‘अच्छे’ का अर्थ है जोड़ना । यह कार्य सुदृढ़ इच्छा-शक्ति के बिना नहीं हो सकता, जिसका अभाव हमारे अंदर अक्सर होता है। ‘बुरे’ का अर्थ है तोड़ना, इसमें इच्छा शक्ति का होना आवश्यक नहीं है | स्वामी बुधानंदजी कहते हैं कि “विनाशकारी वस्तुओं में बड़ा आकर्षण होता है और माया के राज्य में बुरी चीजों में अदम्य खिंचाव होता है, लेकिन जल्दबाजी में कदम उठाकर हम बाद में पछताते हैं और अपने ही रचे अंधकार में रुदन करते हैं।’ इसकी पुष्टि में लंकापति रावण का यहां एक ज्वलंत उदाहरण है – मरणासन्न लेटे हुए रावण ने दशरथ-पुत्र लक्ष्मण से कहा था – ‘मेरी इच्छाएं थीं कि मैं समुद्र का खारा जल मीठा करूं और मृत्युलोक से इंद्रलोक में सीधा जाने के लिए सीढ़ियां बनाऊं, लेकिन मैंने इन्हें साकार रूप न देकर पहले श्रीराम से युद्ध करने का संकल्प ले लिया और इसका परिमाम जो मुझे मिला है, उसे तुमने देख लिया है। 

इसी प्रकार हम भी जीवन में कभी-कभी गलत शब्दों का प्रयोग करके दूसरे के हृदय को घायल कर देते हैं, जिसका परिणाम हमें ही हानि से भुगतना पड़ता है। इन शब्दों का बुरा प्रभाव जानते हुए भी हमारे अंदर इतनी इच्छा शक्ति नहीं होती कि हम उन शब्दों को भीतर ही रोक लें । सारांश यह है कि दृढ़तापूर्वक गलत को नकार देना और सही को अपनाना ही इच्छा-शक्ति है, जिसका अभाव हमारे भीतर होता है। भले ही मन में ढेरों इच्छाएं उत्पन्न हों, लेकिन एक सुदृढ़ इच्छा-शक्ति का उदय हृदय से होता है, जिसका सीधा संबंध चेतना (जो सकारात्मक रूप है) से जुड़ा है। अतः दुर्बल पक्ष से बचने का एक ही साधन है और वह है – इच्छा शक्ति का विकास । 

अब प्रश्न है, कैसे हो इच्छा-शक्ति का विकास? बस, आपको इच्छा शक्ति की रेसिपी को स्वयं के अंदर की रसोई में तैयार करना आना चाहिए। इस रेसिपी में क्या-क्या है जरूरी, देखिए यहां – 

सबसे पहले हम अपनी भीतरी बुराइयों पर जीत हासिल करें। 

इसका सरल उपाय यह है कि हम अपने दिव्य तत्व (Divinity) को पहचानें, जो हमारे हृदय में निवास करता है, अर्थात् हम अपने चेतन स्वरूप में स्थिर हों । दिवत्य को जानने के लिए हमें ‘कायरता’ और ‘मिथ्यावाद’ से बचना होगा । स्वामी विवेकानंद ने कहा है – 

‘उठो, साहसी बनो, वीर्यवान बनो। तुम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हो। तुम्हें जो कुछ बल और सहायता चाहिए, सब तुम्हारे भीतर ही विद्यमान है।’ 

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को चेतन स्वरूप में स्थिर हो जाने को इसलिए कहा था कि वह ‘संशयात्मक बुद्धि से हटकर ‘निश्चयात्मक’ बुद्धि को ग्रहण करे, जिससे वह अपनी पूर्ववत इच्छा शक्ति को पुनः जागृत कर कायर – जैसे कृत्य त्यागे और रणभूमि में खड़ा होकर अपने लक्ष्य की सिद्धि करे । ऐसा करने से ही वह विजेता बना था।

एक बार की विफलता को अपने सम्पूर्ण जीवन की असफलता बिल्कुल न मानें । विफलता और सफलता में जमीन-आसमान का अंतर है। विफलता इसलिए मिली कि पहले इच्छा शक्ति का अभाव था । इच्छा शक्ति के विकास के लिए दृढ़ इच्छा का होना अत्यंत आवश्यक है।

केवल भौतिक वस्तु की ओर अपना झुकाव न बढ़ाएं। आदर्श स्थापित करने वाली इच्छा को भी अपने अंदर विकसित करें। उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद से उनकी पत्नी शिवरानी ने अपने पास से पैसे देते हुए कहा – ‘आप अभी बाजार जाकर अपने लिए कोट का कपड़ा ले आइए।’ प्रेमचंदजी ने कहा – ‘ठीक है, आज कपड़ा आ जाएगा। शाम को जब वे खाली हाथ लौटे, तब उनकी पत्नी ने पूछा, “कपड़ा क्यों नहीं लाए? कुछ क्षण तो वे चुप रहे फिर बोले- ‘मैं कुछ ही दूर गया था कि सामने से प्रेस का एक कर्मचारी आ गया। उसकी लड़की की शादी में पैसों की कमी पड़ गई थी, उसकी आवश्यकता को देखकर मैंने अपने कोट के कपड़े के पैसे उसे दे दिए। मेरा कोट तो फिर कभी भी बन सकता है, किन्तु लड़की की शादी नहीं टल सकती थी।’ शिवरानी धीरे से बोली, ‘मैं जानती थी कि यही होगा । वह नहीं मिलता तो और कोई मिल 

जाता। प्रेमचन्दजी मुस्कराकर रह गए। सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति आदर्शमय जीवन में विश्वास करते हैं। वे परदु:खकातर होते हैं, भौतिक-संग्रह में विश्वास नहीं करते, बल्कि संचय के वितरण, त्याग में ही जीवन का उत्कर्ष समझते हैं। 

ऐसी इच्छा शक्ति को भी मन में आने दें, जिससे सामाजिक जीवन \की निराशाजनक परिस्थितियों में सुधार के लिए उल्लेखनीय परिवर्तन लाए जा सकते हैं। जैसे- बंग प्रदेश के राजा राममोहन की इच्छा शक्ति ने यदि सती प्रथा को बंद नहीं कराया होता तो आज भारत में महिलाओं की क्या दशा होती।

आज हमारे देश और सामुदायिक जीवन में चरित्र निर्माण की अत्यधिक आवश्यकता है। इस दिशा में अपनी इच्छा शक्ति का विकास कर हम क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकते हैं। हरबर्ट स्पेंसर ने कहा है – 

‘मानव की सबसे बड़ी आवश्यकता शिक्षा नहीं, चरित्र है और यह उसका सबसे बड़ा रक्षक है।’ 

दूसरों की इच्छाओं के आगे न झुककर केवल अपनी इच्छाओं कासम्मान करें, जिससे हमारी इच्छा शक्ति के विकास को बल मिले। ध्यान रहे, परिस्थितियों से हार मानकर अपनी रुचि का परित्याग करने अथवा किसी और के थोपे काम को चुपचाप स्वीकार करने से कामयाबी हासिल नहीं होती। दो भाई थे। एक बादशाह की नौकरी करता था और दूसरा मेहनत करके गुजर-बसर करता था। बादशाह की नौकरी करने वाले भाई ने मेहनत करने वाले भाई से कहा – ‘तू भी बादशाह की नौकरी क्यों नहीं कर लेता? तुझे कड़ा परिश्रम नहीं करना पड़ेगा। इसके जवाब में उसने कहा, ‘भाई, तू भी मेहनत करके क्यों नहीं कमाता? इससे तुझे गुलामी और अपमान की जिंदगी से छुटकारा मिल जाएगा। समझदारों का कहना है कि सुनहरी पेटी बांधकर बादशाह के दरबार में दिनभर खड़े रहने से कहीं ज्यादा अच्छा है मेहनत की रोटी खाकर आत्मसम्मान की रक्षा की जाए।’ 

बीते दिनों के बारे में अधिक सोचना और आने वाले दिन की चिंता करना ये दोनों इच्छा शक्ति के विकास में बड़ी बाधाएं हैं । अतः हम अपनी मानसिक ऊर्जा को व्यर्थ ही नष्ट होने से बचाएं, जिससे इच्छा शक्ति का विकास-क्रम निरंतर जारी रहे | ध्यान रहे, ऊर्जा नष्ट होती है – 

  • व्यर्थ चिंतन में, 
  • व्यर्थ की चिंता से, .व्यर्थ की बातों में. 
  • निरर्थक कार्यों में, 
  • निरुद्देश्य और बेबुनियाद भय से, 
  • कामुक विचार और कल्पनाओं में, 
  • उन चीजों के लिए परेशान होने में जिनसे हमारा दूर-दूर तक का वास्ता नहीं है।

* एकाग्रता से इच्छा शक्ति के विकास में बड़ी सहायता मिलती है। मन एकाग्र होगा तो वह इधर-उधर नहीं भटकेगा और इच्छा शक्ति बढ़ेगी, खासकर जिनमें हमारी रुचि अथवा शौक है।

* कमजोर इच्छा शक्ति को सुदृढ़ बनाने का एक उपाय है – चिंतन प्रणाली। इसके जरिए हम अपने विचारों को गलत दिशा में जाने से रोककर अपनी इच्छा शक्ति में सुदृढ़ता अवश्य ला सकते हैं। 

चलते-चलते 

कुछ लोग यह कहते हैं कि इच्छा शक्ति के विकास की जरूरत उन्हीं को होती है जो महत्त्वाकांक्षी हैं और बड़े-बड़े कार्यों में लगे हैं। ऐसे लोग अपनी वर्तमान उन्नति में ही संतोष करते हैं 

और उससे आगे बढ़ने के लिए अपनी इच्छा शक्ति का विकास नहीं कर पाते। 

तो क्या संतोष का अर्थ वर्तमान उपलब्धि तक ही सीमित है? महान विचारक इमर्सन कहते हैं – 

‘व्यक्ति को कभी भी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। वर्तमान स्थिति को विकास के सोपान का एक पायदान मानें। विकास का पायदान अंतहीन होता है, अत: किसी पायदान को अंतिम मानकर ही न बैठ जाएं। उत्कर्ष पर वही पहुंचता है जिसे वर्तमान स्थिति से क्षोभ होता है और अधिक पाने की उत्कृष्ट अभिलाषा।’ 

उक्त कथन का सार यह है कि ‘संतोष’ एक लक्ष्य का निर्धारण कर लेने के पश्चात उस दिशा में धैर्य से चलने की स्थिति है। दूसरे शब्दों में, संतोष एक पड़ाव है, जहां कुछ समय रुककर हमें फिर आगे बढ़ जाना है। 

याद रहे, आगे बढ़ने के लिए जिस धरातल की आवश्यकता पड़ती है, संतोष उसी का निर्माण करता है। संतुष्ट मनःस्थिति वाला व्यक्ति अपनी तुलना स्वयं से करता है, किसी दूसरे से नहीं और फिर वहीं से आगे बढ़ने की योजना बनाता है। 

अतः कहीं आपकी इच्छा शक्ति बीच में शिथिल न पड़े, इसके लिए आप उत्साही मन से अपने मन-संकल्प को दोहराते रहें और साथ में अपनी इच्छा शक्ति का विकास करते रहें। 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.

thirteen + thirteen =